श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दर्द और हमदर्द…“।)
अभी अभी # १०५६ ⇒ आलेख – दर्द और हमदर्द
श्री प्रदीप शर्मा
जहां दर्द है, वहां कोई न कोई हमदर्द भी है ! दुख मन का हो, या दर्द तन का हो, एक आह या पुकार जब उठती है, किसी न किसी हमदर्द की याद अवश्य आती है। वह कोई अपना ही होता है, जिसका अस्तित्व या तो इस दुनिया में होता है या किसी और दुनिया में।
दो कदम चले, रास्ते के पत्थर से ठोकर जब लगी, क्यूं उसकी याद आई, जिसे हम कभी मां कहते, कभी अम्मा, कभी आई। जब दुख दर्द में कराहते, मुंह से अनायास अरे राम रे, अथवा क्यों निकलता, हे राम या या खुदा, अब तो तू ही बचा। किसी को संकट में हनुमान याद आते तो किसी को नानी। क्या नहीं ये सब उन हम दर्दों की फेहरिस्त, जो हमें याद मुंह जबानी।।
हमारे दर्द का हमदर्द कोई औरत भी हो सकती है, कोई मर्द भी हो सकता है। वह हमारे दुख दर्द को दूर तो नहीं करता, लेकिन दिल को राहत और तसल्ली अवश्य देता है, जिससे कभी यह शिकायत नहीं रह जाती, कि :
हंसने की चाह ने
कितना मुझे रुलाया है,
कोई हमदर्द नहीं,
दर्द मेरा साया है।
जी हां ! यह सच है कि आपका हम दर्द हमेशा साये की तरह आपके साथ साथ चलता है। कितना दर्द है राजा मेहंदी अली खान के इस गीत में ;
तू जहां जहां चलेगा
मेरा साया साथ होगा।
कभी मुझको याद करके,
जो बहेंगे तेरे आंसू
तो वहीं पे रोक लेंगे
उन्हें आ के मेरे आंसू
तू जिधर का रुख करेगा
मेरा साया साथ होगा।।
आखिर ये साया कौन है ! यही वो रहबर है, जो कभी दोस्त बनकर, कभी कोई रिश्ता बनकर, तो कभी कोई फरिश्ता बनकर हमारे दर्द के साथ चलता है। हम किसी का घाव ठीक नहीं कर सकते, लेकिन प्रेम के दो शब्द, मरहम का काम करते हैं, और तिरस्कार की एक नजर, जले पर नमक छिड़कने का काम करती है।
क्या हमने कभी कोई ऐसी फेहरिस्त बनाई है, जब हमने डूबते को तिनके का सहारा दिया हो। किसी दुखी इंसान के आंसू पोंछे हों। यही ज़बान तो छुरी भी है और कटार भी। मरहम भी यही और प्यार, दुलार भी।।
नेकी और बदी, ये ज़िन्दगी की किताब के शब्द हैं, महज किसी शब्दकोश के दो आखर नहीं। चलती ट्रेन में जब कोई अनजान व्यक्ति प्लेटफॉर्म पर दौड़ता हुआ, आपकी प्यास बुझाने के लिए, आपका खाली बर्तन भरता है, तो क्या आप सोच सकते हैं, यह कितनी बड़ी सेवा है। ताली, थाली पर बहुत राजनीति और व्यंग्य हुआ, लेकिन सच्चाई के धरातल पर भी बहुत कुछ हुआ। देर से ही सही, किसी ने तो पलायन करते मजदूरों की आवाज़ उठाई।
ये चलते फिरते हमदर्द फरिश्ते आपको सब जगह मिलेंगे। कहीं नजर नहीं आएंगे, कहीं रूबरू मिलेंगे। शैलेन्द्र से अच्छा इस फलसफे को हमें और कोई नहीं समझा सकता ;
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो, तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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