हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२२ ☆ व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२२ ☆

? व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

शहर के चौराहे पर लगा नेताजी का स्टैचू आज भी वैसा ही है। उनका हाथ हवा में ऐसे ठहरा है, मानो किसी अदृश्य भीड़ को बरसों से समझा रहे हों, ” मैंने तुम्हें विकास का जो लॉलीपॉप दिया है, उसे चूसना क्यों छोड़ रहे हो?, लॉली पाप चूसते रहो, और मुंह बंद रखो”

उसी मूर्ति के चौराहे के कोने में मोची रामसहाय बैठा करता है । उसे बहुतों की टूटी चप्पलें मौके पर सिलनी होती हैं और इंटरव्यू देने जाते बेरोजगार लोगों के जूते चमकाने होते हैं।

आज उसके पास सिर उठाने की फुर्सत नहीं है। उसे उन ‘खास’ जूतों की पॉलिश करनी है, जो कल स्वतंत्रता दिवस की परेड में ‘आम’ सड़कों पर शान से धूल उड़ाते हुए चलेंगे।

राम सहाय को उसके बचपन की याद है। गर्मियों की दोपहरी में खास लोगों के बंगलो की  खिड़कियों और दरवाजों पर खस की खुशबूदार चिक लगाई जाती थी। वह खास लोगों को आम लोगों से अलग करने वाली एक अदृश्य, मगर ठंडी विभाजक रेखा थी । बाहर का ‘आम’ आदमी भरी दोपहरी में बाल्टी भर-भरकर पानी उस चिक पर छिड़कता था।भीतर ‘खास’ साहब मखमली कुर्सी पर पसरकर उस ठंडी बयार में कलमी आम को तक चूसकर आनंद लेते थे । बाहर सिंचाई करता ‘आम’ आदमी भी खस की महक को ही अपनी नियति मानकर तृप्त हो जाता था।

खस की महक की खुशी  ‘आम’ के पसीने और ‘खास’ के आराम के बीच का इकलौता साझा रिश्ता थी।

आज न खस की चिक बची, न वह सादगी। शीशे की वातानुकूलित दीवारों ने खस को रिप्लेस कर दिया है। इस कांच की दीवार ने संवेदनाओं को भी ‘फ्रीज’ कर दिया है। अब कोई किसी की खिड़की पर पानी नहीं छिड़कता, क्योंकि अब भीतर वालों को बाहर की गर्मी का एहसास ही नहीं होता।

पहले अंदर की खास लोगों की  बातें खस की चिक के उस पार आम व्यक्ति तक पहुंच जाती थी। अब कांच के पार आवाजें नहीं जाती ।

रामसहाय ने अब मेरी घिसी हुई टूटी चप्पल सिलना शुरू किया था ।

मैंने उस से पूछा, “रामू भाई, खस की चिक हट गई, अब क्या बचा?” उसने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, “साहब, अब चिक नहीं, एल्गोरिदम की दीवार है। पहले हम पानी छिड़कते थे तो महक हमें भी नसीब होती थी। अब हम सिर्फ डेटा रिचार्ज करवाते हैं, ताकि ‘खास’ लोगों की डिजिटल चमक को लाइक कर सकें।”

कहने को सच है कि खास वह नहीं है जो बंगलों में बैठा है। खास तो वह है, जो यह तय करता है कि किस ‘आम’ को कितनी देर तक किस मुद्दे की हवा में भिगोकर खास बनाए रखना है। और रामसहाय इस तरह का ही खास आम है।वह निचोड़ा जाता है, बार बार नए तरीकों से नए लोगों द्वारा ।

चौराहे पर पकौड़े तलने वाले की कड़ाही में तेल तो एक ही खौल रहा है, पर ‘पकौड़े’ की गुणवत्ता पर राजनीति की मोहर लगी है। ‘खास’ काउंटर पर पकौड़े सजे-सजाए प्लेट में पहुंचते हैं। ‘आम’ काउंटर पर आदमी को अपनी थाली खुद ही ढोनी पड़ती है । यह ‘सेल्फ-सर्विस’ का दौर है।

‘आम’ आदमी का लाइन में खड़े होना लोकतंत्र की गरिमा है, और ‘खास’ का सीधे अंदर जाना वीआईपी शिष्टाचार है। अगर ‘आम’ आदमी  कुर्सी मांग ले, तो वह ‘अतिक्रमणकारी’ करार दिया जाता है, जबकि ‘खास’ का वहां बैठना ‘जन-संवाद’ की तस्वीर बन जाता है।

खस की चिक के साथ हमने वह सौंधी खुशबू खो दी है, जो वर्ग-भेद को कम से कम ‘महसूस’ तो करने देती थी। आज की एयर-कंडीशंड खामोशी में संवाद मर चुका है। ‘आम’ आदमी ‘खास’ बनने की ऐसी अंधी दौड़ में है कि वह यह भूल गया है कि वह खुद उस पेड़ का तना है, जिस पर ‘खास’ फल लटके हैं।

त्रासदी यह है कि ‘आम’ आदमी ने अब यह मान लिया है कि उसे कुल्हड़ ही नसीब होगा और ‘खास’ को चीनी मिट्टी का प्याला।

मिट्टी तो मिट्टी ही है, चाहे वह कप हो या कुल्हड़।

मेरी टूटी चप्पल सिल कर फिर एट माई सर्विस, ऑन रोड आ चुकी थी। मैं फटियाते हुए आगे निकला, सोच रहा था कि

जिस दिन ‘आम’ आदमी शीशे की दीवार हटाकर भीतर की बातों में हिस्सेदारी का साहस करेगा, उस दिन शायद सारी कृत्रिम व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।

तब तक, बस लॉली पाप चूसते हुए, मुंह बंद रख मुस्कुराते रहिए। हंसी अभी भी टैक्स-फ्री है। पर डर तो यह है कि कहीं अगली बजट मीटिंग में ‘हंसी कर’ न लग जाए। आखिर, ‘खास’ को अपनी लग्जरी गाड़ियों के लिए पेट्रोल और  खामोशी के लिए साउंड-प्रूफ दीवारों का खर्चा तो ‘आम’ के पसीने से ही निकालना है!

  

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३२ – हास्य-व्यंग्य – “कुछ कुछ होता है का मतलब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  कुछ कुछ होता है का मतलब

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३२

 व्यंग्य ☆ “कुछ कुछ होता है का मतलब” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

 मैं रात्रि का भोजन करके पान खाने झब्बूलाल की दुकान पहुंचा। दुकान बंद होने का समय था इक्का दुक्का ग्राहक थे। दुकान में गाना बज रहा था

“तुम पास आए, यूं मुस्कुराए

तुमने न जाने क्या सपने दिखाए।

अब तो मेरा दिल जागे न सोता है।

क्या करूं हाए, कुछ कुछ होता है…

मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्ते भाई साहब कहते हुए एक पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पान मुंह के हवाले किया ही था कि झब्बू ने प्रश्न दाग दिया – भाई साहब, “ये कुछ कुछ होता है” का मतलब आखिर क्या होता है ? मैंने कहा झब्बू फालतू की बात मत छेड़ो, मुझे घर जाकर अभी एक लेख लिखना है। झब्बू बोला – भैया फालतू बात नहीं कर रहा। जब जब ये गाना सुनता हूँ देर तक सोचता रहता हूं कि आखिर ये “कुछ – कुछ” है क्या ? आप पत्रकार हैं। आप नहीं बताएंगे तो कौन बता पाएगा? मैंने कहा – प्यारे भाई पत्रकार क्या सब कुछ जानता है ?

झब्बू ने मेरी ओर लम्बी मुस्कान फेंकते हुए कहा – भैया में तो ऐसा ही समझता हूं। पत्रकार चोरी, डकैती, खून के बारे में पुलिस से ज्यादा, बजट के बारे में वित्त मंत्री और अर्थशास्त्रियों से ज्यादा, विदेश नीति के बारे में विदेश मंत्री और देश की सुरक्षा के बारे में रक्षा एवं गृह मंत्री व सेना से ज्यादा जानता है। अभी राम मंदिर में चंदा चोरी पर समाचार पत्रों को पढ़कर लग रहा है कि जैसे पत्रकार इस मामले में भी जांच अधिकारियों से ज्यादा जानते – समझते हैं। खेल पत्रकार तो क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन जैसे बड़े खेलों तक में यह बता देते हैं कि जीतने के लिए किस खिलाड़ी को कैसे खेलना चाहिए। शायद इसी कारण से लोग पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते, पत्रकारों से बचने की कोशिश करते हैं। मैंने झब्बूलाल से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से कहा भाई मुझे माफ करो मैं सादा पत्रकार हूं, खोजी या खेल पत्रकार नहीं और वापस लौटने लगा। झब्बू ने आवाज दी भाई साहब ये भाभी जी का पान तो लेते जाएं। मैं वापस मुड़ और पान की पुड़िया ली। झब्बू ने मार्मिक शब्दों में कहा, भैया आपने मेरी शंका का समाधान नहीं किया। अब मुझे रात भर नींद नहीं आएगी। सोचता रहूंगा कि आखिर “कुछ कुछ होता है” का मतलब क्या होने से है।

मैंने कहा देखो भाई झब्बू – “कुछ कुछ होने” का कोई एक मतलब नहीं है। इसके हजार मतलब हैं जो अलग – अलग परिस्थितियों में अलग – अलग होते हैं। शाहरुख खान, काजोल, रानी मुखर्जी को जो “कुछ कुछ” हुआ था वह अलग था। किसी राष्ट्राध्यक्ष को टॉफ़ी पाकर और झुमके पहनने से  किसी राष्ट्राध्यक्ष को जो “कुछ कुछ” हुआ वह अलग था, भारत की तरक्की देखकर चीन, पाकिस्तान और अमेरिका को जो “कुछ कुछ” हो रहा है वह अलग है, ईरान युद्ध में फंस कर ट्रंप को और यूक्रेन युद्ध में फंस कर पुतिन को होने वाला “कुछ कुछ” अलग है। इसी तरह बंगाल चुनाव हारकर ममता को और जीतकर भाजपा नेताओं को होने वाला “कुछ कुछ” भी अलग – अलग है। प्रियंका और राहुल को होने वाले “कुछ कुछ” की तुलना, बराबरी या समानता भी किसी दूसरे के “कुछ कुछ” से नहीं की जा सकती। मेरी बात से झब्बू के चेहरे पर समाधान के भाव उभरते देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। मैं वापस लौटने लगा तो झब्बू ने टोका, बोला – भाई साहब, मुझे पता था कि पत्रकार के पास हर बात का जवाब होता है, वह अति दूरदर्शी होता है तभी तो जब चंद्रशेखर जी प्रधान मंत्री थे तब एक बार उन्होंने कहा था कि अब पत्रकारिता इतने आगे बढ़ गई है कि मुझे सुबह समाचार पत्र पढ़कर पता चलता है कि मैंने कल रात क्या सोचा अथवा मैं आगे क्या करने वाला हूं। पत्रकारों पर झब्बू की बात सुनकर मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ काजल चोर (वन लाइनर)… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ काजल चोर (वन लाइनर)☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

आँखों से काजल चुराना, मुझे तो ये मुहावरा सही नहीं लगता, और समझ में भी नहीं आता– क्या ये मुमकिन है ? वीणा ने पतिदेव से कहा, तो उनका जवाब था— तुम्हारी शंका निराधार नहीं है।

“आँखें हमारी, काजल हमारा, लगाने वाले हाथ भी हमारे, फिर आँखों को छुए बगैर, काजल कैसे चुरा सकता है कोई?

पर जानती हो – जादू भी कोई चीज है। कोई पहुँचा हुआ जादूगर ही ऐसा कर सकता है। जिसे दूसरे शब्दों में हाथ की सफाई कहते हैं। दुनिया में बहुत कुछ ऐसा होता है, जो हमारी सोच से परे होता है।

जादूगर सरकार का कारनामा देखा है। उन्हें लोग मोटे से लोहे की संदूक में बिठा देते और बाहर से भारी भरकम ताला लगाकर समुद्र में फेंक देते। वे पलक झपकते ही बाहर निकल आते थे।

अब तुम्हारी ही बात ले लो- कितनी सफाई से मेरी जेब से पैसे चुराती हो।

देखिए जी–पति की जेब किसी मंदिर से कम थोड़े ही है। उससे पैसे उड़ाने में कैसा संकोच, कैसा पाप। जब आपने उड़ाते हुये  देखा ही नहीं तो इल्जाम कैसा? अब तो न्याय की देवी की आँखों से पट्टी भी हट गई है। वो तो सबूतों के बिना मानेगी नहीं।

और सबूत आपके पास हैं नहीं।

—    देखो डार्लिंग, इधर उधर की बातें न करो. जेब में 200 रुपए हों और 100 गायब हो जाएं !सोचनेवाली बात ये है कि घर में तुम और मैं, मैं और तुम, तीसरा कोई नहीं। फिर—-

हँसते हुये वीणा ने कहा- डाॅगी है ना। आपका वफादार।

उसकी वफादारी और कब काम आयेगी।

–अब मुझे डाॅगी की गवाही लेनी होगी।

–देखिए जी, अपनों के पैसे अपने चुरा लें, तो उसे चोरी नहीं कहते। उसे पाप भी नहीं कहते। उसे प्यार कहते हैं।

मैंने तुम्हारा दिल चुराया था कि नहीं? तब तो तुमने चोरी का इल्जाम नहीं लगाया। लोग तो जाने क्या-क्या नहीं चुराते, चैन चुराते हैं। नज़र चुराते हैं। और तो और नींदे भी चुराते हैं। अब तो कविता कहानी चोर भी सीना ताने घूमते नज़र आते हैं।

—सब कुछ शब्दों का ही तो खेल है. इसमें महारत होनी चाहिए।

—इसका मतलब डिग्री, रसूख आवाज़, विरासत, रंगरूप, ओहदे से ज्यादा जरूरी है हाथ की सफाई।    

—अब तो समझ में आ ही गया होगा। आँखों से काजल चुराना– मुहावरा यूँ ही नहीं बना।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४२ ⇒ व्यंग्य – सफ़ेद बाल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “सफ़ेद बाल।)

?अभी अभी # १०४२⇒ व्यंग्य – सफ़ेद बाल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बाल उगाना तो बच्चों का खेल है, लेकिन उन्हें हमेशा काले बनाए रखना बड़े-बूढ़ों का खेल है। सभी बच्चे अमूमन बाल लेकर पैदा होते हैं, कुछ ज़्यादा तो कुछ कम। बिना बाल के बच्चे कम ही पैदा होते हैं। इसीलिए उन्हें बाल बच्चे कहते हैं।

बच्चों के साथ बाल भी बढ़ते हैं। लड़कों के बाल कटते रहते हैं, लड़कियों के बाल बढ़ते रहते हैं। बाल और नाखून साथ साथ बढ़ते हैं, दोनों में खून नहीं होता। लेकिन जब कोई उखाड़ता है तो दर्द होता है। नाखून घर में काटे जाते हैं, केश, आपले केश कर्तनालय में।।

बहुत से घरों में छुट्टी के दिन बाल दिवस मनाया जाता है। एक समय था जब शिकाकाई और मुल्तानी मिट्टी से महिलाएँ बाल-सेवा में व्यस्त रहा करती थी। रेडियो सीलोन पर लोमा हेयर आयल का विज्ञापन आता था। तब तक शैम्पू का तो जन्म भी नहीं हुआ था। केवल दादियों के बाल सफ़ेद हुआ करते थे। बालों में जुओं और घरों में खटमलों का राज हुआ करता था।

बालों की सुरक्षा शरीर की सुरक्षा का एक प्रमुख अंग है। किसी के सर में एक भी सफेद बाल बुढापे की निशानी समझा जाता था। इसी कारण हाथों में लगने वाली मेंहदी सर पर चढ़ गई। बाज़ार में बालों की सुरक्षा के लिए शैम्पू, कंडीशनर और मॉइस्चराइजर आ गए। इंदौर में एक मॉडर्न लांड्री थी, जो अपनी दुकान के नाम के नीचे डायर्स और ड्राइकलीनर्स भी लिखती थी।।

जब से वॉशिंग मशीन घरों में आ गई कपड़े घरों में ही ड्राई-क्लीन होने लगे और गोदरेज डाई से बाल भी काले होने लगे। बाल डाई करने के बाद किसी भद्र महिला-पुरुष की उम्र का पता ही नहीं चलता। महिलाओं के चेहरे और बालों की सुंदरता के लिए ब्यूटी पार्लर की सेवाएँ ली जाने लगी तो पुरुषों ने भी जेंट्स पार्लर की ओर रुख कर लिया।

जॉनीवाकर का एक मशहूर गीत है -तेल मालिश चम्पी ! सर की मालिश और शरीर की मालिश अब फेशियल और बॉडी मसाज हो गई है। ए के हंगल भी जब मेन्स पार्लर से बाहर आता है तो अपने आप को देवानंद समझता है। बाल काले करने से दुनिया उजली नज़र आने लगती है।।

कुछ ही भाग्यशाली पुरुष ऐसे होते हैं जिन्हें बालों की चिंता नहीं होती। लोग उन्हें मुफ्त ही बदनाम करते हैं कि चिंता से बाल उड़ जाते हैं। महिलाओं के बाल कम उड़ते हैं, जब कि उन पर जिम्मेदारियों का बोझ अधिक होता है।

एक ऐसी मान्यता है कि धूप में बाल सफेद होते हैं। जिनके बाल सफेद होने लगते हैं, वे सफाई देते हैं कि हमने बाल धूप में सफेद नहीं किये। कहाँ किये, कभी नहीं बताते। उन्हें इतना नहीं समझता कि सफेद बाल काले करना तो आसान है लेकिन काले बाल सफेद करना इतना आसान नहीं।।

जिन्हें हम सफ़ेद बाल कहते हैं, उन्हें अंग्रेज़ी में grey hair कहते हैं। सफेद बाल सम्मान का प्रतीक है। लोग सम्मान की आशा तो रखते हैं, लेकिन बूढ़ा नहीं दिखना चाहते। बुढापा विचारों से तो आता ही है, बार बार आईना देखने, और सफ़ेद बाल गिनने से भी आता है।

बाल काले हों, सफेद हों, कोई फ़र्क नहीं पड़ता ! बस दिल काला न हो। सुंदर दिखना और लगना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। अच्छे दिखें, अच्छे लगें, साथ साथ अच्छे बनें भी। जो देखे, बस यही कहे, अहा ! आप मुझे अच्छे लगने लगे। कितना पुराना गीत है, लेकिन हमेशा जवां ;

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ…

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२१ ☆ व्यंग्य – भंडारा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२१ ☆

?  व्यंग्य – भंडारा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

दीनू दान उड़ा रहा है। चंदू चंदा डकार रहा है। ठेकेदार मुनाफा बटोर रहा है। नेता बजट का श्रेय और बजट का हिस्सा दोनों ले रहा है। अधिकारी कमीशन को प्रशासनिक संस्कार मानकर आत्मसात कर रहा है। जमीन पर कब्जा हो रहा है। जनता मुफ्त प्रसाद की प्रतीक्षा में खड़ी है।

देश में भंडारों की बड़ी परंपरा है। पहले लोग पुण्य कमाने के लिए भंडारे करते थे। अब प्रभाव, प्रभुत्व और प्रायोजन कमाने के लिए करते हैं। पहले कड़ाही में दलिया और खिचड़ी पकती थी, अब कागजों में योजनाएं पकती हैं। पहले पूड़ी सब्जी बंटती थी, अब घोषणाएं, विज्ञापन और सपने बांटे जाते हैं।

भंडारे की शुरुआत हमेशा श्रद्धा से होती है और समापन हिसाब से। श्रद्धालु धन देता है, आयोजक धन्यवाद देता है और बीच का रास्ता धन के चरित्र को बदल देता है। चंदा जब तक दानदाता की जेब में रहता है, धर्म के लिए संकल्प कहलाता है। दान खाते में पहुंचते ही अवसर बन जाता है।

चंदू इसी अवसरवाद का पुरोहित है। वह चंदे को इस कौशल से पचाता है कि आयकर विभाग भी उसके पाचन तंत्र पर शोध करना चाहे। वह पारदर्शिता का इतना बड़ा समर्थक है कि हर सवाल पूछने वाले को आरपार देख लेता है, लेकिन अपने खाते किसी को नहीं दिखाता। उसके अनुसार समाजसेवा में हिसाब मांगना आस्था पर हमला है। वह उदाहरण देता है, प्रतिप्रश्न करता है कि अमुक धर्म या खास ट्रस्ट पर कोई सवाल क्यों नहीं उठा रहे, केवल हमारी आस्था ही क्यों सवाल की परिधि में है।

दीनू सेवा का ब्रांड एंबेसडर है। वह हर फोटो में गरीब के कंधे पर हाथ रखता है और हर सौदे में अपना दूसरा हाथ जेब के भीतर रखता है। उसके चेहरे पर करुणा टपकती है और व्यवहार में गणित। उसे मालूम है कि पांच लाख का दान पचास लाख की प्रतिष्ठा और पांच करोड़ का प्रभाव पैदा कर सकता है। इसलिए वह परोपकार को निवेश की तरह करता है। 

नेता जी मंच पर विराजमान हैं। वे जनता को अपना परिवार बताते हैं। यह वही परिवार है जिससे वे चुनाव के बाद उतनी ही दूरी बना लेते हैं जितनी दूरी सुरक्षा घेरा जनता से बनाए रखता है। वे बताते हैं कि विकास गांव गांव पहुंच चुका है। गांव वाले सहमति में सिर हिलाते हैं क्योंकि विकास उनसे मिलने नहीं आया, लेकिन उसका विज्ञापन रोज उनके मोबाइल पर पहुंच जाता है।

अब विकास का अर्थ भी बदल गया है। सड़क टूट जाए तो मरम्मत का बजट विकास है। मरम्मत टूट जाए तो नया टेंडर विकास है। टेंडर रद्द हो जाए तो पुनः स्वीकृति विकास है। काम हो जाए तो वह चमत्कार की श्रेणी में आता है।

ठेकेदार लोकतंत्र का अनसुना जन कवि है। वह सीमेंट में दर्शन और बजरी में संभावना मिलाकर निर्माण करता है। उसकी बनाई सड़कें बरसात आते ही आत्मनिर्भर होकर मिट्टी में विलीन हो जाती हैं। पुल उद्घाटन के समय मजबूत और जांच के समय भावुक पाए जाते हैं। मगर चिंता की कोई बात नहीं। हर दुर्घटना के बाद संवेदना का नया भंडारा शुरू हो जाता है।

अधिकारी व्यवस्था के योगी हैं। वे फाइलों के पद्मासन पर बैठकर निर्णय की साधना करते हैं। उनकी कलम तब तक मौन व्रत में रहती है जब तक उसे समुचित ऊर्जा प्राप्त न हो जाए। इस ऊर्जा के कई नाम हैं, पर जनता इसे सुविधा शुल्क के नाम से पहचानती है।

भंडारे का एक स्वादिष्ट व्यंजन जमीन भी है। जिस भूमि पर स्कूल बनना था, वहां कॉम्प्लेक्स उग आता है। जहां तालाब था, वहां टावर खड़ा हो जाता है। जहां पार्क प्रस्तावित था, वहां प्लॉट बिक जाते हैं। नक्शे बदलते हैं, सीमाएं बदलती हैं, मालिक बदलते हैं, केवल सरकारी रिकॉर्ड अपनी नींद में खर्राटे भरता रहता है।

इस पूरे आयोजन में जनता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण और सबसे नगण्य है। उसी के नाम पर चंदा आता है, उसी के नाम पर बजट आता है, उसी के नाम पर योजनाएं बनती हैं और उसी के नाम पर भाषण दिए जाते हैं। दरअसल पूरा भंडारा ही जनता के नाम पर आयोजित होता है, जनता का ,  जनता के लिए , जनता के धन से , बस वही जनता भंडारे के स्वादिष्ट भोजन की  लाभार्थियों वाली लाइन में कहीं पीछे छूट जाती है।

भंडारा समाप्त होने पर पत्तलें उठ जाती हैं, बैनर उतर जाते हैं, नारे बदल जाते हैं। लेकिन दीनू बना रहता है, चंदू बना रहता है, ठेकेदार बना रहता है, कमीशन बना रहता है। और बने रहते हैं, नेता जी , जो अवसर के अनुसार नई पार्टी में नजर आ सकते हैं। केवल जनता हर बार नए विश्वास के साथ फिर अगले भंडारे की  पंक्ति में लग जाती है। 

लोकतंत्र की यही सबसे अद्भुत व्यवस्था है। यहां भंडारा जनता के नाम पर होता है, खर्च खजाने से होता है, लाभ प्रभावशालियों को मिलता है और धन्यवाद जनता देती है। फिर अगला भंडारा घोषित होता है। फिर वही श्रद्धा, वही शोर, वही भाषण, वही बजट, वही बंटवारा।

देश का विकास रथ चलता रहता है।

भंडारा भी।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ लेडी जूँ का इंटरव्यू… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ लेडी जूँ का इंटरव्यू… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

लोक में बहुत दिनों से एक मुहावरा हलचल मचा रहा है. “कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती.” अव्वल तो रेंगती शब्द से स्पष्ट है कि वह लेडी जूँ है। मर्द जूँ को कान पर रेंगने से परहेज क्यों है, यह एक यक्ष प्रश्न है। वैसे भी इन दिनों जूँ दुर्लभ प्रजाति हो गई है। आखिर वह आशियाना बनाये भी तो कहाँ! बढ़िया बढ़िया शैंपू से काले काले रेशमी लहराते हुये बाल स्वच्छ सिल्की सिल्की, धूल पसीने से चिपचिपे हों तो जूँ का काम बने।

खैर, एक पत्रकार ने इस दिशा में एक लेडी जूँ का इंटरव्यू लिया। पूछा– आप को आकाओं के कान क्यों पसंद नहीं?

रेंगना आपका संस्कार है, धर्म है, फिर ये बगावत कैसी?

जूँ का जवाब था— हम बहरे लोगों के कानों पर रेंग कर क्या करेंगे? यह तो खुद का अपमान ही हुआ ना, इसलिए हमने ठिकाना बदल लिया है। हम उनके कानों पर रेंगते हैं, जो हमारे रेंगने के मानी समझते हैं या उसका महत्व जानते हैं।

— देखिए जूँ जी, कभी कभी कुछ काम ऐसे भी करने पड़ते हैं जो पसंद नहीं होते। मुझे आपकी देशभक्ति पर सन्देह है।

— मैं जानती थी, तुम मुझे अर्बन नक्सल, देशद्रोही, आतंकवादी, पाक परस्त कहोगे है ना?

— मैंने ऐसा तो नहीं सोचा, पर आप से एक गुज़ारिश है। रेंगो तो सही। फल की चिंता मत करो। अगर रेंगते हुए शहीद भी हो गईं, तो यह राष्ट्र हित हेतु कुर्बानी होगी। आपका नाम इतिहास में लिखा जाएगा।

— मुझे अपने “मन की बात “सुना सुना कर मत पकाओ। भूलो मत यहां सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। मैं, कहाँ, किस हद तक अभिव्यक्त होऊं, ये मेरी मर्जी है। आप मुझे मजबूर नहीं कर सकते। मुझे संविधान की दुहाई न दें।

— जूँ जी! आप ना, बेहद अक्खड़, ढीठ और जिद्दी हैं। —– जब लोग अपनी खतरनाक जिद पाले हुए हैं, तो मुझे आत्मरक्षार्थ ऐसा सोचना ही पड़ेगा।

— इतना तो आपको पता है कि व्यक्ति से बड़ा देश है. सभी का कर्तव्य है कि हर हाल में उसकी रक्षा करें. बापू के तीनों बंदरों ने काया बदल कर माया इकट्ठी कर ली। मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया।

— आप बंदर युग तक ना पहुँचें तो अच्छा है। वर्तमान की बात कीजिये। आज बहरे कानों  को आपकी जरूरत है, जितनी कभी नहीं थी।

मैं कई बार रेंग आई पर देखा, नतीजा सिफ़र। फिर लगा, कि आत्मसम्मान भी कोई चीज है। जूँ हूँ तो क्या हुआ?

— देखिये, भगवान ने आपको किसी  खास प्रयोजन से बनाया है। संभवतः आप उसे जानती होंगी।

अंत में एक बार फिर कहूंगा कि प्रयास कीजिए। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३१ – व्यंग्य – “रामचंद्र कह गए सिया से…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका समसामयिक विषय पर एक विचारणीय व्यंग्य  रामचंद्र कह गए सिया से…

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३१ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “रामचंद्र कह गए सिया से…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

वर्षों पहले एक फिल्म आई थी गोपी जिसमें दिलीप कुमार पर फिल्माया गया एक गाना बहुत चर्चित हुआ था।

“रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,

हँस चुनेगा दाना जुन का कौवा मोती खाएगा।”

अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिये गए दान के पैसों और आभूषणों की चोरी ने इस वर्षों पुराने गीत को सही साबित कर दिया। गीत लंबा है और इसमें जितनी भी बातें कही गई हैं वे सभी सच साबित हो रहीं हैं। राम मंदिर में चोरी की चर्चा न सिर्फ भारत वरन पूरी दुनिया में हो रही है। दान की चोरी करने वालों को श्रद्धालु और तमाम ईमानदार लोग तो धिक्कार ही रहे हैं, ईश्वर पर आस्था रखने वाले सिद्धांतवादी चोर, डाकू, लुटेरे, रिश्वतखोर, जमाखोर भी मंदिर के दान और चढ़ोत्तरी पर हाथ साफ करने वालों की निंदा कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि मंदिर में दान राशि – संग्रह के लिए बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन नहीं हुआ। वैसे देखा गया है कि तमाम नियमों कानूनों के बाद भी देश में अरबों के घोटालों, चोरियों, धोखाधड़ी से लेकर प्रश्न पत्रों व अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी का लम्बे इतिहास के साथ – साथ वर्तमान भी है।

चोर, चौकीदार से शातिर होते हैं। वे लोगों की आंखों के काजल से लेकर दिल तक चुरा लेते हैं और पता चोरी होने के बाद ही चल पाचौड़ाता है। इसलिए तो कहा गया है कि डाल – डाल चलने वाले चौकीदारों की अपेक्षा पात – पात चलने वाले चोर हमेशा सफलता प्राप्त कर लेते हैं। यह ठीक है कि चोरी बुरी बात है पर चोर होना कोई मामूली बात नहीं। चोरी के लिए 56 इंच का सीना होना चाहिए ये तो मैं नहीं कहूंगा क्योंकि इस नाप का सीना निर्विवाद है, लेकिन विशाल सीना होना आवश्यक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों विशेषकर संस्कृत साहित्य जैसे “दशकुमारचरितम्” में चोरी को चतुषष्टिक कलाओं में से एक विशेष विद्या “चौर्य कला” के रूप में उल्लेखित किया गया है। अर्थात चोरी एक कला है इस आधार पर यह मानना पड़ता है कि राम मंदिर के चोर पहुंचे हुए साहसी कलाकार हैं।

एक लोक प्रिय कहावत भी है “राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत; खाओ चिड़िया भर-भर पेट“। जो हमारी नजर में चोर हैं वे शायद चंदे को अपना ही समझ कर खा रहे थे। “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सब के दाता राम॥” कहीं ये राम मंदिर में बैठे अजगर तो नहीं थे।

श्रीरामचरितमानस के रचनाकार संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में वर्षों पूर्व ही बालकाण्ड में लिख दिया था -“होइ है वही जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।” अर्थात् संसार में वही होकर रहेगा जो भगवान श्रीराम ने पहले से तय कर रखा है। व्यर्थ के तर्क – वितर्क करके कौन इसे बढ़ाए। दान के करोड़ों रुपयों और जेवरों का गबन हुआ है। जांच जारी है, कई लोगों से सघन पूछताछ की जा रही है, अनेक लोग गिरफ्तार हुए हैं। संभवतः जांच से सब सामने आ जाए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाए। शायद न भी हो क्योंकि “होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥” हम तो सिर्फ परिणाम की प्रतीक्षा कर सकते हैं। वैसे यदि चोर राम मंदिर में चोरी करने की जगह कृष्ण मंदिर में चोरी करते तो सफाई में कुतर्क कर सकते थे कि हमने चोर (माखनचोर) के घर चोरी की है, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर में चोरी करके वे बुरी तरह फंस चुके हैं। यों आज के युग में लोग बेशर्मी से चिल्ला – चिल्ला कर चोरी कर रहे हैं, कई लोगों के जीवन यापन का साधन ही फिल्म “चोरी मेरा काम” के हीरो की तरह खुल कर चोरी करना है, ऐसे लोगों पर अब तक क्या प्रतिबंध लगे ? इस फिल्म के गाने के बोल ही देख लीजिये –

चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम।

अरे वो करते हैं चोरी चोरी करून मैं खुले आम।

सुना था स्वतंत्रता पूर्व चोरों – डाकुओं को राजाओं – जमीदारों आदि का संरक्षण प्राप्त रहता था। संरक्षण प्राप्त चोर – डाकू दूसरे राज्यों – क्षेत्रों में चोरी – डकैती करते थे और लूट का धन अपने राज्य राजकोष में जमा करके कमीशन, सुरक्षा व सम्मान प्राप्त करते थे। कहां तक बात करें, दुनिया चोरों से भरी पड़ी है। बहरहाल राम मंदिर के चोरों को राम जी भले ही माफ कर दें लेकिन सरकार और राम भक्त जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३९ ☆ व्यंग्य – टेढ़े-मेढ़े रास्ते ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ टेढ़े-मेढ़े रास्ते ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

गोस्वामी जी ऑफिस के बड़े बाबू के पास पहुंचे। कहा, ‘बड़े बाबू, वाइफ का ट्रांसफर कराना है। छः साल से सीतापुर में पड़ी हैं। परेशानी बनी हुई है।’

बड़े बाबू सुंघनी का एक डोज़ लेकर बोले, ‘हो जाएगा। हम किस दिन काम आएंगे?’

गोस्वामी जी ने पूछा, ‘कुछ चंदन-पानी लगेगा क्या?’

बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘तीन लाख का रेट चल रहा है। ले आओ और हफ्ते भर में आर्डर ले लो।’

गोस्वामी जी की आंखें फैल गयीं, बोले, ‘तीन लाख? यह तो बहुत है। इतना कौन देगा?’

बड़े बाबू इत्मीनान से फाइल पलटते हुए बोले, ‘देख लो। हमने सीधा रास्ता बता दिया। काम बिलकुल सही और ईमानदारी से होगा। हफ्ते भर में आर्डर मिल जाएगा।’

गोस्वामी जी हाथ उठाकर बोले, ‘न बाबा! यह तो बहुत ज्यादा है। मेरी मंत्री जी के पीए से रसाई है। मेरी कॉलोनी में ही रहते हैं। उनसे कहूंगा। वह ज़रुर मदद करेंगे।’

बड़े बाबू बोले, ‘देख लो। हमने तो आपको सीधा-सादा रास्ता बता दिया, एकदम एक्सप्रेस वे वाला। आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते पसंद हैं तो उन्हीं को पकड़ो। आपकी मर्जी।’

गोस्वामी जी पंद्रह दिन बाद फिर आकर बड़े बाबू के पास बैठ गये। मायूसी के स्वर में बोले, ‘हमें पीए साहब ने आश्वासन दिया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सब झटका देते हैं। कोई भरोसे के लायक नहीं है। अब तो ट्रांसफर बंद भी हो गये ।’

बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘हमने तो आपको पहले ही सलाह दी थी कि सीधे रास्ते पर चलो, लेकिन आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते ही पसंद हैं तो हम क्या कर सकते हैं? जमाने के हिसाब से नहीं चलोगे तो तकलीफ तो उठानी पड़ेगी।’

—–

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १०९ – व्यंग्य – कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा।)  

☆  चुभते तीर # १०९ – व्यंग्य  – कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

 गंगा नदी नहीं है भाई, हम भारतीयों के लिए एक यूनिवर्सल वॉशिंग मशीन है। डिटर्जेंट की ज़रूरत नहीं, बस एक डुबकी मारो और जनम-जनम के पाप ऐसे ग़ायब, जैसे गधे के सिर से सिंग।

हम बचपन से सुनते आ रहे हैं “मन चंगा तो कठौती में गंगा।” लेकिन हमने इसका प्रैक्टिकल वर्ज़न ढूंढ निकाला है: “कर्म चाहे नंगा, बस बहती रहे गंगा।”

ऋषिकेश से लेकर बनारस के घाटों तक चले जाइए, गंगा किनारे खड़े होकर आपको लगेगा कि यहाँ मोक्ष का कोई स्टार्ट-अप चल रहा है। लोग घाट पर ऐसे आते हैं जैसे किसी बैंक की कैश-डिपॉज़िट मशीन के सामने खड़े हों। जेब से निकाला ‘घोटाला नंबर 1’, ‘झूठ नंबर 2’, ‘पड़ोसी की चुगली नंबर 3’ और ‘धपाक!’… सब गंगा जी के खाते में।  गंगा मैया भी मन ही मन सोचती होंगी, “भैया, मैं मोक्षदायिनी हूँ, तुम्हारी रीसायकल बिन नहीं कि जो कचरा समाज में नहीं खपा पाए, वो लाकर मुझमें वाश आउट कर दिया।”

हमारी श्रद्धा इतनी भारी है कि वह सीधे प्लास्टिक के थैलों में बंद होकर नदी में तैरती है। हम गंगा को ‘माँ’ कहते हैं, और माँ के प्रति हमारा प्यार इतना अगाध है कि हम उनके आँचल में फूल, अगरबत्ती के रैपर, अधजली लकड़ियाँ, लाशें और ज़हरीला केमिकल सब कुछ उड़ेल देते हैं।

 “गंगा पुत्र” होने का हमारा दावा तब तक ज़ोरदार रहता है, जब तक बात नारे लगाने की हो। जैसे ही बात कचरा डस्टबिन में डालने की आती है, हम सब अचानक “सौतेले” हो जाते हैं।

हम हर साल हज़ारों करोड़ के ‘नमामि गंगे’ प्रोजेक्ट्स लाते हैं। फाइलें तैरती हैं, बजट बहता है, मगर गंगा का पानी? वह आज भी इस ताक में रहता है कि कोई उसमें अपनी आस्था बहाने से पहले थोड़ा सा ‘कॉमन सेंस’ भी बहा दे।

आजकल गंगा किनारे मोक्ष कम, ‘इंस्टाग्राम रील्स’ ज़्यादा मिलती हैं। घाट की आरती में लीन भक्त का ध्यान इस बात पर कम होता है कि मंत्र क्या हैं, और इस बात पर ज़्यादा कि ‘सिनेमैटिक शॉट’ में बैकग्राउंड ब्लर सही आ रहा है या नहीं।

एक आदमी हाथ जोड़कर गंगा जी से प्रार्थना कर रहा था: “हे माँ, मेरे सारे पाप धो देना।”

तभी पीछे से आवाज़ आई, “भैया, थोड़ा राइट होना, फ्रेम में तुम्हारी वजह से सूरज छिप रहा है!”

गंगा चुपचाप बह रही है। वह पहाड़ों की पवित्रता लेकर आती है और हमारे मैदानों की चालाकियों को समेटकर समंदर की तरफ बढ़ जाती है। वह मैली इसलिए नहीं हो रही कि उसमें पानी कम है, वह मैली इसलिए हो रही है क्योंकि हमारे भीतर का ‘पाप-साफ़’ करने का लालच बहुत ज़्यादा है।

अगर गंगा सचमुच इंसानी ज़ुबान में बोल पाती, तो घाट पर डुबकी लगाते ही पहला श्राप नहीं, बल्कि एक सीधा सा सवाल पूछती: “शर्मा जी, पिछले हफ़्ते जो टैक्स चोरी की थी, उसका कीचड़ मुझमें धो रहे हो, या सीधे अकाउंटेंट का सिर मुंडवा कर आए हो?”

लेकिन माँ तो माँ है, चुपचाप ज़हर पीकर भी अमृत का आशीर्वाद दिए जा रही है। इस उम्मीद में कि किसी दिन, हम डूबने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बचाने के लिए हाथ बढ़ाएंगे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १०८ – व्यंग्य – विज्ञापित स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – विज्ञापित स्वर्ग)  

☆  चुभते तीर # १०८ – व्यंग्य  – विज्ञापित स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शहर के मुख्य चौराहे पर लगे उस अस्सी फीट ऊँचे डिजिटल होर्डिंग ने पिछले एक पखवाड़े से जनता की रातों की नींद और दिन का चैन छीन रखा था, क्योंकि उस पर ‘अंतिम मोक्ष टावर्स’ की बुकिंग का विज्ञापन इस कदर चमक रहा था जैसे साक्षात चित्रगुप्त ने अपना नया स्टार्टअप खोल लिया हो। बिल्डर महोदय की मुस्कुराहट विज्ञापन में इतनी मखमली थी कि उसे देखकर मोहल्ले के वे लोग भी अपनी वसीयत बदलने पर विचार करने लगे थे, जिनके पास अपनी साइकिल के टायर बदलवाने के पैसे तक नहीं थे। उस ‘स्वर्गीय’ सोसाइटी के ब्रोशर में स्विमिंग पूल का पानी इतना नीला दिखाया गया था कि उसे देखकर समुद्र को भी अपने खारेपन पर शर्म आ जाए, और जिम की मशीनों को देखकर ऐसा लगता था कि वहाँ कसरत करने मात्र से इंसान की उम्र रिवर्स गियर में चलने लगेगी। दफ्तरों में बाबू लोग अपनी फाइलों को ताक पर रखकर इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या किश्तों में स्वर्ग खरीदा जा सकता है, जबकि हकीकत में उनकी पगार महीने के दसवें दिन ही आईसीयू में भर्ती हो जाती थी। सपनों का यह सौदागर शहर की हर दीवार पर अपनी कामयाबी के ऐसे पोस्टर चिपका रहा था, मानो वह कंक्रीट के जंगल में नहीं बल्कि बादलों के ऊपर कॉलोनी काट रहा हो, जहाँ प्रदूषण के बजाय केवल इत्र की बारिश होने का वादा किया गया था।

उस प्रोजेक्ट के लिए जिस जमीन का अधिग्रहण किया गया था, वह दरअसल शहर का वह पुराना कब्रिस्तान था जहाँ कभी शांति का साम्राज्य हुआ करता था, पर अब वहाँ ‘प्रगति’ का शोर गूँजने वाला था। आर्किटेक्ट ने नक्शे में इस तरह की बाजीगरी दिखाई थी कि पच्चीस बाई पचास के प्लॉट में भी उसे गोल्फ कोर्स और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नजर आ रहा था, जिसे देखकर भौतिक विज्ञान के सिद्धांत भी आत्मग्लानि से भर उठे थे। रेरा के नियमों को उस फाइल में इस तरह दबाया गया था जैसे किसी अपराधी को कालकोठरी में डाल दिया जाता है, और मंजूरी देने वाले अधिकारी के चेहरे पर वह दिव्य तेज था जो केवल करोड़ों के वारे-न्यारे होने के बाद ही अवतरित होता है। लोग अपनी जीवन भर की जमापूँजी उस काल्पनिक खिड़की के लिए लुटा रहे थे, जहाँ से बिल्डर ने ‘हिमालय के दर्शन’ कराने का वादा किया था, जबकि असल में वहाँ से केवल बगल वाले नाले की दुर्गंध और पड़ोसी के फटे हुए बनियान ही नजर आने वाले थे। विज्ञापनों की उस मायावी दुनिया में नैतिकता एक ऐसी वस्तु बन चुकी थी, जिसे सेल में भी कोई खरीदने को तैयार नहीं था, और मध्यमवर्ग अपनी ईएमआई के बोझ तले दबकर उस ‘अंतिम मोक्ष’ की प्रतीक्षा में अभी से ही अधमरा हुआ जा रहा था।

‘अंतिम मोक्ष टावर्स’ के उद्घाटन समारोह में स्वयं सूबे के सबसे बड़े रईस को रिबन काटने के लिए बुलाया गया और जैसे ही उन्होंने सोने की कैंची चलाई, वह डिजिटल होर्डिंग अचानक फट पड़ा। लोग घबराकर पीछे हटे, लेकिन वहाँ से धुआँ नहीं बल्कि हजारों की तादाद में असली सफेद कबूतर निकले जो देखते ही देखते काले कौवों में तब्दील होकर पूरे प्रशासन पर हमला करने लगे। ताज्जुब तो तब हुआ जब वह नवनिर्मित बिल्डिंग अपनी जगह से किसी रॉकेट की तरह ऊपर उठी और हवा में लटक गई, जहाँ से बिल्डर की आवाज गूँजी कि ‘पैसे पूरे मिल चुके हैं, अब फ्लैट भी स्वर्ग में ही मिलेंगे’। हतप्रभ भीड़ ने देखा कि वह पूरी बिल्डिंग अब कांच की तरह पारदर्शी हो गई थी और उसके भीतर वे सभी अधिकारी और नेता कैद थे जिन्होंने इस फर्जीवाड़े में हिस्सा लिया था, जो अब हाथ जोड़कर नीचे उतरने की भीख माँग रहे थे। अंत में, वह पूरी इमारत एक विशाल बुलबुले की तरह फूटी और आसमान से नोटों की बारिश होने लगी, पर वे नोट असली नहीं बल्कि उन मासूमों की ‘बददुआओं’ के कागजी टुकड़े थे जिन्हें घर के नाम पर बेघर कर दिया गया था। पूरा शहर इस भयावह और चमत्कारी दृश्य को देखकर जड़ हो गया था, क्योंकि स्वर्ग की बुकिंग कराने वाले अब नरक के दरवाजे पर अपनी रसीदें लिए कतार में खड़े थे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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