श्री एस के कपूर “श्री हंस”
☆ “श्री हंस” साहित्य # २१३ ☆
☆ मुक्तक ।। आज खुद अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆
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=1=
हर पल हर क्षण बदल रहा है आदमी।
पाने कोऔर हीऔर मचल रहा है आदमी।।
प्रभु तेरी दुनिया का क्या रूप हो रहा है।
जाने किस ओर आज चल रहा है आदमी।।
=2=
दया दुआऔर भावना सब गौण हो गए हैं।
धन के समक्ष जैसे सब ही मौन हो गए हैं।।
पैसे की ही बोली भाषा समझते हैं लोगअब।
रिश्ते गहरे वाले जैसे अब कौन हो गए हैं।।
=3=
कमियां ही कमियां आज निकाल रहा आदमी।
दिल में नफरत के बीज बस पाल रहा आदमी।।
प्यार के लिए भी बहुत कम है यह एक जिंदगी।
फिर भी किस रूप में खुद को ढाल रहाआदमी।।
=4=
स्नेह प्रेम भावआज कर तार-तार रहा हैआदमी।
कई-कई मखोटेआज तो उतार रहा है आदमी।।
जाने कैसा भविष्य होगा हमारे इस संसार का।
अपने ही पांव खुद कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी।।
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© एस के कपूर “श्री हंस”
बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब – 9897071046, 8218685464




