श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तो बुरा मान गए !…“।)
अभी अभी # १०६९ ⇒ आलेख – तो बुरा मान गए !
श्री प्रदीप शर्मा
हम इंसान हैं ! हमें अच्छा भी लगता है, और बुरा भी लगता है।
अच्छे से कभी हम आहत नहीं होते लेकिन बुरा हमें केवल लगता ही नहीं, हम बुरा मान भी जाते हैं। कोई हमें बुरा मानने का कहता नहीं, हम खुद ही बुरा मान जाते हैं।
अच्छा-बुरा लगना, अक्सर हमारे मूड पर निर्भर करता है। अच्छे मूड में सब अच्छा लगता है, हँसी मज़ाक, छींटाकशी सब चलती है। लेकिन अगर मूड ठीक न हुआ, तो पत्नी के हाथ की चाय स्वाद खो बैठती है। ब्यूटी पार्लर से सजी-धजी आई पत्नी खाने को दौड़ती है। यह सब एकांगी नहीं होता ! जब पति पत्नी के जन्मदिन की तारीख भूल जाता है, तो सदन में भूचाल आ जाता है। राजा दशरथ रानी कौशल्या के आगे घुटने टेक देते हैं।।
अच्छे माहौल में हमारा स्वभाव भी अच्छा रहता है। हर बड़े-छोटे को गले लगाने की इच्छा होती है, लेकिन अगर वातावरण अप्रिय हो, तो सबसे पीछा छुड़ाने का मन करता है। आखिर हम बुरा मानते ही क्यूँ हैं।
इंसान का मिज़ाज़ भी किसी मौसम से कम नहीं ! एक अच्छे मौसम की तरह कुछ लोग हमेशा खुशनुमा, मुस्कुराहट लिए नज़र आते हैं तो कुछ बेईमान मौसम की तरह चिड़चिड़े, मुँह लटकाए हुए। कुछ लोग इसे इंसान की फ़ितरत कहते हैं। किसी का चेहरा हमेशा एक ताज़े गुलाब की तरह खिला हुआ होता है, तो कुछ का एक बासी, मुरझाई हुई फूलगोभी की तरह फूला;फूला। जब पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं, तो सभी इंसानों का स्वभाव एक जैसा कैसे हो सकता है।।
बुरा मानने वाले भी दो तरह के होते हैं, एक जिनके बुरा मानने की कोई वजह होती है, और दूसरे, जो बिना वज़ह बुरा माने बैठे रहते हैं। बिना वजह बुरा मानने वालों में अक्सर मौसाजी और फूफाजी का नंबर आता है।
उनके एक शादी में बुरा मानने की वज़ह दूसरी शादी में जाकर पता चलती है, और तब तक वे पुनः बिना वज़ह बुरा मान बैठ गए होते हैं। वैसे भी जिनकी बुरा मानने की कोई वजह भी होती है, वह अक्सर बेवज़ह ही होती है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है !
सबसे मिल-जुलकर हँसते-खेलते, सबके लिए प्रेम और उदारतापूर्वक दृष्टिकोण रख, ज़िन्दगी जीना ही उसका मक़सद होता है, लेकिन अगर कोई रूठा है, नाराज़ है, किसी कारण बुरा मान बैठा है, तो उसे मनाना भी पड़ता है। बच्चे अगर ज़ल्दी रूठते हैं, तो ज़ल्दी मान भी जाते हैं। मान-मनव्वल तो बड़ों के साथ करनी पड़ती है।।
जब कोई फितरती इंसान अचानक किसी बात को बिना समझे बुरा मान बैठता है, तो उसका मान-सम्मान, इज़्ज़त, स्वाभिमान
सभी दाँव पर लग जाता है।
महामना चाणक्य, महर्षि दुर्वासा और परशुराम का क्रोध उस्में फनफनाने लगता है। उस्का बस चले तो धरती को श्राप दे दे, आसमान में आग लगा दे। लेकिन जब उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाता है, तब
जाकर अपनी ही लंका को जलाने वाले ये वीर पुरूष, पश्चाताप के सागर में अपनी जलती पूँछ को बुझा पाते हैं। और कहीं कहीं तो देर होने पर लंका जलकर ख़ाक भी हो जाती देखी गई है।
रूठना मनाना, बुरा मानना, अगर सहज और बच्चों जैसा हो, तो जीवन का आनंद ही कुछ और है। किसी की बात को दिल पर ले लेना, किसी से न कहना, मन ही मन घुटना, जीवन में अवसाद की स्थिति निर्मित कर देता है। खुलकर कहना, मन की गाँठों को खोलना और हर बात का सकारात्मक अर्थ निकालना ही
एक खुशहाल व्यक्तित्व की निशानी है। ऐसे भी लोग हैं दुनिया में, जो बुरा लगे, तो एक रोटी ज़्यादा खा लेते हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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