श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ द्वारा सम्पादित “प्रबोध-बोध ” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०९ ☆
☆ “प्रबोध-बोध ” – संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक – प्रबोध-बोध (प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित)
संपादक – डॉ कृष्णा रावत, सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर ‘
प्रकाशक – साहित्यागार
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ प्रबोध जी पर विभिन्न एंगल से साहित्यिक सामाजिक शोध बोध – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
( इन दिनों लंदन से)
किसी लेखक पर लिखी गई पुस्तक तभी सार्थक बनती है जब वह केवल व्यक्ति का परिचय न दे, बल्कि उसके रचना संसार के भीतर छिपे उस जीवंत मनुष्य को भी सामने लाए जो अपने समय, समाज और संवेदनाओं से निरंतर संवाद करता है।
लेखक को समझने के लिए उसके परिवेश , का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है, इसीलिए रचना के साथ फुटनोट में सूक्ष्म लेखक परिचय प्रकाशित किया जाता है। पाठक और लेखक के बीच दूरी मिटाती यह पुस्तक स्वागतेय साहित्यबोध है।
प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित पुस्तक प्रबोध बोध इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज के रूप में अब पाठकों के साथ है।
यह पुस्तक प्रबोध जी के बहाने से उस रचनात्मक चेतना की पड़ताल है जिसने दशकों तक हिंदी साहित्य को अपनी विशिष्ट दृष्टि, वैचारिक निर्भीकता और मानवीय सरोकारों से समृद्ध किया है।समय के साथ लेखक के चश्मे के नम्बर , उनके फ्रेम परिस्थितियों की पृष्ठ भूमि बदलती रहती है, किंतु उसके लेखकीय लक्ष्य , उसका दृष्टिकोण उम्र की परिपक्वता के साथ विकसित होता चलता है।
इस पुस्तक का आकर्षक पक्ष यह है कि इसमें प्रबोध कुमार गोविल को केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं देखा गया है। उनके भीतर के मनुष्य, चिंतक, समाज दृष्टा और संवेदनशील रचनाकार को समान महत्त्व दिया गया है।
पुस्तक पढ़ते हुए यह अनुभव बार बार होता है कि साहित्य अंततः जीवन से ही जन्म लेता है और जीवन के विविध रंग ही किसी लेखक की रचनाओं में रूपांतरित होकर पाठक तक किताबों और स्फुट रचनाओं के माध्यम से पहुंचते हैं , यही लेखकीय यात्रा का जीवन संदेश बन जाता है।
प्रबोध कुमार गोविल का साहित्य अपने समय की धड़कनों को दर्ज करता है। उनके पात्र केवल कथा को आगे बढ़ाने वाले माध्यम नहीं हैं। वे समाज के भीतर छिपे प्रश्नों, अंतर्विरोधों, इच्छाओं और संघर्षों के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। पुस्तक इस तथ्य को अनेक दृष्टियों से प्रमाणित करती है। उनके लेखन में महानगरीय अकेलापन भी है। बदलते सामाजिक मूल्य भी हैं। संबंधों की जटिलताएँ भी हैं। मनुष्य की आंतरिक बेचैनियाँ भी हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य, पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देता बल्कि उसे वैचारिक मंथन के लिए भी बाध्य करता है।
इस पुस्तक की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह लेखक की रचनात्मक यात्रा को उसके सामाजिक संदर्भों से जोड़कर देखती है। आज जब साहित्य को अक्सर केवल पाठ या विचार के रूप में पढ़ा जाता है, तब यह पुस्तक स्मरण कराती है कि हर रचना के पीछे एक जीवित अनुभव संसार होता है। प्रबोध कुमार गोविल ने जीवन को बहुत निकट से देखा है। समाज के विविध वर्गों, परिस्थितियों और मानवीय मनोदशाओं को समझा है। यही अनुभव उनकी रचनाओं को विश्वसनीय बनाते हैं।
पुस्तक में उनके व्यक्तित्व के जिन आयामों का उल्लेख किया गया है, वे भी कम रोचक नहीं हैं। सहजता, विनम्रता, संवेदनशीलता और मानवीय आत्मीयता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं के रूप में उभरती हैं। यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान खींचता है कि उनकी रचनात्मकता केवल बौद्धिक उपक्रम नहीं है। उसके पीछे मनुष्य और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि उनके साहित्य में विचार और संवेदना साथ साथ चलते हैं।
प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य की चर्चा करते हुए पुस्तक के आलेख उनके कथा साहित्य, उपन्यासों, कविताओं तथा बाल साहित्य की ओर संकेत करती है। इससे उनके बहुआयामी रचनाकार होने का परिचय मिलता है। वे किसी एक विधा तक सीमित लेखक नहीं हैं। उनकी रचनात्मक ऊर्जा अनेक साहित्यिक रूपों में व्यक्त हुई है। यह विस्तार उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की शक्ति को रेखांकित करता है।
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी भाषा और शिल्प पर किया गया विमर्श भी है। उनकी भाषा सरल है, पर साधारण नहीं। उसमें जीवन की सहजता है। संवाद की ऊष्मा है। विचार की स्पष्टता है। यही कारण है कि उनका साहित्य विद्वानों के साथ साथ सामान्य पाठकों तक भी पहुँचता है। साहित्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह पाठक के मन में उतर सके और उसके अनुभव का हिस्सा बन जाए।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह भी महसूस होता है कि लेखक के मूल्यांकन का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता। उसका वास्तविक उद्देश्य उसके साहित्यिक अवदान को समझना और समझाना होता है। प्रबोध बोध इस कसौटी पर खरी उतरती दिखाई देती है। यह पुस्तक प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का अवसर प्रदान करती है। साथ ही यह बताती है कि किसी लेखक की वास्तविक पहचान उसके पुरस्कारों से नहीं, उसकी रचनाओं की जीवंतता और समय से संवाद करने की क्षमता से निर्मित होती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो प्रबोध बोध एक ऐसी पुस्तक है जो व्यक्ति और कृतित्व के बीच सेतु का काम करती है। यह पाठक को लेखक के निकट ले जाती है। उसके साहित्य को नए सिरे से पढ़ने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह विश्वास भी जगाती है कि सच्चा साहित्य समय के साथ पुराना नहीं होता। वह हर युग में नए अर्थों के साथ पाठकों के सामने उपस्थित होता रहता है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता भी है।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






