श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तन – बदन।)

?अभी अभी # १०५७ ⇒ आलेख – तन – बदन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईश्वर द्वारा प्रदत्त इस काया को सत्तर वसंत हो गए लेकिन मैं आज तक तन में बदन का स्थान तय नहीं कर पाया। वनस्पति जगत में जरूर एक पेड़ के तीन भाग होते हैं, जड़, तना और फलती फूलती टहनियां। लेकिन इंसान के पास तो एड़ी से चोटी तक तन ही तन है। तन में मन है, मन में वतन है और जेब में वेतन है।।

मैंने यह भी सुना है कि अपने पांव पर खड़े होते ही कुछ लोगों के बदन में पैसे की गर्मी चढ़ जाती है तो कुछ सिने तारिकाएं बदन पे सितारे लपेट लेती हैं। आप विश्वास नहीं करेंगे एक ज़माने में तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री के बदन में ज्वाला जागी थी, और आजकल पश्चिम बंगाल की ममता के बदन में तो साक्षात दुर्गा माता का वास है।।

लगता तो ऐसा है मानो तन – बदन का चोली दामन का साथ है लेकिन जब मेरे दामन में खुशियां आती हैं तो चोली कहीं नजर नहीं आती। हां पूरे बदन में खुशी की एक लहर ज़रूर दौड़ जाती है, और जब कोई वामी अथवा टुकड़े टुकड़े गैंग वाला नजर आ जाता है, तो सारे तन – बदन में आग लग जाती है। आखिर ये आग कब बुझेगी।

जगदीश जी की आरती मैं रोज गाता हूं ! तन, मन, धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। लेकिन इसमें भी अपना बदन चुपके से छुपा ही लेता हूं। एक भारतीय पत्नी के त्याग और समर्पण की तो बात ही मत पूछिए। लेकिन वहां भी तन, मन से आगे नहीं बढ़ा जाता। किसी के तन पर आपका अधिकार हो सकता है, चलिए मन भी आपको दिया, अब बदन तो छोड़ दो।।

अगर तन पर कपड़े धारण किए जाते हैं तो बदन पर मालिश की जाती है। तेज़ बुखार में तन की सुध नहीं रहती, पूरा बदन पहले टूटता है, फिर गर्म हो जाता है।

एक क्रोसिन पेन रिलीफ से शरीर को आराम मिलता है।

इससे यह सिद्ध हुआ कि हमारे शरीर में ही तन – बदन का वास है। जब भी दफ्तर की कुर्सी पर बैठें, ज़रा तनकर बैठें। घर पर व्यायाम से तन को व मन को स्वस्थ रखें, तथा अधिक व्यायाम के पश्चात बदन को ढीला छोड़ दें। लंबी गहरी सांस लेते रहें। सारा तनाव निकल जाएगा।।

जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे 

हसरत जयपुरी ! यकीन नहीं होता, तो देख लीजिए, तन – बदन का अध्यात्मिक दर्शन ;

तन में अग्नि, मन में चुभन

कांप उठा मोरा गोरा बदन

ओ रब्बा खैर …खैर

रब्बा खैर ही करे, तो सबकी खैर ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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