☆ लघुकथा – मुंह पर थप्पड़☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया।पहले तो जयंत ने मानसी का फोन अटैंड नहीं किया, और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा, औरजब मानसी ने सीधे सीधे सवाल किया कि, “जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं, तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?”
“हां! है तो ।”
“क्या, तुम उससे सहमत नहीं ?”
“नहीं।”
“मतलब असहमत हो?’
“नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”
“मतलब यह , कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है, तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा।—-और फिर इसमें बुराई भी क्या है, आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है।इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।”
“मतलब, यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?”
“हां!ऐसा ही समझो।’
“और हमारे प्यार का क्या ?”
“वह तो हमने तब किया था, जब मैं आय.ए.एस. नहीं था। ”
“ओके!तो मैं इस रिश्ते को अभी ख़त्म करती हूं।मुझे नहीं करना दहेज के लालचियों के घर अपना रिश्ता।”
और फुंफकारती हुई मानसी चली गई, और जुट गई जी-जान से यू.पी.एस.सी. की तैयारी करने में।
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – शुभम भवतु !
☆ लघुकथा ☆ शुभम भवतु!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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सुबह-सुबह भक्त नहा-धोकर मंदिर पहुँचा। उसने दीप प्रज्वलित किया, दो अगरबत्ती जलाई, ग्यारह रुपए का प्रसाद और श्रीफल चढ़ाया, हाथ जोड़े, आँखें बंद की और आर्त्त स्वर में निवेदन किया- ‘प्रभु! प्लीज… प्लीज… कुछ कीजिए…!’
तभी भक्त को अपने कानों में प्रभु की मधुर स्वर सुनाई दिए- ‘भक्त क्या बात है…! बड़े उद्विग्न, भयाक्रांत और घबराए हुए लग रहे हो…! प्लीज़…के आगे भी कुछ कहोगे… या यूँ ही मेरे नाम की रट लगाए रहोगे।’
भक्त- ‘प्रभु! वो बात ऐसी है कि देश और दुनिया में घमासान मचा हुआ है। विभिन्न धर्मावलंबियों और देशों के मुखिया आपस में लड़-मरने पर आमादा हैं। उनके अहं की लड़ाई में अब तक कई निरीह और निर्दोष लोग बेमौत मारे जा चुके हैं। दुनिया में त्राहिमाम मचा हुआ है।’
प्रभु ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा- ‘भक्त! यह जो कुछ तुम्हारे देश या दुनिया के दूसरे देशों में मारामरी, खूखराबा हो रहा है। इसके लिए न तो मैं दोषी हूँ, न ही ज़िम्मेदार। दरअसल तुम्हारी यह आदमजात क़ौम के नुमाइंदे हैं जो अपने और दूसरे देशों की अवाम पर अपना रुआब गाँठना और अपनी हुकूमत क़ायम करना चाहते हैं। दुनिया भर की सारी समस्याएँ इन्हीं अहंकारी और उजबकों द्वारा पैदा की हुई हैं, अतः समाधान भी उन्हीं आकाओं को मिल-बैठकर खोजना है। प्रभु ने अपने चक्षु बंद किए, भक्त को ‘शुभम भवतु’ का आशीर्वाद दिया और पलक झपकते अंतर्ध्यान हो गए…!
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘रुख बदलना होगा‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५९ ☆
☆ लघुकथा – रुख बदलना होगा☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
अलसुबह चाय की चुस्कियों के साथ रेवा की शादी की बातें चल रही थीं। सासु जी बोलीं- “अरे बहू! यह बताओ रेवा की शादी में भात कौन देगा? तुम्हारे भाई तो है नहीं, दो बहनें ही हो।”
“अम्माँ! शादी में भात की रस्म भाई ही करता है क्या? ”- साधिका ने बड़े ही शांत भाव से पूछा।
“हाँ बहू! लड़की की माँ मिठाई, कपड़े, फल लेकर मायके अपने भाई को भात न्योतने जाती है। शादी में लड़की का मामा अपनी सामर्थ्य के अनुसार भात लेकर आता है, जिसमें बहन के परिवार के लिए कपड़े और लड़की के लिए साड़ी, गहने आदि होते हैं।”
“अम्माँ! तो मैं कल ही जाकर राधिका को भात न्योतकर आती हूँ। मेरी बेटी की शादी में उसकी मौसी भात लेकर आएगी।”
“बहू! अपने किसी ताऊ-चाचा के लड़के को कह दे भात देने को, मौसी को तो शादी में भात देते मैंने कभी नहीं देखा।”
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “आत्ममुग्ध… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆
लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
संतोष जी को अपने अलावा किसी के अस्तित्व की जानकारी ही नहीं थी, ऐसा लगता था। तारीफ करते तो अपनी या अपनी संतान की जैसे किसी और की तो औलाद होती ही नहीं। उनकी नज़र में कोई कुछ नहीं जानता है सिवाय उनके। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सुनने वाले पर क्या असर पड़ता है। बस अपनी बात कहने और सामने वाला कुछ कहने को उद्यत हो तो उसे रोक देते। फिर अपनी बात पूरी करके सामने वाले से तपाक् से हाथ मिला कर चल देते। साथ ही चलते चलते एक सप्ताह का अपना कार्यक्रम बताते जाते कि किस किस बड़े आदमी के साथ किस दिन क्या कार्यक्रम है, क्योंकि प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनकी गहरी मित्रता रहती है।
सामने वाले सज्जन अवाक् रह गए। न कुछ कहते बना और न कुछ सोचते । ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी मंच पर विराजमान थे। उसी कार्यक्रम में उनके एक सहयोगी शशिकांत भी उपस्थित थे जो उन्हीं की रैंक से रिटायर हुए थे परंतु नौकरी की शुरुआत में वे संतोष जी से जूनियर साथी रहे थे। कार्यक्रम के मध्याह्न में शशिकांत जी अपने एक मित्र के साथ वॉशरूम जा रहे थे तो संतोष जी मिल गए और मित्र का संतोष जी से अच्छा परिचय था तो उन्होंने शशिकांत जी का परिचय कराना चाहा तो संतोष जी तपाक् से बोले , “हाँ हाँ मैं शशिकांत को जानता हूँ, ही वाज़ माय जूनियर” और वाशरूम में घुस गए। शशिकांत जी ने महसूस किया कि संतोष जी को अपना सीनियरपन याद है पर उनकी प्रोन्नति नहीं, पद भी नहीं। नहीं याद है तो कहने की क्या आवश्यकता थी।
ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी को कुछ कहने का अवसर मिला तो अपनी बात के समर्थन में किसी ग्रंथ, किसी विद्वान को उद्धृत न कर अपनी ही कविता या अपनी किसी उपलब्धि की कहानी उद्धृत करते रहे। उनकी आत्ममुग्धता पर उपस्थित जन कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते हुए मुग्ध होते रहे।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नई ऊर्जा।)
सीता जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ा रही थी मंदिर की ओर तभी उसके मन में ख्याल आता है कि एक बार अपनी पूजा की थाली को देख लूं सब सामान बराबर रखी हूँ।
अरे! भगवान मुझसे गलती हो गई फूल रखना भूल गई?
वह सोचने लगती है। भगवान को जल चढ़ाऊंगी अक्षत चढ़ाऊंगी टीका लगाऊंगी आरती भी करूंगी पर फूल नहीं, तो अच्छा नहीं लगेगा तभी अचानक उसे सामने एक फूल वाला बैठे दिखता है।
“भैया फूल ₹5 के दे दो?”
“मेरा नाम मोहन है, मैं कोई भैया दूध वाला नहीं हूं?”
सीता ने गुस्से में कहा- “ओ मोहन ₹5 के फूल दे दो?”
मोहन ने कहा- “₹5 के फूल नहीं मिलेंगे?”
सीता ने कहा- “अरे! मुझे दो-चार फूल ही चाहिए है? कोई बात नहीं ₹10 के दे दो?”
मोहन सभी फूलों को एक कागज में रखता है।
सीता ने कहा- “ये लाल गुड़हल के २ फूल दो न? गौरी माता को जोड़ा फूल चढ़ाने की मन में इच्छा है।”
मोहन ने कहा – “मैडम यह फूल तो ₹5 का एक मिलता है एक फूल आपको दे रहा हूँ।”
सीता ने कहा – “फूल बेचने बैठे हो या सोना बेच रहे हो। अच्छा सुबह-सुबह मेरा दिमाग मत खराब करो,मुझे पूजा करना है।”
सीता मंदिर में प्रवेश करती है और भगवान शिव की पूजा करती है उन्हें फूल चढ़ाती है और सामने जब माँ गौरी के चरणों में जल चढ़ाती है और सिंदूर चढ़ाने के बाद जब वह फूल चढ़ाने लगती है तो देखी है कि उसके हाथ में दो फूल आ जाते हैं उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता और वह मां को श्रद्धापूर्वक नमन करती है और आरती पूजा करती है।
मंदिर में भगवान के सामने बैठकर वह सोचती है, भगवान से जो मांगो वह मिलता है माता तुम तो सब जानती हो जिस तरह दो फूल दिए हैं। इस तरह मेरी गोद भी भर देना।
दुनिया के तानों से अब मेरा मन भर गया है और सीता के मन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ ☆
🌻लघुकथा🌻ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड 🌻
सभी कहते हैं सोशल मीडिया ने रिश्ता तो खतम ही कर दिया अब तो भगवान भी दिन भर छाये रहते हैं।
पोस्टर बना बना भेज दिये। अब डिलीट करने वाला मोबाइल को सिर माथे लगा रट सपाट सभी ऊँगलियाँ चला डिलीट करते चलते हैं।
भला हो उस मेसेज का अभी कुछ दिनों से बंद है – – 👉 ये मेसेज दस लोगों को भेजों नहीं तो अनर्थ हो जायेगा।
बात करते हैं शादी ब्याह के सुंदर- सुंदर कार्डों का। किटी आयोजन में भरपूर उपयोगिता 😊
अपने दादा जी के साथ चाचा का कार्ड बाँटते बच्चा बड़ा खुश हो रहा था। घर आते ही कहने लगा इसमें मेरा नाम लिखा है आंटी पढिये।
यहाँ से वहाँ तक पूरा कार्ड अंग्रेजी के अक्षरों से भरा। हमें तो अंग्रेजी आती नहीं है।
भोले पन से बच्चे ने हिन्दी पर लिखें अक्षरों को दिखाते कहा – – ये है न हिन्दी आप पढ़ लिजियेगा।
और धीरे से कान के पास आकर बोला–गणपति बप्पा को भी अंग्रेजी कहाँ आती है। इसलिये उनका नाम बस हिन्दी में लिखा गया है।
सौ टके की बात कहते मासूम से बच्चे की मासूमियत पर ह्रदय सोचने पर मजबूर हो गया।
पूरे कार्ड में गणपति वंदन हिन्दी में लिख कर बाकी पढ़ने वाले भी उसी दो लाईन को पढते है बाकी तो इधर की जुबानी कुछ उधर की जुबानी।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कारा…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९२ —कारा—☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
दोनों कहते थे पिंजड़े में बंद उनका तोता उनके प्रेम का साक्षी है। तोते को दिखा कर वे हाथ पर हाथ रखते और कभी एक दूसरे को चूम लेते थे। तोता पिंजड़े में जैसे उनका यह प्रेम देख कर नाचने लगता था। आवाज़ तो वह खूब लगाता था। पर तोता एक दिन पिंजड़ा तोड़ कर उड़ गया। दोनों समझ रहे थे तोता उनके प्रेम का मोहताज नहीं था। वह भी एक जीव है। उसका अपना प्रेम कहीं और है।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “आज के संजय”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।
वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।
अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह पा मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!
ये कैसे संजय हैं?
ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नेम प्लेट।
लघुकथा – नेम प्लेटसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
रात के खाने के बाद घर के सभी सदस्य इकट्ठे बैठे. पति, पत्नी, बेटा, बेटी और दूर कोने में कुर्सी पर बैठी उदासीन, स्वयं को उपेक्षित मानती मां. नया घर पूरा बन चुका था और अब उसके नाम के बारे में चर्चा चल रही थी.
“आशियाना” नाम कैसा रहेगा? बेटी उत्साह से बोली.
“कोई नया नाम सुझाओ… वैसे “ उपवन “ कैसा रहेगा..? बेटा उत्साह से बोला.
“अच्छा, “ हार्मनी “ या “ हरसिंगार “ कैसा रहेगा…? पत्नी ने अपनी राय रखी.
“दोनों अच्छे हैं. लेकिन मैं सोच रहा हूं पिताजी के नाम पर अगर” घनश्याम कृपा” रखा जाए तो कैसा रहेगा..? पति ने भी अपना सुझाव दिया.
सर्वसम्मति से इस नाम को स्वीकृति दे दी गई.
पति के जाने के बाद मां धीरे-धीरे स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगीं थीं जैसा अक्सर होता है. आजकल तो वे डाइनिंग रूम के कोने में कुर्सी पर बैठी रहतीं और वहीं पर खाना मांग लेती. शेष समय तो अपने कमरे में ही पड़ी रहतीं. बहू बेटे ने उन्हें कितनी ही बार समझाया कि शाम के वक्त आप सोसायटी में जहां बुजुर्ग बैठकर बतियाते, हंसते, गपशप, मनोरंजन करते हैं उनके पास जाकर बैठ जाया करें. आपका भी दिल बहल जाया करेगा लेकिन वह इस बात को मानने को तैयार ही नहीं थीं. उन्हें लगता उनसे दो घड़ी बातें करने के लिए किसी के पास वक्त नहीं था. सभी अपने अपने कार्यों में उलझे रहते हैं. कितनी ही बार पति की फोटो देखकर शिकायत करने लगतीं-“ मुझे बीच मँझधार में छोड़कर आप तो चले गए. कितनी अकेली रह गई हूं मैं आपके बिना… किसी को फुर्सत नहीं मेरे पास बैठने की, बातें करने की… ”
नेम प्लेट बनकर आ गई. काले रंग पर सुनहरे अक्षरों से “घनश्याम- रमा कृपा“ के चारों तरफ बेल बूटों से बनी हुई अत्यंत आकर्षक और सुंदर नेम प्लेट देखकर घर के सभी सदस्य चहक उठे.
सबके देख चुकने के बाद नेम प्लेट को लेकर पोती दादी के पास गई और बोली – “ देखो दादी अपने नए घर की नेम प्लेट, दादू और आपके नाम पर. है न सरप्राइज़… “
मां ने नेम प्लेट हाथ में ली एकटक उसे निहारती रहीं. फिर ना जाने क्या हुआ कि उसे आंखों से लगाकर लगातार चूमने लगीं. उनकी आंखों से निरंतर आंसुओं की झड़ी लग गई जिसमें बच्चों के प्रति उनके मन में जबरन पनपते उपेक्षा, अनगिनत शिकायतों, तिरस्कार के भाव धुलने लगे थे. आंखों में छाई धुंध भी छंटने लगी थी.
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – आग
दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे।
बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उसपर। वह अलग-अलग पत्थरों से खेलने लगा।
वह पहला आदमी था जिसने आग बोई, आग की खेती की। आग को जलाया, आग पर पकाया। एक रोज आग में ही जल मरा।
लेकिन वही पहला आदमी था जिसने दुनिया को आग से मिलाया, आँच और आग का अंतर समझाया। आग पर और आग में सेंकने की संभावनाएँ दर्शाईं। उसने अपनी ज़िंदगी आग के हवाले कर दी ताकि आदमी जान सके कि लाशें फूँकी भी जा सकती हैं।
वह पहला आदमी था जिसने साबित किया कि भीतर आग हो तो बाहर रोशन किया जा सकता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈