(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८० ☆ देश-परदेश – अंतरराष्ट्रीय पोहा दिवस : 7 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆
अस्सी के दशक तक उतर भारत के लोग पोहा को चिवड़ा के नाम से जानते थे। सूखे पोहे को तलने के पश्चात चिवड़े के नाम से सेवन किया जाता था।
संचार माध्यमों की सुगमता, टीवी, फिल्मों आदि ने पोहे को संपूर्ण भारत में प्रचारित कर दिया। प्रत्येक क्षेत्र में अलग अलग खाद्य पदार्थ उपयोग किए जाते हैं।
हमारी आज के प्रातःकालीन उद्यान सभा में भी इस पर खूब चर्चा हुई। सभा में विभिन्न प्रांतों के रहने वाले सेवानिवृत साथी हैं। इन सब लोगों को अनर्गल विषयों पर घंटों चर्चा करने का शौक है।
पोहे के समर्थन में भी बहुत सारी दलीलें पेश की गई, हल्का खाद्य और फास्ट फूड की श्रेणी में आता है। एक और साथी ने तो सारी हदें पार कर, वर्षों से इंदौर के सफाई वर्चस्व के लिए पोहे को ही वज़ह बताया। क्या पोहा खाने से मन में सफ़ाई के विचार आते हैं ?
पंजाब राज्य के साथी बोले, सिर्फ पोहे का ही अंतरराष्ट्रीय वर्ष क्यों मनाया जाता हैं ? हमारी लस्सी किसी से कम हैं, क्या ? एक पटना निवासी बोले हमारे “लिट्टी चोखे” का भी दिवस मनाया जाना चाहिए।
त्रिवेन्द्रम निवासी बोले हमारी इडली तो वर्षों से पूरे भारत को भाती हैं। हम पोहा दिवस इस शर्त पर मनाएंगे, जब हमारी इडली को भी ऐसी ही मान्यता मिले।
जयपुर निवासी बोले, जिस जमीन पर बैठे हो, उसकी कचौरी को मत भूलना। हर नुक्कड़ पर मिलती है। मामला आगे बढ़ता, ये तय हुआ हर सात तारीख़ को अलग अलग प्रांतों के उपलब्ध खाद्य पदार्थों का दिवस मनाया जाएगा।
तय कार्यक्रम के अनुसार नजदीक के “इंदौर पोहा” वाले ठेले पर सबने कांदा पोहा, जिस में रतलामी नमकीन सेव भी था, का भरपूर सेवन किया।
पोहा काग़ज़ की प्लेट में परोसा गया था, लेकिन ठेले पर “कचरा पात्र” उपलब्ध नहीं था, इसलिए सब अपनी अपनी उपयोग की गई प्लेट को साथ ले कर आए और उचित स्थान पर फेंका। कुल मिला कर पोहा खाने के बाद “सफाई का कीड़ा” अपना असर दिखाता है।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – महा-प्रस्थान के क्षण…१।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८७ – महा-प्रस्थान के क्षण…१
काल दशित दस दिशाएँ
दग्ध दिनकर मौन हैं।
चन्दन चिता पर सो गया
लेकर विदा
यह कौन है?
आह इसका मुख
कि जिससे हो रहा
आलोक प्लावन,
सम्पुटित ज्यों पुण्यगीता
वेद के श्लोक पावन!
सिद्धि के सोपान वर से
वे अधर
कि जैसे शांति के स्वर है
हारी कितनी उम्र के
मुखर होकर, बोलना ही चाहते हैं।
पाँव हैं या प्रगति के पर्याय!
संभावना के ये सफल समुदाय के
मानो डोलना ही चाहते हैं
कि
स्यात् यह निद्रा
अरुक छंदी यात्रा की श्रांति है.
किन्तु यह निष्कंप है
कैसी भयाकुल शांति है!
वातावरण में भ्रान्ति है!
जलती चिता की गोद मे
जो शीश रखकर सो रहा
कितना तरुण है!
झेल वज्राघात
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – हे रिमोट महाराज! और कितना पिटोगे!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९७ – व्यंग्य – हे रिमोट महाराज! और कितना पिटोगे! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
ड्राइंग रूम की धुंधली रोशनी में टीवी रिमोट किसी दिव्य ब्रह्मास्त्र की तरह सोफे के कुशन पर आराम फरमा रहा था। हम सब जानते हैं कि जब उसकी स्क्रीन धुंधली होती है और चैनल बदलने की गति कछुए से भी धीमी हो जाती है तब घर का हर सदस्य एक मूक वैज्ञानिक बन जाता है। हमारी रगों में बहता स्वदेशी जुगाड़ हमें प्रेरित करता है कि हम नई बैटरी खरीदने के बजाय उस प्लास्टिक के टुकड़े को उसकी औकात याद दिलाएं। जैसे ही स्टार स्पोर्ट्स पर अंतिम ओवर की पहली गेंद फेंकने की तैयारी हुई रिमोट ने अचानक दम तोड़ दिया। पिताजी के चेहरे पर वैसे ही भाव उभरे जैसे किसी अंतरिक्ष यात्री का ऑक्सीजन सिलेंडर अंतरिक्ष में खत्म हो गया हो। उन्होंने रिमोट को हाथ में लिया और उसे इस तरह निहारा जैसे कोई जौहरी नकली हीरे को परख रहा हो। पहली बार में उन्होंने उसे हौसले के साथ सोफे की गद्दी पर पटका ताकि उसके भीतर सोए हुए रासायनिक कण जाग जाएं। यह भारतीय परिवारों का वह आदिम विश्वास है जो मानता है कि दुनिया की हर तकनीकी समस्या का समाधान केवल दो थप्पड़ मारकर ही निकाला जा सकता है। रिमोट को ठोकना सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है बल्कि यह हमारे भीतर छुपे उस इंजीनियर का जागना है जो मानता है कि घर्षण से ही अग्नि पैदा होती है और ठोकर से ही इंसान और रिमोट सुधरते हैं।
जब पहली चोट के बाद भी चैनल नहीं बदला तो माताजी ने मोर्चा संभाला और उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उनका मानना था कि रिमोट को सिर्फ पीटना काफी नहीं है बल्कि उसे सही कोण और सही दिशा में घुमाना भी जरूरी है। उन्होंने रिमोट को अपने आंचल से पोंछा जैसे कोई मां अपने लाडले को परीक्षा से पहले तिलक लगा रही हो। फिर उन्होंने उसे टीवी की तरफ ऐसे ताना मानो वह कोई तीर कमान हो जिससे सीधे महिषासुर का वध करना हो। हमारा यह अंधविश्वास कितना गहरा है कि हम रिमोट के सेल को निकालने के बजाय अपनी कलाई की ताकत पर ज्यादा भरोसा करते हैं। माताजी ने रिमोट के पिछले ढक्कन को खोला और दोनों सेलों की आपस में अदला बदली कर दी। यह वैसा ही था जैसे ट्रांसफर ऑर्डर देकर किसी सुस्त सरकारी कर्मचारी को दूसरे विभाग में भेज दिया जाए ताकि वह काम करने लगे। इस प्रक्रिया के पीछे छिपी मानसिकता यह है कि शायद बायां सेल दाएं वाले से ज्यादा वफादार हो और आपस में मिलकर वे दोनों कुछ नया चमत्कार कर दिखाएं। पूरा कमरा इस समय एक अदृश्य प्रयोगशाला में बदल चुका था जहां सांसें थमी हुई थीं और रिमोट अगली मार खाने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा था।
तभी बड़े भाई साहब ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करते हुए रिमोट को अपने दांतों के बीच दबा लिया। यह दांतों से सेल को दबाने की कला हमारे पूर्वजों से हमें विरासत में मिली है जिसे हम सबने कभी न कभी आजमाया ही है। दांतों का दबाव पड़ते ही सेल की जस्ता धातु थोड़ी पिचक जाती है और रासायनिक ऊर्जा को लगता है कि अब अगर बाहर नहीं निकले तो जान चली जाएगी। भाई साहब ने रिमोट को ऐसे चबाया जैसे वह कोई कड़क रेवड़ी खा रहे हों और उनके चेहरे पर एक अजीब सा सस्पेंस था कि अब टीवी का पर्दा खुलेगा या नहीं। हम सब इस बात पर पूरी तरह सहमत थे कि नया सेल खरीदना सीधे सीधे हमारी हार होगी क्योंकि बाजार से पचास रुपये का सेल लाना हमारी जेब से ज्यादा हमारी मर्दानगी पर चोट होती। हम उस अंतिम सांस तक लड़ना चाहते थे जब तक कि रिमोट का प्लास्टिक खुद रोकर न कह दे कि मुझे बख्श दो। इस दौरान टीवी पर विज्ञापन आ रहे थे और मैच का रोमांच बढ़ता जा रहा था जिससे हमारी धड़कनें भी रिमोट की धड़कनों के साथ ताल मिला रही थीं। हर कोई अपनी अपनी थ्योरी दे रहा था कि रिमोट को दीवार पर मारना ज्यादा फायदेमंद होगा या फर्श पर पटकना।
पिताजी ने फिर से कमान संभाली और इस बार उनके प्रहार में एक अनूठा सम्मोहन और गुस्सा दोनों शामिल था। उन्होंने रिमोट को सोफे के हत्थे पर इस तरह तीन बार पटका जैसे कोई धोबी घाट पर कपड़े धो रहा हो। इस बार रिमोट के भीतर से एक खड़खड़ाहट की आवाज आई जिसने हमें यह यकीन दिलाया कि आत्मा अभी भटकी नहीं है बल्कि शरीर के भीतर ही कहीं छुपी है। हमारी मानसिकता यह होती है कि अगर रिमोट को दो दिन और चला लिया जाए तो हम देश की जीडीपी में अपना बहुत बड़ा योगदान दे देंगे। हम उस हर थप्पड़ के साथ यह सोचते हैं कि हम महंगाई के खिलाफ एक मौन युद्ध लड़ रहे हैं जिसमें हमारी जीत तय है। रिमोट को पीटने की इस कला में एक अजीब सा सुकून मिलता है जो हमें किसी महंगे स्पा में भी नहीं मिल सकता। ऐसा लगता है कि रिमोट को मारना वास्तव में दिनभर के तनाव को निकालने का एक वैध और पारिवारिक माध्यम है। पूरे मोहल्ले में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां शाम को टीवी देखते समय थप थप की यह पावन ध्वनि सुनाई न देती हो जो हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है।
हालत तो तब बुरी हुई जब रिमोट को इतनी प्रताड़ना देने के बाद भी स्क्रीन पर कोई हलचल नहीं हुई और मैच की आखिरी दो गेंदें बची थीं। अबकी बार मैंने रिमोट को अपने हाथों में लिया और उसे अपनी शर्ट से रगड़ना शुरू किया ताकि स्थैतिक ऊर्जा का संचार हो सके। हम भारतीयों का यह भी एक दृढ़ विश्वास है कि रगड़ने से तो अल्लादीन का जिन भी बाहर आ जाता है तो यह मामूली बैटरी क्या चीज है। मैंने रिमोट को टीवी के बिल्कुल करीब ले जाकर बटन को इतनी जोर से दबाया कि मेरी उंगली का नाखून नीला पड़ गया। इस समय कमरे का माहौल किसी थ्रिलर फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा हो चुका था जहां बम को डिफ्यूज करने के लिए आखिरी तार काटना बाकी होता है। हम सब एक दूसरे को इस तरह देख रहे थे जैसे अगर मैच छूट गया तो इसके जिम्मेदार हम खुद होंगे न कि वह बेजान रिमोट। रिमोट पर बने बटन अब अपनी जगह से हिल चुके थे और वॉल्यूम वाला बटन तो अंदर ही धंस गया था पर हमारी उम्मीदें अभी भी आसमान छू रही थीं। हमें लग रहा था कि हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति की ताकत से टीवी खुद ब खुद मान जाएगा और चैनल बदल देगा।
तभी पिताजी ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा जुआ खेलने का फैसला किया और रिमोट को सीधे धूप में ले जाने की बात कही पर रात के नौ बज रहे थे। रात के समय धूप कहां से लाएं इस बात पर विचार किए बिना उन्होंने रिमोट को गर्म तवे के पास रख दिया ताकि उसकी सोई हुई गर्मी वापस आ सके। यह वैज्ञानिक सोच इतनी अद्भुत थी कि न्यूटन और आइंस्टीन भी अपनी कब्र में करवट बदल लेते। बैटरी के रसायनों को गर्म करके उन्हें पुनर्जीवित करने का यह नुस्खा केवल हमारे देश के महान विचारकों के पास ही मिल सकता है। तवे की गर्मी पाकर रिमोट का प्लास्टिक थोड़ा पिघलने लगा और उससे एक अजीब सी गंध आने लगी जिसने सस्पेंस को अपने चरम पर पहुंचा दिया। भाई साहब ने चिल्लाकर कहा कि देखो अब लाल बत्ती जलने वाली है और हम सब अपनी आंखें फाड़कर रिमोट की उस नन्ही एलईडी लाइट को देखने लगे। वह लाइट हमारे लिए किसी डूबते को तिनके का सहारा जैसी थी जिसके जलते ही हमारी दुनिया रोशन हो जाती। पूरा परिवार उस बेजान प्लास्टिक के टुकड़े के चारों तरफ इस तरह मंडरा रहा था जैसे कोई तांत्रिक किसी आत्मा को बुलाने का अनुष्ठान कर रहा हो।
अंतिम ओवर की आखिरी गेंद फेंकने का समय आ चुका था और पिताजी ने पूरी ताकत से रिमोट का लाल बटन दबाया। अचानक टीवी की स्क्रीन चमकी और चैनल बदल गया पर जो सामने आया उसे देखकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। टीवी पर मैच नहीं चल रहा था बल्कि पड़ोस के शर्मा जी का नया वाईफाई नेटवर्क हमारे स्मार्ट टीवी की स्क्रीन पर पासवर्ड मांग रहा था। असल में हमारे हाथ में जो रिमोट था वह टीवी का था ही नहीं बल्कि वह तो पिछले साल खराब हो चुके हमारे पुराने एयर कंडीशनर का रिमोट था जिसे हम पिछले आधे घंटे से पीट रहे थे। असली टीवी रिमोट तो सोफे के नीचे आराम से तकिए के पीछे छुपा हुआ अपनी किस्मत पर हंस रहा था। इस महासत्य के उजागर होते ही पिताजी ने रिमोट को ऐसे देखा जैसे वह कोई लावारिस वस्तु हो और माताजी जोर से हंस पड़ीं। भाई साहब ने अपने दांतों को साफ किया और मैंने चुपचाप उठकर सोफे के नीचे से असली रिमोट निकाला जिसके सेल बिल्कुल नए थे। इस तरह रिमोट को पीटने का हमारा वह महान वैज्ञानिक प्रयोग एक ऐतिहासिक कॉमेडी में बदल गया और हम सब अपनी ही बेवकूफी पर लोटपोट होते रहे।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “सरकारी सांड़ और आवारा सांड”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २७ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “सरकारी सांड़ और आवारा सांड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
किसी पुराने समाचार पत्र के टुकड़े में मैंने एक समाचार पढ़ा कि एक जगह – “अच्छी नस्ल तैयार करने के लिए शासन से उपलब्ध सांड़ दुबला हो रहा है जबकि वहां के डॉक्टर के पालतू पशु मोटे हो रहे हैं। मुझे इस समाचार से बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ। चिकित्सक रूपी सांड़ के सामने आखिर मूक पशु रूपी सांड़ की क्या हैसियत? समाचार में बताया गया कि डॉक्टर सांड़ की खुराक में कटौती कर उसे अपने पालतू पशुओं को खिला रहा था।
सरकार चाहे केंद्र की हो अथवा राज्यों की नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों रूपी सांड़ों से भरी पड़ी हैं। शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जिसमें सांड़ न हों, देखा तो यह गया है कि प्रत्येक विभाग में नीचे से ऊपर तक अलग – अलग शक्लों, कद – काठियों, स्वभावों और खुराकों वाले सांड़ भरे पड़े हैं। क्यों न हों सरकार और उसके विभाग सांड़ों के लिए सर्वश्रेष्ठ चारागाह जो हैं। सांड़ या तो सरकार और उसके अधीन विभिन्न विभागों में होते हैं या फिर आवारा। स्वभाव और प्रकृति में सरकारी सांड़ों और आवारा सांड़ों में कोई खास अंतर नहीं होता, किंतु सरकारी सांड़ों को सरकारी होने का सम्मान और जोर – जबरदस्ती से माल हड़पने के लिए एक निश्चित क्षेत्र का मालिक होने का संतोष, नियमित खुराक मिलते रहने की निश्चिंतता तो रहती ही है। सरकारी सांड़ अपने कार्यालय की कुर्सी पर बैठे – बैठे अथवा मात्र अपने कार्य क्षेत्र में रह कर ही वह सब प्राप्त कर लेते हैं जो वह चाहते हैं। लेकिन आवारा सांड़ों को इसके लिए अपेक्षाकृत अधिक मेहनत करना पड़ती है। इनका कार्य क्षेत्र भी विस्तृत होता है जो सरकारी विभागों से लेकर जनता तक फैला रहता है। देखा गया है कि सशक्त आवारा सांड़ों से सरकारी सांड़ डरते हैं और इसी कारण अधिकांश आवारा सांड़ों को सरकारी सांड़ों का संरक्षण व सहयोग प्राप्त रहता है। बहुत से सरकारी कर्मचारी/अधिकारी रूपी सांड़ लोगों को फंसाकर उनको चरने का कार्य दलाल रूपी आवारा सांड़ों के माध्यम से ही सम्पन्न करते हैं किन्तु इस अघोषित संरक्षण के बाद भी सरकारी और आवारा सांड़ों में अंतर तो है ही। सरकारी सांड़ मिलकर आवारा सांड़ की सारी सांड़गिरी धूल में मिलाकर उसे बैल बनने पर मजबूर कर सकते हैं। यदि सरकारी सांड़ चाहें तो समाज को लूटने खसोटने और आतंक मचा कर परेशान करने वाले आवारा सांड़ों से मुक्ति दिला सकते हैं, किन्तु वे मजबूर हैं ऐसा नहीं चाह सकते। आखिर आवारा सांड़ों के सहयोग से ही तो उनकी अवैध कमाई का धंधा – पानी और सांड़ गिरी चलती है। अतः समाज में सरकारी सांड़ों और आवारा सांड़ों का तालमेल सदा बना रहता है। सुरक्षित रिश्वत पाकर सरकारी सांड़ खुश, कमीशन पाकर आवारा सांड़ खुश।
सामान्यतः नेताओं की तरह अधिकारी, कर्मचारी भी सांड़ों की तरह तंदरुस्त होते हैं। मेरा अर्थ नेताओं को सांड़ कहना नहीं है। नेता सांड़ की सुधरी हुई परिष्कृत रचना है वह सरकारी और आवारा सांड़ों को पालने, उन्हें वश में करने में सक्षम होता है क्यों न हो, वह भी तो इन्हीं से मिले क्लाइंटों को निचोड़ता है। ज्यादातर नेता अपनी मुफ्तखोरी, लूट खसोट, रिश्वत आदि की चाह के कारण सांड़ रूपी सरकारी अधिकारियों – कर्मचारियों और दलाल रूपी आवारा सांड़ों को प्रश्रय देते हैं उनसे दूरी नहीं बनाते। इसीलिए तो सरकार में मलाईदार पदों पर खींचतान बनी रहती है। मैं समझता हूं कि सरकारी और आवारा सांड़ों पर लंबी चर्चा व्यर्थ है क्योंकि आप भी अपने क्षेत्र के ऐसे अनेक सांड़ों से परिचित होंगे।
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मेरी अर्ज…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख ‘धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # ११० ☆
☆ आलेख – धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
बचपन से धार्मिक ग्रंथो में पढ़ते आए हैं, कि हनुमान जी ने बचपन में ही सूर्य को निगल लिया था, थोड़े बड़े हुए, तो शंका होने लगी, अभी भी बहुत से लोग अंधविश्वास कहते हैं और बहुत से लोग इसे आदिशक्ति कहते हैं. सनातन धर्म के मानने वाले, इस बात को ईश्वर की लीला कहते हैं, आखिर धर्म में ऐसा क्या बताया कि हम इसे नहीं मानते या मानते हैं, तो ईश्वरीय महिमा बताते हैं. धार्मिक कथाओं के दो स्तर होते हैं –
श्रद्धा का स्तर
ज्ञान का स्तर
वास्तव में हनुमान जी चेतना के प्रतीक हैं, और सूर्य ज्ञान के प्रतीक हैं, जब चेतना जागृत होती है तो वह ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करती है, जब वह ज्ञान प्राप्त करने लगती है या ज्ञान प्राप्त करती है तो हम साधारण भाषा में कहते हैं कि उसने तो पुस्तकों को निगल लिया, घोंट लिया, पुस्तक ज्ञान का भंडार होती हैं, ज्ञान को निगल लिया, और इसी क्रम में आगे चला, यह शब्द कि, हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया, यह सिंबॉलिज्म है और यह बताता है कि हनुमान जी में जब चेतना जागृत हुई तो उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया और ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया. इसे प्रतीक के रूप में देखा जाए, तो सारी बात समझ में आ जाती है.
सनातन धर्म की खूबसूरती यही है. वह कथा, प्रतीक और दर्शन को एक साथ लेकर चलता है..
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘समाधान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३७ ☆
☆ कथा-कहानी ☆ समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
रोज़ शाम को शुभा का इंतज़ार होता है। पांच बजे के बाद दरवाज़े पर आहट होने पर सबकी निगाहें इसी उम्मीद के साथ उठती हैं कि दरवाज़े पर शुभा होगी।
दो महीने पहले शुभा की नियुक्ति एक सरकारी महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर हुई थी। नियुक्ति में कोई दिक्कत नहीं हुई। परेशानी तब हुई जब पोस्टिंग ऐसे महाविद्यालय में हुई जो शहर से करीब साठ मील दूर था। अब रोज़ सुबह आठ बजे तीन चार मील दूर स्टेशन जाना पड़ता है। उसके बाद दो घंटे की ट्रेन यात्रा के बाद महाविद्यालय पहुंचना पड़ता है। फिर भी अपने पैरों पर खड़े होने और समाज में अपनी जगह बनाने के ख़याल से अच्छा लगता है। शुभा का संसार अब बड़ा हो गया है। समाज में अब उसकी हैसियत बन गयी है। अभी ट्रेन में अकेले यात्रा करने की आदत नहीं थी। शुरू शुरू में काफी मुश्किल महसूस होती थी। सिमट सिकुड़ कर यात्रा पूरी करनी पड़ती थी। कभी किसी के उड़ते हुए फ़िकरे को सुनकर अनसुना करना पड़ता था। फिर धीरे-धीरे आदत होने लगी। शुभा को भी लगने लगा कि सब कुछ इतना ख़तरनाक नहीं होता जितना दूर से महसूस होता है।
संबंधियों, पड़ोस और नगर में अब शुभा का अपना वजूद है। कहीं आयोजनों, कार्यक्रमों में जाती है तो लोगों की निगाहें उसकी तरफ उठतीं और टिकतीं हैं। उसकी बात कान देकर सुनी जाती है। परिवार में भी उसकी बात लगभग निर्णयात्मक होती है।
लेकिन ज़िन्दगी का रास्ता हमवार नहीं होता। एक शाम शुभा लौटी, लेकिन रोज़ की तरह नहीं। जब लौटी तो ख़ामोश, चेहरे पर परेशानी। घर में आकर बिना किसी से बात किये पलंग पर लेट गयी। सब हतप्रभ। मां के प्राण हलक में आये। कौन सी मुसीबत आयी?
पूरा घर से शुभा के आसपास इकट्ठा हो गया। सब तरफ से चिन्तित सवाल। पूछताछ से पता चला कि कुछ लड़के थे जिन्होंने लौटते में पूरे रास्ते शुभा को तंग किया। पूरे रास्ते फ़िकरेबाज़ी। अपने स्टेशन तक पहुंचना पहाड़ हो गया। डिब्बे के सारे यात्री तटस्थ बने रहे। कुछ ऐसे भी थे जो ख़ुद शरीफ़ बने स्थिति का आनंद लेते रहे। अब शुभा भयभीत थी। पता नहीं वे लड़के कहां के थे। उन्होंने अगर उसे ही लक्ष्य बनाकर रोज़ परेशान करना शुरू कर दिया तो आना जाना संकट का काम हो जाएगा।
उसकी रिपोर्ट सुनकर घर के सभी बड़े लोग अपराध-बोध से ग्रस्त हो गये। सभी को लगा लड़की से नौकरी करा के गलती की। सदियों से लड़कियां घर में बैठती रही हैं। सिर्फ शादी करके दूसरे के घर की शोभा बनती रही हैं। अगर शुभा भी नौकरी न करती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता। जिन जिन सदस्यों ने पहले शुभा की पीठ ठोंकी थी उन्हें लगने लगा कि उनसे गलती हो गयी।
सबसे पहले टिप्पणी शुभा के बूढ़े दादाजी की तरफ से आयी। वे शुरू से ही लड़कियों की नौकरी के खिलाफ थे। उन्होंने अपना गुस्सा बेटे-बहू पर उतारा। तमतमाकर बोले, ‘हमने पहले ही कहा था कि लड़कियों को घर में ही रखो, लेकिन तुम्हें तो लड़कियों की कमाई से घर भरने की पड़ी है।’
बेटा-बहू चुप, जैसे चोरी करते पकड़े गये हों। शुभा फिलहाल अकेले यात्रा करने को तैयार नहीं है। मन में भय बैठ गया है, उससे मुक्ति पाने में समय लगेगा।
मां पति से पूछती हैं, ‘शुभा का ट्रांसफर अपने शहर में नहीं हो सकता?’
शुभा के पिता पहले ही अपने पिता की डांट खाकर झल्लाये हैं। खीझ कर कहते हैं, ‘ट्रांसफर रातोंरात नहीं होते। रातोंरात ट्रांसफर उनके होते हैं जिनकी लंबी पहुंच होती है। अपनी बेटी की तो नौकरी लग गयी, यही बहुत समझो।’
शुभा छुट्टी लेकर घर बैठ गयी है। फिलहाल कुछ सोचना नहीं है। पिता कई बार कह चुके हैं, ‘बेटा, नहीं चलती तो छोड़ो नौकरी वौकरी। तुम्हारे नौकरी न करने के बावजूद गृहस्थी तो चलेगी ही। अभी हमारे हाथ पांव चलते हैं।’ लेकिन उनकी आवाज़ में दम नहीं है। शुभा की तनख्वाह से घर में रौनक आयी है। घर के अविवाहित बच्चों की कमाई ज़्यादातर चमक-दमक और शौक पूरे करने में जाती है, इसलिए उसका असर तत्काल दिखायी पड़ता है। अब बेटी घर में बैठी है इसलिए वीर-भाव के प्रदर्शन के बावजूद पांव के नीचे से खिसकती ज़मीन का एहसास होता है।
शुभा के दादाजी एकदम तुले हैं कि नौकरी से तत्काल इस्तीफा दे दिया जाए और शुभा के पिता उनसे कन्नी काटते घूमते हैं। घर में चूहा- बिल्ली का खेल चलता है। दादाजी पुराने ज़माने के, आज की ज़मीन से कटे हैं। उनके पुत्र सारी मान्यताओं और परंपराओं के बावजूद आज के दबावों को समझते हैं।
इस बीच शुभा के पिता कॉलेज के प्रिंसिपल से मिल आये हैं। वहां से कोई उत्साहवर्धक जवाब नहीं मिला। प्रिंसिपल ने कहा, ‘नौकरी करना है तो कुछ दिक्कतें उठानी पड़ेंगीं, कुछ रिस्क लेना पड़ेगा। आप उन लड़कों के बारे में जानकारी दे सकें तो मैं पुलिस में रिपोर्ट करा दूंगा।’ शुभा के पिता को लड़कों की कुछ जानकारी मिली थी, लेकिन वे बड़े झमेले में नहीं फंसना चाहते थे। पूरे रास्ते पुलिस उनकी बेटी की चौकीदारी करने से रही।
चार-छ: दिन गुज़रने पर विचार बदलने लगे। शुभा को भी कुछ अटपटा लगने लगा और घर के लोगों के स्वर बदलकर कुछ ऐसे हो गये कि लंबी छुट्टी लेना ठीक नहीं है। नयी नौकरी है, कोई अड़चन आ सकती है। मोटी तनख्वाह वाली नौकरी पर इस तरह लात मार देना अक्लमंदी की बात नहीं।
तय हुआ कि शुभा का छोटा भाई मुन्नू उसके साथ रोज़ सफर करेगा। पुरुष का होना ज़रूरी है, भले ही छोटा भाई हो। घर के वातावरण को देखते हुए मुन्नू ने मना नहीं किया। अब फिर शुभा की कॉलेज यात्रा शुरू हो गयी। तीन-चार दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा, फिर मुन्नू ने असहयोग शुरू कर दिया। कहा, ‘सब कुछ तो ठीक चल रहा है। फालतू मुझको इतनी दूर दौड़ना पड़ता है।’ उसने जानबूझ कर हीला-हवाला करना शुरू कर दिया। कभी सो कर उठने में घंटों लगाता, कभी बाथरूम में घुसकर समाधि लगा लेता।
तीन-चार दिन बाद उसने विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया। अब यह व्यर्थ का काम उसके वश का नहीं। उसका पूरा दिन नाश हो जाता है। पढ़ाई लिखाई का नुकसान अलग होता है। शुभा के माता-पिता के सामने फिर समस्या खड़ी हुई। आज के ज़माने में बेटी के साथ रोज़ जाने वाला कौन है, और फिर हर किसी पर भरोसा कैसे किया जाए? किसी पराये व्यक्ति के साथ रोज़ जाने पर लोगों को टिप्पणी करने का मौका मिलता है।
मुन्नू के मना करने के बाद शुभा के पिता ने दो-तीन दिन की छुट्टी ली। लेकिन अब शुभा को इस इंतज़ाम से कष्ट होने लगा। पहले मुन्नू कॉलेज के आसपास वक्त गुज़ारने के लिए निरर्थक घूमता था, अब पिता कॉलेज के किसी कोने में बैठकर ऊंघते थे। कॉलेज के लोगों के सामने कैफियत देते शुभा को शर्म आती थी। और भी शिक्षिकाएं थीं जो निर्द्वंद्व आती जाती थीं और वे कभी रास्ते में हुई दिक्कतों का रोना नहीं रोती थीं। ऐसी भी शिक्षिकाएं थीं जो अकेले शहर में कमरा लेकर रह रही थीं और फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं करती थीं।
पिता तीसरे दिन शुभा के साथ जाने की तैयारी कर रहे थे कि शुभा ने उन्हें रोक दिया, कहा, ‘मैं चली जाऊंगी। आप अपनी नौकरी पर जाइए।’
पिता अचकचाये, बोले, ‘बेटा रास्ते में फिर कुछ गड़बड़ हुआ तो?’
शुभा ने संयत स्वर में जवाब दिया, ‘चिन्ता छोड़ दीजिए। वहां प्रिंसिपल हैं, पुलिस है, इतने सारे साथी हैं। फिर ये छेड़छाड़ करने वाले किस सीमा तक जाएंगे यह मेरी समझ में आ गया है। मैं आराम से वापस लौट आऊंगी।’
बहुत दिनों बाद पिता के मन से एक भारी बोझ हटा। धूप का एक टुकड़ा जो इतने दिनों तक ग़ायब था, फिर घर में कौंध कर उसे रौशन कर गया।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– श्रद्धा सुमन…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # १०९ — श्रद्धा सुमन —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
भारतीय आप्रवासी मजदूरों में से बहुतों ने मॉरिशस में साहसिक जीवन शैली की छाप छोड़ी थी। मैंने उन पर आधारित खूब लिखा है। मैं अपने शब्द लेखन को उनके प्रति श्रद्धा सुमन मानता हूँ। आज मैं आप्रवासी भारतीय मजदूर हल्कू को शब्दों का श्रद्धा सुमन समर्पित कर रहा हूँ। जवान अविवाहित हल्कू बिहार से आया था। वह बेल्ज़ामें नाम के आततायी फ्रांसीसी गोरे जमींदार का बंधुआ सा मजदूर था। उसने किसी तरह युक्ति से बेल्ज़ामें की हत्या की और दूसरे इलाके में भाग गया। उसने वहीं बस कर शादी कर ली। नब्बे बरस के बुढ़ापे में उसकी मृत्यु के दिन उसकी पत्नी ने कहा उसे मालूम था वह एक नीच को जान से मार कर यहाँ आया था। इतने बरस दर बरस दोनों समानता के स्तर पर बड़े ही प्रेमल पति पत्नी हुए। आज जाने वाला उसका पति उसके लिए देवता बन कर चला। इनकी संतान नहीं थी।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३३९ ☆ तादात्म्य…
प्रकृति के चौरासी लाख प्राणियों में एक अदृश्य तादात्म्य है। इस तादात्म्य को हर सजीव अनुभव करता है। इस अनुभूति की तीव्रता परिवेश के आधार पर कम या अधिक हो सकती है। इस तादात्म्य से जुड़ी कुछ घटनाओं का स्मरण हो रहा है।
उस दिन दर्शन के बाद मैं मंदिर से बाहर निकला। सीढ़ियों पर बैठकर जूते के फीते बाँध रहा था। स्पोर्ट्स शूज़ थे, फलत: फीते अधिक लंबे थे और बाँधने की प्रक्रिया में कुछ समय लग रहा था। एक जूता बाँधने के बाद गरदन ऊपर उठाई तो देखता हूँ कि भूरे रंग का एक श्वान मुश्किल से एक हाथ की दूरी पर आकर खड़ा है। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे निशब्द देख रहा है। मैंने उसकी आँखों में तैर रहे भावों को पढ़ने का प्रयास किया। फिर स्नेह से पूछा, “क्या बात है? कोई परेशानी है?” वह और निकट आया और अपना चेहरा मेरे घुटनों के पास रगड़ने लगा। मेरे घुटनों के नीचे अपना सिर डालने का प्रयास करने लगा। मैंने प्रेम से उसे अपने पास लिया। उसके चेहरे के बाएँ हिस्से को कुछ देर सहलाया। वह पूँछ हिलाते हुए उसका आनंद लेता रहा।
फिर उससे कहा कि अब दाईं तरफ का चेहरा ला। भाषा से अधिक भाव और संकेत समझ में आते हैं। अब उसके चेहरे का दायाँ भाग सहलाया गया। उसकी पीठ थपकाई और थपथपाई भी।
उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव थे। मैंने कहा, “तेरा काम हो गया न! अब जा।” वह थोड़ी दूर जाकर बैठ गया।
तादात्म्य का ऐसा ही अनुभव प्रचंड ट्रैफिक वाली एक सड़क को पार करते समय आया था। ट्रैफिक कम होने की प्रतीक्षा में जब मैं खड़ा था, मेरे साथ आकर एक श्वान खड़ा हो गया। हम दोनों की आँखें मिली। केवल आँखें मिलने तक मामला नहीं रुका। उसने मेरे साथ कदमताल की और सड़क पार हो गया।
अनुभवों की शृंखला में किसी शिकारी प्रजाति-सी खूँखार दिखती पूरी काली देह और उसमें काँच-सी चमकती पीली आँखों वाली बिल्ली भी याद हो आई। पार्क और एक सरकारी पाठशाला के बीच की साझा दीवार के पास बैठी वह मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थी। फिर उछल-उछल कर म्याऊँ-म्याऊँ कर अपने पंजे मेरे पैरों पर टिका कर कुछ कहने लगी। उसके उछलने से मैंने अनुमान लगाया कि वह उस ऊँची दीवार पर जाना चाहती है। संभव है कि उस पार उसके बच्चे हों। मैंने उसे पुचकार कर धीरे से उठाकर दीवार पर बैठा दिया। उसकी म्याऊँ-म्याऊँ में अब धन्यवाद का भाव था।
प्रसिद्ध साहित्यकार अनातोले फ्रांस ने कहा था कि मनुष्य की आत्मा का एक अंश तब तक सुप्तावस्था में रहता है, जब तक वह किसी पशु या पक्षी से प्रेम नहीं करता।बिल्ली विशेषज्ञ पशु चिकित्सक डॉ. लुईस जे कम्युटी ने लिखा है, “बाई लविंग एंड अंडरस्टैंडिंग एनिमल्स, परहेप्स वी ह्यूमेन शेल कम टू अंडरस्टैंड ईच-अदर।” पशुओं से स्नेह करना और उन्हें समझना, हमें एक-दूसरे को व्यापक स्तर पर समझने में सहायक होता है।
प्रकृति के जीवों में परस्पर तादात्म्य के मूल में एक समान आवश्यकताएँ रही होंगी। यह तादात्म्य एक-दूसरे के प्रति संवेदना जगाता है, करुणा उपजाता है। साथ ही एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी पर हमला करने पर अपनी सुरक्षा का भाव या प्रत्याक्रमण भी उतने ही तेजी से जगाता है।
जो भी हो लेकिन प्रकृति के विशाल और विस्तृत परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मनुष्य का तादात्म्य उसे असीम आनंद और विशेष दृष्टि प्रदान करता है। इस दृष्टि पर अपने-अपने अनुभव के आधार पर हरेक का अलग-अलग मत हो सकता है। तथापि मत-मतांतर के परे यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव जाग्रत रहे तो जगत अधिक सुंदर और अधिक आत्मीय बन सकता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
१७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी। इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:।
इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈