श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक रोचक कहानी- बांट कर खाएं

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 185 ☆

बाल कहानी – बांट कर खाएं ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

संगीता कोई भी चीज किसी को नहीं देती थी. वह अकेली खाती थी. यह बात उस की दोस्त अनीता जानती थी. जब कि अनीता कोई चीज लाती वह संगीता सहित अपनी दोस्त को भी देती थी.

आज जब अनीता ने देखा कि संगीता नई तरह की चॉकलेट लाई है तो उसे का मन ललचा गया. काश! आज वह संगीता से नई तरह की चॉकलेट ले कर खा पाती. मगर क्या करें? संगीता किसी को चॉकलेट नहीं देगी. यह बात वह जानती थी.

अनीता ने अपने बस्ते से लंबी वाली चॉकलेट (पर्क) निकाली. धीरे से संस्कृति को देते हुए बोली, “यह लो बड़ी वाली चॉकलेट.”

संस्कृति को चॉकलेट खाने का शौक था. वह अपनी मनपसंद चॉकलेट देख कर बोली, “अरे वाह! मजा आ गया.”

 फिर अपने बस्ते से टिफिन निकाल कर अनीता को दो गुलाब जामुन दे दिए, “तुम मीठे गुलाब जामुन खाओ.”

यह देख कर संगीता के मुंह में पानी आ गया. वह उन दोनों की ओर देखने लगी. शायद वे उसे अपनी चीज दे दे.

मगर हमेशा की तरह उन्होंने ऐसा नहीं किया. वे आपस में मिल-बाँट कर चीजें खाने लगी. तब संगीता समझ गई जब तक वह उन्हें खाने की चीजें नहीं देगी तब तक वे उसे चीजें नहीं देगी.

‘मगर क्यों?’ संगीता के मन ने कहा, ‘वे हमेशा मुझे अपनी खाने की चीजें देती है.’

इस पर उसके मन में से दूसरी आवाज आई, ‘मगर तू उसे अपनी खाने की चीजें नहीं देती है तब वे क्यों देगी?’

“अगर मैं उन्हें अपनी खाने की चीजें दे दूं तो,” अचानक वह बड़बड़ा कर बोली. तब अनीता ने कहा, “अरे संगीता! तुमने कुछ कहा है?”

“हां हां,” संगीता बोली, “मैं मीठी वाली चॉकलेट लाई हूं. एक-एक तुम दोनों भी खा कर देखो,” यह कहते हुए उसने दोनों को एक-एक चॉकलेट दे दी.

अनीता और संस्कृति वैसे भी बांटचूट कर खाती थी. उन्होंने झट से अपने-अपने टिफिन से लंबी वाली चॉकलेट और गुलाब जामुन निकाल कर उसे दे दिए.

संगीता ने जब गुलाब जामुन खाए तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगे. वैसे भी उसे गुलाब जामुन बहुत अच्छे लगते थे. इस कारण उसने कहा, “संस्कृति, गुलाब जामुन बहुत स्वादिष्ट हैं. ये कहां से लाई हो?”

इस पर संस्कृति ने जवाब दिया, “ये मेरी मम्मी ने बनाए हैं.”

“और यह लंबी वाली चॉकलेट?” संगीता ने पूछा तो अनीता ने जवाब दिया, “तेरी तरह मैं भी बाजार से खरीद कर लाई हूं.”

“अरे वाह! आज तो मजा आ गया,” संगीता ने कहा, “हम एकएक चीज घर से लाई हैं और तीन-तीन चीज खाने को मिल गई है.”

इस पर अनीता ने जवाब दिया, “यह तो बांटचूट कर खाने का मजा है।” कह कर तीनों खिलखिला कर हंस दी.

आज उन्हें बांटने का मजा मिल गया था.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

18-05-2023

संपर्क – पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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