हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विलोम ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विलोम ? ?

विद्यालय में विलोम का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाया था। फिर जीवनभर पढ़ना पड़ा विलोम का पाठ।

जिससे सुख की आस रही, उसने पीड़ा दी। जिस पर विश्वास किया, उसने विश्वासघात किया। जिनसे अपनापन अपेक्षित था, वे व्यवहार करते रहे परायों-सा। जीने ने भी साथ नहीं दिया, सो मर-मरकर जिया।

सचमुच मरा तब तक विलोम को जीता रहा वह।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️💥 श्री महावीर साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जवेगी।आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 245 ☆ अनुभवों से जुड़ें… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अनुभवों से जुड़ें। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 245 ☆ अनुभवों से जुड़ें

गुजरते वक्त की आहट

सुनायी दे रही है।

कही अनकही अनायास

दिखायी दे रही है।।

*

अंदाज बदल जाता है

जब कभी विवादो से।

बात सुधरती जाती है

तब केवल संवादों से।।

*

नासमझ बन जीते रहो

पर याद करना सदा।

भूलते हो भूल जाओ

पर पीर हरना सदा।।

*

फूल संग शूल मिलेंगे

बात यही सच्ची है।

कर्म करते चले जाओ

सीख यही अच्छी है।।

जीत के मूल मंत्र के साथ चलते रहने वाला कभी हारता नहीं है, बस सबको साथ लेकर चलना आना चाहिए। वक्त एक न एक दिन अपने अनुरूप सभी को ढाल लेता है जो जल्दी समझते हैं, वही सुखी रहते हैं। मानव मन सदा से यात्रा प्रेमी रहा है, उसे नए लोगों का साथ, नया परिवेश, नयी बोली, भाषा, पानी सभी कुछ चाहिए जिससे अपनी अनवरत यात्रा के दौरान वैचारिक पोटली को विस्तारित कर सके। चार धाम, पहाड़ों की सैर, नर्मदा परिक्रमा, नदियों में स्नान, तीर्थ स्थलों के दर्शन, पुरातत्व से जुड़े स्थान, ऐतिहासिक इमारतें आदि को समझना, जानना व इनसे सीखना।

जिज्ञासा से सीखने की प्रेरणा मिलती है। आइए मिलकर देश दुनिया को जाने समझे और उन्नत बनाने में सहयोग करें।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 693 ⇒ अपना देस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना देस ।)

?अभी अभी # 693 ⇒ अपना देस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे राष्ट्र में महाराष्ट्र भी है और गुजरात प्रदेश में सौराष्ट्र भी! एक देश के वासी होते हुए भी सबका अपना अपना देस है। बरसों से लोग रोजी रोटी के लिए, देस को छोड़ परदेस जाते रहे हैं। जिसे हम आज प्रदेश कहते हैं, उसका ही अपभ्रंश है यह देस।

जब लड़की की शादी के बाद बिदाई होती है तो अमीर खुसरो का यह विदाई गीत महिलाएं गाती हैं ;

काहे को ब्याहे बिदेस,

अरे लखिय बाबुल मोरे,

काहे को ब्याहे बिदेस

‌आखिर तब देस होता ही कितना छोटा था!

‌ये गलियां ये चौबारा

यहां आना ना दोबारा।

पनघट और अमराई और सावन के झूले, बचपन के संगी साथी जब छूटते थे, तो मन बरबस कह उठता था;

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना

ये घाट, ये बाट कहीं भूल न जाना।

निरगुन कौन देस को बासी!

देस वह स्थान है, जहां हम पैदा हुए, बड़े हुए, खेले कूदे। हम जिस नदी में नहाए, हमने जिस कुएं का पानी पीया, ज़िन्दगी भर आप चाहो तो उसे भूल जाओ, आखरी समय वह जरूर याद आता है।

ऐसा माना गया है कि जब हम देह त्यागते हैं तो हमें अपने बचपन की तस्वीरें खुली आंखों से दिखाई देती हैं। हमारे परिवार के वे वरिष्ठ जन, जिनकी गोद में आपने बचपन गुज़ारा है, आपको पुकार रहे हैं। लोग समझते हैं, आप भावुक होकर प्रलाप कर रहे हैं। लेकिन अंतिम समय में अतीत ही साथ जाता है, वर्तमान से नाता टूट जाता है।

उड़ जाएगा हंस अकेला।

जग दर्शन का मेला।।  

हम कितना भी देश विदेश में प्रवास कर लें। रोजी रोटी किस इंसान को कहां फेंकती है, कुछ कहा नहीं जाता। होते हैं कई बदनसीब, जो वापस अपने देस नहीं लौट पाते। जिन्हें अपनी माटी से लगाव होता है, वे हमेशा उस पल की तलाश में रहते हैं, जब वे एक बार फिर अपने जन्म स्थान के दर्शन कर लें।

माटी से यह लगाव, माटी की उस खुशबू का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। आखिर यह तन ही तो हमारा वतन है। जिस माटी से पैदा हुआ है, उसे उसमें ही मिल जाना है। हम इस माटी का कर्ज चुका पाएं, उसे अंतिम प्रणाम कर पाएं, शायद इसीलिए माटी का मोह हर अमीर गरीब को, मजदूर किसान को अंतिम समय में, सैकड़ों मील दूर, अपने देस की ओर खींचता है, आकर्षित करता है।।  

आप एक नन्हे बालक से उसका खिलौना छीनकर देखिए। उसे पैसे का, सोने चांदी का लालच देकर देखिए। एक मिट्टी के खिलौने में उसकी जान बसी है। वह उसके साथ उठता, बैठता, सोता खाता है। उसका खिलौना टूटता है, वह मचल जाता है। उसकी दुनिया बिखर जाती है।

इंसान की दुनिया भी जब एक बार बिखर जाती है, तो उसे समेटना इतना आसान नहीं होता। आज हर जगह सब बिखरा बिखरा सा है। इसे समेटना, संभालना, संवारना बहुत ज़रूरी है। केवल भरोसा और विश्वास ही हमें वापस अपनी माटी से जोड़ सकता है, हमें बिखरने से बचा सकता है। शायद तब ही जो दर्द की सरगम हमें सुनाई दे रही है वह थमेगी। कहीं कोई अभागा फिर यह दर्द भरा गीत गाने को विवश ना हो ;

हम तो चले परदेश

हम परदेसी हो गए

छूटा अपना देस

हम परदेसी हो गए

ओ रामा हो ….!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 692 ⇒ रायता… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रायता।)

?अभी अभी # 692 ⇒ रायता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक वक्त था, जब हम रिसेप्शन में नहीं, किसी के यहाँ जीमने जाते थे। हमें प्रयोजन से कोई मतलब नहीं होता था, बस कहाँ जीमने जाना है, इससे ही काम चल जाता था। किसी विप्र को भोजन का न्यौता मिलने पर वह सूँघने अथवा चखने नहीं जाता था, वह जीमने जाता था, और तबीयत से जीमकर आता था।

पत्तल के साथ जब दोने रखे जाते थे, तब दोनों की संख्या से ही पता चल जाता था कि आलू की रसेदार सब्जी के साथ खीर और रायता है कि नहीं। पत्तल और तीनों दोनों को, हवा से बचाने की ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए, किसी मोटी गर्म पूड़ी और लड्डू को पेपर वेट की तरह इस्तेमाल किया जाता था। आँधी, तूफान और बरसात के अलावा हर मौसम में पत्तल-दोने, परोसे हुए पकवानों के साथ सुरक्षित हाथों में होती थी।।

जब तक खीर नहीं परोसी जाती, जीमने की प्रक्रिया आरंभ नहीं होती थी। केवल एक लड्डू परोसने पर उसे दो लड्डू धरने की हिदायत दी जाती थी। सेंव और नुक्ती पत्तल के किसी भी कोने में हों, उनका आपस में मिलन हो ही जाता था। खीर के बारे में, परोसने वाले को, स्थायी अनुदेश थे, कि जब भी खीर का दोना खाली देखे, पूछे नहीं, चुपचाप भर जाया करे।

फूटे दोनों की शिकायत आम रहती थी। खीर तो तुरंत उदरस्थ हो जाती थी, रायते को उपसंहार के लिए रखा जाता था। किसे पता था कि रसेदार सब्जी और खीर भले ही ढुल जाए, आसमान सर पर टूटकर नहीं गिरने वाला, लेकिन अगर एक बार रायता फैल गया, तो कुछ न कुछ तो होने वाला ही है।।

आम तौर से पंगत का रायता बूंदी का रायता होता था। बूंद जो बन गई नुक्ती ! यानी उसी बेसन की बूँदी पर जब चीनी की चाशनी चढ़ जाती थी, तो वह नुक्ती कहलाती थी। नुक्ता-चीनी, नुक्ती वाली चीनी की ही शायद चचेरी बहन लगती है। लेकिन बड़ी कर्कश प्रतीत होती है।

समय के साथ रायते का प्रमोशन हो गया ! यह घरों और पंगत से उठकर बड़ी बड़ी होटलों और प्रीति-भोजों में अपना आसन जमाने लगा। फ्रूट सलाद और कस्टर्ड से जब इसका विवाद होने लगा, तो जगह जगह रायता फैलने लगा। नौबत यहाँ तक आ गई कि जहाँ रायता मौजूद ही नहीं रहता, वहाँ भी रायता फैलने लगा।।

आज रायता, दोनों से निकलकर सुरक्षित कटोरियों में पहुँच गया है, जिसमें न तो दोने की तरह छेद है और न ही किसी आँधी तूफान का डर, लेकिन रायता फैलाने वाले फिर भी रायता फैलाकर चले जाते हैं।

इन दिनों रायता बहुत परेशान है ! घर परिवार हो या राजनीति, इतने सात्विक, स्वास्थ्य-वर्धक आहार को जब लोग व्यवहार में लाकर उसे खाने के बजाए फैलाने लगेंगे, तो वह अपना दायित्व झोल्या अथवा जलजीरा को सौंपकर अपना अस्तित्व ही समाप्त कर देगा। उसकी आप सबसे करबद्ध गुजारिश है कि आप रायता खाएँ ज़रूर, एक नहीं चार-पाँच दोने-कटोरे सूत जाएँ, लेकिन रायता फैलाएं नहीं। उम्मीद है आज के रोज, जब आप बूंदी के लड्डू के साथ रायते का सेवन करेंगे, अनावश्यक रायता फैलाएंगे नहीं।।

 ♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 133 – देश-परदेश – अंतरराष्ट्रीय मधुमक्खी दिवस: 20 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 133 ☆ देश-परदेश – अंतरराष्ट्रीय मधुमक्खी दिवस: 20 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज के दिन पूरा विश्व मधुमक्खी दिवस मनाता हैं। हमें मधुमक्खियों से बचपन से ही बहुत अधिक डर लगता है, तो विचार किया लिखने से शायद कुछ डर कम हो जायेगा।

मधुमक्खियों को सबसे पहले अपने नाम से ही कठिनाई है। होनी भी चाहिए, अज्ञानी लोग उनको साधारण काली वाली मक्खी के कुनबे की समझते है। ये वो मक्खियां है, जो गंदगी और दूषित स्थानों पर भी प्रसन्न रहती हैं। दूसरी तरफ मधुमक्खी तो स्वयं सुगंधित फूलों का रसपान कर उनकी खुशबू और मिठास को मधु का रूप दे देती हैं। इसको शहद मक्खी तो नहीं कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा दिया जाने वाला मधु अमृत तुल्य है।

हिन्दू धर्म में पूजा के समय इसका प्रयोग ही किया जाता हैं। इसको “कुदरत की नियामत” भी कहा जा सकता हैं। आयुर्वेद में भी मधु की महत्ता खूब बताई गई है।

मुम्बई प्रवास के समय हमारी परिसर में मधुमक्खी का बहुत बड़ा छत्ता लगा हुआ था। एक दिन दो व्यक्ति आए और बोले कि जिसको भी इस छत्ते का शहद चाहिए वो बहुत कम कीमत पर वहां रहने वालों को विक्रय कर देंगे जोकि उनकी मजदूरी कहलाएगी।

जब छत्ता तोड़ने की प्रक्रिया आरंभ हुई सभी निवासियों ने घर की खिड़कियों को सुरक्षा कारणों से बंद कर लिया। उनके द्वारा बेचा गया शहद नकली था, असली शहद वो अपने साथ ले गए। लोग कहने लगे ये तो हाथ की सफाई है। ये मुहावरा भी सही बना है, कि मधुमक्खी के छत्ते में हाथ नहीं डालना चाहिए। अब समय बदल गया है, मधुमक्खी  पालन एक बहुत कमाऊ उद्योग बन चुका है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 691 ⇒ कल और आजकल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कल और आजकल ।)

?अभी अभी # 691 ⇒ कल और आजकल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज कल में ढल जरूर जाता है लेकिन फिर वह आज नहीं रह जाता। आज गुजर जाता है, कल वह फ्रेश होकर आता है और आज बन जाता है। कल को आज बनने के लिए कल तक का इंतजार करना पड़ता है। आज को जाने की जल्दी नहीं, लेकिन कल को तो आने की जल्दी है।

आजकल कल और आज एक जैसे ही चल रहे हैं, इसलिए किसी को कल का इंतजार नहीं। बस आज किसी तरह गुजर जाए।

वैसे देखा जाए तो कल भी कल ही था और कल भी कल ही होगा। बस यह हमारा जो आज है न, यह ही कलकल करके बहता रहता है और हम इसे आज का नाम दे देते हैं। समय का प्रवाह भी एक झरना ही तो है। जिस दिन यह समय का झरना सूख जाएगा, आज कल में ढलना बंद हो जाएगा। ईश्वर की टकसाल भी बंद हो जाएगी।।

हम समय से हैं, समय हम से नहीं ! समय का झरना, सूर्य का उदित होना अस्त होना है वृक्ष पर पत्तियों का उगना, पल्लवित होना, फलना फूलना और समय के साथ झरना भी है, लेकिन तब तक, आज की कोमल पत्तियां कल पुनः वृक्ष को हरा भरा कर देगी। प्रकृति के विनाश में ही नीड़ के निर्माण के बीज भी हैं। हर कली में एक फूल है, हर अंडे में एक चूजा, समय का झरना कभी नहीं सूखता। इसके कलकल की आवाज ही इसका कल था, इसका आज है और इसका कल भी रहेगा।

हमने कभी अतीत की, यानी गुजरे कल की चिंता नहीं की, केवल चिंतन किया। अच्छा बुरा जैसा भी था, व्यतीत हो गया। लेकिन हमें आज की चिंता है और कल आने वाले कल की भी। जब हमारा आज अच्छा होता है, तो हम कल की तरफ से निश्चिंत रहते हैं। लेकिन जब आज ही गड़बड़ होता है, तो कल में भी गड़बड़ी नजर आती है। पूत के पांव पालने में।।

लेकिन यह अच्छी बात नहीं है सबै दिन न होता एक समाना ! रहने दीजिए अटल जी। एक साल से देख रहे हैं, हर दिन एक जैसा गुजर रहा है। याद कीजिए आपने भी आपातकाल में जेल से एक कविता लिखी थी, जिसे बाद में जगजीत सिंह ने गाया था, एक बरस बीत गया ;

झुलसाता जेठ मास

शरद चांदनी उदास

सिसकी भरते सावन का

अंतर्मन रीत गया

एक बरस बीत गया …

हमें भी एक बरस बीत गया। आपकी तो अभिव्यक्ति की आजादी छिनी थी, हमारे तो मुंह पर ही पट्टी बांध दी गई है। हमने भी प्यासा सावन देखा है और झुलसाता जेठ मास देखा है। हमारे अंतर्मन में भी कोई लड्डू नहीं फूट रहे। किसको दोष दें, सरकार को, या उस अलबेली सरकार को। हम भी बरबस, यह कह उठते हैं ;

आज कल में ढल गया

दिन हुआ तमाम

तू भी सो जा, सो गई

रंग भरी शाम ….

अतीत गवाह है, अगर रामायण के प्रसंग में से प्रभु श्रीराम के चौदह बरस निकाल दिए जाएं, तो रामायण में कुछ बचे ही नहीं न अंगद, न बाली, न सुग्रीव और ना ही रामदूत बजरंग बली। न रावण का वध होता और न हम दशहरा और दीपावली जैसा उत्सव मनाते ;

तेरे फूलों से भी प्यार,

तेरे कांटों से भी प्यार।

तू जो भी देना चाहे,

दे दे करतार,

दुनिया के पालनहार।।

झरने की तरह कलकल करते कल भी गुजरा, आज भी गुजर जाएगा, उम्मीद की कली फिर खिलेगी, आशाओं का एक नया सूरज निकलेगा, बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आएंगी। कल आने वाला कल, आज से बेहतर होगा। आजकल समय भी उम्मीद से है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 290 – उड़ जाएगा हंस अकेला ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 290 उड़ जाएगा हंस अकेला… ?

आनंदलोक में विचरण कर रहा हूँ। पंडित कुमार गंधर्व का सारस्वत कंठ हो और दार्शनिक संत कबीर का शारदीय दर्शन तो इहलोक, आनंदलोक में परिवर्तित हो जाता है। बाबा कबीर के शब्द चैतन्य बनकर पंडित जी के स्वर में प्रवाहित हो रहे हैं,

उड़ जाएगा हंस अकेला

जग दर्शन का मेला…!

आनंद, चिंतन को पुकारता है। चिंतन की अंगुली पकड़कर विचार हौले-हौले चलने लगता है। यह यात्रा कहती है कि ‘मेल’ शब्द से बना है ‘मेला।’ मिलाप का साकार रूप है मेला। दर्शन जगत को मेला कहता है क्योंकि मेले में व्यक्ति थोड़े समय के लिए साथ आता है, मिलाप का आनंद ग्रहण करता है, फिर लौट जाता है अपने निवास। लौटना ही पड़ता है क्योंकि मेला किसीका निवास नहीं हो सकता। गंतव्य के अलावा कोई विकल्प नहीं।

विचार अब चलना सीख चुका। उसका यौवनकाल है। उसकी गति अमाप है। पलक झपकते जिज्ञासा के द्वार पर आ पहुँचा है।  जिज्ञासा पूछती है कि महात्मा कबीर ने ‘हंस’ शब्द का ही उपयोग क्यों किया? वे किसी भी पखेरू के नाम का उपयोग कर सकते थे फिर हंस ही क्यों? चिंतन, मनन समयबद्ध प्रक्रिया नहीं हैं। मनीषी अविरत चिंतन में डूबे होते हैं। समष्टि के हित का भाव ऐसा, सात्विकता ऐसी कि वे मुमुक्षा से भी ऊपर उठ जाते हैं। फलत: जो कुछ वे कहते हैं, वही विचार बन जाता है। अपने शब्दों की बुनावट से उपरोक्त रचना में द्रष्टा कबीर एक अद्वितीय विचार दे जाते हैं।

विचार कीजिएगा कि हंस सामान्य पक्षियों में नहीं है। हंस श्वेत है, शांत वृत्ति का है। वह सुंदर काया का स्वामी है। आत्मा भी ऐसी ही है, सुंदर, श्वेत, शांत, निर्विकार। हंस गहरे पानी में तैरता है तो हज़ारों फीट ऊँची उड़ान भी भरता है। आकाश मार्ग की यात्रा हो अथवा वैतरणी पार करनी हो, उड़ना और तैरना दोनों में कुशलता वांछनीय है।

हंस पवित्रता का प्रतीक है। शास्त्रों में हंस की हत्या, पिता, गुरु या देवता की हत्या के तुल्य मानी गई है।

हंस विवेकी है। लोकमान्यता है कि दूध में जल मिलाकर हंस के सामने रखा जाए तो वह दूध और जल का पृथक्करण कर लेता है। संभवत:  ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ मुहावरा इसी संदर्भ में अस्तित्व में आया। हंस के नीर-क्षीर विवेक का भावार्थ है कि स्वार्थ, सुविधा या लाभ की दृष्टि से नहीं अपितु अपनी बुद्धि, मेधा, विचारशक्ति के माध्यम से उचित, अनुचित को समझना। मनुष्य जब भी कुछ अनुचित करना चाहता है तो उसे चेताने के लिए उसके भीतर से ही एक स्वर उठता है। यह स्वर नीर-क्षीर विवेक का है, यह स्वर हंस का है। हंस को माँ सरस्वती के वाहन के रूप में मिली मान्यता अकारण नहीं है।

कारण-मीमांसा से उपजे अर्थ का कुछ और विस्तार करते हैं। दिखने में हंस और बगुला दोनों श्वेत हैं। मनुष्य योनि हंस होने की संभावना है। विडंबना है कि इस संभावना को हमने गौण कर दिया है।  हम में से अधिकांश बगुला भगत बने जीवन बिता रहे हैं। जीवन के हर क्षेत्र में बगुला भगतों की भरमार है। हंस होने की संभावना रखते हुए भी भी बगुले जैसा जीना, जीवन की शोकांतिका है।

मनुष्य को बुद्धि का वरदान मिला है। इस वरदान के चलते ही वह नीर-क्षीर विवेक का स्वामी है। विवेक होते हुए भी अपनी सुविधा के चलते ढुलमुल मत रहो। स्पष्ट रहो। सत्य-असत्य के पृथक्करण का साहस रखो। यह साहस तुम्हें अपने भीतर पनपते बगुले से मुक्ति दिलाएगा, तुम्हारा हंसत्व निखरता जाएगा। जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य जी कहते हैं कि महर्षि वेदव्यास जब महाभारत का वर्णन करते हैं तो पांडवों का उदात्त चरित्र उभरता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे पांडवों के प्रवक्ता हैं। सनद रहे कि महर्षि वेदव्यास सत्य के प्रवक्ता हैं।

अपनी एक कविता स्मृति में कौंध रही है,

मेरे भीतर फुफकारता है

काला एक नाग,

चोरी छिपे जिसे रोज़ दूध पिलाता हूँ,

ओढ़कर चोला राजहंस का

फिर मैं सार्वजनिक हो जाता हूँ…!

दिखावटी चोले के लिए नहीं अपितु उजला जीवन जिओ अपने भीतर के हंस के लिए। स्मरण रहे, वह समय भी आएगा जब हंस को उड़ना होगा सदा-सर्वदा के लिए। इस जन्म की अंतिम उड़ान से पहले अपने हंस होने को सिद्ध कर सको तो जन्म सफल है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️💥 श्री महावीर साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जवेगी। आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 690 ⇒ सपनों के सौदागर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सपनों के सौदागर ।)

?अभी अभी # 690 ⇒ सपनों के सौदागर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम नींद में सपने देखते हैं, जब हमारा मन सो जाता है और अवचेतन मन जाग उठता है। उसका काम ही सपने देखना है, जिसका हमारे चेतन संसार से कोई लेना देना नहीं होता। सपने सभी देखते हैं, कुछ भूल जाते हैं, तो कुछ याद रह जाते हैं। हमारे सपनों पर केवल हमारे अवचेतन मन का अधिकार होता है।

कोई दूसरा व्यक्ति आपके सपनों को नहीं देख सकता। सभी सपनों का कॉपीराइट आपके ही पास होता है। सपनों को कोई ना तो चुरा सकता है और ना ही उन पर डाका डाल सकता है, क्योंकि नींद खुलते ही सभी सपने अदृश्य हो जाते हैं।

अक्सर लोग हमारी नींद चुरा लेते हैं, यानी एक तरह से सपने देखने में बाधा पहुंचा सकते हैं, लेकिन हमारे सपनों तक उनकी कभी पहुंच नहीं हो सकती। फिर भी होते हैं कुछ लोग, जो सपनों के सौदागर कहलाते हैं और हमें सच्चे झूठे सपने बेचा करते हैं।

जो काम स्वप्न में भी संभव नहीं हो सकता, उसके वे खुली आँखों से सपने दिखाते हैं।।

हम जानते हैं, सपने कभी सच नहीं होते, फिर भी इन सपनों के सौदागरों के हाथ अपना वर्तमान और भविष्य सौंप देते हैं। सपने देखना अपराध नहीं, लेकिन किसी के द्वारा दिखाए मीठे मीठे सपनों पर भरोसा कर लेना केवल मूर्खता ही नहीं, ईश्वर की नियति के साथ खिलवाड़ करने का गंभीर अपराध भी है।

बहुत देख लिए हमने इन सपनों के सौदागरों द्वारा दिखाए गरीबी हटाने, भ्रष्टाचार मिटाने और रामराज्य वापस लाने के सपने। अब तो हमारी आँखें खुल जानी चाहिए। यह जानते हुए भी कि कभी सपने सच नहीं होते, खुली आंखों से दिखाए सपनों से हमें सावधान रहना होगा।।

केवल हमारा संयुक्त प्रयास ही हमारी सभी समस्याएं दूर कर सकता है, कोई सौदागर जादू की छड़ी घुमाकर अथवा झूठे सपने दिखाकर अब हमें बहला फुसला और बहका नहीं सकता है। सपनों और सपनों के सौदागरों से कोसों दूर रहें और केवल अपनी बुद्धि, विवेक, पुरुषार्थ एवं सुधार के लिए केवल सामूहिक प्रयासों पर ही यकीन करें।

उम्मीद है यह कोई सपना नहीं होगा, हमारे बीच में कोई सपनों का सौदागर नहीं होगा, क्योंकि हम पूरी तरह से नींद से जाग चुके हैं, पूरी तरह से होश में आ चुके हैं, अलविदा हमारे सपने और सपनों के सौदागर।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 689 ⇒ मस्त नज़र की कटार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मस्त नज़र की कटार।)

?अभी अभी # 689 ⇒ मस्त नज़र की कटार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आपने शायद तलत का यह गीत सुना हो ;

आँखों में मस्ती शराब की काली ज़ुल्फ़ों में आँहें शबाब की।

जाने आई कहाँ से टूट के मेरे दामन में पंखुड़ी गुलाब की। ।

यानी संक्षेप में, मस्त नज़र की बात हो रही है। अरे भाई, ईश्वर ने सबको दो आँखें दी हैं, आंखों का काम देखने का है, लेकिन यहां तो कोई नजरों से शिकार कर रहा है तो कोई नज़रों से ही शराब पिला रहा है। देखिए हमारे बोंगाली मोशाय हेमंत कुमार को;

ज़रा नज़रों से कह दो जी

निशाना चूक ना जाए।

मज़ा जब है,

तुम्हारी हर अदा

कातिल ही कहलाए …

क्या आपने कभी किसी की मस्त नजर देखी है। क्या आपको यकीन होता है कि अगर आपने दिन में काजल लगाया हो, तो रात हो जाएगी। देखिए कैसे कैसे लोग पड़े हैं ;

काजल वाले नैन मिला के कर डाला बेचैन

किसी मतवाली ने। ।

अरे रे रे लूट लिया रे

झाँझर वाली ने। ।

भगवान नज़र सबको देता है, लेकिन मस्त नज़र कहां सबको नसीब होती है। इधर एक हम हैं, हमारी तो बचपन से ही कमजोर नजर है। हमारी नज़रों पर कोई शायर गीत नहीं लिखेगा। नजर तो उस शायर की भी कमज़ोर है। वह भी चश्मा लगाकर ही ऐसे गीत लिखता होगा ;

तुम्हारी मस्त नज़र,

अगर इधर नहीं होती।

नशे में चूर फ़िज़ा

इस क़दर नहीं होती। ।

हमें तो यह मस्त नजर का नशा नहीं लगता। बस थोड़ी चढ़ गई तो शायर साहब को फ़िज़ा भी नशे में चूर नजर आने लगी। ।

क्या आपके पास इन साहबान का कोई इलाज है ;

मैं हूं साक़ी तू है शराबी-शराबी -२

तूने आँखों से पिलाई वो नशा है के दुहाई

हर तरफ़ दिल के चमन में फूल खिले हैं गुलाबी-गुलाबी

मैं हूँ साक़ी …

हमारे धरम पाजी की तो बस पूछिए ही मत। उनकी मस्ती को किसी की नज़र ना लगे, शराब की भी नहीं ;

छलकाएं जाम

आइये आपकी आँखों के नाम

होंठों के नाम।

फूल जैसे तन के जलवे,

ये रँग-ओ-बू के

आज जाम-ए-मय उठे,

इन होंठों को छूके

लचकाइये शाख-ए-बदन, लहराइये ज़ुल्फों की शाम

छलकाएं जाम …

लेकिन कोई चंद्रमुखी अगर आपकी आंखों की नींद और चैन भी चुराकर ले जाए, तब तो यह एक गंभीर मामला बनता है ;

नैन का चैन चुराकर ले गई

कर गई नींद हराम। चन्द्रमा सा मुख था उसका चन्द्रमुखी था नाम। ।

यानी यहां तो नाम और हुलिया भी बयान किया गया है। लेकिन जब मस्त नज़रों से घायल और लुटा हुआ आशिक ही कोई शिकायत नहीं कर रहा हो तो समझिए गई भैंस पानी में। यकीन ना हो तो देखिए ;

शरबती तेरी आँखों की

झील सी गहराई में

मैं डूब डूब जाता हूँ …..

हम तो आखिर में यही कहेंगे ;

मेरी प्यास का कोई हिसाब नहीं

तेरी मस्त नज़र का जवाब नहीं

इसी मस्त नज़र से पिलाए जा

मेरे सामने जाम रहे ना रहे

तेरा, हुस्न रहे मेरा

इश्क़ रहे

तो ये सुबहो ये शाम

रहे ना रहे।

रहे प्यार का नाम जमाने में

किसी और का नाम

रहे ना रहे ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 688 ⇒ मृत्यु से साक्षात्कार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मृत्यु से साक्षात्कार।)

?अभी अभी # 688 ⇒ मृत्यु से साक्षात्कार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मौत को किसने देखा है ! बिना मरे स्वर्ग तो बहुत दूर की बात है, मृत्यु से तो साक्षात्कार के लिए भी मरना पड़ता है। ऐसी किसकी गरज है कि सिर्फ साक्षात्कार के लिए मरना पड़े। मरने दो, नहीं करना हमें मृत्यु से साक्षात्कार।

अच्छा, ईश्वर से साक्षात्कार करना चाहोगे ? वाह, क्यों नहीं ! ये हुई न बात। कब करवा रहे हो। लेकिन ईश्वर कहीं मौजूद हो तो उससे साक्षात्कार करवा दें, उसका भी कोई पता नहीं। ईश्वर से साक्षात्कार के लिए कोई गुरु के पास जा रहा है, कोई जंगल, पहाड़, वन वन, बाबा बन, भटक रहा है, सब ईश्वर को ढूंढ रहे हैं। सबको ईश्वर का साक्षात्कार चाहिए। जिंदगी भर ईश्वर को ढूंढते रहे, जब ईश्वर कहीं नहीं मिला, तो ईश्वर को प्यारे हो गए। पहले मृत्यु से साक्षात्कार हुआ, ईश्वर अभी कतार में हैं।।

हमने न तो मृत्यु को देखा और न ही ईश्वर को ! लेकिन कभी ईश्वर को याद करते हैं तो कभी मृत्यु से डरते हैं। ईश्वर को पाने के लिए तो हमें प्रयत्न करना पड़ता है।

बिना मनुष्य जन्म लिए, ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती लेकिन मृत्यु कितनी सहज है, बिना मांगे ही मिल जाती है। हम जो चाहते हैं, वह हमें कब मिला है। हम मौत को गले नहीं लगाना चाहते। हम चाहते हैं, ईश्वर हमें गले लगाए। हम ईश्वर के ही तो बालक हैं। फिर भी इतनी दूरी, और मौत, कितनी करीब ! मानो कह रही हो, आ गले लग जा।

कौन लगाता है, मौत को हंसते हंसते गले। खुद ही हमारे गले पड़ती है। मानो कोई स्वयंवर चल रहा हो। जिसके गले में उसने वरमाला डाली, उसे मौत ने वर लिया। लो हो गया मौत से साक्षात्कार। कितना पवित्र संस्कार ! उसने आपको चुना है, आपको वरा है। लेकिन आप सुखी नहीं। मुझे अभी मृत्यु से साक्षात्कार नहीं करना। पहले एक बार ईश्वर से साक्षात्कार हो जाए, तो मैं मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लूंगा। और उधर उपनिषद कह रहा है, जिसने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली, उसे ईश्वर का साक्षात्कार हो गया।।

जो सत्य है, उससे हम भाग रहे हैं। जहांआस्था है, वहां विश्वास है और जहां भय है वहां मृत्यु। आस्था हमें जीवित रख रही है, भय हमें मार रहा है। कोरोना के भय से हम रोज बाहर से जब घर आ रहे हैं, तो कपड़े बदल रहे हैं, नहा रहे हैं। अपने आपको सुरक्षित रख रहे हैं। लेकिन यहां गीता का ज्ञान हमारे काम नहीं आता ;

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। २३।।

इस आत्माको शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।

जब भी हम शरीर की बात करते हैं, हमें आत्मा परमात्मा की बातों में भटकाया जाता है, उलझाया जाता है। आत्मा वस्त्र बदलती है, जैसे आप बदलते हो। फिलहाल हमें न तो मृत्यु से और न ही ईश्वर से साक्षात्कार करना। हमें मौत से नहीं, कोरोना से डर है। एक बार इससे निपट लें, फिर मृत्यु और ईश्वर दोनों से साक्षात्कार कर लेंगे। क्योंकि हम जानते हैं, मनुष्य जन्म दुबारा नहीं मिलता। देवता भी कतार में हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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