श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆
☆ कविवर श्री राजेन्द्र मिश्रा की काव्य कृति – “कर्णिका” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(१ नवम्बर – जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित)
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कर्णिका श्री राजेन्द्र मिश्रा जी की सृजित काव्य रचनाओं का एक ऐसा संग्रह है जिसने पाठकों को एक कवि के भावुक मन से परिचित कराने में अपनी सार्थक भूमिका का निर्वाह किया है। कर्णिका की कविताएं पढ़ कर पाठकों को ऐसा प्रतीत होगा कि कवि ने अपने आसपास जो देखा और जो महसूस किया है वह उनकी भावनाओं और कल्पनाओ के साथ कविता के रुप में कलम के माध्यम से कागज पर उतर आया। वैसे तो श्री राजेन्द्र मिश्रा काफी समय से कविताएं लिख रहे हैं और पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से छप भी रहे हैं। उनकी कविताओं का एक ऐसा पाठक वर्ग भी है जो उनकी कविताओं को काफी आतुरता और उत्सुकता से पढ़ता है और उस पर मनन भी करता है।
कर्णिका में जिन साहित्य मनीषियों ने काव्य रचनाओं का अध्ययन और मनन करते हुए विश्लेषण किया है वे प्रतिक्रियाएं कृति की पठनीयता को सिद्ध करती हैं। महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर दुबे लिखते हैं कि कर्णिका के स्वर कानों में गूंज कर कहते हैं कि आशा के आकाश गिरते नहीं और कभी गिरेंगे भी नहीं। कर्ण प्रिय स्वर गूंजेंगे ही। डॉ. राजकुमार ‘सुमित्र’ के शब्दों में कहें तो, “छंद, कविता का सिंहासन है और छंदिक परंपरा के विश्वासी उसके पुजारी हैं। ” कविवर श्री सनातन कुमार वाजपेई लिखते हैं कि सभी रचनाएं भावपूर्ण हैं जो कवि के हृदय का स्वच्छ दर्पण हैं। पाथेय प्रकाशन के संयोजक श्री राजेश पाठक प्रवीण का सोचना है कर्णिका की कविताओं में समाहित मार्मिक संवेदनायें भावों का प्राबल्य और जीवन जगत की प्रतिध्वनियां कविवर के गहन चिंतन का प्रतीक हैं। पाथेय प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति लगभग चालीस छंदबद्ध गीतों का एक ऐसा गुलदस्ता है, जो पाठक के अंतस को सीधे झकझोर देता है।
वैचारिक बहुमंजिला आयाम और आत्मीय नामकरण
रचियता का यह काव्य-संसार केवल वैयक्तिक अनुभूतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राष्ट्रीयता, प्रकृति प्रेम, सामाजिकता और मातृ-प्रेम के सतरंगी रंग समाहित हैं। इस काव्य-संग्रह का नामकरण भी अत्यंत आत्मीय और मार्मिक है। कवि ने अपनी पौत्री ‘कर्णिका’ के प्रथम स्पर्श से उपजी असीम सुखानुभूति और कोमलता को अपनी रचनाओं की धुरी बनाया है:
“जब मैंने अपनी पौत्री का प्रथम स्पर्श करते छुये अपने मस्तक
उसके चरणों में टिका दिया तो ऐसा लगा जैसे कमल सी कोमलता और
अबोधता ने मेरे अंतरमन को गहरे तक पुलकित कर दिया है।”
प्रकृति का सजीव और अलबेला आंचल
‘कर्णिका’ के पन्नों को पलटते ही प्रकृति अपने पूर्ण यौवन और विविध रूपों में सामने आती है। कवि का मन वनों, उपवनों, बादलों और खिलखिलाती कलियों के बीच विचरण करता है। संग्रह की कविता ‘वसुन्धरा’ में प्रकृति के श्रृंगार का ऐसा विहंगम दृश्य उभरता है कि पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है:
“सज गई आभूषणों से
धरा ने श्रृंगार किया
सुरभित हुयें सुमन सतरंगी
खुशनुमा संसार किया…”
प्रकृति के इसी अंचल में जब राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव का स्वर पिरोया जाता है, तो कविता ‘मेरा भारत’ के माध्यम से देश की गौरवगाथा स्वतः मुखरित हो उठती है:
“गोद गंगा, गोदावरी सरि
जमुना जल से पूर्ण भरी
करते हैं अभिषेक स्वयं घन
अवनि बनी है जल हरी। “
नारी गरिमा और आत्मीय सबलता का उद्घोष
इस संग्रह की सबसे बड़ी खूबी इसकी वैचारिक गहराई और संवेदनशीलता है। नारी शक्ति और उसकी कोमल किंतु दृढ़ छवि को उकेरती हुई कविता ‘मैं बालिका हूँ’ समाज को एक नया दृष्टिकोण देती है। इसमें अहंकार या देवी होने के झूठे आवरण से परे, एक सच्ची और सजीव बालिका के वास्तविक सामर्थ्य का ओजस्वी चित्रण मिलता है:
“स्नेह की गागर
छलकती
सागरों की गंभीरता हूँ
देवी नहीं
मैं बालिका हूँ।
40 वर्षों तक प्रशासनिक पदों पर सक्रिय रहने के बावजूद भी श्री राजेंद्र मिश्रा जी की काव्य साधना आज भी निरंतर जारी है। उन्होंने अपने भीतर के कवि को जीवित रखा है और उनकी काव्य साधना साहित्यिक क्षेत्र के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन का विषय है।
जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित
आत्मीय बधाई और प्रणाम
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





