स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  सूरज नहीं दिया…२ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २१० ☆

☆ –  सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

मेरे बच्चो !

इस जमाने में

खुशहाली का रास्ता

बहुत तंग है.

आम आदमी के लिये बंद है,

सिफारिश के बिना योग्यता अपंग है।

यकीन करो,

मैं तुम्हारे लिये

सब सुख मुहैया करना चाहता हूँ,

एक सही आदमी की तरह जीकर

मरना चाहता हूँ।

काश!

शेष वर्षों में ऐसा हो पाए,

हर आदमी

जरूरत की चीजें पाए।

बहरहाल

मैं अपने पास

नहीं फटकने दूँगा हताशा, निराशा,

नहीं चाहिये सोने के कटोरे में दूधभात,

हड्डियों को चन्दन सा घिसकर

जुटा ही लूँगा बताशा ।

और जब

उम्मीद का बताशा चुकेगा

यानी जिन्दगी का बताशा घुलेगा

तब मेरे पौरुष का

आखिरी पृष्ठ खुलेगा,

जब सुलग रही होगी चिता

तब तुम कह सकोगे कि हमारा पिता

दूसरों के लिये भी जिया था

वो सूरज नहीं दिया था।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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