मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – सच तो यही है…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
कह दो इन माटी के पुतलों से
जब इनमें जान ही नहीं
तो जज़बात कैसे हों
फितरत ही न थी कभी
तो फिर मुलाकात कैसे हो
ये तो जी कर भी निर्जीव रहे
वो कोई और थे जो
गुज़र कर भी सजीव रहे
बहती थी जो सरल सलिल सरिता
अब उसमें न जल न हरियाली है
संबंधों की सुखद कल्पना, रह गयी ख़ाली है
ये दुनिया चलती थी जो कभी
कच्चे धागों के रिश्तों पर
आज स्वार्थ के गठीले बंधनों में भी
सिर्फ़ मिथ्या का जाल है
और तो कुछ भी नहीं..,
बस रह गया ये मलाल है…!!!!!☆
© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





