श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – “ईमानदारी की अकड़ ।)

?अभी अभी # १०८४ ⇒ कविता – ईमानदारी की अकड़ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ऐसा क्या हो गया

जो तुम्हारी कमर झुक गई

क्या ईमानदारी,

तुम्हारी अकड़ निकल गई ?

एक ज़माना था

ईमानदारी का रुतबा बुलंद था !

आवाज़ में जोश था

बाजुओं में ज़ोर था।

कोई बेईमान, ईमानदारी

से आँख नहीं मिला सकता था !

ईमानदारी का बोलबाला था

बेईमान का मुँह काला था।।

ईमानदारी कड़क थी, सख्त थी

बेईमान उसके आगे

थर थर काँपता था !

ईमानदारी के डर के आगे

बेईमान उल्टे पाँव भागता था।

ईमानदारी निडर थी, निर्भय थी

बेईमान डरपोक था, कायर था !

ईमानदारी सड़क पर शान से,

सीना तानकर चलती थी।

ईमानदारी की इज़्ज़त थी

बेईमान बेइज़्ज़त होता था।।

कैसी समय ने पलटी खाई

ईमानदारी ने मुँह की खाई

बेईमान की बन आई !

आज ईमानदारी की आँख में

जब बेईमान झाँकता है,

ईमानदारी शर्म से आँख

नीची कर लेती है।

ईमानदारी आज घरों में

दुबकी हुई है !”

बेईमान शान से रथ पर

हो रहा सवार।

ईमानदारी को सब रहे धिक्कार

बेईमान की हो रही जय-जयकार।।

ईमानदारी !

आखिर तुम्हें हो क्या गया है ?

क्या तुम्हारा ईमान खो गया है

या ये बेईमान कुछ कुछ

ईमानदार हो गया है !

ऐसा कुछ नहीं है भाई !°

ईमानदारी फरमाई।

ईमानदारी की परिभाषाएं

बदल गई हैं।

जैसे हो, वैसे मत दिखो !,

बेईमान से कुछ सीखो।

बाज़ार में कई मुखोटे मिलते हैं

मुख में राम, बगल में छुरी रखो।

लोग तुम्हें ईमानदार समझें

तुम बेईमानी का दामन

थामे रखो।।

बस इसी तरह ईमानदारी

पिटती चली गई

उसकी पकड़ ढीली होती

चली गई और

बेईमान अकड़ता चला गया

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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