श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रेम पर्वत…“।)
अभी अभी # १०६१ ⇒ आलेख – प्रेम पर्वत
श्री प्रदीप शर्मा
जो शब्द हिंदी में ढाई आखर का है, वह अंग्रेजी का four letter word LOVE है। अक्सर प्रेम, प्यार अथवा इश्क में ऊंचाइयों की बात होती है, गहराइयों की बात होती है, प्यार के सागर में या तो हम डूब जाते हैं, या फिर इतने ऊंचे उठ जाते हैं, कि हमारा प्रेम ईश्वरीय प्रेम हो जाता है।
किसी के प्यार में डूबना तो बहुत आसान है लेकिन प्रेम की ऊंचाई को नापना इतना आसान भी नहीं। प्रेम परीक्षा लेता भी है और परीक्षा देता भी है। प्रेम में सफल होने पर प्रेमी प्रसन्न होता है, उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। लेकिन प्रेम में असफल होते ही उसका मन खिन्न हो जाता है। ये दुनिया और यह महफिल उसके काम की नहीं रह जाती।।
कहीं कहीं प्रेम शर्तिया होता है, प्रेम में कुछ शर्तें रख दी जाती हैं। प्यार नहीं हुआ, मानो सौदा हो गया हो। पहली नजर में प्यार अंधा प्रतीत होता है, लेकिन आंख खुलते ही सच सामने आ जाता है। प्रेम में अपेक्षा तो होती है, लेकिन प्रेम उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर पाता।
प्रेम का ही दूसरा नाम आसक्ति है। हमें जो प्रिय है, उससे हमें प्रेम हो ही जाता है। आप उसे लगाव, अथवा आकर्षण भी कह सकते हैं। हमारे प्रेम का दायरा कितना विस्तृत है, यह हम नहीं जानते। बच्चे से लेकर बूढ़े तक, मां से लेकर दादी मां तक, और बेटी से लेकर पोती तक इसकी जड़ें फैली होती हैं। हमारे प्रेमपाश में जर्रा जर्रा समाया है, लेकिन यह जीव कभी इसे समझ नहीं पाया है।।
ये वादियां ये फिजाएँ, बुला रही हैं तुम्हें, खामोशियों की अदाएं, बुला रही हैं तुम्हें।
हमें कभी फूलों से प्यार होता है तो कभी सावन की घटाओं से। कभी दिन सुहाना नजर आता है, तो कभी रात। खुशियों में मन झूमने लगता है, जब किसी का जन्म होता है, तो कहीं निकलने लगती है किसी अपने की बारात।
पसंद प्रेम का ही दूसरा स्वरूप है। जो तुमको हो पसंद, वही बात कहेंगे। तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे ! क्या यह प्रेम नहीं। अच्छा संगीत, अच्छी फिल्में, अच्छा साहित्य, अच्छे लोग, अच्छा खाना, एक अच्छी पत्नी और अच्छी अच्छी बातें, हमें बहुत पसंद है। इन सबसे हमें कितना प्रेम है। सोचिए क्या हम इनके बिना रह सकते हैं।।
अगर फिर भी हम दुखी हैं, तो इसका मतलब अभी भी हममें प्रेम की कमी है। हम मीठा मीठा तो गप कर जाते हैं, लेकिन कड़वा हजम नहीं कर पाते। जब प्रेम हमारी परीक्षा लेता है, तो हम वहां से भाग खड़े होते हैं।
प्रेम के पर्वत पर चढ़ना इतना आसान भी नहीं। कई कंकर, पत्थर, कांटे, विषैले और हिंसक जीव प्रेम की राह में हमारा रास्ता रोकने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग प्रेम का रास्ता छोड़ खुदगर्जी और स्वार्थ की पगडंडी पकड़ लेते हैं। ऐसे लोग कभी प्रेम पर्वत पर चढ़ नहीं पाते। बस रास्ता भटक जाते हैं, और कह उठते हैं ; कह दो, कोई ना करे यहां प्यार। इसमें खुशियां हैं कम, और आंसू हजार।।
प्रेम त्याग, समर्पण और निष्ठा मांगता है, प्रेम सहूलियत नहीं, जीवन की असलियत है। अक्सर लोगों का प्यार स्वामित्व वाला प्यार (posessive love) होता है, वे बस लेना ही लेना जानते हैं। प्यार संग्रहालय में रखने की वस्तु नहीं, बांटने की चीज है।
प्यार बांटते चलो। मेरी मोहब्बत पाक मोहब्बत, और जहां की ख़ाक मोहब्बत। आइए, झमाझम बारिश में, प्रेम रस में भीगें, प्रेम का ही छाता, प्रेम की ही बरसाती, प्रेम की ही छड़ी, प्रेम पर्वत पर कदम बढ़ाएं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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