श्री अनिल वामोरकर
☆ कविता ☆
☆ ये अच्छाई ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆
सब कुछ छोडा
हमने धीरे धीरे,
पर कमबख्त ये
ये अच्छाई न छूटी हमसे…
जमाने ने,
खूब ताने मारे
रूलाया भी खूब
गलत हम न थे फिर भी,
क्यों की ये अच्छाई….
आपसे,
दिल से प्यार
किया था हमने
गैर के बाहों में थी आप
पर न टोका हमने
क्यों की अच्छाई…
एक बार पूछती
उसे चाहती हूँ मैं
बीच आपके न आता
तासीर है संस्कारो का
क्यों की अच्छाई…
(तासीर = प्रभाव)
© श्री अनिल वामोरकर
अमरावती
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





