डॉ. ऋचा शर्मा
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘पचास पार की औरत’। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 134 ☆
☆ लघुकथा – पचास पार की औरत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
सुनंदा बहुत दिनों से अनमनी-सी हो रही थी। क्यों? यह उसे भी नहीं पता।बस मन कुछ उचट रहा था। रह-रहकर निराशा और अकेलापन उसे घेर लेता। बेटी की शादी के बाद से अक्सर ऐसा होने लगा था। पति अपनी नौकरी में व्यस्त और वह सारा दिन घर में अकेली। इतनी फुरसत तो आज तक कभी उसे मिली ही नहीं थी। कहीं पढ़ा था कि पैंतालीस-पचास की उम्र के बाद स्त्रियों में हारमोनल बदलाव आते हैं, तो यह मूड स्विंग है? मेरे साथ भी यही हो रहा है क्या? अपने में ही उलझी हुई थी कि फोन की घंटी बजी। बेटी का फोन था– ‘क्या कर रही हो मम्माँ! बर्थ डे का क्या प्लान है? कितने साल की हो गईं अब ? ‘
‘अरे, कुछ नहीं इस उम्र में क्या बर्थ डे मनाना। जहाँ उम्र का काँटा चालीस-पैंतालीस के पार गया कि फिर शरीर ही उम्र बताने लगता है बेटा! विदेश में कहते हैं कि जीवन चालीस में शुरू होता है। हमारे देश में तो इस उम्र तक आते-आते महिलाएं चुक जाती हैं। ‘वह सोचने लगी अब पति कहते हैं– ‘तुम्हें आराम के लिए समय नहीं मिलता था ना, अब जितना आराम करना है करो।‘ बेटी समझाती है- ‘घूमने जाइए, शॉपिंग करिए, मस्ती करिए, बहुत काम कर लिया माँ आपने। ‘वह कैसे समझाए कि उसकी जिंदगी तो इन दोनों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। अपने लिए कभी सोचा ही कहाँ उसने। अब एकदम से कैसे बदल ले अपने आपको ?
‘हैलो मम्माँ कहाँ खो गईं ?’ बेटी फोन पर फिर बोली ।
‘अरे यहीं हूँ, बोल ना।‘
‘बताया नहीं आपने, क्या करेंगी बर्थ डे पर?‘
अभी कुछ सोचा नहीं है, अच्छा फोन रखती हूँ। मुँह धोकर वह शीशे के सामने खड़ी हो गई। लगा बहुत समय बाद फुरसत से अपने चेहरे को देख रही है। वह मुस्कुराने लगी, सुना था ऐसा करने से मन खुशी से भर जाता है। हाँ कुछ कह रहा है मन ‘-अब भी अपने लिए नहीं जीऊँगी तो कब? निकलना ही होगा अपने बनाए इस घेरे से। ‘उसने कपड़े बदले, रिक्शा बुलाया और निकल पड़ी।
© डॉ. ऋचा शर्मा
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