श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆ अनजान रिश्ते – श्री आलोक श्रीवास्तव “धीरज” ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
परस्पर प्रेम के निर्वाह को लेकर विभिन्न दृष्टिकोणों से वैसे तो साहित्य में काफी कुछ लिखा गया है और इस संबंध में विस्तृत चिंतन भी किया गया है। साहित्य के अंतर्गत डा . धर्मवीर भारती लिखित उपन्यास गुनाहों का देवता हो या श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उसने कहा था, दोनों ही का कथानक हमें प्रेम के बारे ये सीख तो जरुर देता है कि प्रेम भावनात्मक रूप से जीवन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में यही सब कुछ नहीं है । दोनों ही अमर रचनाकारों के इन चर्चित कथानक में प्रेम के इस अद्भुत चिंतन और दर्शन में यही बात सामने आती हैं । उसने कहा था कहानी का मुख्य पात्र लहना सिंह हो या गुनाहों का देवता का मुख्य पात्र चंदर हो, इन दोनों की प्रेम की पराकाष्ठा से सभी परिचित हैं लेकिन प्रेम के अतिरिक्त व्यावहारिक जीवन के प्रति उनकी निष्ठा और दायित्वों की अगर बात की जाये तो समाज के प्रति यह प्रेरणा दायक ही नजर आती है ।
श्री आलोक श्रीवास्तव “धीरज”
भाई आलोक श्रीवास्तव के द्वारा लिखित उपन्यास अनजाने रिश्ते को जब पाठक वर्ग बड़ी गहराई से अध्ययन करेंगे तो वे भी मेरी उपरोक्त बातों से सहमत होंगे कि जीवन में आत्मिक प्रेम और दैहिक प्रेम ही सब कुछ नहीं है बल्कि इससे आगे भी कुछ और है जो कि हमें अपने जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर सोचने के लिए विवश करता है। आलोक जी के इस उपन्यास में इस तथ्य के समर्थन में किसी फिल्म की ये पंक्तियां भी सहायक सिद्ध हो सकती हैं-
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छोड़ दें सारी दुनिया किसी के लिए,
ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए ।
प्यार से भी जरुरी कई काम हैं,
प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए।।
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देखा जाए तो आलोक जी ने भी अपने इस उपन्यास में उपरोक्त पंक्तियों के आधार पर ही अपने पाठकों को यह मैसेज दिया है। उपन्यास के कथानक पर ध्यान दें तो लेखक अपने इस उपन्यास के माध्यम से अपनी बात समझाने में सफल भी हुए हैं । इस उपन्यास में मुख्य तौर पर तीन पात्र हैं, शेखर, सुधा और रेखा । शेखर सुधा से प्यार करता है और अपने बचपन के दोस्त रवि की पत्नी रेखा के प्रति ट्रेन यात्रा के दौरान वह आकर्षित हो गया था और यह आकर्षण उन दोनों की अति निकटता का कारण भी बना । इधर सुधा से मिलने की सुलभता के लिए उसने रेखा की मित्रता सुधा से करवा दी लेकिन बाद में जब उसने सुधा से शादी करनी चाही तो उसके परिजनों ने उसकी शादी अपनी इच्छा से दूसरी जगह करवा दी और यहां रेखा ने भी शादी से मना कर दिया। बाद में शेखर अपने पिता की इच्छाओं के अनुसार ही शादी के लिए तैयार हो गया ।आलोक जी के इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैं फिर पाठकों का ध्यान उल्लेख की गई फिल्म की उन्हीं पंक्तियों की ओर दिलाना चाहूंगा कि आलोक श्रीवास्तव ने प्रेम संबंधों का विश्लेषण करते हुए ये सार्थक संदेश तो समाज को दिया ही है कि परस्पर प्रेम संबंधों में कोई सफल हो या असफल अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों की दिशा में उसे सदा सचेत एवं सक्रिय होना चाहिए।
मेरे दृष्टिकोण से आलोक श्रीवास्तव का यह उपन्यास अनजान रिश्ते पाठकों के समक्ष प्रेम को एक और नये रुप में परिभाषित करने में समर्थ सिद्ध होगा।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






