सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपकी कविता ।। श्री गणेश ।।)

☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆

? कविता – ।। श्री गणेश ।। ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

-1-

पहले नाम गणेश का, लेना बारम्बार l

सहज सफल सब कामना, फिर होगा उद्धार ll

-2-

प्रेरक नेक गणेश हैं, नमन करूँ सौ बार l

देव अनुज दानव सभी, करते हैं स्वीकार ll

-3-

गजानना गौरी प्रिया, रिद्धि सिद्धि के नाथ l

विश्वरूप हे गजमुखा, आओ मेरे साथ ll

-4-

वक्र तुंड सुत शंकरा, जग भर पूज्य गणेश l

मूषक वाहन देव जी, सफल करो विघ्नेश ll

-5-

मांगलमूर्ति गजवदना, भवन पधारो आप l

एकदन्त गौरीसुता, मिलकर कर लें जाप ll

-6-

तू सद्गुरु ओंकार है, लम्ब उदर गणराज l

ज्ञान बुद्धि के देवता, गणाध्यक्ष सरताज ll

-7-

गजानना हे गजवदन, मृत्युंजय हो आप l

कोटी सूर्य सम तेज से, हरो सकल जन पाप ll

-8-

गण के साधक शिव बनें, प्रेरक रहे गणेश l

प्रथम पूज्य के हैं पिता, कहते जिन्हें महेश ll

-9-

नमन करूँ सद्भाव से, गौरी पुत्र गणेश l

भूल चूक को माफ कर, हर लो शीघ्र कलेश ll

-10-

मेरे ईश गणेश जी, करती रोज प्रणाम l

वंदन करती आप को, होते हैं सब काम ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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