सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ गा कोकिल बरसा पावक कण… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(21 जून विश्व संगीत दिवस पर कोयल को अर्पित व्यंग्य योग)

प्रिय कुहू

तुम 46 डिग्री टेम्प्रेचर में भी कूकीं। बदरीले मौसम,धुंआधार बारिश और हाड़ कँपाती ठंड में भी। मधुऋतु में कूकना तुम्हारा मौलिक अधिकार है।

तुम्हें कौन समझाए कि बेमौसम कूकना अच्छा नहीं होता। भले ही चीनी से ज्यादा मीठी कूक क्यों न हो। हमने कब कहा कि मुहूर्त निकलवाकर कूको ,पर जनरल नॉलेज नाम की कोई चीज होती है कि नहीं।

बेशक तुम पक्षी -जगत की नेत्री हो पर, हर बात पता हो जरूरी तो नहीं। वैसे भी अज्ञानी रहकर सब कुछ पाया जा सकता है तो ज्ञान की सिफारिश किसलिए।

कभी सुमित्रानंदन पंतजी ने तुम से गुजारिश की थी ! याद करने की कोशिश करो। मुझे पता है तुम भूली नहीं हो। भूलने का अभिनय कर रही हो। जिसमें तुम्हें महारत है।

हैरानी इस बात की है कि जहां तुम्हें याद रखना होता है वहां तुम भूल जाती हो। और जहां भूलना चाहिए वहां शिद्दत से याद रखती हो।

उन्होंने कहा था—- गा कोकिल बरसा पावक कण नष्ट भ्रष्ट हों जीर्ण पुरातन*—–वे जानते थे कि सुर सम्राज्ञी रसप्रिया वक्त पड़ने पर अग्नि भी बरसा सकती है। मृदूनि कुसुमादपि, वज्रादपि कठोर। तुम्हारे लिये यह पथ अपरिचित नहीं है। इसमें नया कुछ भी नहीं। भगवान कृष्ण ने होठों पर बाँसुरी रखी तो तर्जनी पर सुदर्शन चक्र।

शक्तिरूपा महामाया के हाथों में वीणा होती है पर असुर संहार हेतु धनुष ,त्रिशूल ,और अन्य आयुध भी होते हैं।

लोग कहते हैं तुम कौए के घोंसले में अपने अंडे छोड़ आती हो। तुम काली कलूटी हो । तो क्या। रंग देखकर कैसे फैसला किया जा सकता है। गोरा, मन से काला ढुस भी हो सकता है। रंग तो सियार भी बदल लेते हैं। बगुला ,मौनी बाबा बनकर मछली का शिकार करता है। चाहे जो हो तुम “तोतों “से तो लाख गुना अच्छी हो। तुम्हारा अपना राग है। सुर है। स्वयं की भाषा है। तुम्हें आज तक कोई तोता बनाने में कामयाब नहीं हो सका।

कभी सोचने की जहमत भी उठाओ। तुम्हें हम कादम्बरी, कोकिल, पिक, वसंतदूती, वनप्रियः चाहे जिस नाम से पुकारें कोयल ही रहोगी ना। नाम बदलने से फितरत नहीं बदलती ना पाखी। जन्मजात आदतें आखिर तक साथ रहती हैं।

अपनी ही सूरत पर नर्सिसस की तरह रीझनेवाला, जमाखोर मनुष्य तुम्हारे सुरदान का महत्व समझ ही नहीं सकता। क्योंकि उसकी सुरों की समझ खो गई है। वह निहायत बेसुरा और भौंडा हो गया है।

कुहू तुम सपने देखती हो। बेचती नहीं। तुम्हारे स्वप्न में एक हरा भरा मुल्क है। ताकि आनेवाली पीढ़ियों को जंगल सलामत मिले। बाग बगीचे वन उपवन अमराइयों में वे कूकती फिरें। मौसम में मिश्री घोलें।

तुम कूको कुहू। जी भरकर कूको। कभी तो इंसान के न सही, नदी जंगल पहाड़ के देवता के कानों पर जूँ रेंग जाये।

इंतजार लंबा हो रहा है। अब पंतजी की बात मान भी जाओ ना।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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