☆ पुस्तक चर्चा ☆ “सड़क पर (नवगीत संग्रह)” – रचनाकार: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ समीक्षा – हिन्दी भूषण इं. देवकीनंदन ‘शांत‘ ☆
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कृति : सड़क पर (नवगीत संग्रह)
रचनाकार: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
प्रकाशन: समन्वय प्रकाशन अभियान
प्रथम संस्करण: वर्ष २०१८
मूल्य: २५०/-
पृष्ठ: ९६
आवरण पेपरबैक बहुरंगी, कलाकार मयंक वर्मा
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
☆ समीक्षा: आश्वस्त करता नवगीत संग्रह ‘सड़क पर‘ – हिन्दी भूषण इं. देवकीनंदन ‘शांत‘ ☆
मुझे नवगीत के नाम से भय लगने लगा है। एक वर्ष पूर्व ५० नवगीत लिखे। नवगीतकार श्री मधुकर अष्ठाना जो हमें वर्षों से जानते हैं, ने कई महीनों तक रखने के पश्चात् ज्यों का त्यों हमें मूल रूप में लौटते हुए कहा कि गीत के हिसाब से सभी रचनाएँ ठीक हैं किंतु ‘नवगीत’ में तो कुछ न कुछ ‘नया’ होना ही चाहिए। हमने उनके डॉ. सुरेश और राजेंद्र वर्मा के नवगीत सुने हैं। अपने नवगीतों में जहाँ नवीनता का भाव आया, हमने प्रयोग भी किया जो अन्य सब के नवगीतों जैसा ही लगा लेकिन आज तक वह ‘आँव’ शब्द समझ न आया जो मधुकर जी चाहते थे। थक-हार कर हमने साफ़-साफ़ मधुकर जी की बात कह दी डॉ. सुरेश गीतकार से जिन्होंने कहा कि शांत जी! आप चिंता न करें, हमने नवगीत देखे हैं, बहुत सुंदर हैं लेकिन हम इधर कुछ अस्त-व्यस्त हैं, फिर भी शीघ्र ही आपको बुलाकर नवगीत संग्रह दे देंगे। आज ४ माह हो चुके हैं, अब हम बगैर उनकी प्रतिक्रिया लिए अपना संग्रह वापस ले लेंगे।
यह सब सोचकर ‘सड़क पर’ अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में हाथ काँप रहा है। तारीफ में कुछ लिखा तो लोग कहेंगे ये ग़ज़ल, दोहे, मुक्तक, छंद और लोकगीत का कवि, नवगीत के विषय में क्या जाने? तारीफ पर तारीफ जबरदस्ती किए जा रहा है। यदि कहीं टिप्पणी या आलोचनात्मक बात कह दी तो यही नवगीत के तथाकथित आचार्य हमें यह कहकर चुप करा देंगे कि जो नवगीत प्रशंसा के सर्वथा योग्य था, उसी की यह आलोचना? आखिर है तो ग़ज़ल और लोकगीतवाला, नवगीत क्या समझेगा? हमें सिर्फ यह सोचकर बताया जाए कि कि नवगीत लिखनेवाले कवि क्या यह सोचकर नवगीत लिखते हैं कि इन्हें सिर्फ वही समझ सकता है जो ‘नवगीत’ का अर्थ समझता हो?
हम एक पाठक के नाते अपनी बात कहेंगे जरूर….
सर्वप्रथम सलिल जी प्रथम नवगीत संग्रह “काल है संक्रांति का” पर निकष के रूप में निम्न साहित्यकारों की निष्पक्ष टिप्पणी हेतु अभिवादन।
* श्री डॉ. सुरेश कुमार वर्मा, जबलपुर का यह कथन वस्तुत: सत्य प्रतीत होता है –
१. कि मुचुकुन्द की तरह शताब्दियों से सोये हुए लोगों को जगाने के लिए शंखनाद की आवश्यकता होती है और
‘सलिल’ की कविता इसी शंखनाद की प्रतिध्वनि है।
बस एक ही कशिश, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने जो जबलपुर के एक भाषा शास्त्री, व्याख्याता हैं ने अपनी प्रतिक्रिया में “काल है संक्रांति का” सभी गीतों को सहज गीत के रूप में ही देखा है। ‘नवगीत’ का नाम लेना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा।
* श्री (अब स्व.) चन्द्रसेन विराट जो विख्यात कवि एवं गज़लकार के रूप में साहित्य जगत में अच्छे-खासे चर्चित रहे हैं। इंदौर से सटीक टिप्पणी करते दिखाई देते हैं- ” श्री सलिल जी की यह पाँचवी कृति विशुद्ध ‘नवगीत’ संग्रह है। आचार्य संजीव ‘सलिल’ जी ने गीत रचना को हर बार ‘नएपन’ से मंडित करने की कोशिश की है। श्री विराट जी अपने कथन की पुष्टि आगे इस वाक्य के साथ पूरी करते हैं- ‘छंद व कहन’ का नयापन उन्हें सलिल जी के नवगीत संग्रह में स्पष्ट दिखाई देना बताता है कि यह टिप्पणी नवगीतकार की न होकर किसी मँजे हुए कवि एवं शायर की है – जो ‘सलिल’ के कर्तृत्व से अधिक विराट के व्यक्तित्व को मुखर करता है।
* श्री रामदेवलाल ‘विभोर’ न केवल ग़ज़ल और घनाक्षरी के आचार्य हैं बल्कि संपूर्ण हिंदुस्तान में उन्हें समीक्षक के रूप में जाना जाता है- ” कृति के गीतों में नव्यता का जामा पहनाते समय भारतीय वांग्मय व परंपरा की दृष्टि से लक्षण-व्यंजना शब्द शक्तियों का वैभव भरा है। वे आगे स्पष्ट करते हैं कि बहुत से गीत नए लहजे में नव्य-दृष्टि के पोषक हैं। यही उपलब्धि उपलब्धि आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ को नवगीतकारों की श्रेणी में खड़ा करने हेतु पर्याप्त है।
* डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई बड़ी साफगोई के साथ रेखांकित कर देते हैं कि भाई ‘सलिल’ के गीतों और नवगीतों की उल्लेखनीय प्रस्तुति है “काल है संक्रांति का” कृति। नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना ‘सलिल’ जी को नवगीतकार मानने हेतु विवश करती है। कृति के सभी नवगीत एक से एक बढ़कर सुंदर, सरस, भाव-प्रवण एवं नवीनता से परिपूर्ण हैं। वे एक सुधी समीक्षक, श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ साहित्यकार हैं लेकिन गीत और नवगीतों दोनों का जिक्र वे करते हैं- पाठकों को सोचने पर विवश करता है।
* शेष समीक्षाकारों में लखनऊ के इंजी. संतोष कुमार माथुर, राजेंद्र वर्मा, डॉ. श्याम गुप्ता तथा इंजी. अमरनाथ जी ने ‘गीत-नवग़ीत, तथा गीत-अगीत-नवगीत संग्रह कहकर समस्त भ्रम तोड़ दिए।
* इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार समीक्षक जबलपुर ने अपनी कलम तोड़कर रख दी यह कहकर कि ‘सलिल’ जैसे नवगीतकार ही हैं जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को साध रहे हैं और बोध को भी। सलिल जी के गीतों/नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है।
अंत में “सड़क पर”, आचार्य संजीव ‘सलिल’ की नवीनतम पुस्तक की समीक्षा उस साहित्यकार-समीक्षक के माध्यम से जिसने विगत दो दशकों तक नवगीत और तीन दशकों से मधुर लयबद्ध गीत सुने तथा विगत दस माह से नवगीत कहे जिन्हें लखनऊ के नवगीतकार नवगीत इसलिए नहीं मानते क्योंकि यह पारम्परिक मधुरता, सहजता एवं सुरीले लय-ताल में निबद्ध हैं।
१. हम क्यों निज भाषा बोलें? / निज भाषा पशु को भाती / प्रकृति न भूले परिपाटी / संचय-सेक्स करे सीमित / खुद को करे नहीं बीमित / बदले नहीं कभी चोले / हम क्यों निज भाषा बोलें?
आचार्य संजीव ‘सलिल’ ने स्पष्ट तौर पर स्वीकार कर लिया है कि ‘नव’ संज्ञा नहीं, विशेषण के रूप में ग्राह्य है। उनके अनुसार गीत का उद्गम कलकल-कलरव की लय (ध्वन्यात्मक उतार-चढ़ाव) है। तदनुसार ‘गीत’ का नामकरण कथ्य और विषय के अनुसार लोकगीत, ऋतुगीत, पर्वगीत, भक्तिगीत, जनगीत, आव्हानगीत, जागरणगीत, नवगीत, बालगीत, युवागीत, श्रृंगारगीत, प्रेमगीत, विरहगीत, सावनगीत, फागुनगीत, शोकगीत, बधाई गीत, विवाहगीत आदि हुआ।
परिवर्तन की ‘सड़क पर’ कदम बढ़ाता गीत-नवगीत, समय की चुनौतियों से आँख मिलाता हुआ लोकाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना है। नव भाव-भंगिमा में प्रस्तुत होनेवाला प्रत्येक गीत नवगीत है जो हमारे जीवन की उत्सवधर्मिता, उमंग, उत्साह, उल्लास, समन्वय तथा साहचर्य के तत्वों को अंगीकार कर एकात्म करता है। पृष्ठ ८६ से ९६ तक के गीतों की बोलिया बताएँगी कि उन्हें “सड़क पर” कदम बढ़ाते नवगीत क्यों न कहा जाए?
सड़क पर सतत ज़िंदगी चल रही है / जमूरे-मदारी रुआँसे सड़क पर / बसर ज़िंदगी हो रहे है सड़क पर / सड़क को बेजान मत समझो / रही सड़क पर अब तक चुप्पी, पर अब सच कहना ही होगा / सड़क पर जनम है, सड़क पर मरण है, सड़क खुद निराश्रित, सड़क ही शरण है / सड़क पर आ बस गयी है जिंदगी / सड़क पर, फिर भीड़ ने दंगे किये / दिन-दहाड़े, लुट रही इज्जत सड़क पर / जन्म पाया था, दिखा दे राह सबको, लक्ष्य तक पहुँचाए पर पहुँचा न पाई, देख कमसिन छवि, भटकते ट्रक न चूके छेड़ने से, हॉर्न सुनकर थरथराई पा अकेला, ट्रॉलियों ने चींथ डाला, बमुश्किल, चल रही हैं साँसें सड़क पर।
‘सड़क पर’ ऐसा नवगीत संग्रह है जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो कवि हो, अकवि हो पर सहृदय हो।
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समीक्षा – हिन्दी भूषण इं. देवकीनंदन ‘शांत’
६.१.२०१९
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






