(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है संतोष के दोहे – रक्षा बंधन… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘वृद्धावस्था ‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆
आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
हमारी भारतीय संस्कृति में जीवन रूपी रथ के चार पहिये माने जाते हैंl
1-ब्रम्हचर्य
2-ग्रहस्थ
3- वानप्रस्थ
4- सन्यास
वृद्धवस्था शरीर में होने वाला प्राकृतिक परिवर्तन हैl इस समय व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती हैl शरीर में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैंl साथ ही ऊर्जा क्षक्ति का क्षय होना शुरु हो जाता हैl
आज के समय में वानप्रस्थ की आयु 70 वर्ष हैl इस अवस्था में आते आते मानव के मन की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती हैl उसे अपनों से ही असुरक्षा, डर, संकोच के साथ निर्भरता का भाव झकझोर देता हैl वहीं वह कुछ नया करने की तमन्ना भी जगाए रखता हैl जो उसने युववस्था में नहीं किया उसे ही करने का निश्चय करता हैl
आज समाज वानप्रस्थ के पश्चात् सन्यास लेने की बात करता हैl पर क्या आज की परिस्थिति में सन्यास लेना सम्भव है?? यदि आदमी घर बार छोड़ भी दे तो क्या वह वास्तविकता में जंगल में रह पायेगा?? जंगल…… कौन सा जंगल?? प्राकृतिक घना पेड़ों से भरा जंगल ?? पर वह तो देखने में बहुत कम मिलता हैl आज तो जहाँ तक दृष्टि जाए वहाँ तक सीमेंट और कोंक्रीट के ही जंगल देखने को मिलते हैंl
आज की चकाचौध की दुनिया में वानप्रस्थ होना ही असम्भव सा है तो सन्यास तो बहुत दूर की बात हो गईl
आज वृद्धवस्था में हमें आयुनुसार स्वयं को ढालना बहुत जरूरी हो गया हैl वानप्रस्थ अर्थात मोहमाया से अलिप्त होने की शुरुवात और अपने अंतिम गंतव्य को ध्यान में रख अंतर्मुख होने की प्रक्रियाl सन्यास आश्रम हेतु आपको कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं अपितु संसार में रह कर ही यदि आपने अंतर्मुखी होने की कला सीख ली तो आप पूर्ण रूप से सन्यासी हो गएl
ये जरूर है कि आयु बढ़ने के साथ हम सुविधाओं की तरफ ज्यादा बढ़ते हैं क्यूंकि हमें जीवन व्यापन में आसानी हो जाती हैl बढ़ती आयु के साथ कई वस्तुए तो आवश्यकता की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैंl वास्तविकता तो ये हैं कई जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं तब तक हम पूर्णतः मोहमाया का त्याग नहीं कर सकतेl अगर देखा जाए तो ये मोह ही हमको हमारे परिवार से जोड़े रखता हैl आयु के इस पड़ाव में कुछ गतिविधियां, कुछ आदतें अपने आप ही छूट जाती हैंl कुछ लोग तो आज भी 60 वर्ष की आयु के पश्चात कार्य करना बंद कर देते हैं या स्वयं को रिटायर समझकर किसी काम करने में रूचि ही नहीं रखतेl पर मेरा ऐसा मानना है कि जब तक शरीर में प्राण है काम करते ही रहना चाहिएl और अपनी रूचि भी बनाए रखना चाहिएl इससे शरीर तंदुरुस्त और मन भी प्रेरणा से भरा होगाl पर कुछ लोग आयु बढ़ने से नहीं वरन इसलिए वृद्ध हो जाते हैं क्यूंकि उनके पास जीवन जीने का कोई लक्ष्य ही नहीं होताl सादगी से जीवन व्यतीत कीजिए पर सादगी का मतलब ये नहीं कि आप जीवन से पलायन कर, कंजूस बनकर, अकर्मन्यता से या असामान्य अवस्था से जीवन व्यापन करेंl व्यस्त रहना और कर्म करना दोनों ही बातें जहाँ मानव का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं वहीं समाज में सम्मान का पात्र भी बनाते हैंl अपनी उपयोगिता कभी भी खत्म ना करेंl स्वयं को संकुचित दायरे में रखने की जगह घरपरिवार और समाज हेतु सहयोग की भावना रखेंl वृद्धावस्था में हम जीवन को वास्तविकता में अधिक सार्थक और गरिमापूर्ण बनना चाहें तो संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे व्यापक बनाना होगाl
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘तेरा रह जाना…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३७ ☆
कविता – तेरा रह जाना… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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हर रंग धूमिल पड़ जाते हैं,
ताजा से बदल, फीके पड़ जाते हैं…
हर पल बदल कर, बीता हुआ बन जाता है…
हर सांस…. जीवन कम कर जाता है,
बूंद बूंद टपक कर सागर रीता जाता है…
सुबह हुई और सांझ ढली,
दिन यूं ही ढलता जाता है…
मनुज रूप का जीवन दुर्लभ,
बेकार ही बीता जाता है…
उठ जाग मुसाफिर.. अब तो गुन ले,
तू रह जाए” याद” वह राह पकड़ ले !!!!!,
कुछ ऐसे रंग भी होते हैं,
जो कभी ना फीके पड़ते हैं…
मेहनत कह लो, भक्ति कह लो,
ज्ञान कहो या दान ही कह लो…
परहित को जीवन आनंद बना लें,
दूजे होठों को मुस्कान थमा दें…
त्याग करें स्वार्थ का और सद्गुण को व्यवहार बना लें,
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९८ ☆
☆रक्षाबंधन : रिश्तों की हरियाली का पर्व ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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आम नीम बरगद संग, पीपल की छाँव ।
महुआ और जामुन से, महकेगा गाँव ।।
*
टेसू के लाल फूल, चंपा सुहाय ।
गुलमोहर सेमल मन, सबका लुभाय ।।
☆
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह और विश्वास का पर्व नहीं, बल्कि हमारी प्रकृति और जीवन-मूल्यों से जुड़ने का भी सुंदर अवसर है। जिस तरह राखी का धागा भाई-बहन के रिश्ते को प्रेम और जिम्मेदारी से बाँधता है, उसी तरह एक पौधा हमें धरती के साथ अपने रिश्ते की याद दिलाता है।
आज जब पेड़-पौधों की संख्या घट रही है और पर्यावरण अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब रक्षाबंधन को हरियाली से जोड़ना एक सार्थक पहल हो सकती है। इस वर्ष हम अपने भाई या बहन की कलाई पर राखी बाँधने के साथ एक पौधा भी लगा सकते हैं और उसे अपने रिश्ते की तरह सहेजने का संकल्प ले सकते हैं। नीम, पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला या कोई फलदार पौधा—हर पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारा प्रेम-पत्र बन सकता है।
कल्पना कीजिए, जिस दिन भाई-बहन साथ मिलकर एक पौधा लगाएँ और कहें—“जैसे यह पौधा बढ़ेगा, वैसे ही हमारा स्नेह भी बढ़ता रहे”—तो रक्षाबंधन का अर्थ कितना व्यापक हो जाएगा। राखी का धागा कुछ समय बाद उतर जाएगा, लेकिन लगाया हुआ पेड़ वर्षों तक उस प्रेम की स्मृति बनकर खड़ा रहेगा।
प्रकृति भी तो हमारी बहन जैसी है—वह हमें छाया देती है, हवा देती है, फल-फूल देती है और बिना किसी अपेक्षा के हमारा जीवन सँवारती है। उसकी रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आइए, इस रक्षाबंधन एक नई परंपरा शुरू करें—एक राखी रिश्ते के नाम और एक पौधा प्रकृति के नाम। क्योंकि जब रिश्तों में प्रेम और धरती पर हरियाली होगी, तभी जीवन सचमुच सुंदर होगा।
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” ।)
☆ शेष कुशल # ६६ ☆
☆ व्यंग्य – “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…”– शांतिलाल जैन ☆
आईए श्रीमान्, ये जो आप देख रहे हैं, आज़ाद भारत में इसे प्रदर्शन करने की सबसे मुफ़ीद जगह माना जाता हैं. प्रदर्शनकारियों का मक्का : दिल्ली का जंतर-मंतर. समझ लें कि ये चित्रकार के सपनों की ‘जहाँगीर आर्ट गैलेरी’ है जहाँ वह जीवन में कम से कम एकबार अवश्य नुमाइश लगाना चाहता है. किए होंगे आपने जिंदगीभर प्रदर्शन हर जगह, मगर जंतर-मंतर पर नहीं किया तो आपकी प्रोटेस्टर-लाइफ फ़िज़ूल है. जंतर-मंतर देश में पाँच जगह पर हैं, बट डेल्ही इज डिफरेंट. बाकी जगह जंतर-मंतर हैं मगर प्रोटेस्टर्स नहीं हैं. जहाँ प्रोटेस्टर्स हैं वहाँ जंतर-मंतर नहीं हैं. दिल्ली में जंतर-मंतर भी हैं, प्रोटेस्टर्स भी हैं, कवर करनेवाला मेनस्ट्रीम मीडिया भी है और दोगला निज़ाम भी. वह दिन के उजाले में प्रदर्शन की अनुमति देता है, रात के अँधेरे में तम्बू उखाड़ फैंकता है. दिन में लोकतंत्र मज़बूत होता है. लोकतंत्र मज़बूत करने का काम देश में अगले दिन भी बचा रहे इसलिए रात में इसे फिर से कमज़ोर कर देता है.
लोकतंत्र में प्रोटेस्ट्स का होना जितना जरूरी है उसे कुचला जाना उससे भी ज्यादा जरूरी है. प्रोटेस्ट करने से डेमोक्रेसी ऑक्सीजन पाती हैं, कुचल दिए जाने से मज़बूत होती है. इसलिए हर सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है कि वो लोकतंत्र को पहले कुछ प्राणवायु पा लेने दे फिर उसे कीलें ठुकी हुई लाठियों से मज़बूत बनाने के लिए दौड़ पड़े. प्रहरी ड्रेस पहन पाए तो ठीक, नहीं पहन पाए तो सादी वर्दीवाले साथ में ले जाकर भी डेमोक्रेसी को ताकत दी सकती है. लोकतंत्र सभ्यता के चरम पर तब पहुँचता है जब कोई ‘ही’ पुलिसवाला किसी ‘शी’ प्रोटेस्टर के निजी अंगों में करंट छोड़नेवाली बेटन पुश करता है. पत्थर कभी पुलिसवालों को लगता है कभी प्रदर्शनकारियों को. और कोई घायल हो न हो लोकतंत्र लहूलुहान अवश्य होता है.
जंतर-मंतर निज़ाम के लिए भी मुफीद जगह है. जब वह लोकतांत्रिक दिखना चाहता है, तब प्रदर्शन की अनुमति देता है. जब अधिक लोकतांत्रिक दिखना चाहता है तब उसी प्रदर्शन को कुचल देता है. प्रदर्शनकारियों को निज़ाम से डर नहीं लगता, उसके अधिक लोकतांत्रिक हो उठने से लगता है. जंतर-मंतर पर एक सूर्यघड़ी है जो परछाई के झुकाव से बता देती है कि किस प्रोटेस्टर को कब लाठी खिलाना है, कब जूस पिलाना है. इंटेलिजेंस के खगोलशास्त्री सूर्यघड़ी की परछाई देखकर सरकार को बता देते हैं – कौन कब खतरनाक हो सकता है उसे किस दिन, कितने बजकर कितने मिनट्स, कितने सेकंड्स पर जेल में डालने के योग बन रहे हैं.
एक जंतर-मंतर मेरे शहर उज्जैन में भी है. आलसी और सुस्त. मैंने वहाँ लोकतंत्र मज़बूत होते हुए शायद ही कभी देखा हो. इसीलिए हमारे शहर के पुलिसवाले जब जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत होता हुआ देखते हैं तो मज़बूती के यज्ञ में आहुति देने को मचल मचल उठते हैं. हरबार उनकी मचलन निराशा में बदल जाती है. उनके पास लाठी है मगर चार्ज करने के पॉइंट्स नहीं हैं, पैलेट्स हैं, गन हैं, मगर सब्जेक्ट नहीं है. उनकी अपनी आँख का पानी भले सूख गया हो मगर दूसरों की आँखों से आँसू निकल आए, दागने को गैस के गोले हैं. वाटर केनन है मगर चलाने के मौके नहीं है. किस्मतवाली है दिल्ली की पुलिस, लोकतंत्र मज़बूत करने में योगदान दे पा रही है. उसके पास जंतर-मंतर भी है, प्रोटेस्टर्स भी, झूठ बोल जाने की बेशर्मी भी है. और लाठी, गन, गोले तो हैं ही. इसी बरस रिटायर होने जा रहे एक पुलिस अंकल ने कहा – ‘लगता है आँसू गैस का गोला छोड़ पाने की हसरत मन में लिए लिए ही रिटायर होना पड़ेगा.’
मैंने कहा – “अन्याय तो शेष मुल्क में भी कम नहीं हैं पुलिस अंकल, मगर क्या है कि आमजन ने अन्याय के साथ जीना सीख लिया है. समझदार लोग विरोध, निजता और मानवाधिकार जैसी बातों पर लेक्चर सुनने ज़रूर जाते हैं, चच्च-चच्च करते हैं, फिर आत्मतुष्ट होकर बैठ जाते हैं. टीवी पर मंजर देखकर उबलते तो हैं लेकिन शहर के जंतर-मंतर पर पहुँचकर लोकतंत्र बचाने उपायों में शरीक नहीं हो पाते.”
बहरहाल, धैर्य रखे जयपुर, बनारस, उज्जैन की पुलिस और लाठी को तेल नियमित रूप से पिलाती रहे, कौन जाने कब उन्हें उनके जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत करने के असाइनमेंट में लगा दिया जाए.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “गुरु गुड़, चेला शक्कर ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२६ ☆
व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहावत पुरानी है, मगर शिक्षा की आवश्यकता की तरह सदा प्रासंगिक है, गुरु गुड़ रह गया, चेला शक्कर हो गया।
पहले गुरु के चरण छूकर ज्ञान मिलता था। अब गुरु के पास पहुंचने से पहले विद्यार्थी उसका सोशल मीडिया प्रोफाइल छानता है। गुरु की योग्यता क्या है, यह बाद की बात है, फॉलोअर कितने हैं,रेटिंग क्या है यह पहले देखा जाता है।
कभी शिक्षक ज्ञान का स्रोत था। आज ज्ञान हर जेब में है,गूगल , ए आई और मोबाइल के रूप में।
आज का परिष्कृत मंत्र है,गूगल , मोबाइल दोनों खड़े काके लागूं पाँव, बलिहारी मोबाइल आपकी जिन गूगल दियो बताये ।
शिक्षक कहता है, “बच्चों, ध्यान से सुनो।” बच्चा मोबाइल खोलकर कहता है, “सर, यह तो गूगल पर कुछ और लिखा है।”इसी से परेशान एक
डाक्टर साहब ने क्लीनिक के बाहर बोर्ड लगवा रखा है, गूगल का ज्ञान और जूते बाहर ही रखें।
गुरु समझाने लगता है, चेला स्क्रीन पर अंगुली घुमाकर समझा देता है।
गुरु ने जीवन भर पढ़कर ज्ञान पाया, चेले ने पाँच मिनट में ज्ञान डाउनलोड कर लिया है।
शिक्षक दिवस पर अचानक गुरु का महत्व बढ़ जाता है। स्कूल में फूल आते हैं, कार्ड आते हैं, भाषण होते हैं। विद्यार्थी कहते हैं, “सर, आप हमारे जीवन के आदर्श हैं।”गुरु भावुक हो जाता है।
अगले ही दिन वही आदर्श , ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पर बच्चों के शोषण के रूप में दर्ज किया जाता है।
5 सितम्बर को गुरु भगवान होता है, 6 सितम्बर को ‘फीडबैक’ का विषय बन जाता है।
यूं यदि शिक्षक दिवस की परम्परा नई सरकार के समय शुरू होती तो डा सर्व पल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की जगह उसके संदर्भ गुरु वशिष्ठ या गुरु सानदीपनि के समय से जोड़ निकाले जाते ।
हमारे जमाने में सोंटी वाले मास्साब होते थे , अद्धा , पौना का पहाड़ा होता था, अब तो बच्चों की शिक्षा को आसान बनाने के लिए इतने नियम बना दिए गए हैं, कि शिक्षक को शाला जाने से पहले नियम पढ़ने पड़ते हैं।
कभी शिक्षक पूछता था, “होमवर्क क्यों नहीं किया?”
विद्यार्थी बहाना बनाता था।
आज विद्यार्थी कहता है, “सर, होमवर्क तो एआई ने किया है, बस कोई यह मत पूछिए कि मैंने समझा भी है या नहीं।”
अब कक्षा में गुरु और एआई आमने-सामने हैं। गुरु के पास अनुभव है, एआई के पास उत्तर।
गुरु कहता है, “मैंने तीस साल पढ़ाया है।”
एआई कहता है, “मैंने तीस करोड़ दस्तावेज पढ़े हैं।”
गुरु चुप है।
अनुभव का मुकाबला आँकड़ों से हो जाए तो गुरु भी अपडेट माँगता है।
पहले विद्यार्थी गुरु से पूछता था, “सर, यह कैसे होगा?”
अब गुरु विद्यार्थी से पूछता है, “बेटा, यह ऐप कैसे चलेगा?”
चेला मुस्कुराता है।
गुरु ने शिष्य को ज्ञान दिया था, शिष्य गुरु को पासवर्ड दे रहा है।
शिक्षा का बाजार भी बदल गया है। कभी स्कूल में फीस देकर पढ़ाई होती थी। अब फीस देखकर लगता है कि बच्चा पढ़ने नहीं, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में निवेश करने जा रहा है। विदेशों में हालत ये देखने मिल रही है कि कई माता पिता बच्चे को घर में पढ़ाना पसंद करते हैं। दूसरा बच्चा इसलिए नहीं करते कि पढ़ाई का खर्च कैसे करेंगे।
स्कूल की इमारत चमक रही है, वेबसाइट चमक रही है, यूनिफॉर्म चमक रही है, विज्ञापन चमक रहा है।बस शिक्षा गुमशुदा है। परीक्षा , पेपर लीक चर्चा में हैं, वास्तविक ज्ञान , नैतिकता और व्यक्तित्व का विकास , लापता है।
शिक्षा मिशन नहीं व्यवसाय बन गई है। भव्य स्कूल बिल्डिंग , एसी क्लास रूम, सीसी टीवी , लक्जरी बस ने शिक्षा को ऊँचा किया है, इतना कि वह आम लोगों की पहुंच से ऊपर जा रही दिखती है। व्यवस्था ने स्कूल को धंधा बना कर रसीद धारी पूंजीपति को मोटा किया है।
और शिक्षक?
वह आज भी वही है। कक्षा में खड़ा है। हाथ में चॉक हो या स्मार्ट बोर्ड की पेन, चिंता वही है।
बच्चा पढ़ेगा या नहीं?
माता-पिता संतुष्ट होंगे या नहीं?
परिणाम अच्छा आएगा या नहीं?
और सबसे बड़ी चिंता, कहीं किसी ने उसकी कक्षा का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर तो नहीं डाल दिया?
शिक्षक अब केवल शिक्षक नहीं है। उसे काउंसलर होना है, प्रशासक होना है, तकनीकी विशेषज्ञ होना है, मोटिवेशनल स्पीकर होना है और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उसे विद्यार्थी के माता-पिता की अपेक्षाओं का भी होमवर्क करना है।
5 सितम्बर को मंच पर कहा जाएगा, “शिक्षक राष्ट्र निर्माता है।”
शिक्षक मुस्कुराएगा।
राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी उसी की है।
इसलिए उसे जनगणना भी करना है, चुनाव भी करवाना है।
शिक्षक दिवस पर फूल दीजिए, भाषण दीजिए, सम्मान दीजिए, स्मृति-चिह्न दीजिए।
मगर सिर्फ एक दिन के लिए नहीं। वर्तमान स्थिति में गुरु गुड़ रह गया है, चेला शक्कर हो गया है।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा।)
☆ चुभते तीर # १२९ – व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
शांति नगर वेलफेयर एसोसिएशन का चुनाव किसी राष्ट्रीय चुनाव से कम रोमांचक नहीं होता था। इस बार मुकाबला दो दिग्गजों के बीच था, पुराने अध्यक्ष कूपर साहब और मोहल्ले के नए-नवेले बिल्डर भल्ला जी। कूपर साहब का दांव अपनी पुरानी साख और ईमानदारी पर था, जबकि भल्ला जी का मुख्य हथियार था चुनाव की शाम को दी जाने वाली ‘शाही समोसा और जलेबी पार्टी’।
सोसायटी के ऑडिटोरियम में चुनावी बहस का आयोजन किया गया था। पूरा हॉल दो गुटों में बंटा हुआ था। एक तरफ वरिष्ठ नागरिकों की फ़ौज थी जो कूपर साहब के समर्थन में नारे लगा रही थी, तो दूसरी तरफ नौजवानों की टोली थी जो भल्ला जी के मुफ़्त वाई-फ़ाई और जिम के वादों पर फ़िदा थी।
बहस अपने चरम पर थी। भल्ला जी ने माइक हाथ में लिया और बुलंद आवाज़ में कहा, “भाइयों और बहनों, अगर मैं अध्यक्ष बना तो सोसायटी के पार्क में इटालियन मार्बल लगवाऊंगा और स्विमिंग पूल का पानी हर हफ्ते बदला जाएगा!”
भीड़ ने जमकर तालियां बजाईं। कूपर साहब की बारी आई। उन्होंने अपना पुराना चश्मा ठीक किया और धीमी आवाज़ में बोले, “मार्बल और स्विमिंग पूल तो ठीक है, लेकिन पिछले छह महीने से हमारे मेन गेट का ताला टूटा हुआ है और सिक्योरिटी गार्ड को दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। पहले बुनियादी समस्याएं तो सुलझें।”
माहौल अचानक गंभीर हो गया। तभी भल्ला जी के समर्थकों ने ऑडिटोरियम के पीछे समोसे के पैकेट बांटना शुरू कर दिए। गरमा-गरम समोसे की महक हवा में तैरने लगी और लोगों का ध्यान भाषण से हटकर खाने की प्लेटों पर चला गया। ऐसा लग रहा था कि कूपर साहब की ईमानदारी पर भल्ला जी का समोसा भारी पड़ने वाला था।
वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हुई। हर व्यक्ति अपनी पर्ची बक्से में डाल रहा था। कूपर साहब शांति से एक कोने में बैठे चाय पी रहे थे। उन्हें अपनी हार तय लग रही थी। शाम सात बजे मतों की गिनती शुरू हुई।
जब अंतिम नतीजे की घोषणा की गई, तो मंच पर मौजूद मुख्य अतिथि की आंखें भी फटी रह गईं। कूपर साहब को कुल नब्बे प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भल्ला जी को मात्र दस वोट मिले। भल्ला जी हैरान होकर खड़े हो गए और चिल्लाए, “यह बेईमानी है! जब सबने मेरे समोसे खाए, तो वोट कूपर साहब को कैसे दे दिए?”
तभी सोसायटी के सबसे वयोवृद्ध निवासी गुप्ता जी मंच पर आए, उन्होंने माइक संभाला और बोले, “भल्ला जी, आपकी जलेबी और समोसा बहुत स्वादिष्ट था, धन्यवाद! लेकिन हमारे शांति नगर की परंपरा रही है कि हम खाना अमीर प्रत्याशियों का खाते हैं और वोट उस ईमानदार इंसान को देते हैं जो रात को दो बजे भी गेट का ताला ठीक कराने खड़ा हो सके।”
पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट और ठहाकों से गूंज उठा। भल्ला जी ने भी हार मानते हुए कूपर साहब को गले लगा लिया और कहा, “अध्यक्ष महोदय, अगली बार समोसे के साथ चटनी भी मेरी तरफ से मुफ़्त रहेगी!”
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “ओ! बादल” ।)