सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ परजीवी आखिर कौन है ? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

काक्रोच देखकर दो फुट ऊपर उछलने वाली गृहपत्नी, गृहप्रबंधक, गृहनिर्मात्री ललना इस तरह आतंकित हो उठती है मानो उसने डायनासोर देख लिया हो। आपदा में अवसर देखते ही पतिदेव सक्रिय हो उठते हैं। काक्रोच पर हिट छिड़कते हैं या जूते-चप्पल के प्रहार से उसका काम तमाम कर अजेय योद्धा के रूप में पत्नी के सामने अवतरित होते हैं। पत्नी गदगद ,भला ऐसा हर्क्यूलियन टास्क करना सबके बूते की बात नहीं है। वे धन्यता भाव से भर उठती हैं।

शास्त्र कहते हैं, पृथ्वी पर जो कुछ भी पाया जाता है उसमें कुछ भी निरुपयोगी नहीं होता। सभी का कोई न कोई मकसद या जरूरत जरूर है। काक्रोच के निर्माण के पीछे ऊपर वाले का क्या मकसद हो सकता है, मई दो हज़ार छब्बीस में समझ में आया। कहते हैं ना, कभी न कभी घूरे के दिन भी फिरते हैं।

एक बात चिंतन-मनन को विवश करती है कि क्या काक्रोच को जिंदा रहने , देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार है या नहीं? काक्रोच की भाषा मनुष्य नहीं जानता। पर मनुष्य की आहट से ही काक्रोच भयभीत हो जाता है। वह जानता है इस खतरनाक जीव की मंशा क्या है।दिखता है वैसा कभी नहीं होता।काक्रोच मौका देखकर चाल चरित्र चेहरा नहीं न बदलता।

सियासत, धर्म, क्रिकेट, फिल्म या अन्य कोई भी इलाका क्यों न हो, वर्तमान के विज्ञापनजीवी जमाने में दिखने-दिखाने का चलन जोरों पर है। काक्रोच को रूप के नाम पर ईश्वर ने ठेंगा दिखाया है, पर किसी भी सूरत में जिंदा रहने की ललक से नवाज़ा है। है कोई मनुष्य  ऐसा जिसका सिर कट जाए और फिर भी वो जिंदा रहे ? है कोई ऐसा जो हफ्तों बिना खाए पिए भी अपने जीवन की घोषणा करे और फिर भी काक्रोच परजीवी?

अभी तक समझ में नहीं आया कि आखिर परजीवी कहते किसे हैं? जीवी तो कई तरह के हैं- श्रमजीवी,मिथ्याजीवी, स्वप्नजीवी, कैमराजीवी, मसिजीवी और न जाने कितने। पर सभी किसी न किसी रूप में परजीवी तो हैं।

बेशक काक्रोच के पांव और शरीर पर बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी कृमि होते हैं जो मनुष्य का नुकसान करते हैं। पर क्या मनुष्य किसी का नुकसान नहीं करता? वह तो काक्रोचों से भी ज्यादा डरावना है।उसे गिरगिट की तरह रंग बदलने में महारत है।

दरअसल काक्रोच प्रकृति के सफाईकर्मी हैं। सिर्फ शक्ल-सूरत के डरावने और घिनौने हो जाने से उसके मन का पता नहीं लगता। दुनिया में शक्ल ही तो सब कुछ नहीं, कुछ कारनामे भी देखने चाहिए। अच्छी शक्लवालों के भी खयाल बदसूरत पाए जाते हैं ।काक्रोच के नसीब ही ऐसे हैं कभी वे मानवाकृति नजर आ सकते हैं तो  कभी मानव भी काक्रोचाकृति । सारा माया का खेल है ।अब उनके बीच में जो पाए जाते हैं जेन जी और अल्फा काक्रोच उनकी मंशा का पता लगाना बहुत कठिन है। संभवत प्रकृति के विकास क्रम में उनमें भी कोई परिवर्तन आया हो।

ये काक्रोच पढ़ते-लिखते नहीं तो क्या !  कितने ही पढ़े-लिखों ने कौन सा तीर मार लिया आज भी लकीर के फकीर बने हुए हैं ।अक्ल को घुटनों में छुपाए रहते हैं ।

गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाने वाले इस दुनिया में हमेशा तकलीफ झेलते हैं, सलाखों के पार पाए जाते हैं, फांसी के तख्ते पर झूल जाते हैं या फिर मार दिए जाते हैं ।उन पर कई किस्म की तोहमत लगाई लगती फिर भी काक्रोच अपना धर्म नहीं भूलते। मनुष्य भूल रहा है । हैरानी तो देखिए जो धर्म भूल रहा है वही आरोप लगा रहा है । जो धर्म भूल रहा है उसे छोड़कर इल्जाम काक्रोचों पर लगाया जा रहा है। संभवतः इसे ही कलियुग कहते हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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