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ई-अभिव्यक्ति: संवाद-29 – हेमन्त बावनकर

ई-अभिव्यक्ति:  संवाद–29              जिस स्तर के डिजिटल साहित्यिक मंच की परिकल्पना की थी, उस मार्ग पर आप सब के स्नेह से  प्रगति पथ पर e-abhivyakti अग्रसर है। गुरुवर साहित्य मनीषियों का आशीर्वाद, सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर एवं सुधि पाठक ही मेरी पूंजी है।  विजिटर्स की बढ़ती संख्या 14,500 से अधिक मन में उल्लास भर देती है और सदैव नवीन प्रयोग करते रहने के लिए प्रेरित करती है। 15 अक्तूबर 2018 से प्रारम्भ यात्रा अब तक अनवरत जारी है। आज e-abhivyakti के जन्म से सतत स्थायी स्तम्भ का स्वरूप लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी की योग-साधना/LifeSkills को कुछ समय के लिए विराम देते हैं जो कुछ अंतराल के पश्चात पुनः नए स्वरूप में आपसे रूबरू होंगे। इसी बीच आध्यात्म/Spiritual स्तम्भ के अंतर्गत आप प्रतिदिन प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  जी का  श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद आत्मसात कर रहे हैं। श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी का व्यंग्य विधा पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ - सवाल जवाब प्रति रविवार प्रकाशित हो...
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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ? मी_माझी – #1 – Space ? – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते मी_माझी  - #1 - Space   (हमें आपको यह  सूचित करते  हुए अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि सुश्री आरुशी दाते जी को हाल ही में  साहित्य संपदा द्वारा आयोजित राज्यस्तरीय काव्यलेखन स्पर्धा में उनकी कविता "वसंत" को द्वितीय  पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। e-abhivyakti की ओर से आपको हार्दिक बधाई। आप e-abhivyakti  में  प्रकाशित पुरस्कृत कविता "वसंत" को इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं >>> http://bit.ly/2YTTIFX ) प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ - "मी _माझी " शृंखला की प्रथम कड़ी  Space । इस शृंखला की प्रत्येक कड़ियाँ आप आगामी  प्रत्येक रविवार को पढ़ पाएंगे।    ती रुसली आहे हे त्याला माहित होतं, त्यानेही तिचा रुसवा जाण्याची वाट पाहिली... ह्या वाट पाहण्यात दोघांनी स्वतःला योग्य वाटली ती उत्तर घेऊन पुढे वाटचाल केली... मागे फिरण्याचा प्रश्न अनुत्तरीतच राहिला... योग्य अयोग्य ठरवायला मौनातल्या शब्दांना आधारच उरला नव्हता... स्वतःच स्वतःचे पाऊल त्या वाटेकडे न्यायचे नाही हा निर्धार पक्का झाला होता... ती म्हणते हेही माझे प्रेमच आहे, त्याला स्वातंत्र्य देण्याचे ... पण त्याला काही...
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English Literature – Poetry – ☆ My Dreams ☆– Ms Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra ☆ My Dreams ☆ ("My Dreams" is one of the best poems of Ms. Neelam Saxena Chandra’ji which not only inspires you, but motivates too to struggle for fulfillment of your dreams. When I look back the journey of e-abhivyakti it always gives me a positive message. Thanks Ms Neelam ji to motivate me to continue the journey of life too.) My Dreams I am a gusty wind that darts Merrily at its own pace; I do not stop for joyous detours, My fiery dreams I chase… I am not a merry moon, Waxing and waning at pleasure; I am the fierceness of the sun That has no time for leisure… How can I lazily lie? Halting is prohibited by my soul! Life is bizarre and short And horizons are my goal… My own target posts I keep stretching and expanding; After all, existence is an ellipsis If you know to struggle, it keeps enlarging…   © Ms Neelam Saxena Chandra, Pune   ...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ? रोमांच पैदा करते दर्रे ? – श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन  रोमांच पैदा करते दर्रे  अगर आप जोजिल्ला दर्रा पार करने का रोमांच अनुभव करना चाहते हैं और इस समय वहाँ जा पाने की सुविधा नहीं है तो एक आसान सा विकल्प और भी है. आप भोपाल के न्यू मार्केट तक आ जाईये और उस दर्रे को पार करिए जो हनुमान मंदिर से शुरू होता है और स्टेट बैंक की ओर निकलता है. इसे पार करना एक चैलेंज भी है और जोखिम भरा साहस भी. आईये इसे पार करते हैं. अगर आपकी हाईट साढ़े तीन फीट से ज्यादा है तो आपको कोहनी के बल ‘क्रॉल’ करते हुए निकलना पड़ेगा. बेहतर है आप टिटनस टॉक्साईड का इंजेक्शन पहले से लगवाकर आयें और बिटाडीन का छोटा ट्यूब कॉटन के साथ जेब में धरकर चलें. जरा चूके तो डिस्प्ले में लटकी किसी बाल्टी, अटैची या मनेक्वीन हॉफ पुतली से सिर टकराना तय है. छतरियों के नुकीले सिरों, साड़ियों, कुर्तियों, नाईटियों से बचते हुए आप घुटने-घुटने या करीब करीब रेंगते हुए चलें. एक सावधानी...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ सवाल एक – जवाब अनेक – 7 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय         “सवाल एक – जवाब अनेक (7)” (श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का  विभिन्न  लेखकों के द्वारा  दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु  तो अवश्य ही खोल  देंगे।  तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।   वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा, सामूहिक द्वेष और  स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में……… तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न  और उसके अनेक उत्तर।  प्रस्तुत है  सातवाँ  जवाब  लखनऊ शहर की ख्यातिलब्ध व्यंग्यकारा  सुश्री इन्द्रजीत कौर जी  (हाल ही में...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ छल ☆ – सुश्री सुषमा सिंह 

सुश्री सुषमा सिंह  ☆ छल ☆ (सुश्री सुषमा सिंह जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। सुश्री सुषमा सिंह जी की कविता "छल" एक अत्यंत भावुक एवं हृदयस्पर्शी कविता है जो पाठक को अंत तक एक लघुकथा की भांति उत्सुकता बनाए रखती है। सुश्री सुषमा जी की प्रत्येक कविता अपनी अमिट छाप छोड़ती है। उनकी अन्य कवितायें भी हम समय समय पर आपसे साझा करेंगे।)   हाथों में थामे पाति और अधरों पर मुस्कान लिए आंखों के कोरों पर आंसु, और मन में अरमान लिए हुई है पुलिकत मां ये देखो, मंद मंद मुस्काती है मेरे प्यारे बेटे ने मुझको भेजी पाति है।   बार-बार पढ़ती हर पंक्ति, बार-बार दोहराती है लगता जैसे उन शब्दों को पल में वो जी जाती है अपलक उसे निहार रही है, उसको चूमे जाती है मेरे प्यारे बेटे ने मुझको भेजी पाति है।   परदेस गया है बेटा, निंदिया भी तो न आती है रो-रो कर उस पाति को ही बस वो गले लगाती है पढ़ते-पढ़ते हर पंक्ति को, जाने कहां खो जाती है खोज रही पाति में बचपन, जो उसकी...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जवाबदार कौन….? ☆– श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”

श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश” ☆ जवाबदार कौन....? ☆    सभी दम भरते विकास का, निर्माण उंची-उंची अट्टालिकाओं का, फिर, लोग सड़कों पर क्यों सोते है...?   बड़े-बड़े आश्वासन अनाज उत्पादन के, भरपूर साधन-संसाधन पेट भरने के, फिर, लोग भूखे क्यों सोते हैं.....?   हजारों मील निर्मित लम्बे रास्ते, आश्वासन समर्पित जन-मानस वास्ते, फिर, अन्नदाता पगडंडियों पर क्यों चलते हैं...?   रिश्तें हैं...नाते हैं निभाने को, साक्षरता भी है समझने को, फिर, लोग लिव-इन रिश्तों में क्यों रहते हैं...?   सभी के धर्म मानवता सिखाते हैं, संयम-समर्पण सिखातें है, फिर, लोग धर्म के नाम पर क्यों लड़ते हैं...?   सब ठीक है तो ... फिर, ये प्रश्न क्यों उठते हैं....?   © माधव राव माण्डोले “दिनेश”, भोपाल  (श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”, दि न्यू इंडिया एश्योरंस कंपनी, भोपाल में सहायक प्रबन्धक हैं।)...
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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (57) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ द्वितीय अध्याय साँख्य योग ( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद ) यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌। नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।57।। आनन्दित जो शुभाशुभ को भी पा दिन रात सदा राग से रहित जो वही स्थित धी तात।।57।।   भावार्थ : जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।।57।।   He who is everywhere without attachment, on meeting with anything good or bad, who neither rejoices nor hates, his wisdom is fixed. ।।57।।   © प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८ (हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)...
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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ व्यंग्य और कविता के बीच सेतु थे डा.शेरजंग गर्ग और प्रदीप चौबे ☆ श्री विनोद साव

श्री विनोद साव  ☆ व्यंग्य और कविता के बीच सेतु थे डा.शेरजंग गर्ग और प्रदीप चौबे ☆ (प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री विनोद साव जी का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। हम भविष्य में आपकी चुनिन्दा रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।)  कविता, व्यंग्य क्षेत्र में सक्रिय रहे दो रचनाकार प्रदीप चौबे और डा.शेरजंग गर्ग ने अपनी रचनायात्रा को विराम दिया और साहित्य बिरादरी से उन्होंने अंतिम बिदागरी ले ली. अब उनका व्यक्तित्व नहीं उनका कृतित्व हमारे सामने होगा और उनके व्यक्तित्व को हम उनके कृतित्व में ही तलाश पाएँगे उनसे सीधे साक्षात्कार के जरिए अब नहीं. इन दोनों रचनाकारों से मेरा विशेष परिचय नहीं रहा सामान्य परिचय ही रहा. आंशिक मुलाकातें हुईं पर हम एक दूसरे के नाम को जाना करते थे, हमारे बीच पूरी तरह अपरिचय व्याप्त नहीं था. ये दोनों रचनाकार व्यंग्य की विधा से जुड़े रहे इसलिए मैं भी इनसे थोडा जुड़ा रहा. मैंने कविता नहीं की पर प्रदीप चौबे की कविताओं में जो हास्य-व्यंग्य की छटा मौजूद थी उसने उनकी ओर मेरी...
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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव  ☆ शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं ☆ (प्रस्तुत है डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी की कविता "शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं"।  संयोगवश आज ही के अंक में भगवान  शिव जी परआधारित  श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी की एक और रचना "वह दूर हैं शिवालय, शिवका मुझे सहारा" प्रकाशित हुई है। दोनों ही कविताओं के भाव विविध हैं। दोनों कविताओं के सममानीय कवियों का हार्दिक आभार।)   विष पी पी मैं हूँ नील कंठ बना। विष पी कर ही प्रेम के सूत्र बना, मैं जग में प्रेम अमर कर जाऊंगा।। शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।   विष पी पीकर मैं ही शेषनाग बना, मैं भू माथे पर धारण कर जाऊंगा। धरती धर खुद को निद्राहीन बना, मैं मेघनादों का वध कर जाऊंगा।। शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।   मैं रवि टूट टूट ग्रह तारे नक्षत्र बना, नभ मंडल आलोकित कर जाऊंगा। पी वियोग ज्वाला मैं पृथ्वी चंद्र बना, शीतल हो श्रृष्टि सृजन कर जाऊंगा।। शिवो अहं शिवो अहं शिवो अहं।   नफरत पी पी कर मैं अग्नि बना, वन उपवन नगर दहन कर जाऊंगा, पी पी मैं लोभ द्वेष बृहमास्त्र...
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