श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “खिड़की से अब झाँकते। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३३ ☆

☆  खिड़की से अब झाँकते  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

खिड़की से अब झाँकते, हर बूढ़े माँ बाप ।

गुम सुम से हैं देखते, सूरज का संताप ।।

*

जीवन भर दौड़े बहुत, नहीं किया विश्राम ।

आया जब संकट समय, उन पर लगा विराम।। 

*

श्वासें अब हैं टूटतीं, रोते नेत्र निचोर ।

नील गगन में डूबती, आशाओं की भोर ।।

*

विश्वासों की पोटली, संजाये थे साथ।

काल परिंदा ले उड़ा, क्षण में किया अनाथ।।

*

जीवन की संध्या घड़ी, अंधकार गहराय ।

आशाओं के दीप को, उर में कौन जलाय।।

*

जिन गलियों में खेलकर, बड़े हुये युवराज ।

उन राहों को लाँघ कर, चले गये सरताज ।।

*

नये क्षितिज पर उड़ गये, बेटा भानु प्रताप।

काट डोर सम्बन्ध कीे, बिछुड़ गये माँ बाप ।।

*

अपेक्षायें न राखिये, अपनों से कुछ आप ।

मन दर्पण सा टूट कर, बन जाये अभिशाप।।8

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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