हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लघुकथा # 150 ☆ “सहानुभूति” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “सहानुभूति”)  

☆ कथा-कहानी # 150 ☆ लघुकथा –  “सहानुभूति” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

स्याह अंधेरे को चीरती अमरकंटक एक्सप्रेस अपनी पूरी स्पीड से दौड़ रही है। कड़ाके की ठंड में सामने की बर्थ में दाढ़ी वाला आदमी कांप रहा है, पतला सा कंबल ओढ़े वह धुप्प अंधेरे में भागते पेड़ पौधों को ताक रहा है। अचानक ट्रेन एक छोटे से प्लेटफार्म में रुकती है, कुछ यात्री शयनयान में घुसते हैं, उसकी निगाह एक सुंदर सी नवयौवना पर जाती है, काले लम्बे बाल सुन्दर नाक नक्श वाली वह नवयुवती जगह तलाशती हुई उस दाढ़ी वाले से अनुनय विनय करके उसके बगल में बैठ जाती है। 

ट्रेन अपनी स्पीड पकड़ लेती है। घड़ी की सुइयां रात्रि साढ़े बारह बजने का संकेत दे रहीं हैं। सभी यात्री अपनी अपनी बर्थ में सो गए हैं, कुछ जाग रहे हैं। 

युवती दाढ़ी वाले से सटती जा रही है और वह बेचारा संकोचवश खिड़की तरफ दबा जा रहा है। बड़ी देर बाद युवती ने ऐसा क्या किया कि वह आदमी चौकन्ना सा होकर अपने कंबल को बार बार समेटने लगा, शहडोल स्टेशन आने को है कि अचानक मैंने देखा युवती दाढ़ी वाले की सोने की चैन खींच चुकी थी एवं युवती ने चिल्लाना शुरू कर दिया था, बचाओ….. बचाओ ये दाढ़ी वाला आदमी मेरी इज्जत लूटने की कोशिश कर रहा है, इस बीच मैंने देखा उसने अपना ब्लाउज फाड़ लिया और साड़ी के पल्लू को पेटीकोट से अलग कर दिया। कोलाहल से कोच के अधिकांश लोग जाग गये एवं हम लोगों की बर्थ के पास काफी लोग इकट्ठे हो गए, गाड़ी स्टेशन पर खड़ी हो गई, उस युवती ने रोना धोना शुरू कर दिया है, भीड़ बढ़ रही है, भीड़ से मारो… मारो.. की आवाज से दाढ़ी वाला आदमी कांप उठा है, पर वह चुपचाप अपनी जगह पर ही बैठा हुआ है। भीड़ की आवाजें सुनकर वहां से गुजर रहे पुलिस वाले दौड़कर कोच में घुसे तब तक भीड़ ने उस दाढ़ी वाले को लात घूसों से तर कर दिया है और पुलिस वालों के आते ही उस पर कई डण्डे पड़ चुके हैं। वह कराह उठा, वह बेचारा हक्का बक्का सा मार खाते हुए कुछ बोलना चाहता था पर उसकी आवाज कोलाहल में गुम हो जाती थी। मैंने भी भीड़ और पुलिस को समझाने की कोशिश की तो दो चार डण्डे मुझे भी पड़ चुके थे। युवती बिफरती हुई धीरे धीरे कोच से बाहर भागने की फिराक में थी, भीड़ के कुछ लोग उसकी सुंदरता से घायल से हो गये थे और उस दाढ़ी वाले को कोस रहे थे। एक ने मां बहन की गाली बकते हुए कहा – साला चलती ट्रेन में युवती की इज्जत पर हाथ डाल रहा था। पुलिस वाले उस दाढ़ी वाले पकड़ कर घसीटते हुए प्लेटफार्म पर उतार रहे थे, वह लगातार अपने कंबल को मुंह में दबाए हुए कह रहा था – साब मेरी कोई ग़लती नहीं है बल्कि उस युवती ने मेरे सोने की चैन खींच ली है, ऐसा सुनते ही पुलिस वाले ने उस पर लातों की बरसात कर दी वह पस्त होकर जमीन पर गिर गया। पुलिस वाले ने जैसे ही उसका कंबल पकड़ कर घसीटना चाहा, कंबल पुलिस वाले के साथ में आ गया और भीड़ यह देखकर दंग रह गयी कि उस दाढ़ी वाले के दोनों हाथ कटे हुए थे और वह बेचारा अपाहिज कराह उठा। अचानक भीड़ उस युवती को तलाशने मुड़ गई, पर वह युवती भाग चुकी थी। भीड़ से आवाज आई कि ये आदमी उस युवती का ब्लाउज और साड़ी तो फाड़ ही नहीं सकता, इसके तो दोनों हाथ ही नहीं है, जरुर वह युवती जेबकतरे गैंग से संबंधित होगी पर रोज चलने वाले ये सिपाही जरूर युवती को जानते होंगे। इतना सुनते ही पुलिस वाले डण्डा पटकते हुए आगे बढ़ गये…..

इंजन की ओर हरी बत्ती चमक उठी, इंजन सीटी बजा रहा है, भीड़ देखते देखते ट्रेन में समा गई, लोग व्याकुल होकर खिड़कियों से झांक रहे हैं, अनायास मेरे हाथ जंजीर तक पहुंच गये और एक झटके के साथ ट्रेन रुक गई, भीड़ का हुजूम दाढ़ी वाले की तरफ टूट पड़ा, मेरे बाजू वाला यात्री भीड़ के चरित्र पर हंस पड़ा, दाढ़ी वाले के लिए सहानुभूति की लहर फैल चुकी थी और भीड़ ने उस दाढ़ी वाले को अपने सर पर उठा लिया फिर ट्रेन धीरे से चल पड़ी ….।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – किसान ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा – किसान ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मित्रो, यह मेरी लेखन यात्रा की सबसे पहली लघुकथा है , जो अपने ही संपादन में प्रकाशित प्रयास पत्रिका के लघुकथा विशेषांक में सन् 1970 में लिखी और प्रकाशित की । कहते हैं कि पुराने चावल बहुत स्वादिष्ट होते हैं । क्या, इस लघुकथा में ऐसी कोई महक आ रही है ? बताइएगा जरूर।

-कमलेश भारतीय

जब उसने बैलाें काे खेताें की तरफ हांका ! तब उसे लगा कि उसमें असीम शक्ति है । वह बहुत कर सकता है ! बहुत कुछ । जब उसने बीज बाेया ! तब उसे लगा कि उसने अपने दिल से छाेटा हिस्सा खेत में बिखेर दिया । जब उसने सिंचाई की ! तब उसे लगा अपना स्नेह बहा दिया । और फ़िर अंकुर फूटे-उसके सपने जन्मने लगे । और फसलें लहलहाने लगीं । उसके सपने लहलहाने लगे । उसे लगने लगा कि समूचा आकाश रंगीन ताराें सहित उसके खेताें में उतर आया है ।

फसल लाद कर घर से बैल-गाड़ी हांकने लगा ताे पत्नी ने अपनी फ़रमाइशें रख दीं । वह मुस्कराता रहा । मंडी में उसने बैलगाड़ी राेकी ताे उसे महसूस हुआ मानाें किसी श्मशान में आ रुका है ! जहां छाेटे-बड़े गिद्ध पहले से उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।

फसल बिक़ी – हिसाब बना ।

जाने किसने किससे बेईमानी की थीं । वह उधार के हाथाें नक़द का दांव हार गया । ब्याज के हाथाें मूल गंवा आया । वह फ़िर खाली हाथ था । फटे हाल था । बैल भूखे थे । वह भूखा था । वह लालपरी के संग काेई लाेक-संगीत गुनगुनाता हुआ वापिस जा रहा था आैर उसे लग रहा था कि आकाश बहुत ऊंचा है तथा तारे कितने फ़ीके हैं ! रात कितनी अजब अंधेरी है । गांव तक पहुंच पायेगा कि नहीं?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – लैंस ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

 ? संजय दृष्टि – लघुकथा – लैंस ??

….दादू, स्कैनर ख़राब हो गया है। कैमरा की इमेज कैप्चर कैपेसिटी ख़त्म हो गई है। स्टोरेज भी फुल हो गया है। अब फोटो नहीं आएगी।

वह सोचने लगा, आँख का लैंस तो ताउम्र फोटो खींचता है। बल्कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, दिखना भले कम होता जाये, स्कैनिंग की क्षमता बढ़ती जाती है। स्टोरेज कभी फुल नहीं होता। चित्र धुँधलाते ज़रूर हैं पर याद का लेप लगाने पर गहरे होकर उभरते हैं।

…दादू, टेक इट ईजी। कूल…आजकल टेक्नोफास्ट एज है। लेटेस्ट टेकनीक है। इंजीनियरिंग इज ऑन इट्स टॉप। कल ठीक करा लाऊँगा।

सचमुच तकनीक और इंजीनियर में फ़र्क तो है, उसने सोचा और आँख का लैंस हौले से मूँद लिया।

क्रमशः…

© संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 97 ☆ पेट की दौड़ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर विचारणीय लघुकथा ‘पेट की दौड़ ’. डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस लघुकथा रचने  के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 97 ☆

☆ लघुकथा – पेट की दौड़ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

कामवाली बाई अंजू ने फ्लैट में अंदर आते ही देखा कि कमरे में एक बड़ी – सी मशीन रखी है। ‘दीदी के घर में रोज नई- नई चीजें ऑनलाईन आवत रहत हैं।अब ई कइसी मशीन है?‘ – उसने मन में सोचा। तभी उसने देखा कि साहब आए और उस मशीन पर दौड़ने लगे। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। सड़क पर तो सुबह – सुबह दौड़ते देखा है लोगों को लेकिन बंद कमरे में मशीन पर? साहब से तो कुछ पूछ नहीं सकती। वह चुपचाप झाड़ू–पोंछा करती रही पर कभी – कभी उत्सुकतावश नजर बचाकर उस ओर देख भी लेती थी। साहब तो मशीन पर दौड़े ही जा रहे हैं ?  खैर छोड़ो, वह रसोई में जाकर बर्तन माँजने लगी। दीदी जी जल्दी – जल्दी साहब के लिए नाश्ता बना रही थीं। साहब उस मशीन पर दौड़ने के बाद नहाने चले गए। दीदी जी ने खाने की मेज पर साहब का खाना रख दिया। साहब ने खाना खाया और ऑफिस चले गए।

अरे! ई का? अब दीदी जी उस मशीन पर दौड़ने लगीं। अब तो उससे रहा ही नहीं गया। जल्दी से अपनी मालकिन दीदी के पास जाकर बोली – ए दीदी! ई मशीन पर काहे दौड़त हो? काहे मतलब? यह दौड़ने के लिए ही है, ट्रेडमिल कहते हैं इसको। देख ना मेरा पेट कितना निकल आया है। कितनी डायटिंग करती हूँ पर ना तो वजन कम होता है और ना यह पेट। इस मशीन  पर चलने से पेट कम हो जाएगा तो फिगर अच्छा लगेगा ना मेरा – दीदी हँसते हुए बोली।

पेट कम करे खातिर मशीन पर दौड़त हो? — वह आश्चर्य से बोली। ना जाने क्या सोच अचानक खिलखिला पड़ी। फिर अपने को थोड़ा संभालकर बोली – दीदी! एही पेट के खातिर हमार जिंदगी  एक घर से दूसरे घर, एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग काम करत – करत कट जात है। कइसा है ना! आप लोगन पेट घटाए के लिए मशीन पर दौड़त हो और हम गरीब पेट पाले के खातिर आप जइसन के घर रात-दिन दौड़त रह जात हैं।

©डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – हार गए तो… ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – हार गए तो…।)

☆ लघुकथा – हार गए तो… ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

इस बार नेता जी के चुनाव प्रचार में कुछ पुराने कार्यकर्ता तो थे ही, पर ज़्यादातर पिछले पांच साल में पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने वाले युवा ज़ोर-शोर से प्रचार में जुटे थे। काफ़ी समय से बेरोज़गार चले आ रहे इन युवाओं ने नेता जी की चापलूसी को ही रोज़गार मान लिया था। पार्टी के चुनाव चिह्न वाला पटका इनके गले में रहता। नेता जी की दबंग छवि के चलते आम लोग इन कार्यकर्ताओं से थोड़े दबते थे और इन्हें देखते ही उनके भीतर का डर सम्मान सनी मुस्कुराहट में बदल जाता था। कभी-कभी कोई व्यक्ति प्यार से इनका कंधा थपथपा कर कहता – और नेता जी! यह सुनते ही कार्यकर्ता गर्वित महसूस करते हुए अति विनम्र हो जाता।

नेता जी ने तमाम कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश दे दिया था कि यह चुनाव हमें किसी भी क़ीमत पर जीतना है। अंदरखाते उन्हें सुनील जी से मिल लेने की हिदायत भी दे दी गई थी। सुनील जी नेता जी के खजांची थे। कार्यकर्ता उनके पास अपने-अपने क्षेत्र के बिक सकने वाले मतदाताओं तथा उनकी क़ीमत का हिसाब-किताब जमा करवाते और पैसा ले आते। प्रचार के दौरान दो कार्यकर्ताओं की बात होने लगी। दोनों पुराने परिचित थे और दोनों खुलकर बात भी कर लिया करते थे। युवा कार्यकर्ता ने पूछा – आपने सुनील जी से कितनी रक़म ली?

– एक पैसा भी नहीं, मैं तो सुनील जी से मिला भी नहीं। हाँ, मेहनत कर रहा हूँ।

– सिर्फ़ मेहनत से क्या होता है, अब तो पैसा ही भगवान है। आपके गाँव में तो बिकाऊ वोटर भी बहुत हैं।

– हाँ, हैं तो सही।

– तो फिर पैसे लिए क्यों नहीं, अपना भी चाय-गुड़ बन जाता है तो हर्ज़ क्या है?

– कोई हर्ज़ नहीं है। वोट खरीदने के लिए ये लूट का पैसा ही तो देंगे। लूट के माल में कार्यकर्ता भी थोड़ा मुँह मार ले तो कोई पाप नहीं है।

– फिर आप सुनील जी से क्यों नहीं मिले?

– पिछली बार मिला था, अभी तक भुगत रहा हूँ। दुआ करो कि नेता जी चुनाव जीत जाएँ, हार गए तो…

– हार गए तो?

– हार गए तो जितने पैसे तुम्हें वोटरों में बाँटने के लिए मिलेंगे, सब ब्याज़ समेत तुमसे वापस लिए जाएँगे। पिछले चुनाव में बीस लाख मिले थे मुझे। अट्ठारह-उन्नीस लाख तो मैंने बाँटे भी थे। मेरी बदक़िस्मती कि नेता जी हार गए। ज़मीन बेचकर पैसे चुकाए मैंने! इसलिए कहता हूँ, उनके जीतने की दुआ करो। हार गए तो…

– हार गए तो… हार गए तो… कार्यकर्ता आशंका में डूब रहा था। गर्मी नहीं थी, पर युवा कार्यकर्ता के माथे से पसीना चू रहा था।

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क –  406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – वादा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

 ? संजय दृष्टि –  वादा ??

अपनी समस्याएँ लिए प्रतीक्षा करता रहा वह। उससे समाधान का वादा किया गया था। व्यवस्था में वादा अधिकांशतः वादा ही रह जाता है। अबकी बार उसने पहले के बजाय दूसरे के वादे पर भरोसा किया। प्रतीक्षा बनी रही। तीसरे, चौथे, पाँचवें, किसीका भी वादा अपवाद नहीं बना। वह प्रतीक्षा करता रहा, समस्या का कद बढ़ता गया।

आज उसने अपने आपसे वादा किया और खड़ा हो गया समस्या के सामने सीना तानकर।…समस्या हक्की-बक्की रह गई।..चित्र पलट गया। उसका कद निरंतर बढ़ता गया, समस्या लगातार बौनी होती गई।

© संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – साक्षात्कार ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – साक्षात्कार।)

☆ लघुकथा – साक्षात्कार ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

संपादक महोदय ने कहा- जिस कवि का साक्षात्कार लेने जा रहे हो, वे हमारे लिए नायक हैं, उनकी गरिमा का ख़याल रहे। ‘तथास्तु’ कहने के बाद अब मैं कवि के सामने बैठा था।

मैं कवि से बहुत से सवाल पूछना चाहता था- साम्प्रदायिकता पर आपका स्टैंड, बदलता परिदृश्य और आपकी कविता, आपकी कविता के सरोकार वगैरह ; पर मैंने पूछा- खाने में आपको क्या अच्छा लगता है, आपका पसंदीदा साबुन कौन सा है, आप किस समय कौन से काग़ज़ पर किस पैन से लिखते हैं, कौन सी संस्थाओं ने आपको सम्मानित किया है, क्या आपकी कविता से प्रभावित होकर किसी लड़की ने आपको ख़त लिखा? और इसी तरह के कई मज़ेदार सवाल मैंने किए। कवि ने दर्पमिश्रित मुस्कुराहट के साथ जवाब दिए।

मैंने साहित्यिक ईमानदारी को क़ब्र में दफ़नाया और उस क़ब्र के ऊपर मक़बरे के रूप में शीशे का दमकता ताजमहल खड़ा कर दिया। कवि तथा संपादक दोनों प्रसन्न थे। दोनों ने मेरी क़ाबिलियत की भरपूर तारीफ़ की। संपादक जी ने भावुक होते हुए मुझे सलाह दी- तुम ऐसे ही कुछ और साक्षात्कार लेकर किताब छपवा लो, कोई न कोई पुरस्कार तो तुम्हें दिलवा ही देंगे।

अब आप ही बताइए क्या मुझे संपादक जी का कृतज्ञ नहीं होना चाहिये?

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क –  406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लघुकथा # 148 ☆ “सास-बहू” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक मजेदार लघुकथा – “सास-बहू”)  

☆ लघुकथा # 148 ☆ “सास-बहू” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

सास – – बहू देखो तो… वाटस्अप पर आया ये वीडियो….. 

जिसमें बहू अपनी सास को घसीट घसीट कर मार रही है।

 

बहू – – चिंता मत करो सासू जी, मेरी सहेली है और ट्रेनिंग मैंने ही दी है।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – भरोसा ☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆

डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’

(आज  प्रस्तुत है  डॉ कामना कौस्तुभ जी की एक विचारणीय लघुकथा भरोसा) 

 ☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा – भरोसा ☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆ 

मई की कड़क धूप में उसने दरवाजा खटखटाया बोली, उसके परिवार में कोई नहीं है उसे काम चाहिए। मैंने अपनी होशियारी दिखाते हुए उस सीधी साधी महिला का फोन नंबर लेकर उसे टाल दिया।

आखिरकार एक दिन तबीयत खराब होने पर मैंने उसे बुला ही लिया। आते ही ज्योति ने  हमारे घर के साथ दिलों में भी जगह बना ली थी। अब हम सब पूरी तरह से उस पर निर्भर हो गए थे उस पर पूरा भरोसा करने लगे थे।

घर, बाजार, बैंक के काम वह बड़ी फुर्ती से निपटा देती थी।

एक दिन काम से बाहर निकली 4/5 घंटे हो गए वापस ही नहीं आई। मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल गई। हाय आज तो लॉकर में जेवर रखने भेजा था।

तभी पुलिस की जीप की आवाज मेरे शक को यकीन में  बदल ही रही थी कि इंस्पेक्टर ने कहा …”हमारी जीप से टकराकर यह बेहोश हो गई थी। होश आने पर इन्हें छोड़ने आए हैं।”

ज्योति मुस्कुरा कर बोली..” दीदी घबराओ नहीं बैंक का काम होने के बाद ही टकराई थी।”

मैंने आगे बढ़ कर उसे गले लगा लिया।

© डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’

मो 9479774486

जबलपुर मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार # 101 – ये मिट्टी किसी को नही छोडेगी! ☆ श्री आशीष कुमार ☆

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #101 🌻 ये मिट्टी किसी को नही छोडेगी! 🌻 ☆ श्री आशीष कुमार

एक राजा बहुत ही महत्त्वाकांक्षी था और उसे महल बनाने की बड़ी महत्त्वाकांक्षा रहती थी उसने अनेक महलों का निर्माण करवाया!

रानी उनकी इस इच्छा से बड़ी व्यथित रहती थी की पता नही क्या करेंगे इतने महल बनवाकर!

एक दिन राजा नदी के उस पार एक महात्मा जी के आश्रम के पास से गुजर रहे थे तो वहाँ एक संत की समाधि थी और सैनिकों से राजा को सूचना मिली की संत के पास कोई अनमोल खजाना था और उसकी सूचना उन्होंने किसी को न दी पर अंतिम समय मे उसकी जानकारी एक पत्थर पर खुदवाकर अपने साथ ज़मीन मे गाड़ दिया और कहा कि जिसे भी वो खजाना चाहिये उसे अपने स्वयं के हाथों से अकेले ही इस समाधि से चौरासी हाथ नीचे सूचना पड़ी है निकाल ले और अनमोल सूचना प्राप्त कर लेंवे और ध्यान रखे उसे बिना कुछ खाये पिये खोदना है और बिना किसी की सहायता के खोदना है अन्यथा सारी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी !

राजा अगले दिन अकेले ही आया और अपने हाथों से खोदने लगा और बड़ी मेहनत के बाद उसे वो शिलालेख मिला और उन शब्दों को जब राजा ने पढ़ा तो उसके होश उड़ गये और सारी अकल ठिकाने आ गई!

उस पर लिखा था – “हॆ राहगीर संसार के सबसे भूखे प्राणी शायद तुम ही हो और आज मुझे तुम्हारी इस दशा पर बड़ी हँसी आ रही है, तुम कितने भी महल बना लो पर तुम्हारा अंतिम महल यही है एक दिन तुम्हे इसी मिट्टी मे मिलना है!

सावधान राहगीर, जब तक तुम मिट्टी के ऊपर हो तब तक आगे की यात्रा के लिये तुम कुछ जतन कर लेना क्योंकि जब मिट्टी तुम्हारे ऊपर आयेगी तो फिर तुम कुछ भी न कर पाओगे यदि तुमने आगे की यात्रा के लिये कुछ जतन न किया तो अच्छी तरह से ध्यान रखना कि  जैसै ये चौरासी हाथ का कुआं तुमने अकेले खोदा है बस वैसे ही आगे की चौरासी लाख योनियों मे तुम्हे अकेले ही भटकना है और हॆ राहगीर ये कभी न भूलना की “मुझे भी एक दिन इसी मिट्टी मे मिलना है बस तरीका अलग अलग है।””

फिर राजा जैसै तैसे कर के उस कुएँ से बाहर आया और अपने राजमहल गया पर उस शिलालेख के उन शब्दों ने उसे झकझोर के रख दिया।

राजा ने सारे महल जनता को दे दिये और “अंतिम घर” की तैयारियों मे जुट गया!

हमें एक बात हमेशा याद रखना की इस मिट्टी ने जब रावण जैसै सत्ताधारियों को नही बख्शा तो फिर साधारण मानव क्या चीज है इसलिये ये हमेशा याद रखना कि मुझे भी एक दिन इसी मिट्टी मे मिलना है क्योंकि ये मिट्टी किसी को नही छोड़ने वाली है!

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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