हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १५५ – सैलरी डे का कड़ा संघर्ष – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सैलरी डे का कड़ा संघर्ष।)  

☆  चुभते तीर # १५५ – व्यंग्य  – सैलरी डे का कड़ा संघर्ष ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

हर महीने की पहली तारीख को हमारे बैंक खाते में आने वाला वह मैसेज किसी एक्शन थ्रिलर फिल्म के क्लाइमैक्स से कम नहीं होता। मोबाइल की स्क्रीन पर जैसे ही यह सूचना चमकती है कि “Your A/C has been credited,” वैसे ही हमारे भीतर का सोया हुआ योद्धा जाग उठता है। लेकिन यह जीत क्षणिक होती है, क्योंकि ठीक उसके पांच मिनट बाद ईएमआई, क्रेडिट कार्ड बिल, मकान मालिक का किराया और बिजली के बिलों के एक साथ कई मोर्चे खुल जाते हैं।

यह पैसे की ऐसी गुरिल्ला वॉर है जिसमें हमें चारों तरफ से घेर लिया जाता है। हम एक तरफ से किराया चुकाकर बचते हैं तो दूसरी तरफ से सुपरमार्केट का बिल छाती पर मूंग दलने आ जाता है। बैंक का ऐप ऐसे काम करता है जैसे कोई खूंखार विलेन हमारी हर सांस पर पहरा दे रहा हो। इस आर्थिक संग्राम में हमारी जेबें पूरी तरह लहूलुहान हो चुकी होती हैं और हम खुद को किसी घायल सैनिक की तरह पाते हैं, जो अगले महीने की पहली तारीख तक जिंदा रहने के लिए केवल उम्मीद की बैसाखी का सहारा लेता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ७१ ☆ व्यंग्य – “स्कूली तालीम के निज़ाम पर इतराने के सबब…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “स्कूली तालीम के निज़ाम पर इतराने के सबब…” ।)

☆ शेष कुशल # ७१ ☆

☆ व्यंग्य – “स्कूली तालीम के निज़ाम पर इतराने के सबब…” – शांतिलाल जैन ☆

एक आदर्श नागरिक से सबसे अधिक उम्मीद यही जा सकती है कि वह गर्व करे, गर्व करता रहे, गर्व करने के अवसर की तलाश में रहे और जब भी उसका आह्वान किया जाए वह गर्व से इस कदर फूल जाए कि शर्ट के बटन टूट जाने को मचल-मचल उठें. इस लेख में हम आपके सामने फ़्रांस में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा को लेकर मचे बवाल के बरक्स अपने देश की तस्वीर तरतीब से रखने की कोशिश करेंगे. गरज़ यह श्रीमान् कि आप स्कूली तालीम के निज़ाम पर इतरा सकें और लेख के खतम होते-होते आपकी शर्ट के बटन भी टूट जाने को मचल-मचल उठें.

‘एन इवनिंग इन पेरिस’ वाले देश से खबर है कि विद्यार्थी स्कूलों की जर्जर इमारतों की दीवारों में छेद, छत से पानी टपकने और गर्मी में अत्यधिक गर्म हो जाने वाली कक्षाओं में सुधार के लिए बवाल काट रहे हैं. समस्या की जड़ में है स्कूल की इमारतें, हमारे स्कूलों में वे सामान्यतः नहीं होती. बच्चे दालान में या  पेड़ की छाँव में पढ़ लेते हैं. न छत के टपकने की समस्या से रू-ब-रू होना पड़ता है न गर्मी लगने की. बारिश हो जाए तो स्कूल भैंस के तबेले में शिफ्ट हो जाता है. टॉयलेट एक विलासिता है. लड़कियाँ  स्कूल आती नहीं, लड़के स्कूल जाते नहीं. मास्टरजी स्कूल से सटे खेत में निवृत्त हो लेते हैं. अब ऐसा भी नहीं है कि हर स्कूल खुले में ही लगता है, कुछ में छत होती भी है जो यथासमय गिरकर शिशु आत्माओं को बैकुंठधाम प्रस्थान करवाने के काम आती है. हमारे यहाँ ब्लैक को अशुभ माना जाता है इसलिए बजट में ब्लैक बोर्ड का प्रॉविजन नहीं किया गया है.

एफिल टॉवर वाले देश में असंतोष का एक बिंदु यह कि प्रति क्लास विद्यार्थी तीस से ज्यादा हो गए हैं. गर्व करें आप कि इत्ते तो आपके देश में क्लास बंक करकेई घूमते रहते हैं. स्कूल खुलने का यह मतलब तो नहीं कि कक्षाएँ सच में लगें हीं, समय-सारणी में लगतीं रहे, इनफ़. पश्चिम के मुक़ाबिल हमारे यहाँ परीक्षाएँ लीक से हटकर होती हैं, आई मीन पर्चे थोड़ा हटकर लीक होते हैं.  बरस-दर-बरस विद्यार्थी अगली क्लास में प्रमोट तो होते हैं, लिख-पढ़ नहीं पाते. प्रमोट होने और पढ़े-लिखे होने में आंकड़ा छत्तीस का है. जरूरत भी नहीं. कौनसा सरकारी स्कूल के बच्चों को कलेक्टर बनना है, बेचेंगे तो नून-तेल-मिर्ची ही. हमने हज़ारों बरस पहले संसार को ‘जीरो का ज्ञान’ दिया, गर्व करें आप कि हमारे स्कूल आज भी विद्यार्थियों को ‘जीरो ज्ञान’ देने में मुब्तला हैं.

विकसित देशों  में एक गलत अवधारणा व्याप्त है कि टीचर का असली काम पढ़ाना होता है. हमने इसे ध्वस्त किया है. एक आदर्श टीचर को पशु-गणना में निष्णात और मिड-डे मील पकाने में प्रवीण होना चाहिए. टीचर होने का मतलब टीचर होना नहीं होता, संविदा का एक पक्षकार होना होता है, शिक्षा का दिहाड़ी मज़दूर. जिस दिन पढ़ाने के काम पर आओ उस दिन की मजदूरी पाओ. तालीम के मनरेगा का कार्ड-होल्डर. स्थायी टीचर का पे-स्केल पाना भी समय से ‘पे’ पाने की गारंटी नहीं होता. कभी कभी वह महीनों तक न ‘पे’ पाता है न ‘स्केल’. 

उधर को बवाल शिक्षकों की कमी पर भी मचा हुआ है. इशू ये कि लंबे समय तक अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों के स्थान पर फ़्रांस की सरकार वैकल्पिक शिक्षक उपलब्ध नहीं करा पाती. अपन के देश में यह समस्या नहीं है. अनुपस्थित हो शिक्षक तो स्कूल की छुट्टी हो जाती है. एक शॉट में बारह क्लास के विद्यार्थी खुश!!!! आख़िर पहली से बारहवीं तक की क्लास को सँभालने के लिए टीचर एक ही जो होता है. शिक्षालय बंद, तो अधिकारी खुश!! मंत्रीजी और भी खुश!!!  गर्व कीजिए कि हमारे यहाँ स्कूल खुलवाने के लिए कोई बवाल नहीं काटता.

बहरहाल, जब जब दुनिया में कोई संकट आया है समाधान की राह भारत ने ही दिखाई है. इस बार भी हम ही! हमारी  सरकार ने स्कूलों में संसाधनों की कमी से निपटने का आसान सा फ़ॉर्मूला बनाया भी है और सफलतापूर्वक आजमाया भी है. वो समस्याग्रस्त स्कूल को स्थायी तौर पर बंद कर देती है. पिछले दस सालों में एक लाख से ज्यादा स्कूल बंद करके हमने दुनिया को ये करके दिखाया है. अब आप तालीम के निज़ाम पर नाज़ से इतना तो फूलकर कुप्पा हो ही सकते हैं कि आपकी शर्ट के बटन टूट जाने को मचल-मचल उठें.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १५४ – चाय की टपरी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चाय की टपरी।)  

☆  चुभते तीर # १५४ – व्यंग्य  – चाय की टपरी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

सोमवार की सुबह का यह दृश्य किसी क्लासिकल रोमांस से कम नहीं है। जब दिल और दिमाग दोनों एक साथ बगावत पर उतारू हों, तब दफ्तर के नीचे नुक्कड़ पर लगी वह शर्मा जी की चाय की टपरी हमारे लिए ताज महल जैसी पवित्र हो जाती है। भाप छोड़ते कुल्हड़ की खुशबू और उस पर तैरती मलाई की परत वैसे ही दिल को चुरा लेती है जैसे कॉलेज के दिनों में पहली बेंच पर बैठने वाली लड़की की एक तिरछी नजर।

हम दोनों यानी मैं और मेरा सुस्त पड़ा हुआ आत्म-विश्वास—उस टपरी के बेंच पर ऐसे बैठते हैं जैसे प्रेमी युगल बरगद की छांव में बैठते हैं। अदरक वाली चाय का पहला घूंट गले से उतरते ही नस-नस में एक अजीब सा नशा दौड़ जाता है, जो कॉरपोरेट जगत की इस क्रूर सच्चाई को कुछ पलों के लिए धुंधला कर देता है। सामने से गुजरती हुई वह स्कूटी और उस पर सवार अजनबी लड़की की जुल्फें जब हवा में लहराती हैं, तो ऐसा लगता है कि इस मंडे ब्लूज के समंदर में भी कोई उम्मीद का जहाज तैर रहा है। यह इश्क़ भी बड़ा अजीब है; यह कभी प्रोजेक्ट रिपोर्ट के पन्नों में मिलता है, तो कभी इस कड़क चाय के आखिरी कतरे में छुपा होता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १५३ – मेट्रो की पीली लाइन और अनिश्चित भविष्य – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – मेट्रो की पीली लाइन और अनिश्चित भविष्य।)  

☆  चुभते तीर # १५३ – व्यंग्य  – मेट्रो की पीली लाइन और अनिश्चित भविष्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

सुबह के आठ बज चुके हैं और मेट्रो स्टेशन का यह प्रवेश द्वार किसी पाताल लोक के मुहाने जैसा प्रतीत हो रहा है। पीली लाइन के पार खड़े होकर ऐसा लगता है जैसे हम किसी युद्ध के मैदान में उतरने वाले सैनिक हों, जहां हर दूसरा व्यक्ति आपका विरोधी है। अनाउंसमेंट की रोबोटिक आवाज गूंजती है—”कृपया पीली रेखा से पीछे रहें।” लेकिन पीछे रहने का मतलब है जीवन की दौड़ में हमेशा के लिए पिछड़ जाना।

ट्रेन के दरवाजे खुलते ही अंदर से ऐसा ज्वार उमड़ता है जो इंसान को तिनके की तरह उड़ा ले जाने के लिए पर्याप्त होता है। यह मारक क्षमता और शारीरिक संतुलन की ऐसी अग्निपरीक्षा है, जिसमें कॉलेज की डिग्री या यूपीएससी का सर्टिफिकेट कोई काम नहीं आता। यहां केवल धक्का-मुक्की की कला और कोहनी चलाने का हुनर ही आपकी नैया पार लगा सकता है। डिब्बे के भीतर सांस लेना प्रतिबंधित है; यहां हवा भी टिकट खरीद कर सफर करती है। आप किसी अनजान सहयात्री के कंधे पर ऐसे लटके होते हैं जैसे आप दोनों जन्म-जन्म के बिछड़े हुए भाई हों। यह रोमांचक सफर उस थ्रिलर फिल्म जैसा है जिसका क्लाइमैक्स हर रोज एक ही होता है—ऑफिस की पंचिंग मशीन और लेटमार्क का खौफ।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १५२ – मिडिल क्लास का खाली टिफिन बॉक्स – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता।)  

☆  चुभते तीर # १५२ – व्यंग्य  – मिडिल क्लास का खाली टिफिन बॉक्स ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

रसोई के कोने में रखा एल्युमिनियम का वह पुराना टिफिन बॉक्स अब केवल स्टील के डिब्बों का घर नहीं, बल्कि उस टूटे हुए सपने का संग्रहालय है जो हर महीने की पहली तारीख को तनख्वाह आने पर चमकता है और पच्चीस तारीख आते-आते अपनी चमक खो बैठता है। इस डिब्बे में कभी मां के हाथ के बने पराठे हुआ करते थे, जिनमें घी की महक के साथ आने वाले कल की अनिश्चितता का स्वाद भी मिला होता था।

आज इस महानगर की भागदौड़ में यह डिब्बा ऑफिस की कैंटीन के सूखे सैंडविच और बचे-कुचे पास्ता का गोदाम बन गया है। जब शाम को घर लौटकर इस डिब्बे को सिंक में पटकते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारी पूरी जवानी को धोकर नाली में बहा दिया हो। शहर की इन चकाचौंध भरी सड़कों पर गाड़ी निकालते हुए अचानक वह भूला-बिसरा गांव याद आ जाता है, जहां सांझ होते ही मां चूल्हे के पास बैठकर आवाज लगाती थी—”बेटा, रोटी खा ले।” अब न तो वह चूल्हा है, न वह मां, और न ही उस आवाज में वह अपनापन बचा है। बस एक खोखली हंसी है और इस कंक्रीट के जंगल में भटकती हुई हमारी यह लाचार परछाई है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १५१ – दफ्तर की कुर्सियों का इतिहास और भूगोल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – दफ्तर की कुर्सियों का इतिहास और भूगोल।)

☆  चुभते तीर # १५१ – व्यंग्य  – दफ्तर की कुर्सियों का इतिहास और भूगोल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

दफ्तर की इस पवित्र और वातानुकूलित मचान पर कुर्सियों का भूगोल बड़ा जटिल है। यह कुर्सियां केवल बैठने के उपकरण नहीं हैं, बल्कि यह कर्मचारी के औहदे और उसकी रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन का जीवंत प्रमाण पत्र हैं। चपरासी की कुर्सी प्लास्टिक की होती है, जिस पर बैठते हीन भावना और कमर दर्द का ऐसा बेजोड़ मिश्रण पैदा होता है कि आदमी सीधे मालिक की तरफ देखता है। बाबू की कुर्सी थोड़ी गद्देदार होती है, जो दिनभर चाय की चुस्कियों और फाइलों के नीचे दबाई गई फाइलों के वजन से कराहती रहती है।

लेकिन असली तमाशा तब शुरू होता है जब साहब की कुर्सी का आगमन होता है। वह कुर्सी नहीं, सिंहासन है—एर्गोनॉमिक्स का चमत्कार और चमड़े का वह दानव है जो अपनी धुरी पर ऐसे घूमता है जैसे धरती सूरज के नहीं, उसी के इर्द-गिर्द चक्कर काट रही हो। इस कुर्सी पर बैठने वाला प्राणी भूल जाता है कि वह भी कभी आम आदमियों की तरह लोकल ट्रेन में धक्के खाता था। वह फाइलों पर लाल स्याही से ऐसे हस्ताक्षर करता है जैसे देश के संविधान की नई इबारत लिख रहा हो। शाम ढलते ही यही बाहुबली बाबू अपनी कूबड़ निकाली हुई पीठ के साथ जब घर लौटता है, तो उसकी औकात बस टीवी के रिमोट पर कब्जा करने तक सीमित रह जाती है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १५० – सूत का पुराना चरखा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सूत का पुराना चरखा।)  

☆  चुभते तीर # १५० – व्यंग्य  – सूत का पुराना चरखा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कस्बे के सबसे पुराने सर्वोदय आश्रम एवं खादी ग्रामोद्योग भवन के मुख्य दालान की सीलन भरी दीवार के सहारे सागौन की लकड़ी का एक भारी और घिसा हुआ पुराना चरखा पिछले बीस सालों से रखा हुआ था जिसकी गोल चाक पर कोई सूत की तांत नहीं थी। उस चरखे की धुरी पर लगी लोहे की तकली वक्त की मार से मटमैली पड़ चुकी थी और उसके लकड़ी के हत्थे पर बरसों पहले उँगलियों के लगातार फेरने से बने चिकने निशान आज भी किसी स्वावलंबी संकल्प की गवाही देते थे। उस दालान के ठीक नीचे सीमेंट के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही पंडित गंगाधर जी अपनी बांस की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर पुराना मैला अंगोछा डाले गंगाधर जी दिन भर उस बिना सूत वाले मूक चरखे को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। आश्रम परिसर में सुबह से ही आधुनिक लक्जरी कारों में सवार होकर नए खादी ब्रांडों के फैशन डिजाइनरों, खादी बोर्ड के बड़े अफसरों और सफेदपोश नेताओं की कतारें लग रही थीं। मंच से चरखे की महिमा और स्वदेशी से आत्मनिर्भरता पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए कॉरपोरेट कतिहारों और सूट-बूट पहने मेहमानों को दालान के कोने में रखे उस धूल भरे लकड़ी के चरखे से कोई सरोकार नहीं था। आश्रम का पुराना चपरासी दयाराम जब भी हाथ में सूत की कताई का टोकरा लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे दयाराम आज गांधी जयंती के इस मेले में इस खाली चरखे पर किसी गरीब बुनकर का कच्चा धागा चढ़ने की कोई उम्मीद जगी क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की रेशमी चादरें ही बांटी जा रही हैं?” दयाराम बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

खादी संवर्धन बोर्ड में हाल ही में राजधानी के कुटीर उद्योग मंत्रालय से नए क्षेत्रीय मुख्य कार्यकारी निदेशक बनकर आए साहब अनिमेष वाजपेयी बहुत ही कड़क, आधुनिक कॉरपोरेट टेक्सटाइल के जानकार और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए डिजिटल खादी शो-रूम का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे गंगाधर जी पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस दालान में रखे बिना सूत के चरखे पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को गांधी जयंती के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और वैश्विक खादी फैशन वीक के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक पुराने कबाड़ चरखे के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और भवन के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य चरखा कताई सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे गंगाधर जी के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य दालान का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई स्वतंत्रता सेनानी आश्रित पेंशन या मुफ़्त खादी कूपन की पर्ची बनवानी है तो भीतर दफ्तर में जाकर बाबू से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर दालान में रखे एक पुराने बेकार चरखे को घूरने से इस देश के बुनकरों की कंगाली दूर नहीं होने वाली है।” गंगाधर जी ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “निदेशक साहब मैं किसी पेंशन या मुफ़्त के कूपन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस चरखे पर वह खोया हुआ स्वाभिमान वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए स्वाभिमान की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस गांधी जयंती पर करोड़ों का बजट जारी करके खादी पर विशेष छूट दे रही है और आधुनिक सोलर चरखे बांट रही है, फिर आपके इस पुराने सागौन के चरखे का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त कताई मास्टर पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस आश्रम की हर तकली और हर सांस के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “निदेशक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस जिले में विदेशी पॉलिस्टर और सिंथेटिक धागों ने हाथ से सूत कातने वाले गरीब बुनकरों के चूल्हे बुझा दिए थे तब काका के इकलौते बेटे सत्यकाम ने इसी दालान में खड़े होकर बापू के ग्राम स्वराज की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “सत्यकाम ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस खाली चरखे से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब सत्यकाम उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और स्वाभिमानी युवा गांधीवादी शोधार्थी था, जब मिल मालिक बुनकरों को कौड़ियों के भाव धागा देकर उनका खून चूसते थे तब सत्यकाम ने रात-दिन पसीना बहाकर सैकड़ों गरीब परिवारों को इसी चरखे पर सूत कातना सिखाया था, उसने इस चरखे की चाक को घुमाकर कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे के अंतिम नंगे बदन मजदूर को अपने हाथ से बुना कपड़ा नहीं मिल जाएगा तब तक वह किसी बड़ी विदेशी टेक्सटाइल मिल के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

गंगाधर जी ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस चरखे की गोल चाक को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे सत्यकाम ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह चरखा केवल लकड़ी का ढांचा नहीं बल्कि हिंदुस्तान की आजादी और गरीब की रोटी का पहिया है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय ग्रामीण खादी आयोग का सबसे बड़ा स्वायत्तता आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस चरखे पर नया सूत चढ़ाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े अहिंसा मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी खादी सहकारी संघ की मूल फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब सत्यकाम ने खादी के नाम पर नकली कपड़े बेचने वाले माफियाओं की पोल खोली थी तो दुनिया की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय सिंथेटिक गारमेंट और लक्जरी फैशन लॉबी ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए सत्यकाम को अपनी अंतरराष्ट्रीय डिजाइनर क्लोदिंग कंपनी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। सत्यकाम ने अपने सारे आदर्शों और उस चरखे का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा लक्जरी खादी टाइकून बन गया जो आज उसी खादी के नाम पर हजारों रुपए का एक-एक कुर्ता विदेशों में बेचकर गरीब बुनकरों को भुखमरी के कगार पर धकेलने का सबसे बड़ा सौदागर था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि सत्यकाम तो खुद बापू के सपनों का सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर गांधी जयंती पर खादी और सादगी का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही कताई करने वाले बाप के हाथों का सूत छीनकर उसे विदेशी फैशन के बाजार में नीलाम कर देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई आजादी के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस बिना सूत के चरखे को ताकते रह गए और पूरा खादी भवन उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४९ – लोहे का पुराना पिंजरा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – लोहे का पुराना पिंजरा।)  

☆  चुभते तीर # १४९ – व्यंग्य  – लोहे का पुराना पिंजरा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे से सटे राष्ट्रीय वन्यजीव अभयारण्य के मुख्य वन जांच नाके की कंटीली बाड़ के सहारे लोहे की सींकों वाला एक पुराना और जंग लगा पिंजरा पिछले बीस सालों से एक भारी खूंटे पर टँगा हुआ था जिसका छोटा सा दरवाजा हमेशा खुला रहता था। उस पिंजरे की पपड़ीदार जर्जर सींकों पर कभी वन्यजीवों के बचाव का प्रतीक बना हुआ था जो अब धूल और बारिश की मार से स्याह हो चुका था। उस नाके के ठीक नीचे पत्थर के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही धरमपाल काका अपनी शीशम की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला अंगोछा डाले धरमपाल काका दिन भर उस खुले हुए लोहे के पिंजरे को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। अभयारण्य के प्रवेश द्वार पर सुबह से ही सफारी जिप्सियों, वातानुकूलित कारों और वन विभाग के बड़े-बड़े अधिकारियों की गाड़ियों का तांता लगा हुआ था। मंच से मूक वन्यजीवों के प्रति करुणा और वन रक्षा पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे। उन नए वन्यजीव विशेषज्ञों और सूट-बूट पहने अफसरों को बाड़ के कोने में लटके उस पुराने कबाड़ पिंजरे से कोई सरोकार नहीं था। नाके का पुराना वन रक्षक मंगलू जब भी हाथ में चाय की केतली लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती और धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे मंगलू आज वन्यजीव सप्ताह के इस मेले में इस पिंजरे के खुले दरवाजे से किसी बेजुबान का दर्द समझने का कोई आदेश आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की घास ही चरवाई जा रही है?” मंगलू बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

अभयारण्य में हाल ही में राजधानी के केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से नए क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए डिजिटल निगरानी केंद्र का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे धरमपाल काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस बाड़ पर लटके पुराने पिंजरे पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को वन्यजीव सप्ताह के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और जीपीएस ट्रैकिंग के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक पुराने कबाड़ पिंजरे के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और नाके के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य उद्घाटन सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में काजू बादाम का नाश्ता करने चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे धरमपाल काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य नाके का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई वन आश्रित पेंशन या लकड़ी बीनने का परमिट चाहिए तो भीतर दफ्तर में जाकर क्लर्क से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर बाड़ पर टँगे एक पुराने बेकार पिंजरे को घूरने से इस जंगल के जानवरों की सुरक्षा नहीं होने वाली है।” धरमपाल काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “संरक्षक साहब मैं किसी पेंशन या मुफ़्त की लकड़ी की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस पिंजरे में वह खोया हुआ विश्वास वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए विश्वास की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस वन्यजीव सप्ताह पर करोड़ों का बजट जारी करके बेजुबानों के लिए नए प्राकृतिक गलियारे बना रही है, फिर आपकी इस पुरानी लोहे की जाली का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त वनपाल पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस जंगल के हर पेड़ और हर शिकारी के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “संरक्षक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे वन क्षेत्र में शिकारियों और तस्करों ने बेजुबान वन्यजीवों का संहार करना शुरू किया था तब काका के इकलौते बेटे समरेश ने इसी चौपाल पर खड़े होकर मूक जीवों के प्राणों की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “समरेश ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस पुराने पिंजरे से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब समरेश उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और स्वाभिमानी युवा प्राणी विज्ञानी था, जब शहर के बड़े तस्कर तेंदुओं और हिरणों की खालें नोचते थे तब समरेश ने जंगलों में रात-रात भर भटक कर घायल जानवरों को इसी पिंजरे में रखकर उनका इलाज किया था, उसने इस पिंजरे का दरवाजा हमेशा खुला रखकर कसम खाई थी कि जब तक इस जंगल के अंतिम जानवर को स्वतंत्र सांस लेने की गारंटी नहीं मिल जाएगी तब तक वह किसी बड़ी विदेशी सफारी लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

धरमपाल काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस पिंजरे की जंग लगी सींक को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे समरेश ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह पिंजरा केवल लोहे का ढांचा नहीं बल्कि कैद से आजादी की हिफाजत करने वाली चौखट है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड का सबसे बड़ा अभयारण्य सुरक्षा आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस पिंजरे को संग्रहालय में रखवाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े पर्यावरण मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी वन रक्षा प्रोजेक्ट फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब समरेश ने अंतरराष्ट्रीय तस्करों के सिंडिकेट की पोल खोली थी तो विदेशी निजी जू और लक्जरी सफारी रिसॉर्ट्स की लॉबी ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए समरेश को अपनी अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव पर्यटन कंपनी का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त हिस्सेदारी देकर खरीद लिया था। समरेश ने अपने सारे आदर्शों और उस पिंजरे का वास्ता ताक पर रखकर उन गोपनीय परमिटों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति वाइल्डलाइफ रिजॉर्ट टाइकून बन गया जो आज उसी जंगल के जानवरों को विदेशी रईसों के मनोरंजन के लिए निजी बाड़ों में कैद करने का सबसे बड़ा सौदागर था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि समरेश तो खुद बेजुबानों का सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर वन्यजीव सप्ताह में बेजुबान जानवरों से प्यार का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही वनवासी बाप के खुले पिंजरे का सौदा करके जंगल के राजा को सर्कस का खिलौना बना देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई संवेदना से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस खाली पिंजरे को ताकते रह गए और पूरा वन नाका उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४८ – चमड़े की पुरानी नाल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चमड़े की पुरानी नाल।)  

☆  चुभते तीर # १४८ – व्यंग्य  – चमड़े की पुरानी नाल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राजकीय पशु चिकित्सालय के मुख्य बरामदे की चौखट के पास मोटी कील के सहारे लोहे की नाल जड़ी चमड़े की एक घिसी हुई पुरानी पट्टी पिछले बीस सालों से लटकी हुई थी जिसकी सिलाई वक्त और धूप की मार से उधड़ चुकी थी। उस खुरदरी नाल पर कभी बेसहारा बैलों और घोड़ों के खुरों को घाव से बचाने वाले स्नेह की चमक थी जो अब गर्द और सीलन की परत में बिल्कुल खो चुकी थी। उस चौखट के ठीक नीचे ईंटों के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही हरदेव काका अपनी बांस की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला गमछा डाले हरदेव काका दिन भर उस पुरानी नाल को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। अस्पताल परिसर में सुबह से ही आधुनिक पशु एम्बुलेंस गाड़ियों, विदेशी नस्ल के पालतू कुत्तों के ब्यूटी पार्लर उत्पादों और पशु कल्याण बोर्ड के बड़े अफसरों की चमकती गाड़ियों का तांता लगा हुआ था। मंच से मूक पशुओं के प्रति करुणा और दया पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे पर उन नए डॉक्टरों और सूट-बूट पहने अफसरों को बरामदे के कोने में लटकी उस घिसी हुई पुरानी नाल से कोई मतलब नहीं था। अस्पताल का पुराना ग्वाला सुखराम जब भी हाथ में चारे का गट्ठा लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती आवाज में उससे पूछते “क्यों रे सुखराम आज विश्व पशु दिवस के इस मेले में इस पुरानी नाल से किसी बूढ़े बैल के खुर का दर्द नापने का कोई हुक्म आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की घास ही चरवाई जा रही है?” सुखराम बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

चिकित्सालय में हाल ही में राजधानी के पशुपालन सचिवालय से नए मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक वेटरनरी सर्जरी के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए वातानुकूलित ऑपरेशन थियेटर का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे हरदेव काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस चौखट पर लटकी पुरानी नाल पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को विश्व पशु दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और विदेशी पेट क्लिनिकों के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक कबाड़ चमड़े की पट्टी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और अस्पताल के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में भोजन के लिए चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे हरदेव काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य रास्ते में क्यों बैठते हैं, अगर आपको कोई पशुपालक किसान पेंशन या मुफ़्त टीके की पर्ची बनवानी है तो भीतर ओपीडी काउंटर पर जाइए, इस तरह बाहर बैठकर चौखट पर लटकी एक बेकार लोहे की नाल को घूरने से इस देश की सड़कों पर घूमती लावारिस गायों का पेट नहीं भरने वाला है।” हरदेव काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “अधिकारी साहब मैं किसी मुफ़्त के टीके या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस नाल में वह खोया हुआ दर्द वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए दर्द की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस पशु दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके आवारा पशुओं के लिए आधुनिक गौशालाएं बनवा रही है, फिर आपकी इस पुरानी घिसी नाल का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त पशुधन प्रसार अधिकारी पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस अस्पताल के हर खुर और हर घाव के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “चिकित्सा अधिकारी साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे इलाके में बूढ़े और बीमार बैलों को कसाईखानों में धकेलने की क्रूरता चरम पर थी तब काका के इकलौते बेटे मानस ने इसी चौपाल पर खड़े होकर मूक पशुओं के प्राणों की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस लोहे की नाल से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और संवेदनशील युवा पशु चिकित्सक था, जब व्यापारी काम से छूटे बूढ़े बैलों को भूखा मारकर लावारिस छोड़ देते थे तब मानस ने रात-रात भर जागकर उनके रिसते खुरों पर यही नाल बांधी थी, उसने इस नाल को चौखट पर टांगकर कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे के अंतिम मूक जानवर को जीने का अधिकार नहीं मिलेगा तब तक वह किसी बड़ी विदेशी लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

हरदेव काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस नाल के चमड़े को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह नाल केवल लोहे का टुकड़ा नहीं बल्कि बेजुबानों के आंसुओं की ढाल है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय पशु संरक्षण बोर्ड का सबसे बड़ा अभयारण्य आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस नाल पर सरसों का तेल लगाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े पशु सेवा मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी पशु रक्षा फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने अवैध वधशालाओं और पशु अंगों की तस्करी की पोल खोली थी तो बहुराष्ट्रीय पशु चारा और लेदर एक्सपोर्ट कंपनियों के सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी अंतरराष्ट्रीय पेट फूड और लेदर कॉर्पोरेशन का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस नाल का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति मीट प्रोसेसिंग टाइकून बन गया जो आज उसी कस्बे के बूढ़े जानवरों को काटकर विदेशी पालतू कुत्तों के लिए डिब्बाबंद खाना बनाने का सबसे बड़ा कारखाना चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि मानस तो खुद बेजुबानों का सबसे बड़ा कसाई बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर विश्व पशु दिवस पर मूक प्राणियों पर दया का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही ग्वाले बाप की इस नाल को मुनाफे की भट्टी में झोंककर जानवरों की हड्डियों का व्यापार करते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई करुणा के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस लटकी हुई नाल को ताकते रह गए और पूरा पशु चिकित्सालय उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ७० ☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ।)

☆ शेष कुशल # ७० ☆

☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” – शांतिलाल जैन ☆

लोकतंत्र जम्बूदीप में भी है. जाहिर है वहाँ एक संसद भी है और संसद की कार्यवाही को कवर करनेवाले न्यूज़ चैनल भी. यू-ट्यूब पर उपलब्ध ऐसे ही एक चैनल के बुलेटिन का ट्रांसक्रिप्ट कुछ इस प्रकार है.

“नमस्कार. मैं हूँ अनाम और आप देखना शुरू कर चुके हैं दी जम्बूदीप टाइम्स. सरकार ने आज संसद में दो अधिनियम प्रस्तुत किए, जिन्हें भारी हंगामे के बीच बिना बहस के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया. आज के बुलेटिन में हम दोनों कानूनों पर विस्तार से बात करेंगे.

पहला है मिनिमम वेजेस फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून के तहत देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को एक करोड़ रुपए रोज़ाना की न्यूनतम आय की गारंटी प्रदान की गई है. इसे हर पाँच साल में संशोधित किया जाएगा और प्राइस इंडेक्स के अनुसार इसमें वृद्धि की जा सकेगी. उद्देश्य है रिच लाइफ़ स्टाइल में जीवनयापन के लिए एक तयशुदा बुनियादी आय का भरोसा दिलाया जाना.

दूसरा है वेल्थ क्रिएशन एंड एसेट होल्डिंग फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून में देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को उनके क़ब्ज़े में अब तक आ चुकी राष्ट्र की चालीस प्रतिशत संपदा में कमी नहीं आने देने की गारंटी प्रदान की गई है. उद्देश्य है अमीरों को गरीब होने से बचाना. कानून यह सुनिश्चित करेगा कि कल को आर्थिक समानता लाने की सनक में कोई सिरफिरा जननायक अमीरों की संपदा कम न कर बैठे.

सूत्र बताते हैं कि अंदरखाने सरकार चिंतित है कि कुछ बिजनेस टाइकून्स और टॉप सीईओज की इनकम और सैलरी लगातार घट रही है. कहीं कहीं तो यह पचपन लाख रुपए प्रतिदिन तक रह गई है. जबकि उनकी फैक्ट्रियों में मजदूरों की आय पंद्रह बेसिस पॉइंट के इज़ाफ़े के साथ तीन सौ पंद्रह रुपए रोज़ हो गई है. ऐसे में सुपर रिच सेगमेंट को शोषण से बचाने की जरूरत महसूस की जा रही थी. प्रस्तावित क़ानून यह देखेगा कि बिजनेस टाइकून्स की इनकम बेंच मार्क इनकम से कम न होने पाए. यदि ऐसी स्थिति निर्मित होती है तो शासन इंसेटिवाइज करके अंतर की राशि की आपूर्ति करेगा. बिल पेश करते हुए सरकार ने इसे कल्याणकारी राज्य की दिशा में एक जनहितकारी कदम बताया है.

कॉर्पोरेट फंडेड थिंक टैंक के एक अर्थशास्त्री से हमने कुछ देर पहले बात की. उन्होंने जम्बूदीप टाइम्स को बताया कि सुपर रिच परिवार इन दिनों फाइनेंशियल स्ट्रेस से गुजर रहे हैं. एक करोड़ रुपए रोज़ की मामूली आमदनी से घर खर्च बमुश्किल निकल पाता है. निजी विमान से यात्रा का खर्च,  विदेशों में होने वाली कांफ्रेसेज का खर्च,  प्राईवेट आईलैंड पर हॉलिडेईंग का खर्च और परिवार में परिणय-प्रसंग पड़ जाए तो चार-पाँच हज़ार करोड़ की मामूली सी रकम में सादगी से निपटाने की मजबूरी. स्थिति इतनी गंभीर है कि पाँच सितारा होटल्स में दो जून की रोटी का खर्च निकालपाना दुश्वार होता जा रहा है. अधिनियमों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित जम्बूदीप बनाने के लिए गरीबों को अमीरों के पक्ष में त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. सरकार के विधिक सलाहकारों का अभिमत है कि तीन सौ रुपए रोजाना कमाने की लक्झरी में जी रही पचास प्रतिशत आबादी स्वेच्छा से कुर्बानी न दे तो शासन क़ानून बनाकर ऐसी कुर्बानी ले सकता है, लेना भी चाहिए. गरीब और मध्यम वर्ग की कुर्बानियाँ जीएसटी के रूप में हो सकती हैं. बढ़ी हुई आयकर की दरों के रूप में या सर्विस चार्जेज के रूप में भी हो सकती है, जल, जंगल, जमीन के अधिग्रहण के रूप में भी.

अधिनियम पारित होने के बाद जननायक ने प्रेस से बात करते हुए कहा है कि आर्थिक समानता की बात करनेवाले बुद्धिजीवी जम्बूदीप में अराजकता फैलाना चाहते है. पचास प्रतिशत आबादी के पास देश की संपदा का छह प्रतिशत हिस्सा अभी भी  है. यह विलासिता है. संपत्ति रखने की उसे जरूरत ही क्या है?  रोज़ कमाना रोज़ खाना है. पाँच किलो अनाज हम दे ही रहे हैं, उतना अपने पास रखकर शेष अमीरों में बाँट देना चाहिए.

अधिनियम को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए सरकार ने एक रोडमैप भी बनाया है. मान लो किसी बड़े घराने की संपदा घटने लगी तो सरकार उसे एक दो हवाई अड्डे देगी,  कुछेक सी-पोर्ट दे देगी,  कुछ खदानें,  नॉमिनल दरों पर जमीन और कॉर्पोरेट टैक्स में छूट देकर उन्हें गरीब होने से बचाएगी. लोन के डिफाल्टर हुए तो नब्बे प्रतिशत से ज्यादा का हेयरकट देकर भी उनके सुपर रिच स्टेटस की रक्षा करेगी. सरकार अपनी प्राथमिकताएँ समझती है, अमीरों को और अधिक अमीर बनाना सरकार की प्राथमिकताओं में हमेशा ही शुमार रहा है.

अधिनियम के प्रावधानों में कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रेष्ठीजनों में वर्गीकरण नहीं किया गया है. जो कुशल है वो धनाढ्य भी हो यह जरूरी नहीं है. जो धनाढ्य है वो कुशल है. प्रस्तावित अधिनियम में संरक्षण पाने का अधिकारी है. इस अधिनियम में कार्य घंटे और कार्य दिवस भी परिभाषित नहीं किए गए है. ‘वंस ए अमीर इज आलवेज ए अमीर’ के सिद्धांत का अनुपालन किया गया है. विपक्ष ने इन दोनों अधिनियमों का विरोध किया है लेकिन हमने अपनी पड़ताल में पाया है कि जब वे ट्रेझरी बेंच पर क़ाबिज़ थे तब उनकी नीतियाँ भी प्रो-रिच-सुपर-रिच ही रहीं. बहरहाल, पूरे जम्बूदीप में सरकार के इन क़दमों का स्वागत किया जा रहा है. सुपर रिच खुश तो हैं लेकिन न्यूनतम दैनिक आय एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ रुपए रोज़ाना करने की मांग भी कर रहे हैं.

दोनों अधिनियमों पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ. अभी के लिए बस इतना ही. नमस्कार”

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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