(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “शब्दों में वो मर्म है…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘चन्दा के जैसे चमकेगी…‘।)
☆ कविता – चन्दा के जैसे चमकेगी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
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सुंदर कविता लिख दूं, मैं भाल पर तुम्हारे,
बिंदिया के जैसी चमकेगी वो भाल पर तुम्हारे,
*
खुशियों की सारी नेमत लिख दूं,
चन्दा के जैसे चमकेगी सुर्ख गाल पर तुम्हारे,
*
सहेज लूं, मुस्कराहट तुम्हारी, पहरा लगा दूं,
तैनात रहे हर पल होठों पर, तुम्हारे,
*
झटकना मत, जुल्फों को, बारिश के मौसम में,
मोती टूट जाएंगे, छुपे हैं जो जुल्फों में तुम्हारे,
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मानव शरीर के फालतू अंग ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०९ ☆
☆ व्यंग्य ☆ मानव शरीर के फालतू अंग ☆
कुछ दिनों से ख़बर गर्म थी कि बाबा जी ने परलोक के साथ ‘हॉटलाइन’ स्थापित कर ली है और देवताओं से उनकी रोज़ बातचीत होती है। उनका कहना है कि चित्रगुप्त जी से उनका हंसी- मज़ाक भी हो जाता है और अगर कोई भक्त चाहे तो वे स्वर्ग में ‘रिज़र्वेशन’ के लिए उसकी सिफारिश कर सकते हैं।
ऊपर वालों के साथ बाबा के रसूख के बारे में सुनकर उनके दरबार में भक्तों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी। इसी क्रम में एक दिन पांच छः लोग कुछ शिकायतें और सुझाव लेकर बाबा के दरबार में हाज़िर हुए। वे बाबा के मार्फत अपनी शिकायतें और सुझाव ऊपर पहुंचाने की मुराद लेकर आये थे।
समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि वे देश की एक बड़ी संख्या की भावनाएं लेकर आये हैं। उन्होंने कहा कि देश के बहुत से लोग इस बात को लेकर व्यथित हैं कि आदमी को जन्म के समय अनेक ऐसे अंग दे दिये जाते हैं जिनका उसके जीवन में कोई उपयोग नहीं होता। इस तरह बहुमूल्य कच्चा माल ‘वेस्ट’ होता है, उसका दुरुपयोग होता है। लोगों की भावना है कि अगर उपयोग में न आने वाले अंगों की पूर्ति सीमित कर दी जाए तो बड़ी बचत हो सकती है। अंग उन्हीं को दिये जाएं जिन्हें उनकी ज़रूरत है।
समूह की बात सुनकर बाबा विस्मित हुए। पूछा कि कौन से अंग आदमी के लिए फालतू हैं। समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि बहुत से लोगों को अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं होती। पॉलिटिक्स में यही हो रहा है। जहां पार्टी कहे वहीं हाथ उठाना पड़ता है। ऐसा ही कई संगठनों में भी होता है। वहां भी अनुयायियों को अपना दिमाग अलमारी में रख देना होता है। धर्मगुरुओं के शिष्यों को भी अपने दिमाग के इस्तेमाल की मुमानियत होती है। ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ का सिद्धान्त चलता है। गुरू जो रास्ता दिखाये उसी पर चलो।
वही बात आंखों पर भी लागू होती है। पहले बताये गये सभी संगठनों में छुटभैये या अनुयायी को नेता या गुरू की आंखों से ही देखना पड़ता है। इसलिए अपनी आंखें फालतू हो जाती हैं।
समूह ने बाबा जी को बताया कि एक और अंग जो फालतू और असुविधाजनक साबित हुआ है आदमी की रीढ़ है। राजनीति समेत सभी संगठनों में रीढ़ बड़ी अड़चन पैदा करती है। समूह ने बताया कि बहुत से लोगों ने उन्हें जानकारी दी कि किसी बड़के आदमी के सामने झुकते वक्त उनकी रीढ़ उनके आड़े आ गयी और उन्हें शर्मिन्दगी उठानी पड़ी। लोगों का मत है कि वैसे भी रीढ़ शरीर में छिपी रहती है, इसलिए उसे आसानी से हटाया जा सकता है।
समूह ने बताया कि एक और अड़चन पैदा करने वाली चीज़ अंतरात्मा या ज़मीर है जो शरीर में पता नहीं कहां रहती है, लेकिन आदमी जब भी कोई दो नंबर का काम करना चाहता है आत्मा उसे कोंचने लगती है। कुछ लोग अंतरात्मा को सुलाने में सफल होते हैं, लेकिन कई लोग आत्मा के द्वारा बार-बार कोंचे जाने से परेशान रहते हैं। कई लोग आत्मा के कोंचने से परेशान होकर आत्महत्या की सोचने लगते हैं। इसलिए अंतरात्मा नाम की चीज़ से मुक्ति ज़रूरी है।
समूह ने बाबा जी को बताया कि बहुत से लोग इन अंगों से तो मुक्त होना चाहते हैं, लेकिन वे एक अंग की वापसी भी चाहते हैं। लोगों का कहना है कि वानर की औलाद होने के कारण कभी मनुष्य के भी दुम थी, लेकिन वह कालांतर में झड़ गयी। शायद पहले का आदमी ख़ुद्दार रहा होगा, इसलिए उसे दुम हिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी और इसीलिए वह धीरे-धीरे गायब हो गयी। लेकिन अब आदमी को एक अदद दुम की सख्त ज़रूरत है क्योंकि जो काम खुशामद के दस जुमलों से नहीं होता वह एक बार दुम हिलाने से हो जाता है। इसलिए ज़रूरतमंद लोगों के लिए तत्काल दुम की व्यवस्था करके उन्हें राहत दी जाए।
अन्त में एक और बात समूह ने बाबा को बतायी कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनकी ज़बान बीच से काट दी जाए, जैसी सांप या मेंढक की होती है, जिसे अंग्रेजी में ‘फ़ोर्क्ड टंग’ कहते हैं। इससे उन्हें एक ही समय दो तरह की बात कहने में आसानी होगी। यह राजनीतिज्ञों के लिए बड़े काम की सिद्ध होगी।
बाबा ने समूह की बात सुनकर उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी भावनाएं बाबा की सिफारिश के साथ वायु-वेग से ऊपर पहुंचा दी जाएंगीं। समूह बाबा के चरणों में पर्याप्त दक्षिणा अर्पित कर विदा हुआ।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– राग – विराग…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८१ — राग – विराग —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
कवि पूरी तैयारी से अपनी आत्मा और अपनी कविता के सारे शब्द बेचने गया था। खरीदने वाली वक्त की चालाक राजनीति थी। उसने राजनीति से वादा किया था अब वह केवल दरबारी कवि होगा। कवि आगे – आगे गया था। उसके शब्द न चाह कर किसी तरह उसके पीछे — पीछे गए थे। पर खरीदारी शुरु होने पर उसके शब्द उसके पीछे तो थे ही नहीं। उसके शब्दों ने तो आपस में मिल कर सामूहिक आत्म हत्या कर ली थी।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०९ ☆ संभावना के बीज…
सीताफल की पिछले कुछ दिनों से बाज़ार में भारी आवक है। सोसायटी की सीढ़ियाँ उतरते हुए देखता हूँ कि बच्चे सीताफल खा रहे हैं। फल के बीज निकालकर करीने से एक तरफ़ रख रहे हैं। फिर सारे बीज एक साथ उठाकर डस्टबिन में डाल दिए। स्वच्छता और सामाजिक अनुशासन की दृष्टि से यह उचित भी है।
यहीं से चिंतन जन्मा। सोचने लगा, हर बीज के पेट में एक पौधा है, पौधे का बीज फेंका जा रहा है। फ्लैट में रहने की विवशता कितना कुछ नष्ट कराती है।
सर्वाधिक दुखद होता है संभावनाओं का नष्ट होना। वस्तुत: संभावना की हत्या महा पाप है। हर संभावना को अवसर मिलना चाहिए। पनपना, न पनपना उसके प्रारब्ध और प्रयास पर निर्भर करता है।
चिंतन बीज से मनुष्य तक पहुँचा। सही ज़मीन न मिलने पर जैसे बीज विकसित नहीं हो पाता, कुछ उसी तरह अपने क्षेत्र में काम करने का अवसर न पाना, संभावना का नष्ट होना है। साँस लेने और जीने में अंतर है। अपनी लघुकथा ‘निश्चय’ के संदर्भ से बात आगे बढ़ाता हूँ। कथा कुछ यूँ है,
“उसे ऊँची कूद में भाग लेना था पर परिस्थितियों ने लम्बी छलांग की कतार में लगा दिया। लम्बी छलांग का इच्छुक भाला फेंक रहा था। भालाफेंक को जीवन माननेवाला सौ मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था। सौ मीटर का धावक, तीरंदाजी में हाथ आजमा रहा था। आँखों में तीरंदाजी के स्वप्न संजोने वाला तैराकी में उतरा हुआ था। तैरने में मछली-सा निपुण मैराथन दौड़ रहा था।
जीवन के ओलिम्पिक में खिलाड़ियों की भरमार है पर उत्कर्ष तक पहुँचने वालों की संख्या नगण्य है। मैदान यहीं, खेल यहीं, खिलाड़ी यहीं दर्शक यहीं, पर मैदान मानो निष्प्राण है।
एकाएक मैराथन वाला सारे बंधन तोड़कर तैरने लगा। तैराक की आँंख में अर्जुन उतर आया, तीर साधने लगा। तीरंदाज के पैर हवा से बातें करने लगे। धावक अब तक जितना दौड़ा नहीं था उससे अधिक दूरी तक भाला फेंकने लगा। भालाफेंक का मारा भाला को पटक कर लम्बी छलांग लगाने लगा। लम्बी छलांग वाला बुलंद हौसले से ऊँचा और ऊँचा, बहुत ऊँचा कूदने लगा।
दर्शकों के उत्साह से मैदान गुंजायमान हो उठा। उदासीनता की जगह उत्साह का सागर उमड़ने लगा। वही मैदान, वही खेल, वे ही दर्शक पर खिलाड़ी क्या बदले, मैदान में प्राण लौट आए।”
अँग्रेज़ी की एक कहावत है, ‘यू गेट लाइफ वन्स। लिव इट राइट। वन्स इज़ इनफ़।’ जीवन को सही जीना अर्थात अपनी संभावना को समझना, सहेजना और श्रमपूर्वक उस पर काम करना।
स्मरण रहे, आप जीवन के जिस भी मोड़ पर हों, जीने की संभावना हमेशा बनी रहती है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी.
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – नवगीत – देव उठनी एकादशी (गन्ना ग्यारस)।)
☆ आलेख ☆ ~ केलवा के पात पर उगे लन सुरुजमल… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
(प्रकृति के आराधना का पर्व -छठ)
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आज सांय अस्त होते सूर्य को अर्घ देने के साथ ही छठ महापर्व के पावन बेला पर भगवान भास्कर की प्रथम पूजा पूर्ण हुई। सदियों नहीं बल्कि युगों से परंपरागत ढंग से मनाए जाने वाली छठ पूजा आज करीब एक दशक बाद बड़े आत्मविश्वास के साथ एवं आत्म संतुष्टि के साथ यह बता पाने में सफल हुई, कि ये पुरबिहा लोग आखिर कौन सी पूजा करते हैं ? और किसकी पूजा करते हैं ?
दरअसल पूर्णतः प्रकृति की पूजा का यह पर्व अपने आत्म गौरव के साथ आज इतने दिनों बाद बताने में सफल हो रहा है कि पूरी दुनिया उगते हुए सूर्य को तो प्रणाम करती है लेकिन अस्त होते सूर्य की पूजा कोई नहीं करता और ऐसे अस्त होते सूर्य की पूजा करने से लाभ ही क्या ? जो अस्त होने के लिए उन्मुख है। लेकिन एक बड़ा जनमानस जो हर बार ट्रेन एवं बसों में धक्के खाते हुए अपने गांव परिवार और अपने घर सिर्फ इसीलिए पहुंचता है कि उसे प्रथम दिवस अस्त होते सूर्य को ही पूजना है। क्योंकि उसे पता था सूर्य अस्त ही कहां होता है। जिस समय यह अस्त हो रहा होता है तो कहीं उदय हो रहा होता है। इसका कारण यह कि वह सामान्य तो है नहीं !!! और सामान्य हो भी क्यों हो!!
इस पृथ्वी पर उगने वाली किसी भी वनस्पति की इतनी क्षमता नहीं, जो सूर्य के प्रकाश के बिना, या सूर्य की आभा के बिना, नदी या सरोवर में स्थिर या बहते जल के बिना स्वयं के जीवन या स्वयं के अस्तित्व को प्राप्त नहीं कर सकते। जब जब की वेद वेदांत में पौराणिक धर्म ग्रंथो में पांच भूतों की बात कही गई है सृष्टि के पंचभूत कोई और नहीं प्रकृति के ही पांच स्वरूप है।
श्री राम किशोर उपाध्याय जी की पुस्तक सृष्टि के गीत इन्हीं पांच भूतों की बात करती है। सूर्य अग्नि तत्वों के साथ पांच भूत का ही अंग है। मैं अपनी बात आगे रखता हूं
हालांकि यह सब मेरा अपना अनुभव है। एक समय हुआ करता था, हम शर्माते थे अपने ही कार्यालय में बैठ यह बात नहीं पाते हैं कि हमारा यह पर्व है क्या ? और इसका महत्व क्या है। हालांकि वह समाज,वह क्षेत्र जो इस सूर्य आराधना के पर्व को श्रद्धा पूर्वक तब भी मनाता था।
उसके आस्था विश्वास और ज्ञान की पराकाष्ठा यह थी कि ऐसे परिवेश में जन्म लेकर यहां की माटी पर लोटपोट कर जिसने ज्ञान के सर्वोच्च शिखर को छुआ, प्रशासनिक पदों पर रहकर अपने ज्ञान को सिद्ध करता रहा। विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरकर यह बताता रहा कि हमारी खगोलीय संरचना क्या है, हमारे लिए सूर्य कितना महत्वपूर्ण है, उसके मन में दसको वर्ष पूर्व भी यह पर्व वैज्ञानिक पर्व था, आस्था के साथ-साथ प्रकृति की पूजा का पर्व था , नदियों और जल तालाबों के संरक्षण का पर्व था, कंदमूल फल जड़ी बूटियां, के महत्व को जानने का पर्व था , जलते हुए अखंड दीप का पर्व, डूबते हुए और अस्त होते हुए सूर्य से निकली हुई निर्विकार किरणों का पर्व था, अपने पूर्वजों के विश्वास का पर्व था, और आज भी उसके लिए श्रद्धा और विश्वास का पर्व है।
एक समय था जब हम परदेस में इस पर्व को मानते थे? हमारे सामने प्रश्न ही होते थे? आज हमारे पास प्रश्न नहीं बल्कि आज सबकी श्रद्धा और सब का विश्वास हमारे साथ है , साधारण विश्वास नहीं बल्कि हमसे ज्यादा अटूट विश्वास है।
निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति से लेकर सफलता के सर्वोच्च शिखर पर बैठा हुआ प्रत्येक व्यक्ति, हर कोई एक साथ, एक कतार में ,एक ही नदी और एक ही तालाब में, घुटने भर पानी में, खड़े होकर अस्त होते सूर्य को निहार, उसको प्रणाम करने, उदय होते हुए सूर्य की अगवानी करने और उसका उसको अर्घ समर्पित करने का सुखद सौहार्दपूर्ण समय ढूढ़ता है।
भगवान भास्कर हमारे जीवन में, अपनी सतरंगी किरणों के द्वारा नवीन विकास के पथ को अपने प्रकाश से प्रकाशित करें। भारत दिन-रात नित नवीन ऊंचाइयों को छू छुए और, इसी प्रकार विकासोंमुख बना रहे।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-१० ☆ श्री सुरेश पटवा
बुद्ध दर्शन
जिस समय एकेश्वरवाद धर्मों के स्वयंभू पुजारी धर्म के “ध” की बारहखड़ी सीख कर रहे थे उस समय तक भारतीय दर्शन ईश्वर को चुनौती देकर मानव समाज के लिए आवश्यक “सहिष्णु-व्यक्तित्व” के गठन हेतु स्वयं को संयमित और व्यवस्थित करके दूसरों लोगों ही नहीं जीव जगत और प्रकृति के साथ अन्योन्याश्रित सम्बंधों के गणित का कठिन प्रश्न हल कर रहे थे। भारतीय चिंतकों ने मनुष्य के भाग्य को भगवान भरोसे छोड़ने की बजाय खुद ज़िम्मेदार होने की ज़िम्मेदारी लेना सिखाना शुरू कर दिया था।
गौतम बुद्ध जिन्हें बौद्ध दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है, उनके लिए संसार दुखों का घर है। संसार में आने वाला हर प्राणी दुखों का पुंज लेकर धरती पर आता है। संसार में कोई आए और दुखों से उसका सम्बन्ध न हो, यह असम्भव है। समस्त बौद्ध विचार “चत्वारि आर्य सत्यानि” में समाहित है। चार आर्य सत्यों की यात्रा निर्वाण की यात्रा है। जिसकी शुरुआत दुख से होती है। किसी को पिता के मरने का दुख, किसी को पत्नी के मरने का, किसी को विवाह न होने का दुख तो किसी को रोगी होने का और किसी को अभीप्सित की पूर्ति न होने का दुख। संसार में दुख ही दुख हैं और संसार दुखों का घर है। चार आर्यसत्य, पंचशील, अष्टांगिक मार्ग आदि के रूप में बुद्ध को प्राप्त ज्ञान और उनकी शिक्षाएँ समझी जा सकतीं हैं।
चार आर्य सत्य
तथागत बुद्ध का पहला धर्मोपदेश, जो उन्होने अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, इन चार आर्य सत्यों के बारे में था। बुद्ध ने चार आर्य सत्य बताये हैं।
1.दुख
इस दुनिया में दुःख है। जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुख है। गौतम बुद्ध दु:ख से संसार की यात्रा की शुरुआत मानते हैं किन्तु उनका लक्ष्य दुखों को स्थापित करना नहीं था। दु:ख की चर्चा दुख को जानने के लिए करते हैं, उसके कारणों को ढूंढऩे के लिए करते हैं।
2.दुख का कारण
दुख है तो उसका कारण भी है, जैसे डॉक्टर रोग के निदान के लिए रोग के कारणों को ढूंढते हैं तो रोग का सटीक निदान होता है, वैसे ही दुख है तो दुख का कारण है और जब कारण का पता चल जाता है तो उसका निवारण हो जाता है।
तृष्णा, या चाहत, दुख का कारण है और वह फ़िर से सशरीर धारण करके संसार को जारी रखती है। हर जन्म से तृष्णा और भी गहन होती जाती है।
भारतीय दर्शन के सन्दर्भ में तृष्णा का अर्थ ‘प्यास, इच्छा या आकांक्षा’ से है। तृष्णां, तृ मतलब तीन, इष्णा मतलब लालच। तीन लालच, पहला धन का लालच, दूसरा पुत्र (वंश) का लालच, तीसरा सम्मान का लालच।
3.दुख निरोध
तृष्णा के निराकरण से दुख निरोध सम्भव है। किसी वस्तु की तृष्णा से उसे ग्रहण करने की जो प्रवृत्ति होती है, उसे उपादान कहते हैं। उपादान से ही प्राणी के जीवन की सारी भागदोड़ होती है, जिसे भव कहते हैं। तृष्णा के न होने से उपादान भी नहीं होता और उपादान के निरोध से भव का निरोध हो जाता है। यही निर्वाण के लाभ की दिशा है। हम उपादान और प्रतीत्यसमुत्पादन की चर्चा आगे करेंगे।
प्रतीत्यसमुत्पादन की दूसरी कड़ी ‘तण्हापच्चया उपादानं’ – इसी का प्रतिपादन करती है।
दुःख-निरोध के आठ साधन बताये गये हैं जिन्हें ‘अष्टांगिक मार्ग’ कहा गया है। तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है। बुद्ध दु:खों के निदान के लिए ही दुख का उल्लेख करते हैं। इसे वे दुख निरोध कहते हैं।
4.दुख निरोध का मार्ग
तृष्णा से मुक्ति अष्टांगिक मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है। दुख निरोध के लिए दु:ख निरोध मार्ग भी बताते हैं। अत: उनका लक्ष्य दुख निरोध मार्ग से दुख दूर कर निर्वाण को प्राप्त करना है।
जन्म दुख है, ज़रा दुख है, व्याधि दुख है, मरण दुख है, प्रिय से बिछुड़ना दुख है, अप्रिय से मिलना दुख है। जीवन के दो छोर जन्म और मृत्यु दुख से भरे हैं। सुख-दुख एक सिक्के के दो पहलू हैं। सुख लेना छोड़ दें तो दुख स्वमेव छूटना तय है।
अष्टांगिक मार्ग
बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथा आर्य सत्य अष्टांग मार्ग है दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करके इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :
प्रज्ञा
सम्यक् दृष्टि- वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को जानना ही सम्यक् दृष्टि है। कामना प्रकट होती है नष्ट हो जाती है। सुख स्थायी नहीं है।
सम्यक् संकल्प- आसक्ति, द्वेष तथा हिंसा से मुक्त विचार रखना ही सम्यक् संकल्प है। कामना से अनासक्त होना संकल्प है।
शील
सम्यक् वाक्- सदा सत्य तथा मृदु वाणी का प्रयोग करना ही सम्यक् वाक् है। वही वाणी अनासक्त है।
सम्यक् कर्मान्त- इसका आशय अच्छे कर्मों में संलग्न होने तथा बुरे कर्मों के परित्याग से है।
सम्यक् आजीव- विशुद्ध रूप से सदाचरण से जीवन-यापन करना ही सम्यक् आजीव है।
समाधि
सम्यक् व्यायाम- अकुशल धर्मों (अति) का त्याग तथा कुशल धर्मों (मध्यम) का अनुसरण ही सम्यक् व्यायाम है।
सम्यक् स्मृति- इसका आशय वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप (उत्पत्ति-भव) के संबंध में सदैव जागरूक रहना है।
सम्यक् समाधि – चित्त की समुचित एकाग्रता ही सम्यक् समाधि है। अविचलित चित्त समाधि की पूर्व शर्त है।
सत्य और अहिंसा आंतरिक सफ़ाई तथा ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह बाहरी बुहारियाँ हैं। सम्पूर्ण सफ़ाई से ही निर्वाण सम्भव है। अष्टांगिक मार्ग अनुसरण पूर्व पंचशील समझना अनिवार्य बताया है।
पंचशील
भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायिओं को पांच शीलों का पालन करने की शिक्षा दी है।
1.अहिंसा
पालि में – पाणातिपाता वेरमनी सीक्खापदम् सम्मादीयामी !
अर्थ – मैं प्राणि-हिंसा से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
2.अस्तेय
पालि में – आदिन्नादाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं चोरी से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
3.अपरिग्रह
पालि में – कामेसूमीच्छाचारा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं संग्रह व व्यभिचार से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
4.सत्य
पालि नें – मुसावादा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी
अर्थ – मैं झूठ बोलने से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
5.सभी नशा से विरत
पालि में – सुरामेरय मज्जपमादठटाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी।
अर्थ – मैं पक्की शराब (सुरा) कच्ची शराब (मेरय), नशीली चीजों (मज्जपमादठटाना) के सेवन से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ।
इन आचरण शील पर स्थिर होने के बाद आष्टांगिक मार्ग अनुसरण होता है।
निर्वाण है तो उसके प्राप्ति का मार्ग भी है। बौद्ध दर्शन में इसे अष्टांग मार्ग कहा गया है। सम्यक् दृष्टि अर्थात जैसी वस्तु है वैसा ज्ञान है। सम्यक् संकल्प अर्थात दृढ़ इच्छा शक्ति है। दृढ़ इच्छा को वाणी में उतरना सम्यक् वाक् है। केवल वाणी में ही उतरना नहीं अपितु व्यवहार में उतारना सम्यक् कर्म है। सम्यक् आजीव, व्यायाम, सम्यक् स्मृति के अभ्यास के लिए बुद्ध ने विस्तृत उपदेश दिया है।
कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है। और कुछ लोगों को लगता है कि इस मार्ग पर सब साथ-साथ चलते जाते हैं। अष्टांग मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि।
बौद्ध दर्शन में प्रज्ञा, शील और समाधि के अन्तर्गत अष्टांग मार्ग को समाहित किया गया है। प्रज्ञा के अन्तर्गत सम्यक् दृष्टि व सम्यक् संकल्प आते हैं। प्रज्ञा से व्यक्ति की दृष्टि और संकल्प सधते हैं। शील में सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव एवं सम्यक् व्यायाम समाहित है। शील में वाणी, कर्म स्वत: आ जाते है। पेशा या व्यवसाय भी शील के ही अंग है। अच्छा करने और बुरा रोकने का अभ्यास शील है। प्रज्ञा और शील की सुखद यात्रा के बाद समाधि तक पहुंचा जाता है। समाधि के पूर्व स्मृति भी समाधि में स्वत: समाहित है। अष्टांगमार्ग को प्रज्ञा, शील और समाधि जैसे त्रिरत्न के अंतर्गत रखा गया है जो जैन त्रिरत्नज्ञान, दर्शन और चारित्र से पृथक है। पूर्ण प्रज्ञा, पूर्ण शील और पूर्ण समाधि से निर्वाण संभव है।
प्रतीत्य समुत्पाद
बौद्ध दर्शन में “कर्म और फल का सिद्धांत” एक मौलिक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है। जिसे पाली भाषा में पटिच्चसमुप्पाद, संस्कृत में ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ और इंग्लिश में dependent coercing कहा जाता है। हिंदी में इसे कार्य-कारण, कारण-परिणाम या फिर कर्म और विपाक (विपाक अर्थात कर्म का फल) का सिद्धांत भी कहा जाता है. प्रतीत्य समुत्पाद को ‘भवचक्र’ भी कहा जाता है क्यूंकि ये हमारे भव या becoming का विश्लेषण है। प्रतीत्य समुत्पाद को ‘द्वादशनिदान’ भी कहा जाता है। इसमें बारह बिंदु हैं और इन बिन्दुओं में पूरे जीवन का निदान या diagnosis है। प्रतीत्य समुत्पाद तृष्णा तिरोहिति व्रत है।
प्रतीत्य समुत्पाद में प्रतीत्य शब्द का अर्थ है घटना घटित हो जाने पर या घटना के बीत जाने पर और समुत्प्पाद का अर्थ है नई घटना या कुछ नया उत्पन्न होना। सरल शब्दों में इसका अर्थ हुआ कि “एक घटना घटित हो जाने के परिणाम स्वरुप कोई और घटना घट जाती है और यह सिलसिला जारी रहता है।” यह क्रम सीधा और सरल ना होकर एक जटिल जाल की तरह है। जल, थल और नभ में हर क्षण कुछ न कुछ घटित होता रहता है और इन घटनाओं के मिलेजुले परिणाम होते रहते हैं। जो दूसरी घटनाओं को उत्पन्न करते रहते हैं। इन सब घटनाओं का एक प्रवाह चलता रहता है। अर्थात संसार परिवर्तनशील है। ये घटनाएं भौतिक हों या अभौतिक, चेतन हों या अचेतन, विचार हों या वस्तु किसी ना किसी कारण से होती हैं बिना कारण के नहीं। इसका कोई अपवाद नहीं है।
प्राणी समाज के लिए घटनाएं कर्म पर आधारित हैं और उनके परिणाम (विपाक) के अनुसार फिर कर्म का चक्र आगे चलता रहता है। क्योंकि संसार का चक्र परिवर्तनशील है इसलिए दुखदायी है। दूसरे शब्दों में कारण के होने पर ही कार्य होता है और कारण ना होने पर कार्य नहीं होता जिसका अर्थ है की हम दुःख को समझ लें, कारण ढूँढ लें तो दुःख को रोक पाएंगे।
गौतम बुद्ध ने प्रतीत्य समुत्पाद के माध्यम से जटिल जीवन चक्र को बड़ी सरलता से समझाया है। संयुक्त निकाय के बुद्ध वर्ग के विपस्सी सुत्त में गौतम बुद्ध कहते हैं कि-
“भिक्खुओ बौद्ध होने से पहले जब मैं विपश्यना (मैडिटेशन) कर रहा था तो मन में सवाल थे – यह लोक दुखों से घिरा हुआ है। मानव पैदा होता है, बूढ़ा होता है, मर जाता है, और फिर जन्म लेता है। इस दुःख भरे चक्र से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? मैं इस जरा-मरण के दुःख से छुटकारा जान पाया?” यह प्रतीत्य समुत्पाद चक्र है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति फँसा है।”
प्रतीत्य समुत्पाद चक्र के द्वादश बिंदुओं को सरल ढंग से भी समझा जा सकता है।
जरा-मरण क्या है?
किसी भी जीव का ढल जाना, दांत गिरना, झुर्रियां पड़ना, बाल सफ़ेद हो जाना, इन्द्रियों का शिथिल पड़ जाना, बूढ़ा होना इत्यादि ‘जरा’ या जर्जर होना (ageing) कहलाता है। पांच स्कंधों (विवरण आगे दिया गया है) का छिन्न भिन्न हो जाना, चोला त्याग देना, सांस का न आना मरण कहलाता है। यही जरा-मरण है।
भिक्खुओ मन में चिंतन किया, किसके होने से जरा-मरण होता है? जरा-मरण का कारण क्या है? भली प्रकार चिंतन मनन से ज्ञात हुआ कि जन्म के होने से जरा-मरण होता है। जाति/जन्म ही जरा-मरण का हेतु है।
जाति / जन्म क्या है?
जीव का प्रकट होना, पैदा हो जाना, पांच स्कंधों का मिलना, इन्द्रियों का जुड़ कर काम करने लग जाना यही जाति या जन्म (birth) है।
चिंतन मनन का अगला सवाल था – किसके होने से जाति या जन्म होता है? जन्म का हेतु क्या है? विचारने पर ज्ञात हुआ कि भव के होने से जाति होती है। भव ही जन्म का हेतु है।
भव क्या है?
भव तीन प्रकार के हैं- 1. काम लोक में बने रहने की इच्छा अर्थात काम-भव (sensual becoming) है, 2. रूप लोक में बने रहना की इच्छा रूप-भव (form becoming) है, और 3. अरूप लोक में बने रहना अरूप-भव (formless becoming) है।
इस पर प्रश्न उठा कि किसके होने से भव होता है? भव का हेतु क्या है? विचार करने के बाद ज्ञात हुआ कि उपादान के होने से भव होता है. उपादान भव का हेतु है।
उपादान क्या है?
उपादान या आसक्ति (craving) चार तरह की हैं. 1. काम से आसक्ति (sensuality clinging), 2. मिथ्या दृष्टि से आसक्ति (false view clinging), 3. शीलव्रत से आसक्ति (precept & practice clinging) और 4. आत्मवाद से आसक्ति (doctrine of self clinging)।
अब सवाल ये था कि किसके होने से उपादान होता है? उपादान का हेतु क्या है? गहन मनन के बाद प्रज्ञा जागी कि तृष्णा होने से उपादान होता है। तृष्णा ही उपादान का हेतु है।
तृष्णा कितने प्रकार की है?
तृष्णा छः प्रकार की है. 1. रूप तृष्णा (craving for forms), 2. शब्द तृष्णा (craving for sounds), 3. गंध तृष्णा (craving for smells), 4. रस तृष्णा (craving for tastes), 5. स्पर्श तृष्णा (craving for touch) और 6. धर्म तृष्णा (craving for ideas)।
प्रश्न है कि किसके होने से तृष्णा होती है? तृष्णा का हेतु क्या है? उत्तर है कि वेदना होने से तृष्णा होती है. वेदना ही तृष्णा का हेतु है।
वेदना कितने प्रकार की है?
वेदनाएं छः प्रकार की हैं. 1. चक्षु के माध्यम से होने वाली वेदना, 2. कान के माध्यम से से होने वाली वेदना, 3. नाक के माध्यम से होने वाली वेदना, 4. जीभ के माध्यम से होने वाली वेदना, 5. काया से होने वाला स्पर्श और 6. मन के संस्पर्श से होने वाली वेदना।
प्रश्न उठा कि किसके होने से वेदना होती है? वेदना का हेतु क्या है? चिंतन मनन करने से उत्तर मिला कि स्पर्श के होने से वेदना होती है। स्पर्श ही वेदना का हेतु है।
स्पर्श कितने प्रकार के हैं?
छः तरह के स्पर्श हैं. 1. चक्षु स्पर्श, 2. कान स्पर्श, 3. नाक स्पर्श, 4. जीभ स्पर्श, 5. काया स्पर्श और 6. मन स्पर्श।
इस पर फिर प्रश्न किया कि किसके होने से स्पर्श होता है? स्पर्श का हेतु क्या है? विचार करने पर जाना कि षड़ायतन होने से स्पर्श होता है. षड़ायतन ही स्पर्श का हेतु है।
षड़ायतन क्या है?
षड़ायतन या सलायतन (six senses) इस प्रकार हैं: 1. चक्षु आयतन, 2. कान आयतन, 3. नाक आयतन, 4.जीभ आयतन, 5. काया आयतन और 6.मन आयतन।
अब प्रश्न ये था कि किसके होने से षड़ायतन होता है? षड़ायतन का क्या हेतु है? विचार किया तो उत्तर मिला कि नाम-रूप होने से षड़ायतन होता है। नाम-रूप ही षड़ायतन का कारण है।
नाम-रूप क्या है?
पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि जैसे महाभूतों के संयोग से रूप बना। वेदना, संज्ञा, चेतना, और स्पर्श से मन और सबको मिला कर बना नाम-रूप। अब सवाल ये उठा कि किसके होने से नाम-रूप होता है? नाम-रूप का हेतु क्या है? विचार करने पर प्रज्ञा जागी कि विज्ञान के होने से नाम-रूप होता है। विज्ञान ही नाम-रूप का हेतु है।
विज्ञान कितने प्रकार के हैं?
विज्ञान छः प्रकार के हैं. 1. चक्षु विज्ञान 2. कान, 3. नाक, 4. जीभ, 5. काया और 6. मन विज्ञान।
प्रश्न ये आया कि किसके होने से विज्ञान होता है? विज्ञान का क्या हेतु है? मनन करने पर पाया की संस्कार के होने से विज्ञान होता है। संस्कार विज्ञान का हेतु है।
संस्कार कितनी तरह के हैं?
संस्कार तीन प्रकार के हैं। 1. काया संस्कार 2. वाक् संस्कार, 3. चित्त संस्कार।
मन में प्रश्न आया कि किसके होने से संस्कार होते हैं? संस्कारों का हेतु क्या है? गहन चिंतन से पाया कि अविद्या के होने से संस्कार होते हैं. अविद्या ही संस्कारों का हेतु है।
अविद्या क्या है?
दुःख को ना जानना, दुःख के उदय को ना जानना, दुःख-निरोध को ना समझना और दुःख त्यागने का मार्ग ना जानना अविद्या कहलाता है।
यह बारह बिन्दुओं की श्रंखला हमें दुःख और दुःख के कारण बताती है। साथ ही अगर कारण पता हैं तो उन्हें दूर करने का उपाय भी मिल सकता है. इसी श्रंखला के बारवें बिंदु से पहले बिंदु तक भी विचार कर सकते हैं जैसे कि…
* अविद्या हो तो संस्कार जागते हैं,
> संस्कारों की वजह से विज्ञान है,
> विज्ञान है तो नाम-रूप है,
> नाम-रूप है तो षड़ायतन हैं,
> षड़ायतन के कारण स्पर्श हो जाता है,
> स्पर्श के कारण वेदना होती है,
> वेदना से तृष्णा उपजती है,
> तृष्णा से उपादान या आसक्ति हो जाती है,
> आसक्ति से भव जागता है,
> भव से जाति या जन्म होता है और
> जन्म से जरा मरण होता है*
अब अगर अविद्या का विनाश कर दिया जाए तो संस्कारों का विनाश हो जाएगा, संस्कारों के विनाश से विज्ञान का खात्मा हो जाएगा, विज्ञान का विनाश होगा तो नाम-रूप का भी विनाश होगा, नाम-रूप का विनाश होगा तो षड़ायतन का, षड़ायतन का विनाश हो जाए तो स्पर्श का विनाश हो जाए, स्पर्श का विनाश हो तो वेदना का विनाश हो जाए, अगर वेदना गयी तो तृष्णा भी गई, तृष्णा के विनाश से आसक्ति समाप्त होगी, आसक्ति नहीं तो भव नहीं, भव न हो तो जन्म नहीं और अगर जन्म नहीं तो जरा-मरण दुःख, चिंताएं और परेशानी नहीं।
लुम्बिनी प्रवास में चिंतन जारी है। हम किसी भी तीर्थ स्थल पर केवल मंदिर, मूर्ति, इतिहास, पुरातत्व साक्ष्य देखने नहीं जाते, अपितु इन सबके पीछे क्या दर्शन है, उस पर भी चिंतन हो तो यात्रा सफल होती है। अन्यथा वैचारिक स्तर पर घर से जैसे चले थे वैसे ही घर पहुँचे तो यात्रा की उपलब्धि क्या रही। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
बुद्ध दुनिया में भारत के सर्वकालिक ब्रांड एम्बेसडर हैं। विश्व के कोने-कोने में समृद्ध घरों की बैठकों में उनकी बर्स्ट याने चेहरा मूर्ति मिल जायेगी। इसका कारण यह है कि जीवन के दुख से निजात पाने हेतु उन्होंने एक वैज्ञानिक सोच पर आधारित दर्शन दुनिया को दिया है। वह दर्शन सनातन सिद्धांतों का विस्तार ही था। अनात्मवाद का एक नया सिद्धांत बुद्ध दर्शन को सनातन से अलग करता है। बाद के सनातन ऋषियों ने बुद्ध को भी विष्णु का नौवाँ अवतार बताकर भारतीय दर्शन में मिला लिया। फिर भी बुद्ध की राह पृथक ही रही। भारतीय संस्कृति समन्वयवादी रही है। वह तो ईसा और मुहम्मद को भी समायोजित कर सकती थी परंतु वे श्रेष्ठता और एकेश्वरवाद की हठ छोड़ते तब वह सम्भव था। वे तो सनातन को आमूलचूल मिटाने पर आमादा था।
प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धांत से अविद्या, संस्कार, वेदना, तृष्णा इत्यादि कैसे दूर होंगी? इसके लिए गौतम बुद्ध द्वारा बताई गई विपश्यना मैडिटेशन सीखनी होगी। लेकिन उसके पूर्व उनका अनात्मवाद सिद्धांत समझना होगा। नहीं तो आत्मसुख के चक्कर में भटक सकते हैं।
अनात्मवाद सिद्धांत और चेतना
बुद्ध वैसी आत्मा का अस्तित्व नहीं मानते जैसी आत्मा अद्वैतवाद में अस्तित्वमान बताई जाती है। वे आत्मा को जीव या चेतना कहते हैं।
जो पाँच स्कंधों के समन्वय से अस्तित्वमान होता हैं अर्थात् रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान, इन पांचों का समुदाय ही चेतना कहलाता है। इस प्रकार बुद्ध केवल पामार्थिक नित्य आत्मा का निषेध करते है परंतु अनित्य व्यावहारिक चेतना को मान्य करते है। वे पाँच स्कंध इस तरह बताए गए हैं।
रूप स्कन्द
पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चार महाभूत तथा इनके मेल से उत्पन्न सभी रूप स्कन्ध कहलाते है। हड्डी, स्नायु, मांस और चर्म से घिरा आकार ही रूप कहलाता है।
वेदना स्कंध
सुख, दुःख और न सुख-दुःख इन तीनों प्रकार की अनुभूतियों को वेदना कहते है।
संज्ञा स्कन्ध
गुणों के आधार पर किसी वस्तु का नामकरण ही संज्ञा-स्कन्ध (ज्ञान) है। संज्ञा का कार्य पहचान कराना है। हमें नील, पीत, रक्त, श्वेत आदि रूप से वस्तु का भान होता है, यही संज्ञा है।
संस्कार स्कंध
कुशल-अकुशल चेतना की राग-द्वेष आदि मानसिक प्रवृत्तियां तीन संस्कार हैं।
काय संस्कार- कायिक धर्म, आश्वास-प्रश्वास
वाक् संस्कार- वितर्क-विचार वचन या
चित् संस्कार- संज्ञा और वेदना
विज्ञान स्कन्ध
बाह्य वस्तुओं का ज्ञान और आंतरिक अहं अर्थात् ‘मैं’ का ज्ञान ही विज्ञान कहलाता है। संज्ञा, वेदना और विज्ञान तीनों का आपस में सम्बंध है।
मधुर, तिक्त आदि स्वाद का अनुभव वेदना है, किसी वस्तु का परिचयात्मक ज्ञान संज्ञा है।
परिच्रय के पहले स्वरुप मात्र का ज्ञान विज्ञान हैं।
इस तरह पांच स्कंध या पांच ढेर या पांच समुच्चय , पांच मनो-भौतिक समुच्चय बौद्ध दर्शन के आधार हैं। पांच स्कंध सिद्धांत अनिवार्य रूप से यह समझने की एक विधि है कि हमारे जीवन का हर पहलू लगातार बदलते अनुभवों का संग्रह है। ऐसा कोई एक पहलू नहीं है जो वास्तव में ठोस, स्थायी या अद्वितीय हो। सब कुछ प्रवाह में है। सब कुछ कई कारणों और स्थितियों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए,
रूप-स्कंधहमारे भौतिक संसार-हमारे शरीर और हमारे भौतिक परिवेश में सब कुछ को संदर्भित करता है। ये सभी चीजें लगातार बदल रही हैं।
वेदना-स्कंधहमारी संवेदनाओं को संदर्भित करता है जो सकारात्मक, नकारात्मक या उदासीन हैं – हमारी सभी संवेदनाएं क्षणभंगुर हैं, क्षण-क्षण बदलती रहती हैं।
संज्ञा-स्कंधका अर्थ है हमारी हर उस चीज़ की पहचान या लेबलिंग जो हम देखते हैं, सुनते हैं, सूंघते हैं, स्पर्श करते हैं या सोचते हैं; ये लेबल भी लगातार प्रवाह में हैं।
संस्कार-स्कंद(हमारी सभी मानसिक आदतें, विचार, विचार, मत, पूर्वाग्रह, मजबूरियां आदि) कई कारणों और स्थितियों पर निर्भर हैं और हमेशा बदलते रहते हैं।
हमारी चेतना स्वयं एक चीज नहीं है, बल्कि अनुभूतियों का संग्रह है (विज्ञान-स्कंध:) जो लगातार बदल रहे हैं।
बौद्ध मत में, स्कंधों की विशेषताओं पर विचार करके, हम आत्म-लोभ को दूर कर सकते हैं। आत्म-लोभी एक स्वयं की अवधारणा से लगाव है जो अद्वितीय, स्वतंत्र और स्थायी है। बौद्ध मत में, स्वयं के इस विकृत दृष्टिकोण के प्रति यही लगाव ही दुख का मूल कारण है। अतः इस आसक्ति को त्याग कर हम स्वयं को बुढ़ापा, बीमारी और आसन्न मृत्यु के कष्टों से मुक्त करने का प्रयास कर सकते हैं। यही निर्वाण की दिशा है।
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – पंद्रह अगस्त-स्वतंत्रता दिवस…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २४५ ☆
☆ आत्मचिंतन से विमुख ये आज का संसार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆