श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वेदना निग्रह रस।)

?अभी अभी # १०७८ ⇒ आलेख – वेदना निग्रह रस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

खिलते हैं गुल यहाँ, खिल के बिखरने को। जहाँ महादेवी की वेदना पर प्रसाद के आँसू निकल आते हों, वहाँ बच्चन की मधुशाला किस काम की। जहाँ सूरज की रोशनी कम हो, और हरदम आसमान में काली घटा छाई रहे, ऐसे में शहनाई शोभा नहीं देती। कहीं किसी कोने में, कोई दिल का दीया अगर जला दे, तो मन को बड़ा सुकून मिलता है।

कहीं मीत ना मिला रे मन का, तो कहीं मिल के बिछड़ गई अंखियां, हाय रामा ! ऊपर वाले का खेल बड़ा निराला है। किसी की झोली में खुशियों की सौगात तो कहीं गम बेशुमार। मन करता है, अखबार में इश्तहार दे दिया जाए, गुमशुदा की तलाश ! हमारी खुशी कहीं खो गई है। उम्र नाजुक, हंसता हुआ नूरानी चेहरा, लाने वाले का शुक्रिया, मेहरबानी, मुंहमांगा इनाम।।

होठों पे आए खुशी, क्या मजाल है। दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं। छोटी सी गुड़िया हो तो उदासी ज़्यादा समय तक टिकती नहीं। बच्चों को बहलाना कितना आसान है। गुड़िया, हमसे रूठी रहोगी, कब तक ना हँसोगी, देखो जी, आई रे हँसी आई। देखो जी, आई रे हँसी आई। लेकिन बड़ों का मामला जरा टेढ़ा होता है।

गम की अंधेरी रात में, दिल को न बेकरार कर, सुबह जरूर आएगी, सुबह का इंतजार कर। लेकिन जिसे सब्र नहीं, उसका क्या किया जाए। इंतजार और अभी, और अभी, और अभी। तुम्हारा इंतजार है।।

जब इंसान भीड़ में भी अकेला हो जाता है, किसी के साथ होता है, फिर भी कहीं खोया रहता है, तो वह दुनिया से नहीं, अपनों से नहीं, अपने आप से भी बहुत दूर चला जाता है। उसे न जाने क्यों ऐसा लगता है, ये दुनिया, ये महफिल, मेरे काम की नहीं। सबमें शामिल हो मगर, सबसे जुदा लगती हो, सिर्फ हमसे ही नहीं, खुद से खफा लगती हो। शुभचिंतक कह उठते हैं, सीधा सादा, अवसाद का मामला है।

होठ पर लिए, दिल की बात हम। जागते रहेंगे और, कितनी रात हम। तुम्हारा इंतजार है। दिल बहल तो जाएगा, इस खयाल से। हाल मिल गया तुम्हारा, अपने हाल से।

रात ये करार की, बेकरार है।

तुम पुकार लो। तुम्हारा इंतजार है।।

क्या वेदना में भी रस होता है ! किसी दूसरे के दुख में दुखी होना अलग बात है और खुद को अंधेरे बंद कमरे में कैद करना अलग बात है। मुबारक और को खुशियाँ, मुझे गम से मोहब्बत है।

बहुत इच्छा होती है, ऐसे गमजदा लोगों को पकड़कर बाहर लाया जाए, उन्हें ऐसे लोगों से मिलाया जाए, जो वाकई दुःखी और लाचार हैं। कुएं में कूद जाने से बेहतर है उन लोगों को निकाला जाए जो कुएं में पड़े हुए हैं। दुख दर्द का कुआं, अवसाद का कुआं। जहाँ कोई झांकना पसंद नहीं करता ;

अंधेरे में जो बैठे हैं,

नज़र उन पर भी कुछ डालो

अरे ओ रोशनी वालों !

एक रोते बच्चे को हंसाना अधिक आसान है, क्योंकि वहाँ अभी सुख दुख के संस्कार संचित ही नहीं हुए हैं। हवा के झोंको की तरह खुशी आती जाती रहती है।

प्रकृति में इंसान ज्यादा उदास नहीं रह पाता। जब एक चिड़िया चहकती है, तो उदास मन में आशा की किरण चमकती है। बारिश की बूंदें कितने आंसुओं को धो डालती है। संगीत की स्वर लहरियां एक बार अंतस में प्रवेश कर जाएं, तो अनहद नाद गूंज उठता है।।

क्या है कोई ऐसा वेदना निग्रह रस, जो महादेवी की वेदना को कम कर सके। गीता का तो पहला अध्याय ही अर्जुन विषाद योग है। हम तो यही चाहते हैं ;

झूम झूम कर नाचो आज

गाओ खुशी के गीत,

हो …

आज किसी की हार हुई है

और किसी की जीत,

हो …

गाओ खुशी के गीत …

लगता है, गम हार गया

खुशी जीत गई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted