हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७३ – व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७३ – व्यंग्य – भक्त और ऑनलाइन समीक्षाएँ ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

पवित्रता और श्रद्धा का वह युग, जब भक्त मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपनी धूल-धूसरित चप्पलों के साथ अहंकार को भी बाहर छोड़ आते थे, अब समाप्त हो चुका है। अब तो भक्त नहीं, बल्कि ‘ग्राहक-उपभोक्ता’ आते हैं, जिनके हाथों में धूप-दीप की जगह चमचमाता स्मार्टफोन होता है और मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रश्न गूँजता है: “मैंने समय दिया, पैसा चढ़ाया, अब रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) क्या है?” यह युग ‘त्वरित मोक्ष’ (Instant Salvation) का है, जहाँ आस्था भी एक ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म बन गई है। मंदिर, जो कभी आत्मा की शांति का आश्रय थे, आज गूगल मैप्स पर तीन-सितारा रेटिंग वाले एक पर्यटन स्थल से ज़्यादा कुछ नहीं। सबसे हृदयविदारक दृश्य तब उत्पन्न होता है जब कोई भक्त बाहर आकर अपनी निराशा को व्यक्त करता है: ‘भगवान को चार बार आवाज़ दी, कोई जवाब नहीं आया, प्रसादी भी ठंडी थी, इसलिए एक स्टार!’ यह समीक्षा केवल एक ऐप पर दर्ज की गई टिप्पणी नहीं है; यह उस उपभोक्तावादी संस्कृति का महाकाव्य है, जिसने ईश्वर को भी एक विफल सर्विस प्रोवाइडर बना दिया है, और यह मन को झकझोरने वाला सत्य है कि हम अपनी समस्याओं के तत्काल समाधान की चाह में, धैर्य और विश्वास की अपनी सदियों पुरानी पूंजी को नष्ट कर चुके हैं।

यह ‘वन स्टार’ की विडंबना ही हमारे समय का सार है। भक्त की अपेक्षाएँ किसी प्रीमियम मेंबरशिप वाले ग्राहक से कम नहीं होतीं। उन्होंने लाइन में खड़े होकर ‘वीआईपी दर्शन’ के लिए अतिरिक्त शुल्क दिया है, उन्होंने अपनी अर्जी (चिट्ठी) बाकायदा ड्रॉप-बॉक्स में डाली है, तो अब उनके ‘ईष्ट देव’ को तत्काल प्रकट होकर, कम से कम, उनकी नौकरी की तरक्की या बेटी के विवाह की गारंटी तो देनी ही चाहिए थी। भक्त यह भूल गया है कि यह मंदिर किसी ’24×7 कॉल सेंटर’ का ब्रांच ऑफिस नहीं है, जहाँ शिकायत दर्ज होते ही ‘अगले तीन मिनट’ में समस्या का निवारण हो जाएगा। वे भूल गए हैं कि आध्यात्मिक यात्रा एक ‘स्लो बफरिंग’ वाली लंबी फ़िल्म है, जिसे देखने के लिए धैर्य का डेटा पैक चाहिए, न कि ‘फास्ट-फॉरवर्ड’ बटन। यह त्रासदी केवल भगवान की अनुपस्थिति की नहीं है, बल्कि भक्त के भीतर से उस ‘अदृश्य विश्वास’ की अनुपस्थिति की है, जो बिना किसी सबूत या गारंटी के भी, अपनी यात्रा को जारी रखता था। हम प्रमाणिकता और दृश्यता के इतने आदी हो चुके हैं कि जो चीज़ आँखों से ओझल है, उसे हम स्वचालित रूप से ‘फ़र्जी’ मान लेते हैं।

आस्था का यह बाजारीकरण दरअसल हमारी आत्मिक दरिद्रता का प्रमाण है। जब जीवन की जटिल समस्याएँ (जैसे कि ईएमआई का बोझ, या बॉस का अत्याचार) हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तो हम त्वरित समाधान के लिए दौड़ते हैं, और मंदिर हमें एक ‘मैजिक पिल’ बेचने वाली दुकान लगने लगती है। भक्त यह उम्मीद करता है कि अगर वह एक ‘मेगा डोनेशन’ देता है, तो उसकी फाइल भगवान के इनबॉक्स में सबसे ऊपर चली जाएगी, क्योंकि वह ‘प्रीमियम ग्राहक’ है। वह नहीं समझता कि ब्रह्मांड की व्यवस्था किसी ‘फ़र्स्ट कम, फ़र्स्ट सर्व’ की नीति पर नहीं चलती, और वहाँ कोई ‘सुपर एडमिन’ विशेष लाभ नहीं देता। इस हृदयविदारक नाटक में, भक्त की आँख में एक आँसू भी है—वह आँसू जो उसकी गहरी असुरक्षा और खालीपन को दर्शाता है। वह सचमुच डरा हुआ है और उसे किसी सहारे की ज़रूरत है, लेकिन सहारा ढूँढने के लिए उसने जिस आधुनिक ‘समीक्षा-आधारित’ प्रणाली को चुना है, वह उसकी आस्था को और खोखला कर रही है, क्योंकि जब वह ‘एक स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में भगवान को नहीं, बल्कि अपने ही टूटे हुए विश्वास को रेटिंग दे रहा होता है।

इस ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की बीमारी ने भगवान के अस्तित्व के पूरे सिद्धांत को ही विकृत कर दिया है। ज़रा सोचिए, अगर यह रेटिंग प्रणाली व्यापक हो जाए तो क्या होगा: किसी गरीब ने मन्नत माँगी और लॉटरी नहीं लगी, वह तुरंत आकर लिखेगा: ‘गॉड ऑफ़ लक, फ़ेल! 0/100, विल नॉट रेकमेंड।’ किसी धनी व्यापारी को थोड़ी सी हानि हुई, वह लिखेगा: ‘पोर्टफोलियो मैनेजमेंट बहुत ख़राब है, एआई (AI) आधारित आशीर्वाद की ज़रूरत है।’ मंदिरों को शायद अब एक ‘फ़ॉलोअप टीम’ रखनी पड़ेगी जो भक्तों को फ़ोन करके पूछे: ‘सर, क्या आपको हमारी कृपा प्राप्त हुई? क्या आप हमारे ‘दिव्य समाधान’ से संतुष्ट हैं?’ यह सब इतना मन को झकझोर देने वाला है, इतना तर्कहीन है कि दिमाग चकरा जाता है। हमने ‘कर्म’ को ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ में बदल दिया है और ‘मोक्ष’ को ‘इंस्टॉलेशन प्रोसेस’ मान लिया है। हमारी समस्या यह नहीं है कि हमें भगवान नहीं मिले, हमारी समस्या यह है कि हमने भगवान को ढूँढने का सही पता ही भुला दिया है।

इस पूरे तंत्र में सबसे दयनीय प्राणी है पुजारी। वह बेचारा अब ‘कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजर’ बन गया है। उसकी धोती भले ही पवित्र हो, लेकिन उसकी ज़िम्मेदारियाँ कॉर्पोरेट हैं। वह सुबह उठकर भगवान का अभिषेक करता है या भक्तों की शिकायतों का निवारण? भक्त आकर उस पर चिल्लाता है: ‘महाराज, मेरे बेटे को विदेश की वीज़ा फाइल को पास क्यों नहीं कराया? पिछली बार मैंने आपको अच्छा दक्षिणा दिया था!’ पुजारी, जो कभी आत्मज्ञान का वाहक था, अब ‘फ़्रंटलाइन एग्जीक्यूटिव’ है, जिसे ‘फ़ॉल्टी ग्रेस’ या ‘अन-डिलीवर्ड मिरेकल’ की शिकायतें संभालनी हैं। मंदिर प्रबंधन (जो शायद एक ट्रस्ट का ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ है) उस पर ‘ग्रोथ’ और ‘ईश्वर के विज़िबिलिटी स्कोर’ बढ़ाने का दबाव डाल रहा है। पुजारी अपनी माला जपता है और मन ही मन सोचता है: ‘हे प्रभु, या तो इन्हें असली ज्ञान दो, या मुझे इस रिव्यू सिस्टम से मुक्ति दो।’ यह तनावपूर्ण स्थिति इतनी हृदयविदारक है कि हम इसमें छिपे हुए सच्चे आध्यात्मिक सेवक के दुख को अनदेखा कर देते हैं।

यह व्यवहार, दरअसल, एक ‘आस्था का फ़ास्ट फ़ैशन’ है, जिसमें सब कुछ क्षणिक और खर्च करने योग्य है। आज का भक्त ‘ईश्वर के साथ संबंध’ नहीं चाहता, वह ‘ईश्वर से सौदा’ चाहता है। वह अपने जीवन को एक ‘टू-डू लिस्ट’ के रूप में देखता है, जहाँ भगवान की ज़िम्मेदारी है कि वह सबसे मुश्किल ‘टास्क’ को पूरा करें। वे भूल गए हैं कि ‘आस्था’ एक लंबी अवधि का निवेश है, जिसके लाभ तुरंत नहीं दिखते, बल्कि जीवन के अंतिम खाते में जुड़ते हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ तथ्य है कि हम, जो अपनी मर्ज़ी से मंदिर आते हैं, जब अपनी इच्छा पूरी नहीं होती, तो सार्वजनिक रूप से ‘ईश्वर की गुणवत्ता’ पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। क्या किसी भक्त ने कभी अपनी ‘बुरी आदतों’ को ‘वन स्टार’ दिया है? क्या किसी ने अपने ‘क्रोध’ या ‘लालच’ के लिए ‘रिफंड’ माँगा है? नहीं। हम अपनी विफलताओं का दोष एक अदृश्य शक्ति पर मढ़ने में अत्यधिक कुशल हो चुके हैं, क्योंकि ऐसा करना हमारी ज़िम्मेदारी को आसान बना देता है।

विडंबना यहीं खत्म नहीं होती। कुछ भक्त ‘अच्छी’ समीक्षाएँ भी लिखते हैं, लेकिन उनका आधार भी उतना ही खोखला होता है। ‘मैंने 100 रुपए चढ़ाए थे, और रास्ते में 1000 रुपए का नोट मिल गया। 5 स्टार! बेहतरीन सेवा!’ इस तरह की समीक्षाएँ साबित करती हैं कि ईश्वर को भी अब ‘चमत्कार-वितरण’ (Miracle-Delivery) के आधार पर मापा जा रहा है। वे यह नहीं समझते कि शायद उस दिन उन्हें 1000 रुपए का नोट इसलिए मिला होगा ताकि वे यह जानें कि लालच और कृतज्ञता में क्या अंतर है। लेकिन नहीं, उनके लिए तो भगवान एक उच्च-रिटर्न वाली ‘म्यूचुअल फंड स्कीम’ हैं। यह ‘मन को झकझोरने वाला’ है कि हमने अपनी आध्यात्मिकता को पूरी तरह से भौतिक लाभ और लेन-देन तक सीमित कर दिया है, और इस प्रक्रिया में हमने उस ‘निःस्वार्थ प्रेम’ को खो दिया है जो बिना किसी अपेक्षा के भक्ति की नींव रखता था। यह प्रेम, यह निःस्वार्थता ही वह चीज़ है जिसे हमने सबसे सस्ता समझा और जिसे सबसे पहले ऑनलाइन बाज़ार में बेच डाला।

अंत में, यह कथा भगवान की विफलता की नहीं, बल्कि हमारी मानव जाति की आधुनिक विफलता की है। हमने एक ऐसी दुनिया बना ली है जहाँ हर अनुभव को रेटिंग दी जाती है, जहाँ हर भावना को इमोजी में समेटा जाता है, और जहाँ ‘विश्वास’ का अर्थ ‘गारंटी’ बन गया है। जब भक्त बाहर आकर ‘वन स्टार’ देता है, तो वह वास्तव में चिल्लाकर कह रहा होता है: “मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, इसलिए तुम्हारा अस्तित्व व्यर्थ है!” यह हमारी ‘उपभोक्ता-केंद्रित’ मानसिकता का अंतिम चरण है, जहाँ हम भगवान को भी अपनी नौकरशाही और उपभोक्ता अधिकारों के अधीन देखना चाहते हैं। हरिशंकर परसाई जी शायद आज यह देखकर आहें भरते कि जिस समाज की उन्होंने आलोचना की थी, वह समाज अब अपनी आलोचना को भी ‘वन स्टार’ देकर आगे बढ़ जाएगा। हमें याद रखना चाहिए: ईश्वर ने हमें आज़ादी दी है, लेकिन हम उस आज़ादी का प्रयोग उन्हें ‘रेटिंग’ देने में कर रहे हैं। काश, हम अपनी आत्मा की गहराई में झाँककर, अपने जीवन को ‘पांच स्टार’ देने लायक बना पाते, न कि अपने मनचाहे परिणाम न मिलने पर उस अदृश्य शक्ति को दोष देते।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९० ☆ ~ न्यूयार्क से ~ “समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है सुश्री संध्या जी द्वारा लिखित पुस्तक  ““समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल…” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९० ☆

☆ ~ न्यूयार्क से ~ “समय के आईने में…” – लेखिका… सुश्री संध्या अग्रवाल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

समय के आईने में

रचनाकार ..संध्या अग्रवाल

चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इस आलेख संग्रह में लेखिका ने जीवन के रोजमर्रा के क्षणों को न केवल दर्ज किया है बल्कि उन्हें एक ऐसे चश्मे से परखा है जो हमें बेहतर तरीके से बताता है कि हम कौन थे, कौन हैं और किन भूलभुलैयों में फँसते जा रहे हैं। पुस्तक का अंदाज़ सीधे-साधे संवाद से दूर है, वह दर्पण की तरह मिलता-जुलता, कभी क्रूर और कभी नम्र, पर हमेशा सच के निकट रहने की जिद पर टिका रहता है। लेखिका ने अपनी दीर्घदृष्टि में छोटे-छोटे अनुभवों को ऐसा पिरोया है कि पाठक को बार-बार वही पुराना सवाल सालता है, क्या हमने समय को समझा, या समय ने हमें समझाने की अपनी कला में हमारी असफलता की लंबीं सूची बना दी।

रचनाकार का शिल्प सूक्ष्म अवलोकन और सटीक भाषा का मेल है। वर्णन में रफ्तार ऐसी है कि वह हमें बीच-बीच में पढ़ना रोककर सोचने पर मजबूर कर देती है। किसी पात्र की एक अदायगी, किसी घटना का एक मामूली संवाद, हर छोटी चीज़ एक बड़े प्रश्न की तरफ संकेत करती है। अभिव्यक्ति के ताने-बाने में जो अर्थ छिपे हैं, उन्हें समझने के लिए पाठक को वही ध्यान देना पड़ता है जो लेखक ने पाठ में दिखाया है। यही वजह है कि पढ़ते समय बार-बार ऐसा लगता है कि लेखक केवल कोई घटना सुनाकर नहीं रह गया, वह हमें स्वयं का पुनर्मूल्यांकन करने का निमंत्रण दे गया है।

पुस्तक का एक प्रमुख गुण इसकी समयबद्धता है। समय यहाँ चलता-फिरता पात्र है जो अपने साथ समाज के मानक, परंपराएँ, और रोज़मर्रा की मोह भंग स्थिति लाता है। लेखिका ने पुराने और नए दोनों समय के चेहरों को एक मंच पर खड़ा कर के उनकी बातचीत करवाई है। यह बातचीत कभी तीखी व्यंग्य बनकर उठती है, तो कभी मद्धम, पर हमेशा चिंतन का आव्हान देती जाती है। समय के साथ टकराव में पैदा होने वाले अभाव और आश्चर्य दोनों का ही लेखिका ने समुचित रूप से विवेचन किया है। पाठक के लिए यह केवल कथा का आनंद नहीं रह जाता, बल्कि वह समय के प्रति अपने स्वभाव का निरीक्षण भी करने लगता है।

रचना में पात्रों का जीवंत उल्लेख है। वे किसी नाटक का बाहरी सेट नहीं, बल्कि हमारी कहानियों के भीतर जीते हुए लोग हैं। उनकी छोटी-छोटी आदतें, उनके शब्द, उनकी असफल प्रेमकथाएँ और नौकरी, त्यौहार, सब कुछ मानो हमारे आसपास की सड़कों, चाय की ठेलियों और सरकारी दफ्तरों की कतारों से उठाकर लाया हुआ है। इस वास्तविकता ने पाठक को किताब के पन्नों से फिर फिरवजुड़े रहने पर विवश किया है। लेखिका की संवेदना पात्रों के भीतर झांकते हुए समाज की विसंगतियों को भी उजागर कर देती है। कहीं पर यह व्यंग्य बनकर निकलता है, कहीं पर यह करुणा का रूप धारण कर लेता है, पर अंततः यह मानवता के प्रति सजगता ही साबित होता है।

भाषा कभी-कभी लोकोक्ति की मिठास के संग है, दार्शनिक विचलन कम है पर वैचारिकता लगातार बनी रहती है। लेखिका कहीं भव्य शब्दों में भटकती नही, वह सीधे उस मसले की गांठ खोलकर रख देती है जिसे हम अनदेखा करते आए हैं।

कथ्य संरचना में पहली दृष्टि में अलग दिखने वाले किस्से धीरे-धीरे एक दूसरे से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं और अंततः एक व्यापक सामाजिक चित्र बनाते हैं। यह ब्रह्माण्डीकरण पाठक को थका कर नहीं छोड़ता, इसके विपरीत, यह तार्किक है। हर छोटा उपकथ्य अंततः मुख्य विषय की परिभाषा में योगदान देता है। इस तरह की रचना में लेखिका का नियंत्रण स्पष्ट है। वह जानती है कब अभिव्यक्ति की रफ़्तार बढ़ानी है और कब ठहरकर तत्कालीन भावना का स्वाद चखाना है।

पुस्तक की गंभीरता के बीच भी हास्य भी है। यह हास्य न केवल पाठक को हंसाता है, बल्कि उसे किसी कटु सत्य से अवगत कराता है जिसे स्वीकार करना हम टालते हैं। व्यंग्य कहे तो उसे साहित्य के भीतर एक सक्षम हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जो सामाजिक बेरुखी और मानवीय दोहरावों पर वार करता है, पर कभी अपमानजनक नहीं होता। यह संतुलन ही लेखक की पकड़ की असली कसौटी है।

पठन के बाद मन में एक शेष भाव रहता है, समय के आईने में जो प्रतिबिंब उभरता है, वह स्थिर नहीं होता। वह बदलता रहता है और बदलते रहने की अपनी मजबूरी में हमें भी लगातार बदलने का आह्वान करता है। लेखिका ने यह नहीं कहा कि परिवर्तन आसान है, पर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि बदलाव से इन्कार करना स्वयं को धोखा देना है। पुस्तक का अंतिम भाव पाठक को एक तरह की जागरूकता और जिम्मेदारी देता है, समय की धारा के साथ समझदारी से तैरने का, और अपनी छोटी-छोटी असमानताओं को पहचानने का आग्रह।

कुल मिलाकर यह कृति सोचने-समझने वालों के लिए एक समृद्ध बौद्धिक उपहार है। यह केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, एक संग्रह योग्य संवाद है। समय से, समाज से और अंततः स्वयं से बातें हैं।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

~ न्यूयार्क से ~ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व… ☆

आज के डिजिटल युग में मनुष्य अपनी ही बनाई दौड़ में थककर गिर रहा है, तब प्रकृति हमें एक शांत, स्थिर और सुकून भरी पुकार देती है—

“रुक जाओ… मेरी गोद में आओ… मैं तुम्हें फिर से जीवन दूँगी।”

हरियाली केवल पेड़–पौधों का रंग नहीं है, यह जीवन का मूल भाव है। जिस दिन मनुष्य से पेड़ छिन जाते हैं, उसी दिन उसकी साँस, उसकी शांति, उसका अस्तित्व भी खोने लगता है। इसीलिए कहा जाता है—

“धरती हर बार देती है… बस लेने वाले हाथ हरे होने चाहिए।”

आज पर्यावरण संकट दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। प्रदूषण बढ़ रहा है, वर्षा घट रही है, तापमान असंतुलित हो रहा है, और धरती अपनी थकान का इजहार कर रही है। किंतु इससे बाहर निकलने का सबसे सुंदर, सरल और प्रभावी उपाय भी वही है—

प्रकृति।

एक पौधा लगाना किसी दान से कम नहीं। यह ऐसा पुण्य है जिसकी छाया हम नहीं, आने वाली पीढ़ियाँ पाती हैं।

जब हम बीज बोते हैं, तो सिर्फ एक बीज नहीं डालते…

हम धरती की धड़कन में एक नई धुन जोड़ते हैं।

बुज़ुर्ग कहते थे—

“पेड़ हमारी छाया नहीं, हमारी शिक्षा हैं।

सिखाते हैं—स्थिर रहो, देते रहो, और किसी से बदले में कुछ मत माँगो।”

हमारे गाँवों और कस्बों की पहचान कभी उनके बरगद, नीम, पीपल और आम के पेड़ों से होती थी। बच्चे पेड़ों पर खेलते थे, रास्ते में यात्री छाया पाते थे, और घरों में हवा ठंडी बहती थी। पर आज इन पेड़ों की कमी ने हमारे जीवन से ठंडक, ताज़गी और अपनापन छीन लिया है।

समय आ गया है कि हम फिर से प्रकृति को उसके सम्मान की जगह दें।

ग्रीन मोटिवेशन का अर्थ सिर्फ पौधा लगाना नहीं, बल्कि अपनी सोच को हरियाली से भरना है।

घर की छत पर दो गमले लगाना—छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव लाती है।

बच्चों को पौधों की देखभाल सिखाना—यह उनके चरित्र में संवेदनशीलता बोता है।

प्लास्टिक कम करना और मिट्टी को जगह देना—यही धरती की असली पूजा है।

हर त्यौहार, हर शुभ काम पर एक पौधा समर्पित करना—यह संस्कृति को हरियाली से जोड़ देता है।

हरियाली कोई विकल्प नहीं… यह जीवन का आधार है।

अगर आज पेड़ बचे रहेंगे, तो कल हमारी पृथ्वी सांस ले सकेगी।

अगर आज हम पौधे लगाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें धन्यवाद देंगी।

आइए मिलकर एक संकल्प लें—

“जहाँ हम खड़े हों, वहाँ जीवन उगे।”

प्रकृति हमें कभी खाली हाथ नहीं लौटाती।

बस हमें उसके साथ चलने की जरूरत है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९ – लघुकथा- नियति – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा  – “नियति”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९ ☆

☆ लघुकथा- नियति ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

“सुन बेटा! आम मत लाना। मगर, मेरे घुटने दर्द कर रहे हैं, उसकी दवा तो लेते आना,”  बुजुर्ग ने घुटने पकड़ते हुए कहा।

“हुँ! ” बेटे ने बेरुखी से जवाब दिया, “दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हो। घुटने दर्द नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?  यूं नहीं कि थोड़ा घूम लिया करें। हाथपैर सही हो जाए।”

बुजुर्ग चुप हो गए मगर पास बैठे हुए दीनदयाल ने कहा, ” सुनो बेटा। यह आपके पिताजी हैं। बचपन में…. . “

“हां हां, जानता हूं अंकल,”  कहते हुए बेटे ने अपने पुत्र का हाथ पकड़ा और बोला, “चल बेटा! तुझे बाजार घुमा लाता हूं।”

यह देखसुन कर दीनदयाल से रहा नहीं गया और अपने बुजुर्ग दोस्त से बोला, “क्या यार! क्या जमाना आ गया? ऐसे नालायक बेटों से उनका पुत्र क्या सीखेगा?”

“वही जो मैंने अपने बाप के साथ किया था और आज मेरा बेटा मेरे साथ कर रहा है। कल उसका बेटा वही करेगा,”  कह कर बिस्तर पर लेटे हुए बुजुर्ग दोस्त अपने हाथों से अपनी आंखों को पौंछ कर अपने घुटने की मालिश करने लगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७४ ☆ बाल गीत – पक्षी अपनी तान में… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७४ ☆ 

☆ बाल गीत – पक्षी अपनी तान में… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।

पैराओलंपिक है प्रेरक

हर बाधा को पार करो।

 *

शीतल ने बिन हाथों के ही

देश के लिए जीता मैडल ।

गौरव, सौरभ हुआ है उज्ज्वल

पैरों में अद्भुत है बल।

 *

जिनके हाथ साथ हैं साथी

प्रेरित हो उपकार करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।।

 *

हार नहीं मानी उनने भी

तन से अंग-भंग हैं चेते।

लक्ष्य बना मंजिल तक पहुँचे

नाव स्वयं ही रहे वे खेते।

 *

जिनका तन है सही सलामत

खुद में सदा सुधार करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।

 *

सदा देश हित जीना अच्छा

सार्थक जीवन करो मगर।

मुश्किल में भी मत घबराओ

तब होगी आसान डगर।

 *

मोबाइल में व्यर्थ न उलझो

कुछ तो अच्छे कार्य करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ८० ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ८० ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- “नो प्रॉब्लेम, बोला” वखरेसाहेब म्हणाले. मनाशी नेमकं कांहीच ठरवलेलं नसल्याने जे आपल्या मनात आहे ते सगळं हातचं काहीही राखून न ठेवता मोकळेपणानं बोलण्याशिवाय दुसरा पर्याय नव्हताच. गेल्या दोन दिवसात यासंदर्भात घडलेलं सगळं आणि त्यावरच्या माझ्या मनात उमटलेल्या त्या त्या वेळच्या प्रतिक्रिया यांचंच उत्स्फूर्त शब्दरूप माझ्याही नकळत मनाच्या तळातून उत्कटतेनं व्यक्त होत राहिलं..! )

“तसं पाहिलं तर प्रभूदेसाई आणि सहस्त्रबुद्धे दोघेही कालपरवापर्यंत तरी माझ्यासाठी अनोळखीच होते. ” मी म्हणालो. ” कदाचित दोघांनाही मी प्रथमच

भेटल्यामुळेही असेल घडलेल्या प्रसंगाकडे मी तिऱ्हाईत नजरेने पाहू शकलो. तरीही या सर्व प्रकरणात दोघांपैकी नेमकं कुणाचं चुकलं याचा खल मधे प्रदीर्घ काळ उलटून गेल्यानंतर आज करणं निरर्थकच वाटतं. तीन वर्षांपूर्वी घडून गेलेल्या गोष्टीचा आज पंचनामा करण्यासारखा तो केवळ एक उपचारच ठरेल. त्याऐवजी ही प्रदीर्घ काळ विलंबित राहिलेली तक्रार सहस्त्रबुध्देंनी विनाविलंब मागे घेण्यासाठी कांही करता येईल कां याचा विचार करणं याक्षणी गरजेचं आहे हे लक्षात घेऊन त्यासाठी काय करायला हवं ते ठरवूया. “

” पण सहस्त्रबुद्धे तक्रार मागं घ्यायला सहजासहजी तयार होतील? “

” सहजासहजी नाही होणार. तो त्यांच्यापुरता तरी प्रेस्टीज इश्यूच बनलेला आहे. प्रभूदेसाईंची भूमिकाही मला तरी तितकीच ताठर आहे असंच वाटतंय. सहस्त्रबुध्देंचं समाधान होईल अशी शिक्षा प्रभूदेसाईंना व्हायला हवी असा त्यांचा आग्रह आहे आणि तोच आपल्यासाठी मोठा अडसर ठरायची शक्यता आहे. प्रभूदेसाईंची चूक आहे असं एक वेळ गृहित धरलं तरी कोणत्या चुकीला काय शिक्षा करायची हे बॅंकेच्या नियमांप्रमाणेच ठरवायला हवं. पण त्याने सहस्त्रबुद्धेंचं समाधान होणं अवघड आहे. त्यांना समजावण्याचा प्रयत्न करावा लागेल पण ते त्यांचा कल पाहून. त्यातून कांही मार्ग सापडला तर प्रभूदेसाईंनाही थोडं नमतं घ्यायला लावणं हे ओघानं आलंच. पण ती नंतरची गोष्ट. “

“प्रभूदेसाईचं खरंच काही चुकलंय असं वाटतंय तुम्हाला? “

“ति-हाईतपणे विचार केला तर हो. मुख्य म्हणजे ‘साॅरी’ या शब्दाचं महत्त्व आणि शक्ती कुणीही कधीच विसरू नये. या प्रकरणात प्रभूदेसाईंनी ती ओळखली नव्हती. स्वत:चं कांहीतरी चुकलंय हे त्यांना योग्यवेळी जाणवलं असतं तर वाद सुरू होण्यापूर्वीच मिटला असता. एक पाऊल योग्यवेळी मागं घेणाराच दहा पावलं पुढं जाऊ शकतो. प्रभूदेसाईंना हे या प्रकरणामुळे कायम लक्षात राहिल असं वाटतं.

दुसरी गोष्ट प्रभूदेसाईंना सहस्त्रबुद्धे आजोबा हे नेहमीच तक्रारखोर म्हणून ‘अनवाॅंटेड कस्टमर’च वाटत असत. उलट

वस्तूस्थिती ही आहे कीं सहस्त्रबुध्दे हे एक साधे पेन्शनर कस्टमर आहेत. बँकेत ते फक्त दोन कारणांसाठीच यायचे. पेन्शन काढायला आणि महागाईभत्ता वाढीचा ठराविक अंतराने मिळणारा फरक जमा झालाय कां हे पहायला. सेंट्रल व स्टेट गव्हर्नमेंट पेन्शनर्सची खाती आणि त्या संदर्भात येणाऱ्या सर्क्युलर्सचा अभ्यास करून देय रक्कम योग्य वेळेत पेन्शनर्स खातेदारांच्या पेन्शनखात्यांमधे जमा करणे ही खरंतर बँकांचीच जबाबदारी. दैनंदिन कामातल्या बिझी शेड्यूलमधे ही किचकट कामे नेहमीच दुर्लक्षित रहाणं हा सार्वत्रिक अनुभवच आहे. बऱ्याच ब्रॅंचेसमधे सहस्रबुद्धेंसारख्या अभ्यासू आणि जाणकार पेन्शनरला एखादा क्लार्क मदतीला देऊन ती सर्क्यूलर्सची माहिती समजून घेऊन त्या कामांना प्राधान्य देणं जाणीवपूर्वक केलं जातंही. स्वतःची नेमकी अडचण सांगून, सहस्त्रबुध्देंशी मोकळेपणाने बोलून पेन्शनर्सच्या संदर्भातली कामे प्रभूदेसाई अशा पद्धतीने सहजसुलभपणे पूर्ण करू शकले असते. पण तसं न करता त्यांच्यावर ‘तक्रारखोर’ असा शिक्का मारून त्यांना मोडीत काढणं प्रभूदेसाईंना सोयीचं वाटलं आणि मन कलुषित व्हायला तेच कारणीभूत ठरलं. निदान ब्रॅंचमॅनेजर या पदावर काम करणाऱ्याने तरी सामोपचार आणि सहकार्य यांचं महत्त्व ओळखून नियमानुसार काम करतानाही सर्वांच्याच हिताचं ठरेल असा अॅप्रोच ठेवायलाच हवा असं मला वाटतं.

त्यादिवशी ज्या मन:स्थितीत सहस्त्रबुद्धे बँकेत आले होते याचा विचार केला तर ब्रँचमधे प्रवेश केल्यापासूनचा प्रभूदेसाईंचा त्यांच्या बाबतीतला अॅप्रोच कुणालाही खटकणं सहाजिकच होतं. सहस्त्रबुद्धेना पाहून ‘आता हा माणूस सकाळी सकाळी माझं डोकं खायला कशाला आलाय? ‘ हाच विचार प्रभूदेसाईंच्या मनात आल्यासारखं ते त्यांना सातत्याने टाळतच राहिले होते. त्यांच्यानंतर आलेल्या महत्वपूर्ण ग्राहकाला प्राधान्यक्रमाने अटेंड करणं चुकीचं नसलं तरी निदान सहस्त्रबुद्धे दुसऱ्यांदा केबिनमधे आले तेव्हा तरी त्यांचं (वरवर कां होईना) हसतमुखाने स्वागत करून, ”काय काम आहे? ” असं अगत्याने विचारून कामाचं स्वरूप ते जाणून घेऊ शकले असते. फक्त बॅंकेचाच विचार करायचा म्हंटलं तरीही क्षणार्धात हातावेगळं करता आलं असतं इतकं किरकोळ काम होतं त्यांचं. पण सहस्त्रबुध्देंच्यासाठी तेच काम अतिशय निकडीचं तर होतंच आणि तितकंच महत्वाचंही. त्या कामाचं स्वरूप समजल्यानंतर तरी प्रभूदेसाई अकाऊंटंला बोलावून त्याच्यावर ते काम सोपवू शकले असते आणि प्रश्न निर्माण होण्यापूर्वीच सुटला असता. पण घडलं वेगळंच. ‘मी बोलावल्यानंतरच त्यांनी केबिनमधे यायला हवं.. ‘ हा प्रभूदेसाईंचा दुराग्रह समर्थनीय नक्कीच नव्हता. निदान एका जबाबदार ब्रॅंच मॅनेजरकडून तरी हे अपेक्षित नव्हतं असं मला वाटतं. बायको नुकतीच गेल्यानंतरची समोर उभ्या एका वृध्द ग्राहकाची मनोवस्था ब्रॅंचमॅनेजरला माहित नसणं गृहित धरलं तरी कांही कामानिमित्त केबिनमधे

आलेल्या सामान्य ग्राहकाला निदान आपुलकीची वागणूक देण्याचं भान तरी त्यांनी राखायला हवं ना? ते राखलं गेलं असतं तर त्या ग्राहकाचं काम लक्षपूर्वक समजून घेता आलं असतं. आणि त्यामुळे त्या वृध्द ग्राहकाच्या मन:स्थितीची जाणीवही त्याने न सांगताच झाली असती. त्यानंतर आपसूकच आलेले सांत्वनाचे दोन शब्दही त्याचं समाधान करायला पुरेसे ठरले असते. पण ते काय सांगताहेत याच्याकडे प्रभूदेसाईंचं पूर्ण लक्षच नव्हतं. या माणसाला कसं घालवायचं एवढाच विचार ते करत होते. त्यामुळे नेमकी वस्तुस्थिती त्यांना समजूच शकली नाही. शिवाय त्यानंतरचं त्यांचं लागट असं तोडून बोलणं तर कुणालाही संताप यावा असंच होतं. या पार्श्वभूमीवरची त्या विशिष्ट मन:स्थितीत सहस्त्रबुध्देंकडून उमटलेली टोकाची प्रतिक्रिया त्यांच्याबद्दल कुणालाही किंव वाटावी अशीच होती. याक्षणी नकळत कां असेना आपल्याकडून अक्षम्य चूक झालीय ही जाणीव प्रभूदेसाईंना होणं अपेक्षित होतं. आणि ती न होणंच पुढच्या अरिष्टाला आमंत्रण देणारं ठरलं. हे सगळं सांगण्यामागे प्रभूदेसाईंच्या सारख्या स्टार परफॉर्मरला दोष देण्याचा माझा उद्देश नाहीये. निर्माण झालेल्या परिस्थितीचं ति-हाईत नजरेनं विश्लेषण करताना जे जाणवलं ते मांडणं आवश्यक वाटलं एवढंच. या सगळ्यामुळे निर्माण झालेलं सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या मनातलं दुखावलेपण समजून घेऊन त्याची तीव्रता कमी करायचा प्रयत्न करणं अगत्याचं आहे असं मला वाटतं. तरच निर्माण झालेला हा प्रश्न पुढे योग्य पद्धतीने सोडवणं सोपं जाईल. “

माझं बोलणं लक्षपूर्वक ऐकत असताना वखरे साहेब कांहीसे गंभीर झाले होते. मी बोलायचं थांबताच ते भानावर आले.

“हे खरंच खूप विचित्र आहे. यापुढं हे प्रकरण आणखी न चिघळता सामोपचारानं मिटवायलाच हवं. प्रभूदेसाईला हे सांगणं फारसं अवघड नाही. मी बोलेन त्याच्याशी. पण सहस्त्रबुद्धेंचं काय? ते हटूनच बसले तर? “

“मी उद्या सकाळीच भेटतो सहस्त्रबुद्धेना. बोलतो त्यांच्याशी. बाकी कांही नाही तरी ते कसा प्रतिसाद देतात हे तरी समजेल. “

त्या दिवसापुरता हा विषय असा अधांतरीच राहिला. मनात विचार सुरू झाले ते उद्या सकाळी त्यांना भेटल्यानंतर काय बोलायचं याचेच.

नियोजित एम्. डी. मिटींगमुळे

निर्माण झालेल्या गंभीर परिस्थितीची थेट कल्पना सहस्त्रबुध्देना देणं आमच्या निर्णयप्रक्रियेत अडसर निर्माण करणारं ठरू शकतं असतं. कदाचित ते ऐकून सहस्त्रबुद्धे प्रभूदेसाईना अडचणीत आणण्यासाठी तडजोड करणं नाकारतील ही भीती होतीच. अधिक उशीर न होता सहस्त्रबुध्देना लवकरात लवकर न्याय मिळावा ही माझ्या मनातली प्रामाणिक भावना योग्य पद्धतीने त्याच्यापर्यंत पोचवणं एवढंच माझ्या हातात होतं. त्यांनी त्याला सकारात्मक प्रतिसाद द्यावा ही इच्छा असूनही मी त्यासाठी काहीच करू शकत नव्हतो. काय करायचं ते ‘तो’ पाहून घेईल असं म्हणून सगळं त्या’च्यावर सोपवण्याशिवाय माझ्या हातात दुसरं होतंच काय?

त्या त्या क्षणापुरते आपल्यासाठी अतिशय महत्त्वाचे ठरणारे असे प्रसंग कधी ना कधी प्रत्येकाच्याच आयुष्यात अचानक निर्माण होतात आणि आता एखादा चमत्कार घडल्याशिवाय यातून मार्ग निघणं शक्यच नाही असं वाटण्याइतके आपण हतबल होऊन जातो. मीही याला अपवाद नव्हतो. अशा प्रत्येकवेळी माझ्या मनावरचं सगळं ओझं ‘तो’च आपसूक उतरवून घेतो. मग जे कांही घडतं ते सहजपणे योगायोगानेच घडलंय असं वाटावं असंच असतं, पण माझ्यापुरता त्या क्षणी तरी तो चमत्कारच असतो. अतिशय अकल्पित आणि ‘त्या’चा परीसस्पर्शच वाटावा इतका अतर्क्यही..!

दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी सहस्रबुद्धे आजोबांच्या दारावरची बेल वाजवली तेव्हा मनात विचार होते ते आता त्यांच्याशी काय बोलायचं याचेच. मनातली हतबलता कधीच विरून गेली होती. अनिश्चिततेचा तर लवलेशही नव्हता. हीच पुढे घडू पहाणाऱ्या चमत्काराची सुरूवात आहे याची मात्र मला त्याक्षणी कल्पनाही नव्हती!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ वाढदिवस… लेख क्र. २२ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे ☆

सौ. गीता वासुदेव नलावडे

? मनमंजुषेतून ?

 ☆ वाढदिवस… लेख क्र. २२ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे ☆

पहिलीच्या वर्गात एक मुलीचा वाढदिवस होता, बाहेर तिची आई बसली होती, म्हटलं, “आज लेकीचा वाढदिवस ना? मग काय विशेष बेत ठरलाय? “

तशा त्या गप्पच बसल्या, मी जेव्हा परत विचारलं, तेव्हा नाईलाजाने म्हणाल्या, “बाई, आम्ही सांगतच नाही तिचा वाढदिवस आहे ते. कारण मग ती हट्ट करते चॉकलेट वाटायचा, सर्व मुलांना घरी बोलवायचा. घरी माझे धाकटे दीर राहतात, असा काही कार्यक्रम असला, कोणी पाहुणे येणार आहेत हे माहित असलं, की मुद्दाम ते दारू पिऊन येतात आणि धिंगाणा घालतात. “

त्या बाई आणि तिचे यजमान आमच्या शाळेच्या मागच्या इमारतीत घरकाम करतात, दोघेही खूप कष्ट करतात. पण मुलीचा वाढदिवस – साधेपणाने का होईना – साजरा करू शकत नाहीत, कारण दारू पिणारा दीर.

अशी किती छोटी बाळं असतील की ज्यांना वाढदिवस म्हणजे काय हेच माहित नसेल.

मला आठवण झाली ती २००५ साली माझ्या वर्गात असलेल्या आणखी एका अशाच मुलाची. तो गावाहून शिक्षणासाठी मुंबईत त्याच्या काकांकडे आला होता. अभ्यासात ठीक ठीकच होता, दुसऱ्यांना मदत करण्यात मात्र आघाडीवर असायचा.

त्याच्या वाढदिवशी, शुभेच्छा पत्र (ग्रीटिंग कार्ड) देऊन त्याचं अभिनंदन केलं, तेव्हा त्याने मला विचारलं, “बाई, वाढदिवस म्हणजे काय? या कार्डाचं मी काय करू? “

मग मी त्याला वाढदिवस म्हणजे काय ते नीट समजावून सांगितलं. रंगपेटी आणि चित्रकलेचं पुस्तक त्याला भेट दिलं. त्याला खूप आनंद झाला.

शेतात अहोरात्र राबणाऱ्या त्याच्या आईवडिलांना बहुधा वेळही नसेल त्याचा वाढदिवस साजरा करायला, किंवा पैसेही नसतील. कामाच्या रगाड्यात कदाचित त्याचा वाढदिवस त्यांच्या लक्षातही राहत नसेल.

अशा मुलांना एखादी छोटीशी भेटवस्तूही आनंद देऊन जाते, आणि त्यांच्या चेहऱ्यावरचा आनंद पाहून आपल्यालाही आनंदित करते.

– लेख क्र. २२ 

© सौ गीता वासुदेव नलावडे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०३ – ☆ कविता – केवल बुद्धि विलास न हो… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “केवल बुद्धि विलास न हो…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०३ ☆

☆ केवल बुद्धि विलास न हो… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

साथ कलम के कदम चले

तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो

अन्तर भी सच्चा हो ।

*

पन्नों पर पन्नें भरते हैं

बड़ी-बड़ी बातें करते हैं

लिखा, कहा जो भी है, उस पर

खुद ही कहाँ अमल करते हैं,

तोलें खुद को, फिर बोलें तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो…।

*

जीवन में कुछ ऐसा कर दें

सबके मन में खुशियां भर दें

अंधियारा हो जहाँ, वहाँ पर

दीपक आशाओं का धर दें,

रोते शिशु को अगर हँसा दें, कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो…।

*

जन-मन में अमृत रस घोलें

मीठे बोल सभी से बोलें

ऊंच-नीच वर्गों के बंधन

समता की चाबी से खोलें,

निश्छल मन सब गले मिले तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो, अंतर भी सच्चा हो।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२४ ☆ पहरुए ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पहरुए ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२४ ☆ पहरुए ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

अब उनको समझाना क्या है

सब जाना, अनजाना क्या है।

 *

घोर अराजकता का दलदल

इसमें भला ठिकाना क्या है ।

 *

वो चलता है चालें टेढ़ी

बचना और बचाना क्या है।

 *

अरे पहरुए जागो भाई

हाथ मले पछताना क्या है।

 *

जीवन रिसता एक घड़ा सा

उम्र का ताना-बाना क्या है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२८ ☆ हो गया है मर के भी वंदा अमर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “हो गया है मर के भी वंदा अमर…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२८ ☆

✍ हो गया है मर के भी वंदा अमर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

प्यार की मुझको निशानी दे गया

ज़िंदगानी को रवानी दे गया

 *

हो गया है मर के भी वंदा अमर

मुल्क को अपनी जवानी दे गया

  *

उसकी ख़ुशबू चाहता था लम्स कर

और वो है रातरानी दे गया

 *

आशिक़ी कुर्बानियों का नाम है

इश्क़ को मेरे मआनी दे गया

 *

ख़ुदकुशी कर ली किसी मजबूर ने

गाँव को रचने कहानी दे गया

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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