श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “एक गीतिका” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५९ ☆

☆ एक गीतिका ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पत्ता-पत्ता बूँद झरी है

धूप बिचारी पड़ी मरी है।।

 *

बादल के आँगन में हँसती

चंचल बाला सी बिजुरी है।।

 *

छप्पर से लटकी है बरखा

छानी भरी-भरी गगरी है ।।

 *

ताल-तलैया पोखर बोलें

परे हटो नदिया गहरी है।।

 *

कहाँ रुकेगी मन की फिसलन

जहाँ-तहाँ काई पसरी है।।

 *

धरती पर है यौवन छाया

हरियाली गाती कजरी है ।।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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