स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – घिन आती है…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६८ – घिन आती है
(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )
मुझे
घिन आती है
अपने बुद्धिजीवी होने पर
घिन आती है।
बहुत मुश्किल हो रहा है
प्रबुद्धता के नाटक को निबाहना ।
एक कापुरुष की निरीहता से
देख रहा हूँ
अन्याय, अत्याचार,
आतंक
भूख, भ्रष्टाचार और
बेरोजगारी ।
कभी लगता है
काश! मैं बंदूक बन पाता
या
अलादीन का चिराग पा जाता
या फिर बन जाता बाढ़ का जल
या फिर दावानल
ताकि भ्रष्ट व्यवस्था को दबोच लेता
अपने आगोश में।
© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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