श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आईना।)

☆ लघुकथा # १२५ – आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“नेहा! तुम हमेशा मेरे दुश्मनों से ही क्यों बात करती हो? मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं। आज ही मेरा मकान खाली कर दो।”

मकान मालकिन शांता देवी का स्वर गुस्से से काँप रहा था।

नेहा बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। पीछे से शांता देवी की बड़बड़ाहट सुनाई देती रही—”किराए के घर में रहती है और तेवर महारानी जैसे!”

शाम को संदीप घर पहुँचा तो शांता देवी ने फिर वही बात दोहरा दी। कमरे में आकर उसने पूछा, “आख़िर बात क्या हुई?”

नेहा ने शांत स्वर में कहा, “कोने वाले घर में हमारे गाँव की पूजा रहती है। वह मुझसे दो बातें कर लेती है। आंटी उसे अपना दुश्मन मानती हैं। उनकी दुश्मनी में मेरा क्या दोष?”

संदीप ने कहा, “ठीक है, दोस्त का मकान खाली है। वहीं चलेंगे।”

दोनों सामान समेटने लगे। अलमारी बंद करते हुए नेहा की नज़र अपने पुराने पारिवारिक फोटो पर पड़ी। उसने उसे देर तक देखा, फिर धीमे से बोली, “एक बार सास-ससुर से दूर होकर सोचा था कि शांति मिल जाएगी। अब यहाँ भी वही कड़वाहट… क्या हर बार घर ही बदलना समाधान है?”

संदीप उसकी ओर देखने लगा।

कुछ क्षण बाद नेहा ने दृढ़ स्वर में कहा, “नहीं… गाड़ी विश्वकर्मा नगर नहीं जाएगी।”

“तो कहाँ?” संदीप ने पूछा।

नेहा की आँखें नम थीं।

“रामपुर… माँ-पिताजी के पास। अब किराए के मकान नहीं, अपने व्यवहार को बदलने की कोशिश करूँगी। शायद रिश्ते घर बदलने से नहीं, रवैया बदलने से सँवरते हैं। आज मैंने स्वयं को आईने में देख लिया है।”

गाड़ी रामपुर की ओर मुड़ चुकी थी और नेहा के जीवन की दिशा भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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