श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – टूटता हुआ घर।)
☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
संध्या धीरे-धीरे रात की बाँहों में समा रही थी। आँगन में रखे तुलसी चौरे का दीपक टिमटिमा रहा था। हल्की हवा में चमेली की भीनी सुगंध घुली थी, पर घर के भीतर वातावरण भारी और उदास था।
रसोई में खड़ी सविता दर्द से कराहते हुए भी चुपचाप खाना बना रही थी। सुबह से पैरों में सूजन थी, शरीर बुखार से तप रहा था, लेकिन पति और परिवार की चिंता में उसने अपनी तकलीफ़ को जैसे भीतर ही कैद कर लिया था।
चूल्हे की आँच से उसका चेहरा लाल हो गया था। माथे से पसीने की बूंदें लगातार टपक रही थीं।
उधर बैठक में बैठे उसके पति विकास बार-बार घड़ी देख रहे थे। स्वभाव से वह अत्यंत गुस्सैल और अहंकारी थे। उन्हें ज़रा-सी देरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी।
सविता ने थरथराती आवाज़ में कहा—
“खाना तैयार है…”
बस इतना सुनना था कि विकास भड़क उठे।
“अब याद आया खाना? क्या कर रही थी इतनी देर से?”
उन्होंने क्रोध में भरी गरम दाल की थाली उठाकर ज़ोर से फर्श पर फेंक दी।
थाली पलट गई।
उबलती दाल पास खड़ी सात वर्ष की बेटी गुड़िया के हाथ और चेहरे पर गिर गई।
“माँऽऽ…!”
उसकी दर्दभरी चीख पूरे घर में गूँज उठी।
सविता का कलेजा काँप गया।
वह बदहवास होकर बेटी को सीने से चिपकाए अस्पताल की ओर भागी।
डॉक्टर मरहम लगाते हुए बोले—
“जलन तो ठीक हो जाएगी… लेकिन बच्ची बहुत डर गई है।”
गुड़िया लगातार काँप रही थी।
उसकी छोटी-सी उँगलियाँ माँ का आँचल कसकर पकड़े थीं।
सविता की आँखों से आँसू बहते रहे।
शायद दर्द बेटी के हाथ से ज्यादा उसके अपने हृदय में था।
रात गहरा चुकी थी। घर लौटकर वह चुपचाप बरामदे में बैठ गई।
पास ही बैठी दादी सब देख रही थीं। उनकी बूढ़ी आँखों में अनगिनत प्रश्न तैर रहे थे।
उन्होंने मन ही मन सोचा—
“कैसा दुर्भाग्य है… लोग मंदिरों में सिर झुकाते हैं, रामायण-महाभारत देखते हैं, पर अपने भीतर बैठे रावण को नहीं पहचानते।”
इतने में दरवाज़ा खुला।
विकास भीतर आए।
चेहरा बुझा हुआ था। हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में टूटा हुआ अभिमान।
माँ ने धीरे से पूछा—
“क्या हुआ बेटा?”
विकास कुर्सी पर ढहते हुए बोले—
“आज मेरा प्रमोशन रुक गया…
बॉस ने साफ कह दिया—
‘जिस इंसान को अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं, वह दूसरों का नेतृत्व नहीं कर सकता।’”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
माँ उठीं, बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—
“बेटा…अहंकार इंसान से पहले उसका सुख छीनता है, फिर अपनों का विश्वास… और अंत में उसका सब कुछ।”
फिर उनकी भर्राई आवाज़ कमरे में गूँज उठी—
“अहंकार की आग में, जल जाते संबंध, रावण जैसा ज्ञान भी, नहीं बचा पाया वंश।”
विकास की नज़र धीरे-धीरे गुड़िया के जले हाथों पर गई…
फिर सविता के सूजे पैरों पर…
और अंत में अपने हाथ में पकड़े अस्वीकृत प्रमोशन पत्र पर टिक गई।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ—
आज उनका प्रमोशन नहीं रुका था…
आज उनका घर टूटते-टूटते बचा था।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह धीरे से सविता के पास गए और काँपती आवाज़ में बोले—
“सविता… मुझे माफ़ कर दो…
मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि तुम्हारा दर्द भी नहीं देख पाया।”
सविता ने कुछ नहीं कहा।
बस उसकी आँखों से बहते आँसू वर्षों से दबे दर्द की कहानी कह रहे थे।
उधर तुलसी चौरे का दीपक अब भी जल रहा था—
धीमा, शांत…मानो टूटते रिश्तों को फिर से रोशनी देने की प्रार्थना कर रहा हो।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






