☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “आज के हालात” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆
2/4 कुछ दिन पहले सोना (Gold) खरीदने की ताकत नहीं होने पर कड़का होने की शर्मिंदगी महसूस होती थी … अब मुझे देश भक्त होने का अभिमान होता है, गर्व होता है ।
आने वाला कल 🙂
मैं, आप और हम जैसे करोड़ों देशभक्तों के बल पर भारत फिर से अपने स्वर्णिम युग में लौटेगा। फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा। और एक वर्ष बाद हर कड़के स्वर्णता सैनानी क़ो गोल्ड मेडल दिया जायेगा।
(कृपया इस मेसेज को अपने मोबाइल से पैदल-पैदल फारवर्ड करें।)
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– अनिवार्य निर्णय…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # १०८ — अनिवार्य निर्णय —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
एक सुनी सुनायी कहानी पर मेरा विश्वास होने से उसे लिख रहा हूँ ताकि वह सुनी सुनायी न रह कर शब्दों के घेरे में सदा के लिए अडिग रह जाए। धरती रहने से मनुष्य भी तो रहेंगे। यह कहानी मनुष्य के साथ रहे और रह कर उन्हें विवेचन के लिए विवश करे कि किस तरह उन्हें ठगा जाता है और वे होते हैं कि ठगी को शायद भगवानी प्रसाद मान कर स्वीकार कर लेते हैं। नीच अधम साधु नदी के किनारे बैठ कर अपने पाँव धो रहा था। वह आत्म केन्द्रित भाव से इस चिंतन में पड़ा हुआ था कि क्या लोगों से विश्वासघात करने के लिए वह पैदा हुआ था? तभी नदी में एक विशाल धारा प्रकट हुई जो उसे बहा ले गयी। वक्त को यही इंतजार था वह किसी मोड़ पर कमजोर तो पड़े। अन्यथा भक्तों के घेरे में वह बहुत बलिष्ठ होता था।
(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रति – निदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मातृत्व.)
🌱 लघुकथा – मातृत्व🌷
“मां! आखिर तू नाराज़ किस बात से है? दो साल हो गए, तेरा गुस्सा किसी न किसी बहाने हम दोनों पति-पत्नी पर फूटता है। तू चाहती क्या है?”
सुरेंद्र के स्वर में झुंझलाहट से ज़्यादा थकान थी।
“मैं क्या चाहती हूं, ये तुझे बखूबी मालूम है।” कह कर कमला ने मुंह फेर लिया।
“मां, जो हो नहीं सकता, उसे बार-बार दुहराने से क्या फायदा?”
“तो सुन ले बेटा! मैं चाहती थी कि तू मेरी पसंद की लड़की से ब्याह करें। पर तूने अपनी ज़िद में उससे शादी की, जिसे मैं पहले ही दिन से नकार चुकी थी।”
“मां, सुनिधि शुरू से तुम्हारी सेवा में दिन रात लगी रहती है… फिर भी तुम हर दिन उसे किसी न किसी बात पर कोसती हो।”
“बात तो सही है। पर छुरी कितनी भी तेज़ हो, उससे कोई अपना गला तो नहीं कटवाता न?”
सुरेंद्र की आंखें सख्त हो गईं।
“तू अच्छी तरह से जानती है कि मैं तेरा एकलौता बेटा हूं। आज तक तेरी हर बात मानी है। पर इस बार तेरी ज़िद नहीं मान सकता।”
कमला गुस्से में खड़ी हो गई। आवाज़ में अंगारे थे—
“तो सुन सुरेंद्र, अब इस घर में या तो वो रहेगी या मैं।”
यह सुनकर सुरेंद्र भीतर तक हिल गया। खुद को संभालकर धीमे से बोला—
“ठीक है। मैं कल ही वकील से मिलकर सुनिधि से तलाक की कार्रवाई शुरू करवाता हूं।”
एक पल रुककर, डूबे हुए स्वर में आगे कहा— “पर मां, इस वक्त उस पर ये सब करना घोर अन्याय होगा… क्योंकि वो मां बनने वाली है। कभी भी खुशखबरी आ सकती है।”
‘मां बनने वाली है’ — ये चार शब्द कमरे की गरम हवा में ठंड़े झोंके की तरह लहरा गये। कमला के चेहरे पर हास्य के रंग छा गये। कड़क आवाज़ एकदम से शांत हो गयी।
आधी रात को सुरेंद्र का मोबाइल बजा। दूसरी तरफ से उसकी सास की आवाज़ आई— “जवाई बाबू… अभी-अभी सुनिधि ने बेटे को जन्म दिया है। तुम बाप बन गए हो।”यह सुनकर सुरेंद्र खुशी से उछल पड़ा। “क्या? यह सच?”
“अरे! क्या हुआ?” कमला ने हड़बड़ाकर पूछा।
सुरेंद्र की आंखें चमक उठीं। गर्व से भरकर बोला— “मां, तू दादी बन गई है।”
यह सुनते ही कमला का बुझा चेहरा ऐसे दमक उठा, जैसे किसी ने दिया जला दिया हो। सारा गुस्सा, सारी कड़वाहट एक पल में बह गई।
“चल उठ! अभी के अभी अस्पताल चलना है। मुझे मेरे पोते का मुंह देखना है।” खुशी से अधीर कमला ने बेटे को लगभग धकेल ही दिया।
अस्पताल पहुंचते ही कमला लपककर वार्ड में घुसी। अपने नन्हे पोते को गोद में उठाया और उसका माथा चूमने लगी.
अपने पति और सास को यूं खुशी से सराबोर देख सुनिधि के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। पर उसकी आंखें भर आईं और
मन ही मन सोच रही लगी—”क्या एक नारी को परिवार और समाज में इज़्ज़त, प्यार और मान पाने के लिए ‘मां’ बनना ज़रूरी है?”यह
सोचते-सोचते उसकी नज़रे सामने दीवार पर टंगी बाल-कृष्ण और यशोदा मैया की तस्वीर पर जाकर ठहर गई।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “कार्यवाही”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
हमारा जानने वाले परिवार पर आफत आ गयी। कोई ट्रक उनके घर के पास से निकलता हुआ उनकी चारदीवारी तोड़ गया। चारों ओर समाचार। पुलिस ने कार्यवाही शुरू की। कुछ दिन बाद हम उनके गर गये। पूछा क्या बना पुलिस कार्यवाही का?
-हमने अपनी अर्जी वापस ले ली।
-क्यों?
-पुलिस कार्यवाही के नाम पर आती और चार पानी पीकर चली जाती। हम काम काज करें कि इनकी आवभगत? बस। इसीलिए हमने अर्जी वापस ले ली। अर्जी वापस लेने में ही हमारी भलाई थी।
☆ लघुकथा ☆ ~ जिंदा गुड़िया ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
☆
वह भीड़ में अपने बाबूजी के अंगुली को पकड़े खड़ी लड़की, खिलौनो की दुकान की तरफ देखने में मग्न थी l जब उसका ध्यान टूटा, तो उसने देखा कि अब वह किसी अजनबी के हाथों की उँगुली पकडे खड़ी है l उसने जोर से चिल्लाते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं l अबकी बार जब उसकी आंख खुली तो उसने खुद को खिलौनों के दुकान में पाया, जहां सिर्फ जिंदा गुड़ियाँ ही बिक रही थीं l
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा फर्क।
लघुकथा – फर्कसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
☆
रात के तीसरे प्रहर में पत्नी अचानक सिसकी तो पति ने चौंककर पूछा –“क्या हुआ ?”
हड़बड़ाते हुए पत्नी उठ बैठी ।वह पसीने से तर – ब – तर थी।
“बहुत बुरा सपना देखा” … वह हांफने लगी थी।
“क्या? …”
“मां चल बसी …”
पत्नी ने अटकते अटकते कहा।
“ओफ़, इसमें परेशान होने की क्या बात है? सपने तो आखिर सपने ही होते हैं। फिर आज नहीं तो कल, सबको जाना ही है… चलो, अब सो जाओ..” पति ने करवट बदल कहा।
अगले सप्ताह पति की मां चल बसी। मातमपुर्सी से उबरने के पश्चात पत्नी ने पति से कहा – “आपने तो उस दिन कह दिया था, सपने तो आखिर सपने ही होते हैं पर वह सपना तो वास्तव में घटित हो गया।”
“क्या कह रही हो? तुमने तो अपनी मां की मौत का सपना देखा था न?” पति बौखला उठा।
“नहीं …”
“फिर पहले क्यों नहीं बताया? …”
“तुमने मौका ही कहां दिया! मेरे कुछ कहने से पहले ही कह दिया सपने तो आखिर सपने होते हैं। और फिर सबको एक दिन मरना तो है ही …” पत्नी सहमती सी बोली।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – संस्कारों की छाँव।)
एक छोटे से गाँव में रामरतन दुबे नाम के एक सरल और कर्मनिष्ठ शिक्षक रहते थे। वे विद्यालय में पढ़ाने के बाद प्रतिदिन आश्रम जाकर गरीब बच्चों की सेवा और शिक्षा किया करते थे।
उनकी पत्नी मंजू संतान न होने के कारण चिड़चिड़ी और उदास रहने लगी थी। एक दिन गुरु माँ के कहने पर वह भी आश्रम गई। वहाँ बच्चों की मुस्कान, सेवा और शांत वातावरण ने उसके मन को बदल दिया। वह रोज आश्रम जाने लगी और बच्चों की सेवा में उसका मन रम गया।
धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल गया। अब वह सबसे प्रेम और आदर से बात करने लगी। आश्रम के संस्कारों ने उसके जीवन में नई रोशनी भर दी। कुछ समय बाद उसे माँ बनने का सुख भी प्राप्त हुआ।
अपने बच्चे को गोद में लेकर वह अक्सर कहती—
“जीवन में धन से बड़ी संपत्ति अच्छे संस्कार होते हैं।”
ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध जारी था। कोई भी देश पीछे हटने को तैयार नहीं था। हर तरह के शांति समझौते विफल हो रहे थे। भारत और अन्य देशों में पेट्रोल, डीजल और गैस की हालत बेहद गंभीर थी। सोने-चांदी की कीमतें आसमान छू रही थीं। अमेरिका जैसे देशों में भी तेल और गैस की ऊंची कीमतों को लेकर हंगामा मचा हुआ था। प्रधानमंत्री और देश की राज्य सरकारों ने इन समस्याओं से निपटने के लिए कई तरह की योजनाएं बनाईं। तेल और गैस की खपत कम करने और सोना-चांदी न खरीदने के लिए सूचना जारी की गई। आम लोग सोना-चांदी तो कम खरीद लेते, लेकिन तेल और गैस के बिना उनका गुजारा कैसे होता! सरकारों ने इसका एक समाधान यह निकाला कि सभी कार्यालय सप्ताह में दो दिन घर से ऑनलाइन काम करें, वाहनों का उपयोग कम किया जाए – यानी पेट्रोल और डीजल का कम इस्तेमाल किया जाए, साइकिल को प्राथमिकता दी जाए…। एक दिन हरिंदर ने संजीव और मनदीप से फोन पर बात की, “यार, क्यों न हम लोग अलग-अलग मोटरसाइकिल पर यूनिवर्सिटी जाने के बजाय, एक ही वाहन पर जाया करें! किसी दिन एक अपनी मोटरसाइकिल निकाल ले, तो कभी दूसरा।” “तुम सही कह रहे हो, इस तरह हम ईंधन की खपत कम करने में योगदान दे पाएंगे।” संजीव और मनदीप ने अपनी सहमति जताई। एक दिन रास्ते में यातायात पुलिस ने एक चेकपॉइंट पर रोककर एक ही मोटरसाइकिल पर बैठे तीन लोगों का चालान काट दिया, तो संजीव ने तुरंत कहा, “देखिए साहब, हमने यह कदम सिर्फ पेट्रोल बचाने के उद्देश्य से उठाया है। हमारे बाकी सभी दस्तावेज पूरे हैं, हेलमेट भी पहने हुए हैं। अगर सरकारी कर्मचारी ही पेट्रोल बचाने के काम में बाधा बनते हैं, तो हम आगे से अपनी-अपनी मोटरसाइकिलों पर आ जाया करेंगे…” यातायात पुलिस कर्मी दुविधा में था कि चालान काटें या नहीं…
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– स्तुत्य कला…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # १०७ — स्तुत्य कला —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
सुदूर अतीत कालीन एक संत ने एक बड़ा ही भव्य ग्रंथ लिखा था। कथ्य इस तरह से था – शिल्पी इतनी सुन्दर मूर्तियाँ बनाते थे कि उन मूर्तियों में भगवान की छवि देख ली जाती थी। वह कला की पराकाष्ठा थी। निर्मित मूर्तियों में भगवान सर्पधर अथवा क्रोध के महा नायक हो कर भी मान्य होते थे। मूर्तियों में देवियाँ भी हुईं। महाकाल का वैराट्य, लेकिन महामाता की अभिनव प्रतिमा। बहुत छान बीन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया था सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की कल्पना वहीं से उद्भूत हुई थी। यह धारणा सर्व स्वीकृत हो जाने से कंठ – कंठ में बस गई थी। पर एक कमी इस कोण से रह गई संत का वह लिखित ग्रंथ कभी दिखा नहीं। इस कमी की अनुभूति तो बहुत होती है, लेकिन इतना संतोष अवश्य किया जाता है सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का राग सदा के लिए रह गया है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय कहानी – “एकला चलो रे” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१३ ☆
कथा कहानी – एकला चलो रे श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहानी
दोपहर की तीखी धूप पुणे के इस औद्योगिक क्षेत्र की कंक्रीट सड़कों पर कोलतार पिघला रही थी। साठ पार कर चुके ब्रजेश चाचा ने अपनी पुरानी साइकिल के पैडल पर थोड़ा और दबाव डाला। कैरियर पर सजे टिफिन और भारी-भरकम थैले हैंडल पर लटके हुए हैं। नीले-सफेद कपड़े के थैले आपस में टकराकर एक परिचित लय पैदा कर रहे थे।
सफेद गांधी टोपी के नीचे से बहते पसीने को उन्होंने अपनी खादी की कमीज की आस्तीन से पोंछा और ठीक बारह बजे साधना जी के घर के सामने साइकिल रोक दी।
साधना जी दरवाजे पर ही डिब्बा हाथ में लिए खड़ी थीं। उन्होंने गरम और ताजे भोजन का स्टील का डिब्बा चाचा के हाथ में थमाते हुए बड़ी आत्मीयता से कहा कि चाचा, बाहर धूप बहुत तेज हो गई है, आप दो मिनट बैठ क्यों नहीं जाते, थोड़ा ठंडा पानी पी लीजिए। इस उम्र में आप इतनी कड़ी मेहनत करते हैं, अब तो बेटे भी कमाने लगे हैं, अब आराम क्यों नहीं करते।
ब्रजेश चाचा ने डिब्बे को सलीके से थैले में रखते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया कि बहुरानी, इस धूप से मेरा पुराना नाता है। अगर आज मैं सुस्ताने बैठ गया, तो कारखाने में भूखे पेट मशीन चला रहे उस नौजवान इंजीनियर का भरोसा टूट जाएगा जो घर के स्वाद की आस में बैठा है। आराम तो उस दिन होगा जिस दिन यह सांसें रुकेंगी, जब तक पैरों में दम है, यह चाचा और उसकी सायकिल का चक्का घूमता रहेगा।
साधना जी उनकी इस निष्ठा को देखकर अवाक रह गईं। बरसों पहले जब ब्रजेश चाचा ने मुंबई के डिब्बावालों की कार्यप्रणाली से प्रेरित होकर पुणे के इस नए विकसित होते इंडस्ट्रियल एरिया में अकेले दम पर टिफिन पहुँचाने का फैसला किया था, तब लोगों ने इसे दीवानगी कहा था। कोई संगठन नहीं था, कोई नेटवर्क नहीं था, बस एक साइकिल और एक अटूट संकल्प था।
रवींद्रनाथ टैगोर के एकला चलो रे के मंत्र को उन्होंने अपने जीवन का सत्य बना लिया था।
शहर धीरे-धीरे बदल गया और फैक्ट्रियों के आस-पास चमचमाते रेस्तरां और ऑनलाइन फूड डिलीवरी वाले लड़के मोटरसाइकिल पर दौड़ने लगे। कई लोगों ने चाचा को सलाह दी कि अब इस बुढ़ापे में जान जोखिम में डालने की क्या जरूरत है, तकनीक के इस दौर में अब आपकी इस पुरानी व्यवस्था को कौन पूछेगा। लेकिन चाचा जानते थे कि मशीनी ऐप्स कभी भी उस माँ, पत्नी या गृहणी के हाथ के बने भोजन की ममता और शुद्धता को उस भूखे कर्मचारी तक नहीं पहुँचा सकते, जो उनका डिब्बा खोलते ही अपनी थकान भूल जाता है। यह उनके लिए महज एक रोजगार नहीं, बल्कि एक पवित्र मानवीय सरोकार था जिसे उन्होंने अपने हाथों से बनाया था।
साइकिल का स्टैंड हटाते हुए चाचा ने साधना जी को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि यह डिब्बा सिर्फ पेट नहीं भरता बहुरानी, यह घर को दफ्तर से जोड़ता है, और इस बूढ़े को जिंदा रखता है। इतना कहकर उन्होंने पैडल मारा और देखते ही देखते वह धूप से तपती सड़क पर कारखानों की ओर बढ़ गए। हवा में उनकी सफेद टोपी दूर से ही चमक रही थी, मानो वह थकती और हारती हुई दुनिया को यह संदेश दे रही हो कि जब कोई साथ न दे, तब भी अपने कर्तव्य पथ पर अकेले बढ़ते रहना ही जीवन का असली संगीत है।