श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – यादें पुरानी।)
☆ लघुकथा # १०९ – यादें पुरानी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
तुम्हें कुछ याद नहीं रहता ।
महीने में एक दिन किटी पार्टी के लिए समय नहीं निकल सकती क्या इतनी देर से क्यों आई कमला जी ने कहा।
नेहा ने बड़ी विनम्रता से कहा- “क्या करूँ! घर में काम इतने हो जाते हैं कि समय का पता नहीं चलता।”
कमल जी ने कहा- “भाई हमें भी काम होता है फिर भी हम लोग महीने में एक दिन सब कुछ छोड़कर अपने लिए समय निकालते हैं।”
“ठीक है दीदी अब अगली बार किटी पार्टी में मैं सबसे पहले आ जाऊंगी आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”
अच्छा यह तो बताइए कि “आप लोग इतनी जोर से हॅंस रहे थे और मुझे देखकर अचानक चुप हो गए?”
“कुछ नहीं हम सभी सहेलियाँ बात कर रही थीं ।” पुराने दिन कितने अच्छे थे जब हम लोग घर के बाहर बैठकर एक दूसरे से सुख-दुख की बातें करते थे। स्वेटर बुनते ,आचा,र बड़ी ,पापड़, चिप्स बनाते थे ।
आज वह सब दिन जाने कहाँ चले गए अब तो लोग बाजार से सब चीज खरीद लाते हैं मेरी बहू को तो यह सब काम फालतू और फिजूल खर्ची लगता है।
“कोई बात नहीं दीदी आप मेरे घर आइएगा मैं आपको यह सारी चीज अपने हाथों से बनी हुई खिलाऊंगी।”
“ठीक है तुम्हारे यहां आकर मैं यह सब चीज बनवाऊंगी।”
“अच्छा तुम सभी को दिखाने के लिए मैं एक पुराने जमाने की चीज लाई हूँ।”
“दीदी यह तो लालटेन है” जोर से चिल्लाते हुए नेहा बोली।
“हाँ यह मेरी अम्मा ने मुझे शादी में दिया था बहु को मेरे यह कबाड़ लगता है मेरे कमरे में मेरे साथ मेरी नातिन रहती है उसे भी यह अच्छा नहीं लगती ।”
“बहुत दिनों से इसे लपेटकर अलमारी में आदर पूर्वक रखी हूँ।”
” बिजली और नए युग के आने की खुशी तो बहुत है लेकिन क्या करूँ?”
“इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि मेरी माँ मेरे पास है।”
नेहा बोली-” दीदी सच कह रही हो आजकल की पीढ़ी भी प्लास्टिक की दुनिया में खो गई है।”
“सारे सामान इस्तेमाल करके फेंक देती है उन्हें संभालना रखना यह अच्छा ही नहीं लगता।”
“बस बाहर जाना, नौकरी करना, घूमना, फास्ट फूड खाना हमारे पास बैठने तक का वक्त नहीं है?”
कमल जी ऑंखों से ऑंसू से बहने लगते हैं। उनके मन का सूनापन उनकी ऑंखों में उभर आता है।
कमल जी रोते हुए कहा -“एक दिन मैं भी ऐसे ही डिब्बे में पैक होकर भगवान के घर चली जाऊंगी।”
“क्या तुम लोग मुझे इस लालटेन की तरह याद करोगी।”
नेहा यह लालटेन निशानी समझ कर तुम संभाल कर अपने पास रख लो। देर से आने की यही तुम्हारी सजा है।
सभी सहेलियों मुस्कुराते हुए कहती हैं कमल दीदी अब हम सभी देर से आएंगे तो आप हमें इसी तरह उपहार देना।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




