(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “अपने बूते पार करना ज़ीस्त का सागर है अब…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६४ ☆
अपने बूते पार करना ज़ीस्त का सागर है अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – चलते रहने का हुनर…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “राहत…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆
लघुकथा ☆ राहत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
आजकल हाउसिंग सोसायटी हर जगह बनी हुई हैं। एक कालोनी या एक दो बड़ी बिल्डिंग में रहने वाले लोग सोसायटी बना लेते हैं ताकि बिजली पानी सफाई जैसे काम होते रहें और लोग अपना काम निश्चिंत होकर करते रहें। चिंता अगर रहती है तो अपने निजी काम की। सहकारिता की इस भावना की लोकप्रियता व उपयोगिता को देखते हुए प्रशासन ने भी सोसायटी को मान्यता दी है उसके लिए वियम पर नियम बनाए हैं। उसका रजिस्ट्रेशन वगैरह सब कुछ होता है। सोसायटी अपने सदस्यों और स्थानीय प्रशासन के बीच की कड़ी बन गई है।
गली में कचरा है तो सोसायटी साफ कराएगी। नल में पानी नहीं आ रहा है तो सोसायटी व्यवस्था करेगी। कोई अपने मकान या फ्लैट में कुछ निर्माण करवा रहा है तो उसे सोसायटी देखेगी। पार्किंग व्यवस्था भी यानी जो भी सार्वजनिक काम हो सोसायटी देखेगी। किसी के फ्लैट का पानी दूसरे के फ्लैट में आ रहा है तो सोसायटी देखेगी। वे लोग आपस में बात करके हल नहीं निकाल सकते।
पता नहीं कैसे एक डंफर से एक बड़ा पत्थर सोसायटी के गेट के अंदर गिर गया। पत्थर भारी था। वॉचमैन अकेला उठा नहीं पा रहा था। जो भी आता सोसायटी को कोसता कि सोसायटी कर क्या रही है। कब से पत्थर पड़ा है और सोसायटी सोई हुई है। आते जाते चेयरमैन सेक्रेटरी को बोलते, भाई पत्थर हटवाओ सबको बहुत दिक्कत हो रही है। सेक्रेटरी बोलता क्रेन नहीं मिल रही है, मिलते ही उठवा देंगे। सभी लोग पत्थर के इधर उधर से भुनभुनाते निकल जाते पर किसी ने उसे हटाने का प्रयास नहीं किया।
सोसायटी में चार पांच युवक थे । ड्यूटी से आने के बाद एक जगह बैठकर गप्पें मारा करते थे। एक ने कहा कि भाई यह पत्थर की दिन से एक ही जगह पड़ा हुआ है। चलो मिल कर उसे रास्ते के किनारे कर देते हैं। उनमें सहमति बनी और चारों पांचों उठे और मिल कर पत्थर को एक ओर खिसका दिया। अब किसी को परेशानी नहीं होगी।
दूसरे दिन लोगों ने पत्थर रास्ते में नहीं देखा तो सोसायटी के चेयरमैन सेक्रेटरी की तारीफ़ करने लगे कि ऐसे काम करना चाहिए और चेयरमैन सेक्रेटरी एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर चुप रहे। तीन चार दिन बाद म्युनिसिपेलिटी की गाड़ी आई और पत्थर को उठा ले गई। सभी ने राहत की सांस ली।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दोष किसका?)
लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से शहर की सड़कें तालाब में बदल गई थीं। नालियाँ कूड़े से अटी पड़ी थीं और गंदा पानी घरों में घुसने लगा था। शर्मा जी छतरी लेकर दरवाजे पर खड़े बड़बड़ा रहे थे।
“बस करो बारिश! आखिर कितना सताओगी? पूरा शहर डुबोकर ही मानोगी क्या?”
सामने से गुजर रहे वर्मा जी ठिठक गए।
“शर्मा जी, बारिश को क्यों कोस रहे हैं?”
“क्यों न कोसूँ? देख नहीं रहे, सड़क पर कमर तक पानी है। घर में रखा सामान खराब हो रहा है। बच्चे बाहर नहीं निकल पा रहे। यह बारिश नहीं, आफत है आफत!”
वर्मा जी मुस्कराए, “बारिश आफत नहीं, प्रकृति का वरदान है।”
“वाह! आपके घर में पानी नहीं घुसा, इसलिए वरदान लग रही है।”
“मेरे घर में भी पानी घुसा है, लेकिन दोष बारिश का नहीं है।”
“तो किसका है? बादलों का?”
“नहीं, हमारी व्यवस्था का और हमारी लापरवाही का।”
शर्मा जी तुनककर बोले, “अब इसमें हमारी क्या गलती?”
वर्मा जी ने सड़क की ओर इशारा किया। नाली के मुहाने पर प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और कूड़े का ढेर जमा था।
“यह देखिए। नाली किसने बंद की?”
शर्मा जी चुप रहे।
“बारिश ने?”
शर्मा जी ने मुँह फेर लिया।
वर्मा जी फिर बोले, “नालियाँ समय पर साफ नहीं होंगी, कचरा नालियों में फेंका जाएगा, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर अतिक्रमण होगा और फिर हम बारिश को दोष देंगे—यह कहाँ का न्याय है?”
शर्मा जी कुछ नरम पड़े।
“लेकिन नगर निगम की भी तो जिम्मेदारी है।”
“बिल्कुल है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करना, नालियों की नियमित सफाई करना और जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थायी समाधान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन शहर को साफ रखना नागरिकों का भी कर्तव्य है।”
अचानक नाली से निकला गंदा पानी सड़क पर फैलता हुआ शर्मा जी के दरवाजे तक आ पहुँचा।
वे घबराकर बोले, “अरे! मेरा सामान अंदर रखा है।”
वर्मा जी ने उनकी मदद करते हुए कहा, “यही पानी अगर सही रास्ते से निकल जाए तो मुसीबत नहीं, उपयोगी संसाधन है।”
शर्मा जी ने आश्चर्य से पूछा, “तो बारिश को दोष देना बंद कर दें?”
“बारिश को नहीं, अपनी सोच और व्यवस्था को सुधारिए।”
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
शर्मा जी ने सामने जमा कूड़े को देखा। फिर बोले, “कल मोहल्ले की बैठक बुलाएँगे। नालियों की सफाई के लिए नगर निगम में शिकायत करेंगे और लोगों को भी समझाएँगे कि कचरा नालियों में न डालें।”
वर्मा जी मुस्कराए, “अब बात बनी।”
आसमान से बारिश अब भी बरस रही थी। शर्मा जी ने पहली बार उसे शिकायत भरी नजरों से नहीं, बल्कि समझदारी भरी नजरों से देखा।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५९ ☆
☆ बुन्देली कविता – “दुख से खीब चिन्हारी कर लइ“☆ आचार्य भगवत दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उड़न किस…“।)
अभी अभी # १०७६ ⇒ आलेख – उड़न किस श्री प्रदीप शर्मा
इस नश्वर संसार में उड़न खटोले से लगाकर उड़न परी और उड़न सिख के बीच इतनी उड़ती उड़ती चीजें हैं, कि इन्हें देखकर एक साधारण इंसान का तो सर ही चकरा जाए । क्या पता,कब कोई एलियन उड़न परी, उड़न तश्तरी से इस धरती पर उतर आए, जिसे देख उड़न दस्ता भी आश्चर्य में पड़ जाए और उसका एक एलियन किस,हमारे धरती के फ्लाइंग किस पर भारी पड़ जाए ।
जब एक मक्खी उड़ती हुई,आपके मुंह पर फ्लाइंग किस मारकर उड़ जाती है,तो आप उसका क्या बिगाड़ लेते हो । हमने वे दिन भी देखे हैं जब खटमल हमारा खून चूस रहे हैं,और डैंड्रफ के कारण हम अपना सर खुजा रहे हैं । भला हो, ऑल आउट, काला हिट, मच्छरदानी,पैंटीन शैंपू और लक्ष्मण रेखा का,जो हमें इन उड़ते मक्खी,मच्छर और रेंगती छिपकली, चींटी मकोड़े और कॉकरोचों से हमारा और हमारी बालों की रूसी का भी बचाव करती रहती हैं ।।
हर इंसान को उड़ती खबर और उड़ती नज़र से सावधान रहना चाहिए । कोई अच्छी बुरी खबर उड़ते उड़ते कहां पहुंच जाए,कहा नहीं जा सकता । वे दिन हवा हुए,जब उड़ते हुए शांतिदूतों के जरिए प्रेम संदेश और मित्रता संदेश भेजे जाते थे । सरकारी आदेश तो डुगडुगी पीटकर ही सुनाया जाता था। सुनो,सुनो, सुनो ! और सबको सुनना भी पड़ता था ।
फिर काम की खबरें भी बेतार के तारों के जरिए भेजी जाने लगी । बेतार की भाषा किसी गागर में सागर से कम नहीं होती थी । शब्द और अक्षरों में कोई भेद नहीं होता था । कई बार तो अर्थ का अनर्थ भी हो जाता था ।।
फिर आया सरस्वतीचंद्र का जमाना,जब ” फूल तुम्हें भेजा है खत में,फूल नहीं मेरा दिल है “,जैसे संदेश फूलों के जरिए भेजे जाने लगे । किसी भी पुरानी किताब में सूखा,मुरझाया कोई गुलाब का एक फूल कोई भूली दास्तान बयां करता नजर आता था ।
हमारे नीरज जी तो फूलों के रंग से ,और दिल की कलम से रोज ही पाती लिखते थे ।
आज तो स्थिति यह है कि इधर व्हाट्सएप पर संदेश लिखा जा रहा है,और उधर उन्हें उसकी भी खबर प्रसारित हो रही है । किस टाइप का प्रेम संदेश है यह,
जो लिखने से पहले ही बयां होने को लालायित है,उत्सुक है ।।
आसमान में उड़ते बादल भी विरही प्रेमियों के दिल का हाल जानते हैं । सावन के बादलों,उनसे ये जा कहो ,और ;
जा रे कारे बदरा,
सजना के पास ।
वो हैं ऐसे बुद्धू,
कि समझे ना प्यार ।।
हमारे आनंद बक्षी जी ने सावन को लाखों का बताया है,और नौकरी को दो टकियाॅं की । ऐसे फुल टाइम फूल,गुलदस्ता और फ्लाइंग किस भेजने वालों से भगवान हम शरीफों को बचाए । हम तो चाहते हैं,इस अधिक मास के सावन में दाल रोटी खाएं,और प्रभु के गुण गाकर कुछ पुण्य कमाएं ।।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – रिश्तों की डोरी फिर टूटी….”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३१ ☆
☆ रिश्तों की डोरी फिर टूटी…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१4 ☆
☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला
लेखक – अरविंद तिवारी
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।
यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।
संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।
‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।
तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।
‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।
‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।
इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।
उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।
अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।
शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।
मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “नई दिशा”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ ☆
🌻लघुकथा🌻 नई दिशा 👩🍼
मम्मी आपने बताया आप पापा के साथ शादी के पहले सोलह सोमवार का व्रत कई बार किया है। अंजली ने बड़े भोलेपन से मम्मी को प्रश्न किया मेरी सभी सहेलियों के यहाँ शिव अभिषेक बड़ी श्रद्धा से करते है। न आप करती है न मुझे व्रत करने देती। कहा जाता है – – – इसको करने से मनचाहे पति की प्राप्ति होती है।
मम्मी ने तुरंत बात काटते हुए कहा–बस इसलिये ही नही करने देती। मनचाहा नही वो चाहे ऐसे पति की कामना रखनी चाहिए।
हम नारियों को भगवान ने ममता से भरपूर बनाया है। हमें तो पत्थर से भी प्रेम हो जाता है। पर समय बदल गया है अंजली!!! अब पति की चाहत होना बहुत आवश्यक है।
सारी जिंदगी घूटन से अच्छा है वो चाहे ये मायने रखता है। मम्मी के इस निर्णय पर अंजली हैरान थी। परन्तु नई दिशा, नई सोच मिलने से उसका व्याकुल मन शांत हो चला।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८८ ☆ देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆
फ्री या मुफ्त शब्द का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण की गति से भी तीव्र माना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे कुछ ज्ञानी “कॉम्प्लीमेंट्री” बताकर अपने आप को सफेद पोश समझ लेते हैं। उनका ये मानना है, हमारे द्वारा खरीदी गई सुविधा के साथ ही तो मिल रहा है, इसलिए ये फ्री से अलग होता हैं।
दो साबुन के साथ एक फ्री का मिलना हो या होटल में किराए के कमरे के साथ नाश्ता और एक समय का भोजन जैसी सुविधा इस श्रेणी में गिना जाता हैं।
होटल का कॉम्प्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट वह जगह है, जहाँ आदमी भूख से नहीं, कमरे के किराए की वसूली की भावना से खाता है, घर पर सुबह दो टोस्ट से काम चल जाता है मगर होटल में प्लेट उठाते ही भीतर का चार्टर्ड अकाउंटेंट जाग जाता है।
व्हाट्स ऐप ज्ञान से प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले फल डालेंगे क्योंकि स्वस्थ दिखना है, फिर उसके बगल में आलू पराठा, इडली, पोहा, सॉसेज और एक ऐसा छोटा तिरामिसु रख देंगे जिसकी पहचान हमें नहीं मगर मुफ़्त है इसलिए सम्मान देना ज़रूरी है।
प्लेट में जगह खत्म होते ही दूसरी प्लेट उठा लेते हैं और अपने आप से कहते हैं यह सिर्फ ऑमलेट के लिए है, लाइव काउंटर वाला पूछता है वेज या चीज़, प्याज़, टमाटर, मिर्च, मशरूम, अब हम ऑमलेट नहीं बनवा रहे, जीवनसाथी चुनने जितनी जानकारी दे रहे हैं।
फिर टोस्टर में ब्रेड डालते हैं, वह नीचे से गायब हो जाती है मगर निकलती कहीं नहीं, आप मशीन के सामने झुककर भीतर ऐसे देखते हैं जैसे बच्चा बोरवेल में गिर गया हो, तभी पीछे से किसी और की जली हुई ब्रेड निकलती है और वह आपको संदेह से देखता है कि आपने उसकी ब्रेड के साथ क्या किया, कॉफी मशीन पर छह बटन हैं, एस्प्रेसो दबाओ तो कप में दो चम्मच दुःख गिरता है, कैपुचीनो दबाओ तो मशीन पहले कराहती है, फिर भाप छोड़ती है, फिर इतनी झाग देती है कि कॉफी नीचे कहीं किरायेदार बनकर रह जाती है।
आप मेज़ पर लौटते हैं तो साथी पूछती है इतना कौन खाएगा, आप कहते हैं थोड़ा थोड़ा लिया है, जबकि मेज़ देखकर लगता है संयुक्त राष्ट्र ने अकाल राहत सामग्री भेजी है, बीच में वेटर प्लेट उठाने आता है और आप आधी खाई इडली बचाते हुए कहते हैं अभी चल रही है, भोजन है या पुरानी ईएमआई जिसे बंद नहीं होने देना है।
अंत में पेट जवाब दे चुका होता है मगर नज़र मिठाई पर पड़ती है, हम एक मफ़िन नैपकिन में लपेटकर बाद के लिए रख लेते हैं, फिर कमरे में लौटकर दो घंटे बिस्तर पर सीधे नहीं लेट पाते और गर्व से कहते हैं आज लंच की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, यही होटल ब्रेकफास्ट की असली बचत है, पैसे एक वक्त के बचते हैं और पाचन तंत्र दो दिन का ओवरटाइम करता है।
यदि होटल में कमरे के किराए में नाश्ते के बदले कुछ छूट मिल जाय तो निजी यात्रा के समय हम सब कम किराए वाला ऑप्शन उपयोग करते है। ऑफिशल यात्रा के समय कॉम्प्लीमेंट्री नाश्ता ही चुना जाता हैं।