जगत सिंह बिष्ट

(मास्टर टीचर : हैप्पीनेस्स अँड वेल-बीइंग, हास्य-योग मास्टर ट्रेनर, लेखक, ब्लॉगर, शिक्षाविद एवं विशिष्ट वक्ता)

☆ पुस्तक चर्चा 📖 डॉ कुंदन सिंह परिहार के व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ पर एक दृष्टि 🌿 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

ये इश्क़ नहीं आसाँ : व्यंग्य-संग्रह 🔥

लेखक: कुंदन सिंह परिहार

प्रकाशक: वर्जिन साहित्यपीठ

ई-मेल: virginsahityapeeth@gmail.com

प्रथम संस्करण: जून 2026

पृष्ठ संख्या: 157

मूल्य: ₹235.00

उपलब्धता: अमेज़न एवं फ्लिपकार्ट

डॉ कुंदन सिंह परिहार

वर्तमान परिवेश की विसंगतियों पर प्रहार करते सार्थक व्यंग्य 🔥

वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा जून 2026 में प्रकाशित व्यंग्य-संग्रह ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कुंदन सिंह परिहार जी का सातवाँ व्यंग्य-संग्रह है। इसके अलावा, उनके सात कथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। वे 1960 के बाद से निरंतर कहानी और व्यंग्य लेखन कर रहे हैं।

पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है, “व्यंग्य लेखन एक सामाजिक उपक्रम है। यदि व्यंग्य समाज के लिए नहीं है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। व्यंग्य व्यक्तिगत शिकवा-शिकायत नहीं है, न ही वह मनोरंजन का साधन है। व्यंग्यकार अन्याय, अनीति के विरुद्ध समाज की पीड़ा को प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। इसलिए परसाई जी ने लिखा कि व्यंग्य हँसने-हँसाने की चीज़ नहीं है। मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरी संवेदना अभी जागृत है, क्योंकि मेरी दृष्टि में समाज में बहुत कुछ ऐसा है जो मुझे परेशान करता है और मुझे लिखने के लिए बाध्य करता है।”

इस संग्रह में उनकी अड़तालीस सामयिक और ताज़ातरीन रचनाएँ संकलित हैं। वर्तमान परिवेश की विसंगतियों को उन्होंने बारीकी से देखा, परखा है और उन पर अत्यंत परिपक्वता से प्रहार किया है। उनके लेखन में कहीं भी हल्के, कटु या कठोर शब्द नज़र नहीं आते। गहरी से गहरी और तीखी से तीखी बात भी वे बेहद सहजता से, मजे-मजे में बयाँ कर जाते हैं। जहाँ एक ओर वे अंग्रेज़ी के कुछ शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो दूसरी ओर ठेठ हिंदी और देहात के मुहावरों का भी। विषयवस्तु का चयन वे आसपास से और देश में घटित हो रही चिंताजनक घटनाओं से करते हैं। वे कपोल-कल्पित विषयों अथवा नॉन-इश्यूज़ पर बैठे-ठाले अपने तरकश के तीर व्यर्थ नहीं करते। न ही विशुद्ध हास-परिहास के लिए लेखन करते हैं। हरिशंकर परसाई की तरह उनका समग्र व्यंग्य-लेखन सार्थक और उद्देश्यपूर्ण है।

साहित्य से जुड़ाव के चलते, व्यंग्यकार का अन्य (तथाकथित) साहित्यकारों से गाहे-बगाहे मिलना-जुलना होता रहता है। व्यंग्यकार की पैनी दृष्टि सूक्ष्म अवलोकन करती रहती है। तत्पश्चात् इन निरीह प्राणियों पर हल्की-फुल्की फुहार करती है। कवियों का नामकरण, यथा—कवि कोमल प्रसाद ‘उदासीन’, झलकन लाल ‘अनोखे’, छोटेलाल ‘अनमने’, ‘निर्मम’ जी, ‘नश्तर’ जी और ‘खंजर’ जी—उन कवियों की साहित्य-साधना के विषय में काफी कुछ इंगित कर जाता है। व्यंग्यकार के शिल्प का विनोदपूर्ण पक्ष इन रचनाओं को पढ़ने के दौरान पाठक के मुख से स्मित-रेखा को लुप्त नहीं होने देता। ज्यों-ज्यों बात आगे बढ़ती है, विद्रूप की परतें भी खुलती जाती हैं। प्रथम कविता-संग्रह प्रकाशित होने पर, नए उभरते कवि को नगर के वरिष्ठ कवि किताब के विमोचन, उस पर चर्चा और उसके प्रचार विषयक समझाइश देते हुए कहते हैं, “भैया, किताब के कर्मकांड के लिए लोग अपने प्रोविडेंट फंड का पैसा खर्च कर देते हैं, बेटी के ब्याह के लिए रखा पैसा समर्पित कर देते हैं…”

परिहार जी का लेखन मल्टी-डाइमेंशनल है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टि है, इतिहास-बोध है, देश-विदेश की घटनाओं का समावेश है और साहित्यिक गहराई भी है। वे गहन चिंतक और विचारक हैं, जो आवश्यकतानुसार दोहरे चरित्रों की साहित्यिक शल्य-चिकित्सा भी करते हैं। उनकी एक रचना प्रकृति की ‘फूड चेन’ यानी आहार-श्रृंखला पर केंद्रित है, जिसके अनुसार पोषक-तत्व और ऊर्जा का स्थानांतरण पहले जीव से दूसरे जीव में हो जाता है। इसका विस्तारपूर्वक वैज्ञानिक विवरण देने के उपरांत उनका व्यंग्यकार प्रकट होता है। वे कहते हैं, मनुष्य अन्य जीवों की तुलना में अधिक बुद्धि-संपन्न प्राणी है। प्रकृति द्वारा निर्मित आहार-श्रृंखला से उसका मन नहीं भरता। मनुष्य के द्वारा निर्मित आहार-श्रृंखला में उत्पादक से ऊर्जा और पोषण का संग्रह सबसे निचले अधिकारी या सबसे ऊपर के अधिकारी के द्वारा किया जाता है। मुझे लगता है, यह एक अद्भुत व्यंग्य-रचना है।

व्यंग्य-संग्रह में सर्वाधिक संख्या में व्यंग्य धार्मिक आडंबर और पाखंड पर केंद्रित हैं। वर्तमान राजनीतिक परिवेश में जिस तरह के मिथ्या और बड़बोले धर्मचक्र का प्रवर्तन हो रहा है, उससे व्यंग्यकार खासा उद्वेलित लगते हैं। उन्होंने मिथ्याचार का पर्दाफाश करने में कतई कोई मुरव्वत नहीं की है। बाबाओं और अंधभक्तों के हास्यास्पद क्रियाकलापों पर कटाक्ष करते हुए, आस्था का विज्ञान-सम्मत विश्लेषण किया है। स्वर्ग और नर्क, पाप और पुण्य, और आस्तिक और नास्तिक की मान्यताओं को लेकर कुछ-कुछ फंतासी के अंदाज़ में, या भगवान विष्णु से सीधे संवाद की शैली में लिखी गई रचनाएँ आनंदित करती हैं। धार्मिक मिथ्याचार को लेकर उनका आक्रोश बहुत गहरा है, जो बार-बार उनको इस पर कलम से प्रहार करने के लिए बाध्य करता है।

इसके अलावा, उन्होंने राजनेताओं के मूल चरित्र और भ्रष्टाचार को भी खूब अच्छी तरह पहचाना है और छुटभैया नेताओं से लेकर स्थापित नेताओं की खूब खबर अपने व्यंग्यों में ली है। विदेशों में बसे प्रवासियों के “रूट्स” की उथली तलाश पर भी उन्होंने कटाक्ष करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शीर्षक व्यंग्य ‘ये इश्क़ नहीं आसाँ’ प्रेम और विवाह की सामयिक विडंबनाओं की ओर इंगित करता है। आज के सामाजिक परिवेश और कुछेक लोगों के विचित्र व्यवहार पर भी उन्होंने सटीक एवं सार्थक प्रहार किए हैं। इनका पूर्ण आनंद तो उन व्यंग्य-रचनाओं को डूबकर पढ़ने में ही आएगा, जैसी कि अंग्रेज़ी में कहावत है—The proof of the pudding is in the eating.

पुस्तक के अंत में, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई पर केंद्रित एक संस्मरण है। परिहार जी नियमित रूप से उनसे मिलने उनके आवास पर जाते थे। परसाई जी को याद करते हुए, वे लिखते हैं, “मैंने महसूस किया कि परसाई जी के संपर्क में आने से व्यक्ति का जीवन प्रभावित और परिवर्तित होता था। उनके जीवन को देखने और उनके साथ उठने-बैठने से व्यक्ति अनेक क्षुद्रताओं से मुक्त हो जाता था। उसके लिए उन मार्गों को अपनाना भी कठिन हो जाता था जो आज ऊपर पहुँचने की आसान सीढ़ी माने जाते हैं। मेरे जीवन पर परसाई जी की जो छाप पड़ी वह शायद अंत तक कायम रहेगी।”

डॉ. कुंदन सिंह परिहार का जीवन सादगीपूर्ण और आडंबर-रहित है। वे स्पष्टवादिता और विद्वतापूर्ण ढंग से अपनी बात रखते हैं। अंग्रेज़ी साहित्य और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने डॉक्टरेट और लॉ की उपाधियाँ भी प्राप्त कीं। लम्बे समय तक अध्यापन करने के बाद वे प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्हें मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के वागीश्वरी सम्मान और भवभूति अलंकरण के अलावा अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करे। उनका रचनाकर्म इसी तरह निर्बाध चलता रहे और उनका स्नेह एवं आशीर्वाद हमें मिलता रहे।

©  जगत सिंह बिष्ट 🔥

इंदौर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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Kundan Singh Parihar
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धन्यवाद, बिष्ट जी। ऐसी समीक्षाएं लेखक को अपने लेखन को समझने में मदद करती हैं।