(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२१ ☆ ऋतुराज…
हर क्षण तन छीज रहा,
हर क्षण मन रीझ रहा,
जितना छीजता, उतना रीझता,
छीजना, रीझना, स्वयं पर खीजना,
विरोध का आभास अथाह,
विरुद्ध का समानांतर प्रवाह,
तब पाट का आकुंचन होना,
समानांतर का मिलन होना,
अब न छीजना, अब न रीझना,
भीतर-बाहर मानो संत होना,
देहकाल में ऐसा भी वसंत होना…!
जीवन बहुआयामी है। वसंत केवल रंगों का समुच्च्य भर नहीं, अपितु विभिन्न राग-भावों का समग्र स्वरूप भी है। हर रंग का अपना अस्तित्व है, हर रंग का अपना महत्व है। जीवन में हर रंग की आवश्यकता भी है।
विचार करें तो रोटी, कपड़ा और मकान, मनुष्य की स्थूल अथवा प्रत्यक्ष मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। अभिव्यक्ति सूक्ष्म या परोक्ष आवश्यकता है। जिस प्रकार सूक्ष्म देह के बिना स्थूल का अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार अभिव्यक्ति या मानसिक विरेचन के बिना मनुष्य जी नहीं सकता। अक्षर की इकाई को शब्द, वाक्य एवं भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति का, सूक्ष्म का सर्वाधिक सशक्त साधन बनाने वाली वागीश्वरी माँ सरस्वती का अवतरण दिवस है वसंतपंचमी।
पौराणिक आख्यान है कि ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना तो कर चुके थे पर सर्वव्यापी मौन का कोई हल ब्रह्मा जी के पास नहीं था। तब माँ शारदा प्रकट हुईं। निनाद, वाणी एवं कलाओं का जन्म हुआ। जल के प्रवाह और पवन के बहाव को में स्वर प्रस्फुटित हुआ। मौन की अनुगूँज भी सुनाई देने लगी। आहद एवं अनहद नाद गुंजायमान हुए। चराचर ‘नादब्रह्म’ है।
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतवायदक्षरम् । विवर्तते अर्थभावेन प्रक्रिया जगतोयतः॥
अर्थात् शब्द रूपी ब्रह्म अनादि, विनाश रहित और अक्षर है तथा उसकी विवर्त प्रक्रिया से ही यह जगत भासित होता है।
शब्द और रस का अबाध संचार ही सरस्वती है। शब्द और रस के प्रभाव का एकात्म भाव से अनन्य संबंध है। इसका एक उदाहरण संगीत है। आत्म और परमात्म का एकात्म रूप संगीत है। संगीत को मोक्ष की सीढ़ियाँ माना गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य इसकी पुष्टि करते हैं-
वीणावादनतत्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः।तालश्रह्नाप्रयासेन मोक्षमार्ग च गच्छति।
वैदिक संस्कृति के नेत्रों में समग्रता का भाव है। कोई पक्ष उपेक्षित नहीं है। यही कारण है कि वसंत पंचमी रति और कामदेव का उत्सव भी है। इस ऋतु में सर्वत्र विशेषकर खिली सरसों का पीला रंग दृष्टिगोचर होता है। प्रकृति का चटक पीला रंग आकर्षित करता है पुरुष को। प्रकृति और पुरुष का एकात्म होना मदनोत्सव है।
मदन भाव से श्मशान वैराग्य तक, सृष्टि में सभी कुछ उत्सव है। जीवन के हर पक्ष को उत्सव की भाँति ग्रहण करने का संदेश है वसंत। हर भाव को समग्रता से, परिपूर्णता से जीने का प्रतीक है वसंत। यही कारण है कि ऋतुराज कहलाया वसंत।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाय – भैंस…“।)
अभी अभी # ८९८ ⇒ आलेख – गाय – भैंस श्री प्रदीप शर्मा
क्या आपने कभी भैंस पर निबंध लिखा है ! अगर परीक्षा में भैंस पर निबंध आता, तो हम क्या लिखते । गाय तो खैर हमारी माता है, भैंस से हमारा क्या नाता है । जब भी ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं, हमारी अक्ल अक्सर या तो मारी जाती है, या घास चरने चली जाती है ।
एक समय था, जब हिंदू मुसलमान की तरह गाय और भैंस भी एक ही बाड़े में रहा करते थे । गाय के अगर बछड़े और बछड़ी होती थी तो भैंस के पाड़ा और पाड़ी । बछड़ा तो फिर भी बड़ा होकर बैल बनकर खेत जोत लेता था और बैलगाड़ी चला लेता था, लेकिन भैंस के अगर पाड़ा हुआ तो किस काम का हुआ ।।
गाय के तो कई वर्ण होते हैं, लेकिन भैंस का तो सिर्फ श्याम वर्ण ही होता है । गुणवत्ता में भले ही अंतर हो, लेकिन दोनों का दूध सफेद ही होता है । भैंस मोटी चमड़ी की होती है इसलिए इसका दूध भी चर्बी ही चढ़ाता है । गाय के दूध में जो गुण हैं, वे भैंस के दूध में नहीं पाए जाते । अधिकांश देशों में भैंस का दूध नहीं पीया जाता, शायद वहां के लोग भैंस कम पालते हैं और गाय अधिक । हो सकता है, उनको भैंस का दूध हजम ही नहीं होता हो ।
गो मूत्र और गाय के गोबर की जो उपयोगिता है, वह तो हम सभी जानते हैं, लेकिन भैंस के संबंध में कोई संत महापुरुष प्रकाश नहीं डालता । यह क्या कि बस भैंस का दूध निकाला और उसे भूल गए । भैंस को भले ही बुरा ना लगे, हमें यह भेदभाव अच्छा नहीं लगता ।।
आज भी मेरे घर में पहली रोटी गाय की ही निकलती है लेकिन मेरे यहां दूध सांची गोल्ड ही आता है ।
उसमें अच्छी मोटी मलाई आती है, जिससे घी भी अच्छा निकलता है ।
गोकुल के गोपाल कृष्ण गाय के ब्रांड एंबेसडर रहे हैं । छोटी छोटी गैया, छोटे छोटे ग्वाल, छोटे से, छोटे से मेरे मदन गोपाल । यही तो अंतर है कृष्ण के द्वापर और आज के कलयुग में ।वे कन्हैया जो गइया चराते थे, गोपियों संग रास रचाते थे, बांसुरी बजाते थे, मटकी फोड़ माखन चुराते थे, गोवर्धन पर्वत उंगली पर उठाते थे, कंस को मार, कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान भी दे गए और इधर हमारे आज के कुलदीपक लालू यादव, भैंस का चारा ही खा गए । एक ने कारागार में जन्म लिया और संसार को तारा और दूसरे ने पहले चारा खाया, फिर जेल की हवा खाई । जय जय कृष्ण कन्हाई ।।
जो गाय कभी आवारा पशु कहलाती थी, आज गौशालाओं में सुरक्षित है ।संत महात्मा और सज्जन जन सेवक बन गऊ माता की तन, मन और धन से सेवा कर रहे हैं । घी दूध की नदियां जब बहेंगी तब बहेंगी, आम आदमी के काम तो आज भी भैंस ही आ रही है । भैंस भले ही पानी में चली जाए, उसके दूध में पानी तो दूध वाला ही मिलाता है, इसीलिए आजकल भैंस का दूध भी पतला आता है ।
जिस तरह हम बेटियां बचा रहे हैं, हमें अपनी गऊ वंश को भी बचाना है । वत्सला की श्रेणी में सिर्फ तीन ही माताएं आती हैं, वसुंधरा, हमारी माता और गौ माता, जिनकी गोद में हम जन्म लेते, ह्रष्ट पुष्ट हो बड़े होते हैं, और पुनः उनकी ही गोद में समा जाते हैं । भैंस का क्या है, बेचारी अनासक्त कर्मयोगी की तरह दूध देती रहती है, उसके लिए तो उसका तबेला ही हवा बंगला है ।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नहीं का होना …“।)
अभी अभी # ८९७ ⇒ आलेख – नहीं का होना श्री प्रदीप शर्मा
उस देश में पहले कभी, “नहीं “, हुआ ही नहीं ! वहाँ, ” हाँ ” का ही राज़ था। सब एक दूसरे की, हाँ में हाँ, मिलाते थे। अचानक, यह नहीं, कहाँ से आ गया।
वह एक यस मैन’स् लैंड था !
वहाँ के लोग, नहीं, जानते ही नहीं थे। कभी कोई समस्या ही खड़ी नहीं हुई। हर बात में लोगों की, हाँ होने से कभी कोई देशहित में निर्णय लेने में बाधा उत्पन्न नहीं हुई। ।
अचानक इस, नहीं, ने समस्या खड़ी कर दी ! दिमाग़ी घोड़े दौड़ाए गए, आयोग बिठाए गए, आखिर यह, नहीं, आया तो आया कहाँ से।
इतने दिनों से देश में, हाँ में हाँ, मिलाने के वर्कशॉप्स चल रहे थे, जगह-जगह होर्डिंग्स लगे हुए थे। हाँ में हाँ, के फायदे, मेले, सेमिनार और फेस्टिवल्स आयोजित हो रहे थे, और उसके सकारात्मक प्रभाव भी देश में नज़र आने लगे थे। लेकिन एक, नहीं, ने वातावरण में सनसनी फैला दी। इतने सकारात्मक वातावरण में यह एक नहीं, पूरे तालाब को गंदा कर सकता था। इस नहीं, से क्रांति की बू आती थी। ।
बहुत तलाश की गई ! जमीन आसमान एक कर दिया गया। आखिर इस, नहीं, का मकसद क्या था। तलाशी में सब हाँ में हाँ, मिलाते रहे ! कुछ मिला नहीं, यह भी नहीं कह सकतें थे, क्योंकि नहीं पर प्रतिबंध जो था। हर हाल में इस, नहीं, का पता लगाना था, क्योंकि सरकार को नहीं, सुनने की आदत नहीं थी।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ! आखिर मेहनत रंग लाई। रात-दिन की मेहनत, भागा दौड़ी, सरकारी महकमों, सूचना-तंत्र की चुस्ती-फुर्ती और जनता के सहयोग से पता चल ही गया, कि इस, नए नए, खतरनाक और आपत्तिजनक, नहीं, का राज़ क्या था। ।
सुदूर, किसी गाँव में, किसी माँ ने अपने दूध पीते बच्चे से पूछ लिया था, बेटा, भूख लगी ? बेटा बहुत छोटा था ! उसे न तो शब्द-ज्ञान था, और न ही वह अभी ठीक से बोलना सीखा था। बच्चा अपनी मस्ती में था। अचानक उसके मुँह से नहीं, जैसी ध्वनि वाला शब्द निकल गया।
इतना ही नहीं, उसने ज़ोर से सर भी हिला दिया। बस, गली गली शोर मच गया।
बच्चे को सरकार ने प्ले स्कूल में भेज दिया है, जहाँ उसे हमेशा हाँ बोलने की ट्रेनिंग दी जाएगी। एक बच्चे की नादानी से अगर देश में एक बार, नहीं, का प्रवेश हो गया, तो अच्छे भले हाँ, के लिए ही नहीं, देश के लिए भी मुसीबत खड़ी हो जाएगी। यह देश अब और नहीं, नहीं झेल सकता। नहीं, नकारात्मकता है, असहिष्णुता है, विरोध है, क्रांति है। नहीं ? कभी नहीं !
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख वर्तमान : सुंदरतम उपहार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०६ ☆
☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆
‘अतीत लैसन है, वर्तमान गिफ़्ट और भविष्य मोटिवेशन’…इस वाक्य में ज़िंदगी का यथार्थ अथवा प्रयोजन निहित है। अतीत हमें शिक्षा देता है; पाठ पढ़ाता है; अच्छे-बुरे की पहचान कराता है। सो! अतीत से लगाव मत रखिए … उसकी स्मृतियों को अपने ज़हन से निकाल बाहर फेंकिए, क्योंकि वे आपके विकास में बाधक-अवरोधक होती हैं… आपको पथ-विचलित करती हैं। हां! अतीत में झांकिए, परंतु उसमें लिप्त मत रहिए… जो अच्छा है, उसे ग्रहण कीजिए; संजोकर रखिए और जो बुरा है, उसे सदैव के लिए त्याग दीजिए। अतीत अर्थात् जो गुज़र गया, कभी लौटकर नहीं आता…फिर उसके लिए शोक क्यों?
वर्तमान अर्थात् आज गिफ़्ट है, उपहार है…उसकी महत्ता समझिए; उसका सम्मान कीजिए और उसे प्राप्त कर खुशी का इज़हार कीजिए…जो भी आपको वर्तमान में मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ अभिवादन-अभिनंदन कीजिए… उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए और मासूम बच्चे की भांति निरीह-निश्छल भाव से प्रसन्नता प्रकट कीजिए। वास्तव में वर्तमान ही सत्य है, क्योंकि अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अर्थात् कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस! यही एक पल है। आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने न तू’ इस भाव को सार्थक करती हैं यह पंक्तियां… आज की अथवा वर्तमान की उपादेयता पर प्रकाश डालती हैं। बुद्धिमान लोग आज में अर्थात् वर्तमान में जीते हैं; समय की महत्ता को स्वीकारते हैं और एक भी पल व्यर्थ नहीं जाने देते। चार्वाक दर्शन भी ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ सिद्धांत का पक्षधर है, संदेश-वाहक है और प्रयोगवाद व नयी कविता का क्षणवादिता का दृष्टिकोण भी हर पल को खुशी से जीने व भोग लेने की सीख देता है, क्योंकि वे नहीं जानते कि अगला पल आएगा या नहीं…यह शाश्वत सत्य है; परंतु अनास्था की पराकाष्ठा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वर्तमान की सार्थकता दर्शाते हुए हर पल को अंतिम पल स्वीकार, कर्म-निष्ठता का संदेश दिया है। संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सो! वर्तमान में जीना सीखिए, यही ज़िंदगी का सार है।
भविष्य अनिश्चित है, परंतु वह हमारा प्रेरक है…जिससे तात्पर्य है कि मानव को जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और यह जानने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘वह कौन है और उसका संसार में आने का क्या प्रयोजन है? उसका लक्ष्य क्या है? लक्ष्य निर्धारण के पश्चात् ही आप उस लीक पर चल सकते हैं अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति में स्वयं को जी-जान से जुटा सकते हैं। इसके लिए हमारे पूजनीय माता-पिता, गुरुजन व धार्मिक ग्रंथ ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। सो! उनके प्रति श्रद्धा भाव रखना अपेक्षित है। परंतु आजकल तो यह ‘दूर के ढोल सुहावने’ वाली बातें मात्र जुमले बन कर रह गयी हैं। पहले वे हमारे आदर्श होते थे और हम उनके व्यक्तित्व को देख स्वयं को उसी रूप में ढालने में प्रयासरत रहते थे।
परंतु आजकल तो जीवन-मूल्य दरक़ रहे हैं…
उनका निरंतर पतन हो रहा है। सो! ‘यथा राजा तथा प्रजा’ चारों ओर अराजकता का वातावरण छाया हुआ है। सो! किसी से आस्था व विश्वास की अपेक्षा करना व्यर्थ है, निष्फल है, निष्प्रयोजन है। हिंसा, लूटपाट, अनाचार, अनास्था व भ्रष्टाचार के वातावरण में, जहां इंसान किसी भी कीमत पर अधिकाधिक धन कमाना चाहता है; वहीं उसके हृदय से स्नेह, प्रेम व सौहार्द के भाव नदारद होते जा रहे हैं। वह रिश्तों की अहमियत को नकार, परिवार की खुशियों को अपने हाथों बेदर्दी से रौंद डालता है और दूर… बहुत दूर निकल जाता है, जहां उसे अपने सभी बेग़ाने नज़र आते हैं। इस मन:स्थिति में वह केवल धन की महत्ता को सर्वोपरि मानता है और अपने परिवारजनों और परिजनों की अहमियत व अपेक्षा-आवश्यकता नहीं महसूसता।
धन-संपदा हमेशा साथ नहीं देते। लक्ष्मी स्वभाव से चंचल है… ‘आज यहां, कल वहां।’ सो! एक लंबे अंतराल के पश्चात् उसे अपने आत्मजों की याद आती है, जिन्हें समय की आंधी बहा कर बहुत दूर ले जा चुकी होती है। अब वे उसे लेशमात्र अहमियत भी नहीं देते और वह एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाता है। समय नदी की भांति सदैव बहता रहता है, कभी रुकता नहीं। इसलिए मानव को समय के महत्व व अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त करता व सचेत रहता है तथा उस ग़लती को नहीं दोहराता… ग़लत राह का अनुसरण भी नहीं करता। भविष्य हमें प्रेरणा देता है। सो! लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होना श्रेयस्कर है, जिसके लिए दरक़ार है… आत्मविश्वास व दृढ़ निश्चय की। हां! रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पाँव रखकर आगे बढ़ना ही हमारे धैर्य की परीक्षा है।
अब्दुल कलाम जी इसलिए ‘खुली आंखों से सपने देखने की बात कहते हैं; बंद आंखों से नहीं।’ आप स्वयं को परिश्रम की भट्ठी में झोंक डालिए…अच्छे-बुरे का ध्यान रखते हुए, स्व-पर, राग-द्वेष व लाभ- हानि से ऊपर उठ जाइए… यही सफलता की कसौटी है। दूसरे शब्दों में संसार में आप व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बन कर जिएं, क्योंकि व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, व्यक्तित्व की नहीं…वह अपने आदर्शों के रूप में सदैव ज़िंदा रहता है। परंतु यह तभी संभव है, जब हमारा लक्ष्य सामान्य मानव की तरह जीने का न हो अर्थात् संसार के समस्त प्राणी-जगत् में खाना-पीना सोना व सृष्टि-संवर्द्धन में सहयोग देना–तो सामान्य क्रियाएं हैं; परंतु मानव को प्रदत्त सोचने-समझने की शक्ति उसे श्रेष्ठता प्रदान करती है। मानव का मस्तिष्क अर्थात् बुद्धि उसे शेष प्राणी-जगत् से अलग स्वरूप प्रदान करती है, जिसके बल पर वह सृष्टि पर आधिपत्य स्थापित कर सबको उंगलियों पर नचा सकता है। परंतु उसकी सकारात्मक सोच उसे ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ बनाने का सामर्थ्य रखती है। व्यक्तित्व अर्थात् जिस पर दुनिया नाज़ करती है; उसके गुणों की चर्चा समस्त विश्व में होती है। सब उसके गुणों का अनुसरण करते हैं; वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं और उसका सानिध्य पाकर वे स्वयं को धन्य अथवा सौभाग्यशाली स्वीकारते हैं। ऐसा व्यक्ति भले ही दुनिया से रुख़्सत हो जाए, परंतु वह मानव-मात्र के हृदय में समाया रहता है; सबके दिलों पर राज्य करता है। इसलिए मानव को व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बनकर जीने का सार्थक संदेश दिया गया है।
सोना अग्नि में तप कर ही कुंदन बनता है तथा उसकी चमक कीचड़ में गिरने के पश्चात् भी कम नहीं होती। इसलिए मानव का चरित्र भी कुंदन की भांति होना चाहिए, जिस पर आलोचनाएं प्रभावी न हो पाएं। सो! उसे स्थितप्रज्ञ होना चाहिए, जिस पर सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मान-अपमान व निंदा-स्तुति का लेशमात्र भी प्रभाव न हो। शायद! इसीलिए आलोचनाओं को साबुन स्वीकार कर उनसे अपने अंतर्मन में निहित अहं को धोने व त्यागने की सीख दी गयी है, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए उस से अपने भीतर छुपी दुष्प्रवृत्तियों …काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से मुक्ति पाने का आग्रह किया गया है। सो! हमें आलोचकों अर्थात् निंदकों को जीवन में श्रेष्ठ स्थान देना चाहिए तथा सबसे बड़ा हितैषी स्वीकारना चाहिए, क्योंकि वे ही तो अपना सारा समय आपको, आपके दोष-दर्शन कराने में नष्ट करते हैं। वे अपने समय को आपके हित व समुन्नत करने में प्रयोग करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन-कुटी छ्वाय’ अर्थात् निंदक को सदैव अपने निकट रखना चाहिए। इस तरह वे आप के विकास के निमित्त सदैव चिंतित रहते हैं और आपको व्यक्ति से व्यक्तित्व बनाने में उनका योगदान श्लाघनीय है, अविस्मरणीय है।
मानव को इन हितैषियों द्वारा सुझाए गए रास्तों का अनुसरण कर, अपने अंतर्मन को निर्मल रखना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग बिना साबुन पानी के आप को दोषों व अवगुणों से अवगत करा कर प्रसन्न होते हैं। वे आपके प्रति ईर्ष्या-भाव नहीं रखते, क्योंकि वे आपके हित-चिंतक होते हैं। वास्तव में मानव को ऐसे लोगों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जो नि:स्वार्थ भाव से आपको सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोत्कृष्ट बनाने में अपने जीवन का अनमोल समय रूपी धन निवेश करते हैं, जिसका लाभ आपको मिल सकता है। यदि आप सजग व सचेत होकर स्वयं में परिवर्तन व सुधार लाएंगे, तो आपकी गणना उत्तम श्रेणी के लोगों में होने लगेगी।
इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं, वे पंक्तियां ‘जो बाहर की सुनता है, उसका बिखरना निश्चित है और जो भीतर की सुनता है, उसका निखरना व संवरना निश्चित है, अवश्यंभावी है’…उपरोक्त विचारों की पोषक हैं। सो! आप व्यर्थ की आलोचनाओं से हताश-निराश न हों, बल्कि उनसे प्रेरित होकर स्वयं में सुधार लाएं। हां! लोग तो आपको बातों में उलझा कर आपको पथभ्रष्ट करना चाहते हैं। परंतु वही मनुष्य वास्तव में महान् है, जो उनके कटाक्षों व निंदा से विचलित होकर बिखरता नहीं… बल्कि अपने अंतर्मन की पुकार सुन कर संवर जाता है, निखर जाता है। सो! माया रूपी सांसारिक आकर्षणों के पीछे न भागें और न ही दूसरों की आलोचना, व्यंग्य- बाण व कटाक्षों से हैरान-परेशान हों, बल्कि उनकी उपेक्षा कर निरंतर आगे बढ़ते जाएं … यही मानव का लक्ष्य है। हमें अपने अतीत से सीख लेकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि वर्तमान ही सत्य है…उसे सुंदर बनाना अत्यंत कारग़र है, क्योंकि जो सुंदर होगा, कल्याणकारी अवश्य होगा। वर्तमान वह उपहार है, जो प्रभु-प्रदत्त है और आप उसे अपनी इच्छानुसार रूपाकार प्रदान करने में सक्षम हैं, समर्थ हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचवटी…“।)
अभी अभी # ८९६ ⇒ आलेख – पंचवटी श्री प्रदीप शर्मा
पंचवटी एक खंड काव्य है। बचपन में मैथिलीशरण गुप्त की पंचवटी और मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर पढ़ी थी। आज के तीर्थ स्थल नासिक में पंचवटी स्थित है, जहां कभी लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। पांच वृक्षों का समूह अशोक, पीपल, वट, बेल और पाकड़, पंचवटी कहलाता है और प्रेमचंद के पंच परमेश्वर भी पांच पंचों का एक समूह है, जिनके सर को सरपंच कहते हैं। एक परमेश्वर से भले ही काम चल जाए, पंच तो पांच ही भले।
पांच उंगलियों से ही पंजा बनता है और पांच ही नदियों से पंजाब ! गुरुद्वारे में भी पंच प्यारे होते हैं, पांच तत्वों से ही हमारा यह शरीर बनता है। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश, पांच ही यम नियम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। ।
कुछ विशेष धार्मिक अवसरों पर पूजा आरती के बाद ठाकुर जी को अन्य पकवानों के साथ पंचामृत का भी भोग लगाया जाता है। पांच तरह के अमृत की जब संधि होती है तो वह पंचामृत कहलाता है। ये पांच अमृत हैं, दूध, दही, शहद, शकर और घी। क्या शब्दों का खेल है, अमृत का सिर्फ अ हटाने से मृत हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे शिव की मात्रा हटाओ, तो वह शव हो जाता है। शिव अमर है, सबको अमृत की आस है, जीवन मीठी प्यास है।
एक पहलवान हुए हैं खली और एक मुक्केबाज हुए हैं मोहम्मद अली। मुक्केबाजी को बॉक्सिंग भी कहते हैं। पांच उंगलियों से मिलकर ही मुट्ठी बनती है जो जब तक बंद रहती है, लाख की रहती है, और खुलते ही ख़ाक की हो जाती है। मुष्टि प्रयोग को आजकल पंच कहा जाता है।
हाथ में दस्ताने और चेहरे पर सुरक्षा कवच। फिर भी पंच इतना तगड़ा कि चेहरा लहूलुहान !
विसंगतियों से ही व्यंग्य पैदा होता है। व्यंग्य भी कभी सहलाता है, कभी पुचकारता है, फिर धीरे धीरे चिकौटी काटने लगता है और कभी कभी तो प्रचलित इन मान्यताओं और विसंगतियों पर जमकर प्रहार भी करता है। इसे भी अंग्रेजी में पंच ही कहते हैं। एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कार्टून पत्रिका पंच भी कभी प्रकाशित होती थी। आज की तारीख में पंच का स्थान मानसिक हिंसा, चरित्र हनन और नफ़रत ने ले लिया है।
व्यंग्य भी एक तरह की वटी ही है जो पांच औषधियों को मिलाकर बनी है। ज़माना मिक्सड पेथी का है, देसी विदेशी सब जायज़ है। हिंदी में हास्य है, विनोद है, अगर तंज है तो विद्रूप भी है। ठहाका और अट्टहास है, थोड़ा परिहास भी है। आप इन्हें wit, satire irony, , laughter और punch भी कह सकते हैं। ।
शरीर के विकारों के लिए तो कई औषधियां हैं, सामाजिक विसंगतियों का कोई इलाज नहीं महंगाई, भ्रष्टाचार, निंदा स्तुति, और नफ़रत की राजनीति से स्थायी निदान तो संभव नहीं, हां यह पंचवटी आपको थोड़ी राहत जरूर दे सकती है।
व्यंग्य एक तरह का रसायन है, जो मीठा कम, कड़वा अधिक है। अगर इसे शुगर कोटेड पिल के रूप में लिया जाए तो अधिक असरकारक व लाभप्रद है। आप भी व्यंग्य रूपी इस पंचवटी का सेवन करें और अवसाद, कुंठा और संत्रास जैसी मनोवैज्ञानिक बीमारियों से निजात पाएं।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “ऋतुराज बसंत सुहावन लागे…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २७४ ☆बसंत पंचमी विशेष – ऋतुराज बसंत सुहावन लागे… ☆
☆
आवन जावन पावन भावन, ज्योतित सूर्य हुआ मतवाला।
मातु करें विनती हम मंगल, गीत सुहावन शब्दन माला।।
हंस विराजित शारद शोभित,पुष्प बसंत लगे ऋतु आला ।
पीत सजावत बाग दिखें सब,ज्योतित होवत पुंज उजाला।।
(मत्तगयंद_सवैयाछंद)
बसंत पंचमी का दिन अपने आप में खास होता है। इस दिन से सूर्य अपनी किरणों में सौम्य ऊष्मा घोल देता है।लड्डू गोपाल जी के ठंड वाले वस्त्रों को कम कर दिया जाता है । आकाश हल्का नीला और धरती सुनहरी लगने लगती है। खेतों में सरसों के फूल ऐसे लहराते हैं मानो धरती ने पीली चूनर ओढ़ ली हो। हवा में एक मीठी-सी गंध घुल जाती है, जो मन को भी हल्का और प्रसन्न कर देती है।
इसी पीतमय वातावरण में ऋतुराज बसंत अपने पूरे वैभव के साथ प्रवेश करते हैं। पेड़-पौधे, जो कल तक निस्तेज से थे, आज नई कोंपलों से भर उठते हैं। हर डाल पर जीवन का उत्सव दिखाई देता है। आम की बौर, अमलतास की पीली झालर और खेतों की सरसों—सब मिलकर प्रकृति की आरती उतारते प्रतीत होते हैं।
बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, चेतना का उत्सव है। इसी दिन माँ सरस्वती का स्मरण स्वतः ही हृदय में उतर आता है। श्वेत वस्त्रों में, शांत मुखमंडल के साथ, वीणा धारण किए माँ मानो इसी बसंत की गोद में विराजमान हों। उनके आशीष से विचारों में शुद्धता आती है, वाणी में मधुरता और मन में विवेक का प्रकाश फैलता है। पीला रंग यहाँ केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि ज्ञान, आशा और नवसृजन का प्रतीक बन जाता है।
यह दिन हमें सिखाता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया करती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर के जड़त्व को छोड़कर नए विचार, नई ऊर्जा और सकारात्मकता को अपनाए। बसंत पंचमी हमें जीवन को फिर से खिलने का अवसर देती है—बिलकुल सरसों के उन पीले फूलों की तरह, जो ठंड के बाद भी मुस्कुराना नहीं भूलते।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “श्रद्धा, अश्रद्धा और अंध श्रद्धा…“।)
अभी अभी # ८९५ ⇒ आलेख – श्रद्धा, अश्रद्धा और अंध श्रद्धा श्री प्रदीप शर्मा
श्रद्धा चित्त का वह भाव है, जहां बहता पानी निर्मला है। जल में अशुद्धि, चित्त में अशुद्धि के समान है। अगर जल में अशुद्धि है, तो वह जल पीने योग्य नहीं है। उसके पीने से स्वास्थ्य खराब होने का खतरा बना रहता है। पानी पीयो छानकर और सोओ चादर तानकर।
जल की शुद्धि जितनी आसान है, चित्त की शुद्धि उतनी आसान नहीं। भरोसा, विश्वास और आस्था वे सात्विक गुण हैं, जो किसी भी वस्तु, पदार्थ अथवा व्यक्ति के प्रति हमारे मन में राग उत्पन्न कर सकते हैं। राग आसक्ति का प्रतीक है।
उपयोगी वस्तुओं के प्रति हमारा विशेष लगाव रहता है, और अनुपयोगी वस्तुओं से हम पल्ला झाड़ना चाहते हैं।।
जिस वस्तु अथवा व्यक्ति से हमारा प्रेम हो जाता है, उससे हमारा जाने अनजाने ही लगाव होना शुरू हो जाता है। बिना प्रेम, आस्था, भरोसे एवं विश्वास के श्रद्धा का जन्म ही नहीं हो सकता। एक भरोसा तेरा ही सच्ची श्रद्धा है।
आध्यात्मिक यात्रा में राग द्वेष और आसक्ति को भी व्यवधान माना गया है।
किसी के प्रति अश्रद्धा अगर मन में द्वेष उत्पन्न करती है तो आसक्ति भी आत्म कल्याण के लिए बाधक है। अक्सर जड़ भरत का उदाहरण इस संदर्भ में दिया जाता है। ।
अगर भोजन की थाली में मक्खी गिर गई तो उसे निकाल फेंकना, भोजन का अपमान अथवा अश्रद्धा का द्योतक नहीं, जागरूकता और विवेक का प्रतीक है लेकिन जमीन पर गिरे हुए प्रसाद को श्रद्धापूर्वक उठाकर ग्रहण करना अंध श्रद्धा का प्रतीक भी नहीं।
श्रद्धा और अंध श्रद्धा अगर मुंहबोली बहनें हैं, तो अश्रद्धा उनकी सौतेली बहनें, जिनसे उनकी बिल्कुल नहीं बनती। श्रद्धा, अंध श्रद्धा एक दूसरे पर जान छिड़कती हैं, जब कि अश्रद्धा उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाती।।
जब आस्था पर गहरी चोट पहुंचती है तो अच्छे से अच्छे व्यक्ति के प्रति श्रद्धा, अश्रद्धा में परिवर्तित हो जाती है। श्रद्धा के टूटते ही व्यक्ति बिखर सा जाता है। अगर व्यक्ति विवेकवान हुआ तो ठीक, वर्ना उसका तो भगवान ही मालिक है।
श्रद्धा और अंध श्रद्धा में बड़ा महीन सा अंतर है। कब आपकी श्रद्धा, अंध श्रद्धा में बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। श्रद्धा शाश्वत होती है, जब कि अंध श्रद्धा की एक्सपायरी का कोई भरोसा नहीं। चल जाए तो सालों साल चल जाए, और अगर बिखर जाए, तो एक झटके में बिखर जाए। यह अंध श्रद्धा ही तो है, जो अज्ञान और अंध विश्वास को पाल पोसकर बड़ा करती है।।
आपको अपने तरीके से जीवन जीने का अधिकार है। आपकी अपनी पसंद नापसंद है, श्रद्धा अश्रद्धा है। अगर मैने मतलब के लिए किसी गधे को अपना बाप बना लिया, तो आपको क्या आपत्ति है। मैं धोती कुर्ता पहनना चाहता हूं और आप सफारी सूट, इससे अगर हमारी आपकी दोस्ती में अंतर नहीं आता, तो श्रद्धा और अंध श्रद्धा का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। आप किशोर कुमार के प्रशंसक तो हम मुकेश के।
अगर यह अंध श्रद्धा बीच में से हट जाए, तो शायद श्रद्धा और अश्रद्धा के बीच की खाई भी भर जाए। पसंद अपनी अपनी, खयाल अपना अपना। आप अपने रास्ते, हम अपने रास्ते ! जब भी रास्ते में मिलें, प्रेम से बोलें नमस्ते।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाय और गौ ग्रास…“।)
अभी अभी # ८९४ ⇒ आलेख – गाय और गौ ग्रास श्री प्रदीप शर्मा
cow and grass
गाय को हम गौ माता मानते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि वह हमें दूध देती है। हम गौ सेवा इसलिए भी करते हैं, कि वेदों के अनुसार गाय में ३३ कोटि देवताओं का वास होता है। इन ३३ प्रकार के देवताओं में १२ आदित्य, ८ वासु, ११ रुद्र और २ आदित्य कुमार हैं। केवल एक गाय की सेवा पूजा से अगर ३३ कोटि देवताओं का पूजन संपन्न हो जाता है, तो यह सौदा बुरा नहीं है।
अन्य चौपायों की तरह गाय भी पशुधन ही है और घास ही खाती है, कोई चाउमिन नहीं। यह अलग बात है कि बिहार में एक इंसान चाउमिन छोड़ जानवरों के चारे से पेट भरता था।
हमने बचपन में कहां वेद पढ़े थे। बस गाय पर निबंध ही तो पढ़ा था।
घरों में पहली रोटी गाय की बनती थी, और आज भी बनती चली आ रही है। एक रोटी से कहां गाय का पेट भरता है। पेट तो उसका भी घास से ही भरता है। उसके लिए हमारी रोटी, ऊंट के मुंह में जीरे के समान, एक ग्रास ही तो है। कई अवसरों पर भोजन के पहले गऊ ग्रास भी निकाला जाता है। लेकिन प्रश्न भाव और संतुष्टि का है।
इसे संयोग ही कहेंगे कि घास को अंग्रेजी में भी ग्रास ही कहते हैं। घास से भले ही गौ माता का पेट भरता हो, लेकिन मन तो उसका भी, उसके लिए एक ग्रास जितनी, एक रोटी से ही भरता है। आप गाय को अगर रोज घास नहीं खिला सकते, तो कम से कम गौ ग्रास तो खिला ही सकते हैं। ।
बचपन में हमने कहां वेद पढ़े थे। हमारे मोहल्ले में पाठशाला थी, गुरुकुल नहीं। हर मकर सक्रांति को पिताजी के साथ जाते और नन्दलालपुरा से, हरे भरे, दानेदार, धड़ी भर नहीं, छोड़ के गट्ठर के गट्ठर, साइकिल के पीछे बांधकर ले आते। हमारे लिए तो छोड़ हमेशा ही आते थे, लेकिन ये छोड़ विशेष रूप से गाय के लिए आते थे।
हम तब भाग्यशाली थे, तब सड़कों पर वाहन से अधिक गाय नजर आती थी। हमारी बालबुद्धि समझ नहीं पाती। गाय को छोड़ खिलाना है, खिलाओ, लेकिन छोड़ के दाने तो निकाल लो। लेकिन हमारी मां हमें समझाती, ये छोड़ गाय के लिए हैं, तुम्हारे लिए अलग से रखे हैं। ।
आज घर में मां नहीं है, मकर सक्रांति के दिन, छोड़ खिलाने के लिए आसपास गाय भी नहीं है। गौ शालाओं में गाय की अच्छी सेवा हो रही है और हम तिल गुड़ खाकर और मीठा मीठा बोलकर उत्सव मना रहे हैं।
स्मार्ट सिटी बनने जा रहे महानगर की बहुमंजिला इमारतों की खिड़कियों से जितना आसमान दिख जाए, देख लो, जितनी पतंगें लोग उड़ा सकते हैं, उड़ा ही रहे हैं। पतंग काटने का सुख, और कटने का दुख, दोनों कितने अच्छे लगते हैं। समय कहां रुकता है, जीवन चलने का ही तो नाम है। अच्छे दिन आज भी हैं, फिर भी किशोर कुमार का यह गीत गुनगुनाने का मन करता है ;
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े बूढ़े और महान…“।)
अभी अभी # ८९३ ⇒ आलेख – बड़े बूढ़े और महान श्री प्रदीप शर्मा
जन्म से कोई बड़ा नहीं होता। बिना बड़ा हुए कोई बूढ़ा भी नहीं होता। कुछ लोग बड़े तो हो जाते हैं, लेकिन कभी बूढ़े नहीं होते। ऐसे लोग बोलचाल की भाषा में बिग बी कहलाते हैं। बिन्दास रोमांस और कम उम्र की लड़कियों के साथ फ्लर्ट करते हैं, और अगर इन्हें बूढ़ा कहो, तो पलटकर जवाब देते हैं, बूढ़ा होगा तेरा बाप।
होते हैं, होते हैं कुछ लोग ऐसे भी, जो ठीक से बड़े भी नहीं हो पाते, और बूढ़े हो जाते हैं। नीरज ने शायद इशारों इशारों में ही सही, यही बात कही है ;
नींद भी खुली ही न थी
कि हाय धूप ढल गई
पांव जब तलक उठे
कि जिंदगी फिसल गई
बड़ा होने, और बूढ़ा होने में बहुत फर्क है। जहां बड़प्पन और बुढ़ापा एक साथ नजर आता है, वहीं आसपास हमें एक बड़ा बूढ़ा नजर आता है। ए.के.
हंगल को आपमें हर दृष्टि से एक बड़ा बूढ़ा नजर आएगा।।
बहुत पहले डाबर च्यवनप्राश का एक विज्ञापन आता था, जिसमें एक अधेड़ व्यक्ति को सीढियां चढ़ते दिखाया जाता था, इस शीर्षक के साथ, साठ साल के बूढ़े अथवा साठ साल के जवान ? आजकल ऐसे विज्ञापन आउट ऑफ फैशन हो गए हैं, क्योंकि योगा और जिम, मेन्स पार्लर और विमेंस ब्यूटी पार्लर, हेयर डाई, डेंटल केयर और आई एंड फेशियल सर्जरी इंसान को बूढ़ा होने ही नहीं देती। कल के एक पैंतालीस वर्ष के अधेड़ इंसान के आगे आज का एक पचहत्तर वर्ष का आधुनिक इंसान, पुराने लेकिन हमेशा जवां गीत की तरह आकर्षक और मनमोहक प्रतीत होता है।
बढ़े और बूढ़े के बीच की एक अवस्था और होती है जहां आदमी बड़ा होने के बाद और भी बड़ा होता चला जाता है। इसे आप बोलचाल की भाषा में कामयाबी कह सकते हैं। कामयाबी कभी इंसान को बूढ़ा नहीं होने देती। आदमी पढ़ लिखकर बड़ा आदमी तो बन सकता है, लेकिन उपलब्धियां ही उसे एक कामयाब इंसान भी बनाती है।।
उपलब्धियां कोई लॉलीपॉप नहीं और ना ही कोई फूले हुए रंग बिरंगे गुब्बारे। कामयाबी से प्रसिद्धि, प्रसिद्धि से उपलब्धि और अल्टीमेट उपलब्धि तो खैर महानता ही है, जो इंसान को न तो बूढ़ा होने देती है और न ही मरने देती है। महान लोग अमर हो जाते हैं।
कहने वाले तो यहां तक कह गए हैं, कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ महान बनकर दिखाते हैं, और कुछ पर महानता थौंप दी जाती है। जन्म से महानता की बात तो हमारी समझ से परे है, और बाकी के बारे में, नो कमेंट्स।।
कोई साधारण व्यक्ति कब एक बड़ा आदमी बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। बूढ़ा होना भी कहीं कोई उपलब्धि है।
पहले सिटिजन थे, फिर सीनियर सिटिजन बन गए। वे तनकर चले, जब तक वेतन था, लाइफ सर्टिफिकेट पर तो झुककर ही हस्ताक्षर किया जाता है।
अगर आप बूढ़ा नहीं होना चाहते, हमेशा बड़ा बने रहना चाहते हैं तो उपलब्धियों की बैसाखी को थामे रहिए। कुछ पद्म पुरस्कार, कुछ सार्वजनिक सम्मान, एक ठौ साहित्य अकादमी सम्मान, ऐसी संजीवनी है, जो आपको अपनी निगाहों में ऊंचा उठा देगी। हो सकता है, महानता आपकी राह देख रही हो, अथवा बिल्ली के भाग से छींका टूट जाए और आप पर महानता थौंप दी जाए। महानता तेरा बोलबाला, बुढ़ापा, तेरा मुंह काला।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६२ ☆ देश-परदेश – विंबलडन की विंडम्बना ☆ श्री राकेश कुमार ☆
लॉन टेनिस खेल की सबसे पुरानी प्रतियोगिता प्रतिवर्ष लंदन शहर में बरसो से आयोजित होती आ रही है। प्रतिवर्ष जून के अंतिम सप्ताह से आरंभ होकर जुलाई के मध्य तक चलने वाली प्रतियोगिता जब लंदन में आयोजित होती है, तो वहां का मौसम भी खुशनुमा रहता है।
हमारे देश में इस समय गर्मी चरम पर रहती है। देश के अधिकतर अमीरजादे, क्रिकेटर और बॉलीवुड के बिगड़ैल गर्मी से निजात पाने के लिए विंबलडन खेल देखने के बहाने लंदन शहर चले जाते हैं। इनके पास दौलत इतनी अधिक है, कि खर्च नहीं हो पाती है।
बॉलीवुड के एक प्रसिद्ध लेखक/ गीतकार जो शरीर के दर्द दूर करने की दवा का टीवी पर विज्ञापन भी करते है, विंबलडन देखने गए हुए हैं। उनकी वर्तमान पत्नी और पूर्व पत्नी का पुत्र भी अपनी वर्तमान पत्नी के साथ लंदन गया हुआ है। मीडिया में छाए रहने के लिए हवाई यात्रा कंपनी की तारीफ में भी कशीदे पढ़ दिए, कि इनके वायुयान में बैठने के लिए बहुत खुला स्थान उपलब्ध है, ये नहीं बताया कि वो “बिजनेस क्लास” से यात्रा कर रहें हैं।
इस खेल को देखने अधिकतर वो व्यक्ति जाते हैं, जो घर में एक ग्लास पानी का स्वयं उठाकर नहीं पीते हैं। रईसों की दुनिया में विंबलडन प्रतियोगिता देखना अब एक “स्टेटस” की श्रेणी में आता है। एक लड़के के विवाह बायो डाटा में भी लिखा हुआ था, कि लड़का तीन बार विंबलडन देखने जा चुका है। ऐसे लड़के जीवन में घर के कभी फ्यूज बल्ब तक नहीं बदले होंगे।
विंबलडन प्रतियोगिता में बॉल उठाने के लिए युवा लड़के और लड़कियां सेवा में रहती हैं, ताकि खिलाड़ी खेल पर अधिक ध्यान दे सकें। खिलाड़ियों के जैसे ये युवा भी बहुत फुर्तीले और फिट रहते हैं।
गोल्फ, लॉन टेनिस, क्रिकेट जैसे अंग्रेजों के खेल में सहायक की आवश्यकता होती है। अंग्रेजों ने तो पूरी दुनिया पर लंबे समय तक राज़ कर गुलामों से ऐसे कार्य करवाते थे। अब तो अंग्रेज़ अपने देश तक ही सीमित हो चुके हैं, लेकिन गुलामों/नौकर रखने की आदतें अभी भी हैं। सही कहा गया है” bad habits die hard”.