श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९६ ☆
☆ सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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हरी हरी सी चूड़ियाँ, कजरी वाले राग ।
बहन बेटियाँ आ गयीं, प्रकृति सजाए बाग ।।
इनके बिन लगता सदा, ये जीवन बेकार ।
हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।
सावन मास आते ही धरती मानो नई दुल्हन-सी सज जाती है। चारों ओर बिछी हरियाली की चादर, बादलों की गड़गड़ाहट और बूँदों की रिमझिम—यह ऋतु केवल प्रकृति का ही नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति का भी पर्व है। हिंदू पंचांग में श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय माना गया है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान कर शिवजी नीलकंठ बने थे, और उसी विष की तपन शांत करने के लिए भक्त सावन में जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं।
सोमवार का व्रत, कांवड़ियों की टोली, शिवालयों में गूँजता “ॐ नमः शिवाय” का जयघोष—यह सब मिलकर सावन को एक अलग ही रंग देते हैं। महिलाएँ हरे वस्त्र और चूड़ियाँ पहनकर, झूला झूलकर, लोकगीत गाकर इस मास का स्वागत करती हैं। हरियाली तीज इसी उल्लास की पराकाष्ठा है, जब माता पार्वती और शिवजी के पुनर्मिलन को याद कर सुहागिनें अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
सावन केवल पूजा-पाठ का महीना नहीं, यह प्रकृति और परमात्मा के बीच के अटूट संबंध का प्रतीक भी है। जिस तरह वर्षा धरती को हरा-भरा कर नवजीवन देती है, उसी तरह भक्ति मन को निर्मल कर आत्मा को नवीनता प्रदान करती है। पेड़-पौधे, नदी-तालाब सब मानो शिव की जटाओं से बहती गंगा का ही विस्तार लगते हैं।
आज के भागदौड़ भरे जीवन में सावन हमें ठहरने, प्रकृति को निहारने और भीतर की शांति खोजने का अवसर देता है। यही कारण है कि यह मास सदियों से कवियों, भक्तों और आम जनमानस के हृदय में समान रूप से बसा हुआ है—हरियाली, आस्था और उल्लास का त्रिवेणी संगम बनकर।
हर किसान खुशहाल हो, ऐसा होवे देश ।
आओ मिलकर हम रचें, एक सुखद परिवेश।।
वर्षा बिन होता नहीं, धरती का शृंगार ।
हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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