श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

मीना भट्ट सिध्दार्थ का दोहा संग्रह – सुधियों में सिध्दार्थ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

साहित्य जब केवल कल्पना न रहकर जीवन के गहनतम अनुभवों, अश्रुओं और आत्मीय स्मृतियों का प्रतिरूप बन जाता है, तब वह कालजयी कृति का रूप ले लेता है। आदरणीय मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ जी द्वारा रचित दोहा संग्रह ‘सुधियों में सिद्धार्थ’ एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी साहित्यिक संचेतना है। यह पुस्तक केवल छंदों का संकलन नहीं है, बल्कि एक माँ के हृदय का वह हाहाकार और वात्सल्य है, जो अपने प्रिय पुत्र ‘सिद्धार्थ’ की असामयिक विदाई के बाद स्मृतियों के कल्पतरु के रूप में पल्लवित हुआ है। लेखिका ने अपने जीवन की सबसे बड़ी रिक्ति को साहित्यिक सृजन का माध्यम बनाकर पुत्र को एक अनूठी काव्यांजलि अर्पित की है।

पुस्तक के प्रारंभिक पृष्ठों में समाहित आत्मकथ्य पाठकों को लेखिका के गरिमामयी व्यक्तित्व और उनके पारिवारिक परिवेश से परिचित कराता है। 30 अप्रैल 1953 को छतरपुर जिले की नौगांव तहसील में जन्मी मीना भट्ट जी ने न्यायिक सेवा में व्यवहार न्यायाधीश से लेकर जिला न्यायाधीश के पद पर कार्य करते हुए समाज को न्याय दिया। जीवन के उत्तरार्ध में जबलपुर संभाग की लोकायुक्त कमेटी की चेयरपर्सन जैसे उच्च पदों को सुशोभित करने वाली लेखिका का अंतर्मन सदैव साहित्यिक संवेदनाओं से ओतप्रोत रहा। 3 अप्रैल 2022 का वह निष्ठुर दिन, जिसने उनके युवा पुत्र डॉ. सिद्धार्थ को उनसे छीन लिया, लेखिका के जीवन का सबसे अंधकारमय मोड़ था। इस अपार शोक को उन्होंने दोहों की साधना में बदला। पुस्तक के समर्पण पृष्ठ पर अंकित ये पंक्तियाँ हृदय को झकझोर देती हैं:

0

“बसे क्षितिज के पार तुम, भूल गए सिद्धार्थ।

अब जीवन यह बोझ है, क्या साउथ क्या नार्थ।।”

0

‘सुधियों में सिद्धार्थ’ मुख्य रूप से दोहा विधा पर आधारित है। दोहा अर्ध-सम मात्रिक छंद है, जिसके शिल्प विधान और मात्राओं के नियम का लेखिका ने पूर्ण अनुशासन के साथ पालन किया है। पुस्तक की भाषा तत्सम प्रधान, सुबोध और गंभीर है। छंदों में गेयता, प्रवाह और रसात्मकता का ऐसा अनूठा संगम है कि पाठक स्वतः ही भाव-प्रवाह में बह जाता है। किताब की शुरुआत ‘गणपति’, ‘श्री राम’ और ‘नौ देवियाँ’ जैसी मंगлаचरण की अनूठी रचनाओं से होती है, जो भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को प्रदर्शित करती हैं। ‘गणपति’ वंदना का यह रूप द्रष्टव्य है:

0

“वक्रतुंड गणपति सतत, मंगलकारी नाथ।

लंबोदर गजमुख सदा, मोदक प्रिय है हाथ।।”

0

वहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम को याद करते हुए वे लिखती हैं:

0

“धनुष-बाण है हाथ में, तिलक लगा है भाल।

कमलनयन मोहित करें, आज्ञाकारी लाल।।”

0

लेखिका केवल व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि जीवन के शाश्वत सत्यों, साहित्य की शक्ति और दार्शनिकता पर भी अपनी कलम चलाती हैं। ‘शब्द’ शीर्षक के अंतर्गत वे शब्दों की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहती हैं:

0

“तौल मोल के बात हो, शब्द बड़े अनमोल।

मिश्री सम मीठे रहें, बोल सुधा सम बोल।।”

0

इसी प्रकार ‘वेद’ और ‘दिनमान’ पर लिखे गए दोहे सृष्टि की ऊर्जा, ज्ञान और चेतना को समर्पित हैं। वे प्रकृति को संपूर्ण जगत की आत्मा के रूप में देखते हुए लोक-कल्याण की भावना व्यक्त करती हैं:

0

“कर सेवा निस्वार्थ भी, प्रेम रखो भरपूर।

रवि सम करो प्रकाश तुम, रहो दंभ से दूर।।”

0

‘सुधियों में सिद्धार्थ’ एक माँ के अश्रुओं से धुला हुआ वह दर्पण है, जिसमें जीवन की नश्वरता और वात्सल्य की अमरता एक साथ दिखाई देती है। मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ जी ने अपनी न्यायिक तार्किकता और काव्यात्मक कोमलता का जो संतुलन यहाँ प्रस्तुत किया है, वह अद्भुत है। यह कृति हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से दोहा लेखन की परंपरा को समृद्ध करती है और पाठकों के दिलों में एक स्थायी संवेदना छोड़ जाती है। यह पुस्तक हर उस सुधी पाठक के लिए संग्रहणीय है जो शब्दों में छिपे जीवन-दर्शन और आत्मीय संबंधों की गहराई को महसूस करना चाहता है।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted