श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “झोला, भीख और भिखारी…“।)
अभी अभी # १०५३ ⇒ आलेख – झोला, भीख और भिखारी
श्री प्रदीप शर्मा
(BAG, BEG & BEGGAR)
झोला शब्द कितना सात्विक और यायावर लगता है, लेकिन भीख और भिखारी उतना ही दीन, हीन और दरिद्र। लेकिन अगर इसी में दर्शन और वैराग्य के दर्शन करने हों तो हरि ओम की शरण में आवें ;
भिखारी सारी दुनिया
दाता एक राम ..
उस दाता से मांगने में कैसी शर्म। जिसने उस भोले भंडारी से मांगने में शरम की, समझो उसके फूटे करम।
झोला और झोली शब्द में फर्क है। झोले में आवश्यक सामान रखा जाता है, जब कि झोली फैलाई जाती है। झोला यह दर्शाता है कि जीवन की आवश्यकता उतनी अधिक नहीं जितनी हम सोचते हैं। सच्चा वैरागी वही, जो झोला उठाकर चल दे। जब कि जो झोली फैलाई जाती है, उसकी आवश्यकता की कोई सीमा नहीं होती। एक बार आपने किसी के सामने झोली फैलाई, तो वह कभी भर नहीं सकती। पूरा संसार भी अगर उस झोली में डाल दिया जाए तब भी तृष्णा की झोली हमेशा खाली ही खाली रहती है। ।
भीख से कभी पेट नहीं भरता। मांगने की भीख कभी शांत नहीं होती। रहीम कहते हैं ;
आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गए, जबहि कहा कछु देहि। ।
स्वाभिमान और मेहनत पसीने की कमाई ही पुरुषार्थ है। लेकिन जब इंसान अपना स्वार्थ छोड़ परमार्थ की राह पर चल निकलता है, तब उसके भोग और संचय की वृत्ति पर विराम लग जाता है और उसके कदम अनायास ही सन्यास की ओर उठ जाते हैं। तब वह रहीम को छोड़ राम की शरण में चला आता है। एक शरणागति का अपना कुछ नहीं होता। कैसा मान और कैसा अपमान।
राम की चिड़िया राम का खेत और सबै भूमि गोपाल की।
सन्यास वृत्ति का शुभ मुहूर्त भी भिक्षा से ही होता है। पहले अपना अहंकार और अस्मिता गलाओ, अपनी उपाधि गलाओ। जब संसार ही त्याग दिया तो काहे की पद प्रतिष्ठा और घर परिवार। बुद्धं शरणं गच्छामि। बस जितनी झोली में समाए, उतनी ही भिक्षा। ।
हमारे समाज में आज भी भिक्षावृत्ति अपराध है। लेकिन सुना नहीं आपने, दूसरों के लिए मांगने में परमार्थ है। किसी भले और अच्छे कार्य के लिए चंदा मांगना और रसीद काटना क्या बुरा है। परमार्थ का दूसरा नाम चैरिटी है और क्या आप नहीं जानते, सन्यास तो मन से लिया जाता है, तन से नहीं।
अगर एक बार आपकी सन्यास वृत्ति जाग गई और आपमें वैराग्य भाव जाग गया तो फिर तो समझिए, सभी मठ, आश्रम और एनजीओ के द्वार आपके लिए खुल गए।
कीजिए शान से गौसेवा और दीन हीन, दिव्यांगों की सेवा !आपकी पद, प्रतिष्ठा वहां बहुत काम आती है। फिर आप झोला नहीं, रसीद बुक लेकर शान से कार में जाएं, अपनी झोली फैलाएं, नेक, अच्छे और आदर्श उद्देश्य के लिए भीख मांगे, गिड़गिड़ाएं। बेफिक्र रहें, आपका मान बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं। आप उठें, आगे बढ़ें, सिर्फ मठ और आश्रम ही नहीं, परमार्थ की राह में, अनासक्त सेवा की राह में, रोटरी क्लब और लायंस इंटरनेशनल के द्वार भी आपके लिए खुले हैं।
तू दयालु दीन हों
तू दानी हों भिखारी
जय श्री राम।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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