(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मुस्कुराओ कि…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # ११३ ☆
☆ मुस्कुराओ कि… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
☆
मुस्कुराओ कि जिंदगी लौटे,
रेत की तह पर नमी लौटे,
लबों पर जम गए हैं सन्नाटे,
कुछ किया जाए कि हंसी लौटे,
हमारी जिंदगी में इतनी कटुता कहां से आ गई, बचपन में तो नहीं थी, किसी के बारे में कभी नहीं सोचा कि उन्नति ना करें, कभी नहीं सोचा कि सुखी ना हो, हमारी संस्कृति में भी, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… की बात की है. पर अब क्या हो गया अगर हम त्यौहार भी मनाते हैं तो कटुता से भरे रहते हैं. हम क्यों नहीं उसके घर जाकर उनकी खुशियों में शरीक होते हैं, क्यों नहीं, हम, खुशी को साझा करते हैं, दर्द भी साझा करें, खुशी भी साझा करें.
लेकिन क्या हो गया हम अपने आप में ही सिमट गए, दूसरे की खुशियां हम नहीं बांट सकते, हम दूसरों की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, हम अपने परिवार की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, अकेलापन आप चाहते नहीं हो, तो आप चाहते क्या हो, प्रकृति आपके हिसाब से नहीं चलती, प्रकृति अपनी गति से गतिमान होती है, आपको ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है.
प्रकृति के साथ, बारिश में भीगना छोड़ दिया, छत पर सुबह की धूप लेनी छोड़ दी, जब आप प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हैं, तब आप खुश होना सीख जाते हैं, खुशियां बांटनी चाहिए, दूसरों के गम में शरीक होना चाहिए, और जब आप खुशियां बांटना शुरू कर देते हैं दूसरों के गमों में शरीक होना शुरू कर देते हैं यकीन मानिए आपको भी कहीं ना कहीं अपार खुशी मिलती है.
कोशिश करके देखिए, जीवन जीने का रवैया बदल जाएगा, हंसिए, हंसाईये दूसरों की हंसी का कारण बनिए ऐसा कोई कार्य न करें, जो आप अपने लिए नहीं चाहते, मुस्कराये और दूसरों की मुस्कराहट का कारण बनिए, बस खुशियों से भरा जीवन जीना सीख लीजिए.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पर्दा फिल्मी और फेसमुखी…“।)
अभी अभी # १०३२ ⇒ आलेख – पर्दा फिल्मी और फेसमुखी श्री प्रदीप शर्मा
जीवन केवल सच्चाई और वास्तविकता से नहीं जीया जाता ! सपने सच नहीं होते, फिर भी सपने सुहाने लगते हैं। जीवन का सफर कभी सुहाना होता है, तो कभी काँटों भरा। मन को बहलाना ही मनोरंजन है। दुःख को कुछ समय के लिए भुलाना ही क्षणिक निवृत्ति है।
संगीत, कला और साहित्य जीवन को एक दिशा देते हैं, रोजमर्रा की उबाऊ दिनचर्या को रोचक और आकर्षक बना देते हैं। दुनिया फिल्मी हो, साहित्यिक हो, या फिर संगीतमय, जीवन में रस की सृष्टि करते हैं। साहित्य और संगीत अगर खास विधा है तो फ़िल्म एक आम विधा।।
संगीत अगर कानों में रस घोलता है तो दृश्य मन को आनंदित और आंदोलित करते हैं। आलमआरा और जहाँआरा जैसी फिल्मों से शुरू हुआ यह फिल्मी सफर आज उस मुकाम पर आ गया है, जहाँ सिनेमाहॉल का बड़ा पर्दा पहले टीवी का छोटा पर्दा हुआ और अब एंड्रॉयड के जरिये हमारी हथेली में कैद हो गया।
याद कीजिए सहगल, पृथ्वीराज कपूर, महिपाल, दिलीप, देव और राजकपूर की फिल्मों का दौर ! सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़। नर्गिस, मीनाकुमारी, साधना और सायराबानो की फिल्मों के पोस्टर्स। बिनाका गीत माला की धूम। हर पान वाले की दुकान पर बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं, जैसे गानों पर झूमते श्रोतागण। अभिनय सम्राट, संगीत सम्राट और हास्य सम्राट का त्रिवेणी संगम।।
समय का पंछी उड़ता जाए !
संचार क्रांति ने हरित क्रांति को पीछे छोड़ दिया। आज सिनेमाघर गिनती के हैं।जितने पहले शहर में सिनेमाघर थे, उतने आज मॉल हैं। दो आने की मूँगफली से पूरी ढाई घंटे की फ़िल्म देख ली जाती थी। आज 200 ₹ का पॉप कॉर्न कॉम्बो वह स्वाद नहीं देता।
आज मेरे हाथ में कोई बुक नहीं, फेसबुक है। बस इसे खोलने की देर है। एक झाड़ पर बैठे बंदरों से अधिक app मेरी उंगलियों तले दबे बैठे हैं। टीवी की पिक्चर ट्यूब की अब मुझे चिंता नहीं, एक टीवी दीवार से चिपका है तो एक मेरी आँखों से। यू ट्यूब में मैं जब चाहे सङ्गीत की महफ़िल सजा सकता हूँ। 24 x 7 मेरे सामने एक बोन्साई रजतपट है, सभी अभिनेताअभिनेत्रियों की फिल्में खुल जा सिम सिम की तरह केवल एक क्लिक की मोहताज है।।
फिल्मी पर्दे से फेसबुक के पर्दे तक का मेरा यह सफर बड़ा रोचक है। जो काम सन् 70 के दशक में संगीत, फिल्में और किताबें करती थी, वे सब आजकल केवल फेसबुक अकेली कर रही हैं। पहले किताबें बोलती नहीं थीं, आजकल लेखक से आपका जीवंत परिचय और संवाद होता है। रचना प्रक्रिया पर घर बैठे बहस होती है। सभी पुरानी फिल्में और क्लासिकल संगीत यू ट्यूब में उपलब्ध हो चुका है।
बस केवल एक पर्दे की जरूरत है, और वह है आँखों का पर्दा।
फेसबुक ओपन हुई और पर्दा खुला। किसी ने शायद इसी स्थिति को भाँपकर आज से कई वर्ष पहले इस गीत की रचना की होगी ;
पर्दा उठे सलाम हो जाए
बात बन जाये, काम हो जाए
फेसबुक का पर्दा उठ चुका है, आपसे सुबह का सलाम हो ही जाए ! सुप्रभात…
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ह र क त…“।)
अभी अभी # १०३१ ⇒ आलेख – ह र क त श्री प्रदीप शर्मा
हरकत एक ऐसी सूक्ष्म अथवा स्थूल प्रक्रिया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कहीं कुछ ऐसा चल रहा होता है, जिसका हमें आभास तक नहीं होता। लेकिन अगर किसी ने तनिक इशारा भी कर दिया, तो हमारे कान खड़े हो जाते हैं।
हरकत को स्वस्थ गतिविधि नहीं माना जाता ! अबोध बालकों की कुछ हरकतें गंदी होती हैं, जिनके लिए माता पिता उन्हें अक्सर झिड़कते रहते हैं। बाथरूम में बंद करने तक की धमकी भी देते हैं।।
कांग्रेस, विपक्ष और ममता की सभी हरकतें ओछी होती हैं। पाकिस्तान की घुसपैठ की गतिविधियां भी इसी श्रेणी में आती हैं। अपराधियों के कारनामों की गिनती नीच हरकतों में होती है। कभी कभी किसी अपने की भी कोई हरकत इतनी नागवार गुजरती है कि मन खट्टा हो जाता है। मोहल्ले के कुछ लफंगे टाइप के लड़कों की हरकतों से शरीफ महिलाओं का घर से निकलना दूभर हो जाता है। चीन की यह कोरोना वाली हरकत से तो, अब चीन क्या चाईनीज तक से नफ़रत हो गई है।
फिल्म हकीक़त का एक खूबसूरत सा गीत है :
ज़रा सी आहट जो होती है
तो दिल सोचता है,
कहीं ये वो तो नहीं !
जी नहीं। हकीकत तो यह है कि आहट का हरकत से कोई लेना देना नहीं। आपने कभी सांप के सरसराने की आवाज़ सुनी है, इसमें कोई आहट नहीं, झाड़ियों में हरकत सी होती है। सांप के चलने से सिर्फ हरकत होती है, बाहर भी, और अपने अंदर भी। मत पूछिए कैसी। हल्की हल्की बयार से पेड़ पौधों में, पत्तियों में एक हरकत होती है। जो देखी जा सकती है, महसूस की जा सकती है।।
आप जब किसी पड़ोसी के आंगन से कुछ फूल तोड़ने की इजाजत मांगते हैं, तो उसका जवाब होता है, कोई हरकत नहीं, आप जितने चाहें तोड़ लीजिए। हरकत यानी उज्र भी होता है। नो ऑब्जेक्शन। नो प्रोब्लम।
आइए, अब एक संयुक्त परिवार का हाल लेते हैं ! सबके चहेते ९०वर्षीय, स्वस्थ, खुशमिजाज, सभी परिजनों के दिलों की धड़कन, दादाजी, बिस्तर में पड़े हैं। अच्छे भले, हंसते खेलते, बातें करते, अचानक उन्हें स्ट्रोक आ गया, और वे कोमा में चले गए। पूरे घर में मातम मना हुआ है। दादाजी मज़ाक में कहते थे, पूरी सेंचुरी मारूंगा, इतनी जल्दी नहीं जाऊंगा।।
घर के सभी सदस्य चिंतित, प्रार्थनारत हैं, उन्हें अपने से अधिक दादाजी पर भरोसा है। उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हो सकता। डॉक्टर ने भी बोला है, जब तक दादाजी कोमा में हैं, हम कुछ नहीं कर सकते। आप बस प्रार्थना करें। या तो सबकी प्रार्थना रंग लाती है, या दादाजी का आत्मविश्वास, अचानक उनके शरीर में हरकत होती है, एक बार नहीं, दो तीन बार ! सबके शरीर में आशा का संचार होता है, मानो जग जीत लिया हो। डॉक्टर भी कहते हैं, खुश खबर है। दादाजी अब पुनः स्वस्थ हो सकते हैं।।
सबसे प्यारी हरकत संगीत में होती है। शास्त्रीय गायन और कुछ नहीं, सरगम की हरकत ही तो है। जब रविशंकर सितार के साथ हरकत करते हैं, बिस्मिल्लाह खान की शहनाई जब हरकत करती है, भीमसेन जोशी, पंडित जसराज और कुमार गंधर्व जब तान छेड़ते हैं, तो इबादत हो जाती है। इबादत से बढ़कर कोई हरकत नहीं।
जगजीतसिंह जब सरकती जाए, रुख से नकाब …. गाते हैं, तो कहां कहां हरकत नहीं होती। दर्शक झूम उठते हैं। पूरा हॉल आहिस्ता आहिस्ता से गूंज जाता है। केवल जगजीत की आवाज़ ही नहीं, हर वाद्य यंत्र हरकत में आ जाता है। क्या तबला, क्या वॉयलिन और क्या संतूर।।
शरारत की गिनती भी हरकत में ही आती है। घर में बच्चों की शरारत न होती, तो क्या लॉक डाउन के पहाड़ जैसे दिन आसानी से कटते। हर हरकत ऐसी हो हमारी, जिससे कोई आहत न हो। थोड़े शिकवे भी हों, कुछ शिकायत भी हो। फिर भी अगर कोई बेजा हरकत हो गई हो, तो गुस्ताखी माफ, गुस्ताखी माफ़।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अभिमानी–स्वाभिमानी। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो हर पल तेरा नाम जपूँ / स्वर- रंजना मजूमदार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२७ ☆
☆ अभिमानी–स्वाभिमानी… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘अभिमानी और स्वाभिमानी में केवल इतना-सा फ़र्क़ है कि स्वाभिमानी व्यक्ति कभी किसी से कुछ मांगता नहीं और अभिमानी व्यक्ति किसी को कुछ देता नहीं।’ अहंकार में डूबे व्यक्ति को न तो ख़ुद की ग़लतियाँ दिखाई देती है, न ही दूसरों की अच्छी बातें उसके अंतर्मन को प्रभावित करती हैं। उसे विश्व मेंं स्वयं से अधिक बुद्धिमान कोई दूसरा दिखाई नहीं देता। वैसे भी छिद्रान्वेषण अर्थात् दूसरों में दोष-दर्शन की प्रवृत्ति मानव में स्वाभाविक रूप से होती है। उसे सभी लोग दोषों व बुराइयों का आग़ार भासते हैं और वह स्वयं को दूध का धुला समझता है। दूसरी ओर जहाँ तक स्वाभिमानी का संबंध है, उसमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा होता है और वह स्व अर्थात् मैं में विश्वास रखता है और उसका अहं उसे दूसरों के सम्मुख नत-मस्तक नहीं होने देता। उसे प्रभु में आस्था होती है और वह ‘तुम कर सकते हो’ के विश्वास के सहारे बड़े से बड़ा कार्य कर गुज़रता है, क्योंकि उसके शब्दकोश में असंभव शब्द होता ही नहीं है।
‘सफलता हासिल करने के लिए मानव का विश्वास भय से बड़ा होना चाहिए, क्योंकि असफलता का भय ही सपनों के साकार करने में बाधा बनता है। यदि आप भय पर विजय पा लेते हैं, तो आपकी विजय निश्चित् है’ प्लेटो का यह संदेश अत्यंत कारग़र है। यदि हमारा लक्ष्य निश्चित् और हृदय में आत्मविश्वास है, तो कोई भी बाधा आपका पथ नहीं रोक सकती। इसलिए कहा जाता है,’मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ हमारा मन ही जय-विजय का कारक है। सो! ‘विजयी भव’ एक सर्वश्रेष्ठ भाव है, जिसके साथी हैं– विद्या, विनय व विवेक। इन मानवीय गुणों के आधार पर हम आपदाओं से मुकाबला कर सकते हैं। विनम्रता सर्वोत्तम गुण है, जो अहंनिष्ठ व्यक्ति के हृदय से कोसों दूर रहता है। इसके लिए वस्तुस्थिति का ज्ञान होने के साथ- साथ यथा-समय लिया गया निर्णय भी हमें सफलता की सीढ़ियों पर पहुंचाता है। दु:ख में धैर्य का बना रहना अत्यंत आवश्यक व सार्थक है।
‘कोई भी चीज़ आपके लिए फायदेमंद नहीं हो सकती, जिसे पाने के लिए आपको आत्म- सम्मान से समझौता करना पड़े।’ मार्क्स ऑरेलियस का यह तथ्य आत्म-सम्मान को सर्वश्रेष्ठ समझ समझौता न करने का सुझाव देता है। सो! समझौता परिस्थितियों से करना चाहिए, आत्म-सम्मान से नहीं, क्योंकि जब उस पर आँच आ जाती है; तो व्यक्ति सिर उठा कर नहीं जी सकता। ऐसी स्थिति में प्रभु शरणागति कारग़र उपाय है। मुझे स्मरण हो रही हैं दुष्यंत की यह पंक्तियाँ ‘कौन कहता है आकाश में सुराख हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ से हमें यह संदेश मिलता है कि दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं, सिर्फ़ आप में जज़्बा होना चाहिए उस कार्य को अंजाम देने का। ‘राह को मंज़िल बनाओ, तो कोई बात बने’ में भी यही सोच व भाव निहित है। जब हम दृढ़-संकल्प कर उन राहों पर निकल पड़ते हैं, तो हमारा मंज़िल पर पहुंचना निश्चित हो जाता है। लाख आँधी, तूफ़ान व सुनामी भी आपके पथ के अवरोधक नहीं बन सकते।
स्वाभिमान व आत्मविश्वास पर्यायवाची हैं तथा एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इनकी महत्ता को नकारना असंभव है। सो! हमारे हृदय में शंका भाव नहीं आना चाहिए, क्योंकि यह तनाव की स्थिति का द्योतक है, जो हमें पथ-विचलित करता है। भगवद्गीता में भी यही संदेश दिया गया है कि सुख का लालच व दु:ख का भय मानव के अजात शत्रु हैं। यदि मानव भविष्य के प्रति आशंकित रहता है, तो वह वर्तमान के अपरिमित सुखों से वंचित हो जाता है, क्योंकि यही है दु:खों का मूल। व्यक्ति जीवन में अधिकाधिक धन-सम्पदा व पद-प्रतिष्ठा पाना चाहता है, परंतु उसको एवज़ में छोड़ना कुछ भी नहीं चाहता; जबकि संसार का नियम है ‘एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले’ अर्थात् जो भी आप इस संसार में देते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। वैसे भी आप एक साँस छोड़े बिना बिना दूसरी साँस नहीं ले सकते। यह संसार का नियम है कि इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ लौट जाना है। केवल सत्कर्म ही उसके साथ जाते हैं। इसलिए मानव हरपल प्रभु का सिमरन तथा समय का सदुपयोग करना चाहिए।
अहंनिष्ठ प्राणी आजीवन काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में उलझा रहता है। वे उसे अपना गुलाम बनाए रहती हैं। उसके कदम धरा पर नहीं टिकते। वह केवल दूसरों की भावनाओं को आहत नहीं करता, बल्कि अपना जीवन भी नरक बना लेता है तथा आजीवन इसी उधेड़बुन में खोया रहता है। डॉ वसुधा छवि का यह कथन भी इस तथ्य की सार्थकता सिद्ध करता है कि ‘जब व्यक्ति के पास पैसा होता है, तो वह भूल जाता है कि वह कौन है और जब पैसा नहीं होता, तो लोग भूल जाते हैं कि वह कौन है,’ यही जीवन का कटु यथार्थ है। धन-लिप्सा उसे अपने शिकंजे साथ बाहर नहीं निकलने देती और वह इस भ्रम में अपने जीवन के प्रयोजन को भुला बैठता है। मानव स्वार्थी है और संसार व संबंध मिथ्या। मानव केवल स्वार्थ साधने हेतू संबंध साधता है और उसके पश्चात् उसे भुला देता है। इतना ही नहीं, वह माया महा-ठगिनी के मायाजाल में आजीवन उलझा रहता है और लख चौरासी से मुक्त नहीं हो सकता।
सहारे मानव को खोखला कर देते हैं और उम्मीदें कमज़ोर। मानव को अपने बल पर जीना प्रारंभ करना चाहिए क्योंकि उसका आपसे अच्छा साथी व हमदर्द कोई दूसरा नहीं हो सकता। वैसे भी ‘मंज़िलें बड़ी जिद्दी होती हैं/ हासिल कहाँ नसीब से होती हैं/ मगर तूफ़ान भी वहां हार जाते हैं/ जहां कश्तियां ज़िद पर होती हैं।’ जी हां! यदि मानव का हृदय साहस व धैर्य से लबालब है, तो तूफ़ान भी रुक जाते हैं और व्यक्ति अपने मनचाहे लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ सिद्ध होता है। जब मन रूपी कश्ती ज़िद पर होती है, तो तूफ़ानों को अपने रास्ते से हट जाना पड़ता है, क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी नहीं ठहर नहीं सकता। मानव को न तो किसी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, न ही उम्मीद रखनी चाहिए, क्योंकि दोनों स्थितियां उसके मनोबल को तोड़ती हैं। मानव स्वयं अपना साथी व हमदर्द है। इसलिए जीवन में अपेक्षा व उपेक्षा को त्याग कर जीवन पथ पर बढ़ते जाना चाहिए, अन्यथा यह मानव को अवसाद की स्थिति में ले जाती है। मानव को अहं को शत्रु समझ अपने आसपास नहीं आने देना चाहिए और आत्मविश्वास को धरोहर सम संजोए रखना चाहिए, क्योंकि आत्मविश्वास के बल पर आप असंभव कार्य को भी कर गुज़रते हैं। इसलिए आत्मसम्मान से कभी भी समझौता न करें, क्योंकि जिसमें आत्मविश्वास है, वह सिर उठाकर जीता है; किसी के सम्मुख घुटने नहीं टेकता और न ही नतमस्तक होता है। सो! अभिमानी नहीं; स्वाभिमानी बनें और अपने मान-सम्मान व प्रतिष्ठा को क़ायम रखें।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिल बट्टा और खलबत्ता…“।)
अभी अभी # १०३० ⇒ आलेख – सिल बट्टा और खलबत्ता श्री प्रदीप शर्मा
क्या आपके रसोड़े में आज भी यह जोड़ी मौजूद है ? पत्थर की सिल्ला और पत्थर की ही लोढ़ी,और लोहे का खल और लोहे का ही बत्ता ! जब तक मैं ज़मीन से जुड़ा रहा,ये मुझसे जुड़े रहे। आज मैं जमीन से ऊपर उठ गया हूं,एक फ्लैट में शिफ्ट हो गया हूं। आप कह सकते हैं, न तू ज़मीं के लिए है, न आसमां के लिए। तेरा वजूद है, सिर्फ़ 2BHK, लेट कम अटैच बाथ के लिए। अब मेरे फ्लैट की चार इंच की दीवारें और चमकदार नाज़ुक टाइल्स इनका बोझ नहीं सह सकती। पुराने घर में जहां मन करे, एक कील ठोंको और छतरी टांग दो। यहां तो अपनी ही दीवार में एक कील लगाने के लिए ड्रिलिंग करना पड़ता है। पूरी बिल्डिग जान जाती है, कहीं एक कील ठुक रही है। आज न सिल न बट्टा, और ना ही खलबत्ता। कोई फर्क नहीं अलबत्ता।
सिल अथवा सिल्ला,एक तरह की पोर्टेबल पत्थर की शिला ही तो होती है,जिसके मुंह पर चेचक के दाग की तरह खुरदुरे छेद होते हैं। इन पत्थरों को टांका जाता है। मोहल्ले में एक पत्थर और घट्टी टांकने वाला आवाज लगाता था। घट्टी भी एक पत्थर की छोटी चक्की ही होती थी,जिसमें पक्षियासन की मुद्रा में दोनों पाँव फैलाकर अनाज पीसा जाता था, और दालों को दला जाता था। तब दो ही तो कहावतें मशहूर थी कहासुनी के वक्त ! कौन सी चक्की का आटा खाते हो, और आ जाओ मैदान में, अगर मां का दूध पीया है तो ?
तब कहां घरों में मिक्सर ग्राइंडर होते थे। मेहनत और पसीने की खड़े मसालों की,सिल पत्थर पर पिसी चटनी का स्वाद ही कुछ और होता था। गर्म गर्म मुंगौड़ों के लिए पहले मूंग की दाल भिगोना और फिर उसे सिल बट्टे पर दरदरी पीसना,अदरक,हरी मिर्ची और धनिये के साथ। गणेश चतुर्थी के लड्डू के लिए पहले मुठिया तली जाती, फिर उसे खलबत्ते में कूटा जाता। खलबत्ते की आवाज के साथ मोहल्ले में खुशबू फैल जाती। फुर्सत ही फुर्सत, स्वाद ही स्वाद।
आज समय,स्वास्थ्य और तकनीकी ज्ञान ने सब कुछ कितना आसान कर दिया है। एक वह दिन, जब रसोई घर यानी पाक शाला में बिना स्नान प्रवेश वर्जित। पाक और नापाक का क्या साथ ! चूल्हे में अगर आग नहीं,तो गुलजार साहब पड़ोसी के चूल्हे से आग ले आते। ये मर्द नहीं मानते, उसी से बीड़ी भी जला लेते हैं। सो अनहाइजेनिक। दिन भर धुआं ही धुआं और रात भर रसोई में चिमनी का धुआं। और एक आज, रसोई में बढ़िया स्टैंडिंग किचन, वॉश बेसिन, एक्वा गार्ड, चार बर्नर वाला गैस स्टोव,फिलिप्स का मिक्सर,ग्राइंडर,माइक्रोवेव ओवन और रसोईघर का धुआं और प्रदूषण निकलने के लिए अत्याधुनिक बिजली की चिमनी।।
सब कुछ कितना आसान,आरामदेह और आधुनिक हो गया। जो समय के साथ चला, वह आगे निकल गया,जो साइकिल से आगे नहीं बढ़ा,वो मोरसली गली में ही अटक गया। कांसे और पीतल के बर्तन बिक गए, अनब्रेकेबल क्राकरी भी तेजी से आई और निकल गई। बोन चाइना में हड्डियां पाई गई। दीनदयाल स्टेनलेस स्टील के बर्तन लेकर आए और येरा कांच के बर्तन।
जो चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हैं,वे शायद आज भी चांदी के डिनर सेट में खाना खाते हों।
अगर इंसान हो हट्टा कट्टा,तो आजमा ले सिल बट्टा और खलबत्ता का स्वाद खट्टा मीठा। समय और सुविधा का तकाजा तो यही है,स्वाद से समझौता करें,स्वस्थ और तंदुरुस्त रहें। पहले शरीर को आराम देओ और बाद में बाबा रामदेव। सिलबट्टा, खलबत्ता नहीं हंसी ठट्टा, दोनों से कट्टम कट्टा।।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१८ ☆
☆ इन दिनों लन्दन से ☆
आलेख – ग्रेट ब्रिटेन में लोकतंत्र का रंगमंच: सत्ता की नजाकत और प्रेस की तलवार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ब्रिटेन की राजनीति इन दिनों एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ प्रधानमंत्री निवास एक रैन-बसेरा सा बन गया है। वहां की राजनीतिक अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और जनता की अपेक्षाओं का दबाव किस हद तक बढ़ चुका है। बोरिस जॉनसन का जाना हो या फिर हाल ही में कीर स्टार्मर का पद छोड़ना, ये घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री अब प्रेस और जनता के निरंतर डर के साये में काम करने को मजबूर हैं।
ब्रिटिश राजनीति में जवाबदेही के मानक अत्यंत कड़े हैं। वहां का लोकतान्त्रिक संस्कार किसी भी छोटे से छोटे नैतिक स्खलन को भी स्वीकार नहीं करता। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्रियों के इस्तीफों की सूची को देखें तो कारण अक्सर बड़े नीतिगत संकटों के बजाय व्यक्तिगत नैतिकता और आचरण से जुड़े रहे हैं। कभी कोविड नियमों के उल्लंघन का छोटा सा विवाद (पार्टीगेट), कभी पारिवारिक सदस्य की फीस या निजी खर्चों से जुड़ी पारदर्शिता का अभाव, तो कभी मामूली से प्रतीत होने वाले राजनीतिक फैसलों पर मीडिया का आक्रामक रुख, इन छोटी-छोटी बातों ने सरकार की नींव हिला दी। प्रधानमंत्री बदल गए । यह अस्थिरता दर्शाती है कि वहां का नेतृत्व अब एक ऐसी सूक्ष्म परीक्षा से गुजर रहा है जहाँ कोई भी मानवीय त्रुटि उसके राजनीतिक करियर का अंत कर सकती है।
आज के सोशल मीडिया और डिजिटल दौर में, जहाँ हर छोटी घटना पल भर में सुर्खियों में आ जाती है, वहां के राजनेताओं की निजता और राजनीतिक आज़ादी लगातार सिमट रही है। प्रेस की भूमिका वहां एक सजग प्रहरी से बढ़कर सीधे तौर पर एक निर्णायक की हो गई है। जब मीडिया किसी व्यक्तिगत आचरण या पारदर्शिता के मुद्दे को राष्ट्रहित का नाम देकर उछालता है, तो वहां के प्रधानमंत्री के लिए अपनी कुर्सी बचाए रखना एक कठिन चुनौती बन जाता है। प्रधानमंत्री की आज़ादी का अर्थ वहां निरंकुशता से नहीं, बल्कि स्थिरता से है, जो अक्सर मीडिया के निरंतर दबाव में बिखरती दिखती है।
भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटिश डेमोक्रेसी की ही जड़ से निकली है, लेकिन इनके काम करने के तरीकों में बड़ा अंतर है। ब्रिटेन में नैतिक आधार पर इस्तीफा देना एक स्थापित राजनीतिक परंपरा है और वहां का जनमत त्वरित परिणामों की मांग करता है, जिससे नेतृत्व पर दबाव बहुत जल्दी बढ़ जाता है। इसके विपरीत, भारत में जवाबदेही की परिभाषा थोड़ा अलग है। यहां की सरकारें अक्सर एक बड़े और व्यापक जनादेश के साथ काम करती हैं। हालांकि प्रधानमंत्री सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, फिर भी वे स्वयं को सारी आबादी के प्रतिनिधि के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं। भारतीय राजनीति में मीडिया का दबाव और विमर्श तो चलता है, लेकिन हमारा तंत्र अधिक लचीला है। यहां सत्ता को केवल मीडिया के शोर से हिला पाना कठिन है, क्योंकि भारतीय राजनीति का ढांचा नैतिक शुद्धता के साथ-साथ शासन की निरंतरता और स्थायित्व को भी प्राथमिकता देता है।
लोकतंत्र के इस रंगमंच पर एक संतुलन की आवश्यकता है। एक स्वस्थ समाज के लिए प्रेस का स्वतंत्र होना अनिवार्य है, लेकिन उसे जज की भूमिका से निकलकर एक सुझावकर्ता की भूमिका को भी समझना होगा। उसे यह अहसास होना चाहिए कि अत्यधिक अस्थिरता अंततः राष्ट्र के विकास की गति को बाधित करती है। दूसरी ओर, सत्ता में बैठे नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल युग में पारदर्शिता ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।
अंततः, लोकतंत्र की सार्थकता इसमें नहीं है कि कौन कितनी जल्दी इस्तीफा देता है, बल्कि इसमें है कि व्यवस्था चुनौतियों के बीच भी कैसे निरंतरता बनाए रखती है। ब्रिटेन का उदाहरण हमें सीख देता है कि यदि हम अति-संवेदनशीलता और निरंतर दबाव की संस्कृति को बढ़ावा देंगे, तो प्रशासन केवल अगली हेडलाइन को मैनेज करने में ही उलझा रहेगा। भारत के लिए भी यह एक दिशा-दर्शन है कि उत्तरदायी शासन और स्वतंत्र प्रेस के बीच एक ऐसा सेतु बने, जहां सवाल तो बेबाकी से पूछे जाएं, लेकिन सरकार की स्थिरता और राष्ट्र की कार्ययोजना को दांव पर न लगाया जाए। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में छिपी है।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९१ ☆
☆भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
मानसून भारतीय जीवन का केवल एक मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के सुंदर मिलन का पर्व है। वर्षा की पहली फुहार के साथ ही धरती नवजीवन से भर उठती है और वातावरण में हरियाली का संदेश फैलने लगता है। यही कारण है कि पौधारोपण के लिए वर्षाकाल को सबसे उपयुक्त समय माना गया है।
पौधे लगाने से पूर्व भूमि की तैयारी, जैविक खाद का उपयोग तथा स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधों का चयन आवश्यक है। वर्षा का प्राकृतिक जल पौधों की जड़ों को मजबूती देता है और उनके विकास में सहायक बनता है। किंतु पौधारोपण का वास्तविक उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उनकी देखभाल कर उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित रखना है।
भारतीय संस्कृति में भी वर्षा और हरियाली का विशेष महत्व रहा है। सावन, हरियाली अमावस्या, तीज तथा नागपंचमी जैसे पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना को सुदृढ़ करते हैं। हमारे लोकगीतों, लोकपरंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में वृक्षों को जीवनदाता और पुण्य का प्रतीक माना गया है। इस प्रकार मानसून की रिमझिम फुहारें केवल खेतों और बागों को ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी सिंचित करती हैं।
आज आवश्यकता है कि हम वर्षा ऋतु को केवल मौसम परिवर्तन के रूप में न देखें, बल्कि इसे हरियाली बढ़ाने और प्रकृति से अपने संबंधों को मजबूत करने के अवसर के रूप में अपनाएँ। एक पौधा लगाना पर्यावरण संरक्षण का कार्य है, तो उसकी देखभाल करना संस्कृति और संवेदना का निर्वाह। वास्तव में वर्षा, वृक्ष और संस्कृति का यह संगम जीवन को संतुलित, सुंदर और समृद्ध बनाता है।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ अकेले आंगन का बचपन: एकल परिवारों में परवरिश का बदलता सच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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अकेले आंगन का बचपन: एकल परिवारों में परवरिश का बदलता सच
संयुक्त परिवारों के सुरक्षा कवच से डिजिटल स्क्रीन तक: न्यूक्लियर पेरेंटिंग की चुनौतियाँ और समाधान
“दादी, आप हमारे साथ क्यों नहीं रहतीं?”
सात साल की नन्ही अन्वी ने वीडियो कॉल पर पूछा।
दादी मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आँखों में हल्की नमी उतर आई।
“बेटा, तुम्हारे पापा का काम दूसरे शहर में है न।”
“अगर आप यहाँ होतीं तो कितना अच्छा होता। मम्मी ऑफिस जाती हैं, पापा भी व्यस्त रहते हैं। मैं स्कूल से आकर कभी-कभी अकेली हो जाती हूँ।”
दादी कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर बोलीं, “जब तुम्हारे पापा छोटे थे तो घर में इतने लोग होते थे कि उन्हें अकेले रहने का मौका ही नहीं मिलता था।”
अन्वी ने मासूमियत से पूछा, “सच?”
“हाँ बेटा, तब घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन सब साथ रहते थे।”
कॉल समाप्त हो गई, लेकिन यह छोटी-सी बातचीत आज के समय की एक बड़ी सच्चाई को सामने लाती है।
हमारे घर बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन परिवार छोटे होते जा रहे हैं।
सुविधाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन साथ घट रहा है।
और शायद सबसे बड़ा बदलाव बच्चों के बचपन में दिखाई दे रहा है।
एक समय था जब बच्चे केवल माता-पिता के नहीं, पूरे परिवार के होते थे। उनकी शरारतों पर दादी हँसती थीं, गलतियों पर चाचा समझाते थे और उदासी के समय कोई न कोई उनका हाथ थाम लेता था।
सच ही कहा गया है –
“एक बच्चे को बड़ा करने के लिए पूरे गाँव की जरूरत होती है।”
लेकिन आज अधिकांश परिवार न्यूक्लियर हो चुके हैं। माता-पिता और बच्चे – बस यही परिवार की परिभाषा रह गई है।
इस बदलाव ने अनेक सुविधाएँ दी हैं।
माता-पिता अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सकते हैं। बच्चों की शिक्षा, खान-पान और जीवनशैली को अपनी सोच के अनुसार आकार दे सकते हैं। पारिवारिक हस्तक्षेप कम होता है और निजी स्वतंत्रता अधिक मिलती है।
लेकिन हर सुविधा की एक कीमत भी होती है।
न्यूक्लियर परिवारों की सबसे बड़ी चुनौती है – अकेलापन।
बच्चों का भी और माता-पिता का भी।
आज का बच्चा स्कूल से लौटकर अक्सर खाली घर में प्रवेश करता है। उसके स्वागत में दादी की आवाज़ नहीं होती, न चाचा की हँसी और न ही भाई-बहनों की भीड़।
ऐसे में उसके सबसे आसान साथी बन जाते हैं – मोबाइल, टैबलेट और टेलीविजन। धीरे-धीरे स्क्रीन नया परिवार बन जाती है।
यहीं से एक नया संकट जन्म लेता है।
डिजिटल दुनिया बच्चों का समय तो भर देती है, लेकिन भावनात्मक खालीपन नहीं भर पाती।
सोशल मीडिया दोस्ती का भ्रम दे सकता है, लेकिन कंधे पर रखा हुआ स्नेहिल हाथ नहीं दे सकता।
वीडियो गेम उत्साह दे सकते हैं, लेकिन साझा बचपन की यादें नहीं दे सकते।
संयुक्त परिवारों में बच्चे स्वाभाविक रूप से साझा करना सीखते थे। खिलौने भी साझा होते थे और जिम्मेदारियाँ भी। वे अलग-अलग उम्र के लोगों के साथ रहकर धैर्य, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार सीखते थे।
आज कई बच्चों के पास अपने खिलौने बहुत हैं, लेकिन खेलने वाले साथी कम हैं।
यह केवल बच्चों की समस्या नहीं है।
माता-पिता भी एक अलग संघर्ष से गुजर रहे हैं।
आधुनिक जीवन ने उन्हें अनेक भूमिकाएँ दे दी हैं।
वे कमाने वाले भी हैं, शिक्षक भी, मित्र भी, सलाहकार भी और हर समय उपलब्ध रहने वाले अभिभावक भी।
नतीजा यह है कि अनेक माता-पिता मानसिक थकान और तनाव का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञ इसे “पैरेंटल बर्नआउट” कहते हैं। कई बार माता-पिता अपराधबोध से भी घिर जाते हैं।
उन्हें लगता है कि वे बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे।
बच्चों को लगता है कि माता-पिता उन्हें नहीं समझते।
और इस तरह एक ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि संयुक्त परिवार ही एकमात्र समाधान हैं?
शायद नहीं।
समय बदल चुका है। हर परिवार संयुक्त परिवार में नहीं रह सकता। लेकिन संयुक्त परिवारों की कुछ खूबियाँ आज भी अपनाई जा सकती हैं।
सबसे पहले हमें अपने बच्चों के लिए एक “आधुनिक गाँव” बनाना होगा। ऐसा गाँव जहाँ रिश्तेदार न सही, लेकिन भरोसेमंद लोग हों। दादा-दादी दूर रहते हों तो नियमित संवाद हो। पड़ोसी, शिक्षक, कोच और परिवार के मित्र भी बच्चे के जीवन का हिस्सा बनें। बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि उनके जीवन में केवल दो नहीं, कई ऐसे लोग हैं जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं।
दूसरी बात, परिवार के भीतर गुणवत्तापूर्ण समय बढ़ाना होगा। कई बार बच्चों को घंटों का साथ नहीं चाहिए होता।
उन्हें कुछ ऐसे पल चाहिए होते हैं जब माता-पिता पूरी तरह उनके साथ हों।
एक साथ भोजन करना।
दिनभर की बातें सुनना।
सप्ताहांत में पार्क जाना।
रात को सोने से पहले कहानी सुनाना।
ये छोटी बातें बच्चों के मन में सुरक्षा का बड़ा भाव पैदा करती हैं।
तीसरी बात, हमें स्क्रीन को बेबीसिटर बनने से रोकना होगा। तकनीक आवश्यक है, लेकिन वह रिश्तों का विकल्प नहीं बन सकती। बच्चों को किताबों, खेलों, संगीत, प्रकृति और वास्तविक अनुभवों से जोड़ना होगा।
क्योंकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीखें किसी ऐप से नहीं, अनुभवों से मिलती हैं।
अंततः परवरिश केवल बच्चों को बड़ा करने का नाम नहीं है।
यह उनके भीतर आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और जीवन के प्रति भरोसा जगाने की प्रक्रिया है।
संयुक्त परिवारों में यह काम कई हाथ मिलकर करते थे। आज एकल परिवारों में यह जिम्मेदारी कुछ कंधों पर आ गई है।
लेकिन यदि हम रिश्तों का दायरा थोड़ा बढ़ा दें, संवाद को थोड़ा गहरा कर दें और बच्चों को स्क्रीन से अधिक इंसानों से जोड़ दें, तो यह चुनौती अवसर में बदल सकती है।
क्योंकि
बच्चे केवल घरों में नहीं पलते। वे रिश्तों में पलते हैं। और जहाँ रिश्तों की गर्माहट होती है, वहाँ अकेला आँगन भी धीरे-धीरे फिर से खिल उठता है।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय आलेख – “सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना है यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना”)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९☆
☆ आलेख –सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना है यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो हमें दुनिया भर के लोगों से जुड़ने, जानकारी साझा करने और अपनी राय रखने की अनुमति देता है. यह एक शक्तिशाली उपकरण है जिसका उपयोग अच्छे और बुरे दोनों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग हमारी रचनात्मकता को खत्म कर सकता है.
सोशल मीडिया पर हम हर समय नई चीजें देख रहे होते हैं. हम दूसरों की पोस्ट देख रहे होते हैं, हम उनके विचारों और राय पढ़ रहे होते हैं, और हम उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. यह सब इतना अधिक हो सकता है कि हमें खुद के विचारों और राय उत्पन्न करने का समय नहीं मिलता है. हम दूसरों के विचारों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि हम अपनी रचनात्मकता को खो देते हैं.
सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग हमारी एकाग्रता को भी प्रभावित करता है. जब हम सोशल मीडिया पर होते हैं, तो हम लगातार नए अपडेट देखने के लिए स्क्रॉल करते रहते हैं. इससे हमारा ध्यान भंग होता है और हम अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं. यह हमारी रचनात्मकता को भी प्रभावित करता है क्योंकि हम नए विचारों को उत्पन्न करने में सक्षम नहीं होते हैं.
यदि आप अपनी रचनात्मकता को बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करने की आवश्यकता है. आपको अपने समय को उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो आपको रचनात्मक बनाती हैं, जैसे कि पढ़ना, लिखना, चित्र बनाना, या संगीत सुनना. आपको सोशल मीडिया पर केवल उन समयों पर जाना चाहिए जब आपको वास्तव में इसकी आवश्यकता हो.
यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सोशल मीडिया आपकी रचनात्मकता को खत्म कर सकता है:
जब आप सोशल मीडिया पर होते हैं, तो आप लगातार नए अपडेट देखने के लिए स्क्रॉल करते रहते हैं. इससे आपका ध्यान भंग होता है और आप अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं.
सोशल मीडिया पर आप हर समय नई चीजें देख रहे होते हैं. आप दूसरों की पोस्ट देख रहे होते हैं, आप उनके विचारों और राय पढ़ रहे होते हैं, और आप उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. यह सब इतना अधिक हो सकता है कि आपको खुद के विचारों और राय उत्पन्न करने का समय नहीं मिलता है. आप दूसरों के विचारों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि आप अपनी रचनात्मकता को खो देते हैं.
सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग आपके तनाव और चिंता को भी बढ़ा सकता है. जब आप सोशल मीडिया पर होते हैं, तो आप लगातार दूसरों की तुलना कर रहे होते हैं. आप देख रहे होते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, वे क्या खरीद रहे हैं, और वे कहां जा रहे हैं. यह आपको असुरक्षित और तनावग्रस्त महसूस करा सकता है.
यदि आप अपनी रचनात्मकता को बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करने की आवश्यकता है. आपको अपने समय को उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो आपको रचनात्मक बनाती हैं, जैसे कि पढ़ना, लिखना, चित्र बनाना, या संगीत सुनना. आपको सोशल मीडिया पर केवल उन समयों पर जाना चाहिए जब आपको वास्तव में इसकी आवश्यकता हो.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रोंगटे ||“।)
अभी अभी # १०२९ ⇒ आलेख – || रोंगटे || श्री प्रदीप शर्मा
(GOOSE BUMPS)
हमारा शरीर भी विचित्र है। हमारी त्वचा में असंख्य रोमकूप हैं। जो भक्त होते हैं, उनके रोम रोम में राम व्याप्त होते हैं। हम जब अनजाने में, तनिक से स्पर्श से सिहर उठते हैं, तो ये भी अपनी अपनी हैसियत के अनुसार सक्रिय हो जाते हैं। इन्हें हम रोएँ भी कहते हैं।
हमारे रोमांच में रोम का बड़ा हाथ होता है। Rome was not built in a day.
भारतीय नाट्य शास्त्र में केवल भाव भंगिमा से ही मन में उत्पन्न सभी भावों का सजीव चित्रण किया जाता है। चेहरे पर संचारी भावों का सफलतापूर्वक प्रदर्शन ही तो नृत्य है। जिनमें श्रृंगार, शांत, भय, रौद्र, वीर और वीभत्स रस भी शामिल है। कहीं नटवर है तो कहीं नटराज। वैसे भी तांडव नृत्य मंच पर ही देखना अच्छा लगता है।।
हम भी अजीब हैं। जब हमें गुस्सा आता है, तो हमारे तेवर देखिए और जब हम खुद डर जाते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मानो उन्हें कक्षा में मास्टर जी ने जोर से डांटकर फटकारा हो, ऐ मिस्टर तुम ! खड़े हो जाओ। स्कूल में क्या नींद निकालने के लिए आते हो।
ये रोंगटे भी अजीब हैं। यूँ तो आराम से सोते रहेंगे, लेकिन जरा भी खतरे की घंटी बजी, तो खड़े हो जाते हैं, जैसे अफसर की घंटी से बाहर स्टूल पर ऊंघता चपरासी झट से आया साहब कहता हुआ खड़ा हो जाता है।।
क्या डर के मारे खड़े हुए रोंगटे किसी मास्टर जी के आदेश की प्रतिक्षा करते रहते हैं, कि ठीक है, बैठ जाओ, या खड़े ही रहते हैं। यह भी एक पहेली ही है। पहेली तो वैसे यह भी है कि ये संख्या में कितने हैं और इनकी आपस में एकता देखिए, मुसीबत में, या भय की स्थिति में, सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। और जब संकट टल जाता है, तब सभी निश्चिंत होकर एक साथ चैन से बैठ जाते हैं।
आप भी कभी डरे होगे, आपके भी रोंगटे खड़े होते होंगे। कभी इनसे बात कीजिए, इनके हालचाल पूछिए। आप कैसे हैं मिस्टर रोंगटे ! इनकी संख्या कितनी है और ये शरीर में कहाँ कहाँ विराजमान हैं, इन्हें कोई तकलीफ तो नहीं?