मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – कभी सोचा है ऐसा भी… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मन से रोये या आंसुओं से

भीगता तो कुछ न कुछ है

अच्छा है यह, जीवन में

कहीं न कहीं

शुष्कता को आद्रित कर

नमी को पोषित करता है

और याद रखिये

किसी अंकुरण से नव-विचार,

नवजीवन प्रस्फुटित होने को

आद्रता और नमी तो चाहिए ही

चाहे आंसुओं से रोयें

या भावुकता में, हृदय से रोयें,

फर्क नहीं पड़ता..

नतीजा अच्छा आने की चाह में , न सही

कभी तो रो लीजिये एकांत में या

सबके सामने ही सही , बेझिझक होकर

“कुछ” तो धुल जाएगा और

“कुछ” तो हल्का हो जाएगा

ज़िंदगी के दिल पर भारी,कुछ बोझ ढ़ोने से

लाख बेहतर है उनसे निजात पाना

यही सूत्र उचित लगता है अपनाना…!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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