डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘शीतल भाई और शान्ति की खोज’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४४ ☆
☆ व्यंग्य ☆ शीतल भाई और शान्ति की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
शीतल भाई रिटायर हुए तो पानी से निकली मछली हो गये। लगा जैसे पांव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। समझना मुश्किल हो गया कि क्या करें और कहां जाएं। पहले सवेरे आठ बजे उठकर दफ्तर की तैयारी में लग जाते थे। टहलने- घूमने, पूजा-पाठ में कभी रुचि नहीं रही। ‘जेही विधि राखे राम, तेही विधि रहिए’ की नीति पर चलते रहे। शरीर को ज़्यादा कष्ट देने के कभी पक्षधर नहीं रहे।
अब रिटायर हुए तो नौ बजे तक पलंग पर ही लुढ़कते-पुढ़कते रहते। जब पत्नी उलाहना देती, ‘क्या अहदी बने पड़े हो, दिन कितना चढ़ गया, उठो’, तब उठते।
आदत के मारे कभी-कभी अपने पुराने दफ्तर में पहुंच जाते। कुर्सी लेकर किसी कर्मचारी के बगल में गपियाने को बैठ जाते। लेकिन कुछ दिन बाद वे प्रबंधकों की नज़र में खटकने लगे। आदेश निकल गया कि कर्मचारी किसी भी बाहरी आदमी को बगल में बैठने न दें।
दफ्तर में कार्यरत साथी भी अब उनसे कटने लगे थे। रिटायर्ड आदमी से क्या बात की जाए? शीतल भाई किसी कर्मचारी को फोन लगाते तो वह थोड़ी देर बाद ही बात बन्द करने के बहाने ढूंढ़ने लगता।
अब शीतल भाई को गांव की याद आने लगी। सोच लिया कुछ दिन गांव में रहेंगे तो मन बहलेगा। ताज़ा हवा मिलेगी, शान्ति मिलेगी। वहां अभी रिश्तेदार थे, पुराना पैतृक मकान था। पिता-माता के जीवन काल में साल दो साल में चक्कर लगाते थे, लेकिन वहां मन नहीं लगता था। शहर और दफ्तर बुलाता रहता था। एक-दो दिन में ही ऊब कर भाग खड़े होते। लेकिन अब दफ्तर का दबाव नहीं है। जाएंगे और जब तक मन लगेगा, रहेंगे।
पत्नी से पूछा तो उन्होंने अपनी गठिया का हवाला देकर जाने से मना कर दिया। शीतल भाई अकेले ही निकल पड़े। गांव पहुंचे तो भाइयों, भतीजों ने स्वागत किया। हाल-चाल का लेनदेन हुआ। पुरानी पोथियों के पन्ने पलटे गये।
रात को शीतल भाई आंगन में लेटे तो तारों से भरा आकाश दिखा। शीतल भाई चौंके। ऐसा आकाश अभी तक कहां था? शहर में तो यह कभी दिखा नहीं।
सवेरे गांव में निकले तो पाया कि गांव बदल गया है। अब उन्हें पहचानने वाला कोई नज़र नहीं आता। ढूंढ़ते हुए दो-तीन परिचितों के घर पहुंचे तो लोग उन्हें परिचय देने के बाद ही पहचान पाये। जो ठीक से पहचान पाये वे काफी बूढ़े हो चुके थे।
शीतल भाई को लगा कि यहां आकर ज़िन्दगी जैसे ठहर गयी है। सब कुछ मंथर गति से चलता है, कहीं कोई जल्दबाज़ी नहीं।
शाम को डेढ़ दो किलोमीटर टहलने निकल गये। सड़क के दोनों तरफ खेत दिखते थे। दूर जाकर नदी के पुल पर बैठ गये। बगल में पुराना मन्दिर था। सब तरफ सन्नाटा था। दो चार लोग मन्दिर में आते जाते दिखते थे। थोड़ी देर बैठकर शीतल भाई ऊब कर उठ आये।
शीतल भाई के घर से थोड़ी दूर एक सेठ की किराने की दुकान और मकान था। दूसरी रात को वहां से किसी के गुस्से से बकने- झकने की आवाज़ें आने लगीं। पूछने पर पता चला कि गांव के एक बिगड़े रईस अक्सर शराब पीकर सेठ को गालियां सुनाते हैं और सेठ जी शांत चित्त से सुनते हैं। कारण यह बताया गया कि सवेरे यही सज्जन सेठ के पास हाथ जोड़ते हुए आते थे और घर की चीज़ें उनके पास गिरवी रख जाते थे। इस क्रम में सेठ जी उनकी खेती की ज़मीन और घर की बहुत सी चीजों के मालिक हो गये थे। इसीलिए वह गालियां सुनकर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते थे।
तीन-चार दिन में ही शीतल भाई गांव से उकताने लगे। यहां का सन्नाटा और जीवन की सुस्त रफ़्तार उन पर भारी पड़ रही थी। शहर में थे तो दिन भर गाड़ियों का आना-जाना, ट्रेनों का हूटर, पास-पड़ोस की खटर-पटर कानों में आती रहती थी। चौराहे पर खड़े आदमी को भी शहर अपनी रफ़्तार में लपेट लेता था। ज़िन्दगी उसी रफ़्तार की आदी हो गयी थी, इसलिए सुस्त गति वाली ज़िन्दगी में ‘एडजस्ट’ होना मुश्किल लग रहा था।
शीतल भाई को याद आया कई साल पहले वे मुंबई गये थे। वहां स्टेशन पर एक आदमी ने उनसे उनके शहर का नाम पूछा और फिर बताया कि एक बार वह तीन-चार घंटे के लिए उनके शहर में गया था और वहां की ज़िन्दगी उसे इतनी सुस्त लगी कि उसका जी घबराने लगा। उसकी बात याद करके शीतल भाई को लगा कि हर जगह की ज़िन्दगी की अपनी रफ़्तार होती है और एक रफ़्तार वाली जगह के आदी आदमी को दूसरी जगह समायोजित होना आसान नहीं होता।
एक हफ्ते बाद ही शीतल भाई वापस शहर पहुंच गये। पत्नी बोलीं, ‘बड़ी जल्दी वापस आ गये ? कुछ दिन और शान्ति से रह लेते।’
शीतल भाई ने जवाब दिया, ‘वहां शान्ति कुछ ज़्यादा ही है। हम शहर वालों को ज़्यादा शान्ति की आदत नहीं रही। ज़्यादा शान्ति हो तो मन घबराने लगता है। जैसा भी है हमारे लिए शहर ही ठीक है।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






एक सेवानिवृत्त प्राणी की सहज व्यथा कथा। चित्रण और अंतर्दृष्टि में यथार्थ झलकता है। धीरे धीरे वह प्राणी परिस्थितियों को स्वीकार करने लगता है और अपने स्वभाव के अनुरूप गतिविधियों से जुड़ने लगता है।
साधुवाद!🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।