श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मां की कीमत।)

☆ लघुकथा # 63 – मां की कीमत  श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

मां हम ऑफिस से आते हुए होली के लिए बाजार से गुजिया और सामान ले आएंगे तुम घर में परेशान मत होना तुम बेकार बनाती हो पास में एक अच्छी दुकान है वहां भी एकदम घर जैसी गुजिया मिलती है अरुण ने अपनी मां को कहा।

बेटा तुम और बहू दोनों व्यस्त रहते हो मैं घर में सारा दिन क्या करूं तो सुबह तुम्हारा टिफिन बनाने के बाद मैं बनाकर रख लूंगी फालतू पैसे क्यों खर्च कर रहे हो।

माँ तुम पैसों की चिंता मत करो आखिर हम दोनों काम क्यों रहे हैं?

मां रोमा तो ऑफिस चली गई है अब मैं जा रहा हूं।

शाम को रोमा और अरुण दोनों गुजिया, गुलाल और होली के लिए ढेर सारा  सामान लेकर घर आए।

अरुण – “पास में जो दुकान खोली है वहां कितना अच्छा सामान मिलता है मां जी आप खा कर देखो। एकदम तुम्हारे हाथों का स्वाद लग रहा है मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है।”

कमला ने कहा – “मैं तो बनाती हूं तो तुम लोग नाक मुंह सिकुड़ते हो और अच्छा नहीं लगता अब बाजार से लाए हो तो कह रहे हो कि घर जैसा है।”

तभी अचानक दुकान का मालिक घर में आता है।

“कमला आंटी आप तो बिल्कुल मेरी मां की तरह हो आपके कारण मेरी दुकान चल निकली । होली के लिए कुछ और गुजिया  बनाना है मैं माफी चाहता हूं आपको आकर तकलीफ दे रहा हूं आप चाहे तो मेरी दुकान में आकर बस आपकी निगरानी में  दुकान में काम करने वाले लोग बना देंगे। क्या-क्या सामान चाहिए ? आप पूरी लिस्ट बना दो आंटी।”

“अरे आप लोग तो अभी थोड़ी देर पहले ही मेरी दुकान में आए थे आपने यह क्यों नहीं बताया कि आप आंटी के बच्चे हो। और हंसते हुए कहा हर बच्चों का यही हाल है अपनी मां की कीमत नहीं जानते।”

बहू नाराज होकर बोली – “मां आपको यदि काम करना ही था कुछ तो हमें बताया होता।  इस तरह बेइज्जती तो ना करती सबके सामने । क्या हम आपको अच्छे से नहीं रखते ?

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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