श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆
☆ सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य धारा में है सामाजिक संचेतना – चर्चित काव्य कृति ‘रंग मेरे जीवन के’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
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अभी पिछले कुछ दिनों पहले साहित्यिक क्षेत्र में पाथेय प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध कवि श्री सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य कृति रंग मेरे जीवन के पाठकों के मध्य काफी चर्चा में रहा। इस संग्रह की कविताएं वास्तव में एक सामाजिक व्यक्ति के जीवन में सुख दुख के विभिन्न रंगों का विशविश्लेषण करती नज़र आती हैं और इसीलिए कृति की कविताओं ने पाठकों को ज्यादा प्रभावित किया है।कवि ने अपने आसपास जो भी देखा और महसूस किया वह उनकी कलम से कागज पर उतर आया और जो भी उन्होने रचा वह पाठकों के लिए पठनीय बन गया । सुवीर जी की रचनाएं किसी व्यक्ति के मानस पटल पर एक अनूठी छाप छोड़ती हैं।कवि की अधिकांश कविताएं पाठकों को अत्यंत सार्थकता और गंभीरता के साथ कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं जैसे उनकी इस कविता की ये पंक्तियां देखिए –
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अब जबकि मेरे बाजू/ बड़े हो गये हों/ साथ साथ अब बूढ़ा पेड़/मेरे बाजुओं में/ समाता नहीं है— /मैं आंखों ही आंखों में नापता हूं / मोटाई इसकी /और/सोचता हूं/मन ही मन/ बढ़ते कुनबे के लिए/कमरा एक और बनाना है/ सोफ़ा भी घर का / हो गया पुराना है/ मेरे आंगन का पेड़/ बूढ़ा हो गया है।
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कवि न तो निराशा की बात सोचता है और नहीं निराशा की बात करता है बल्कि कवि आज की व्यवस्था और परिस्थितियों में भी पूर्ण रूप से आशावादी नजर आता है । कवि की रचना में गंभीर सोच का ये उदाहरण भी देखें –
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बहुत अंधेरा है,
सूरज का
कोई टुकड़ा लाओ
चिपका दो
किसी दीवार पर
फेविकोल से
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इस काव्य कृति की शुरुआत में प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी की प्रतिक्रिया अत्यंत प्रभावी और महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं कि- इन कविताओं में रसभाव और प्रभाव है। मुक्त छंद का यही पक्ष मुक्त छंदीय कविताओं के सौंदर्य को बनाए रखता है। परिवेश की विकृति के प्रति आक्रोशित इन रचनाओं में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि है ।
इस संग्रह में सुप्रसिद्ध साहित्यकार,पाथेय प्रकाशन के संयोजक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने रचनाओं का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि सामाजिक पाखंड, दोगलापन और मूल्य हीनता से व्यथित कविवर सुवीर श्रीवास्तव वीर की काव्य धारा में द्वन्द और वेदना के साथ दृष्टिबोधक तत्व मुखरित हुआ है।उनकी आस्था मन की श्रेष्ठता के संधान में है।भाई श्री सुवीर श्रीवास्तव वीर जी की 98 काव्य रचनाओं के इस संग्रह की सोचनीय और सार्थक कविताओं से साहित्यिक क्षेत्र को काफी आशाएं हैं और पाठकों के मध्य वर्ष 2025 की ये एक श्रेष्ठ कृति सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





