श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८४ ☆ देश-परदेश – अमानत में ख़यानत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे देश में तो “पड़ोसी” को भाई जैसे रिश्ते से भी अधिक महत्व दिया जाता है। दुःख की घड़ी में तो सबसे पहले पड़ोसी ही काम आता है।

आज उपरोक्त फोटो स्थानीय समाचार पत्र में देख मन बहुत आहत हुआ। जिस समाज में “पड़ोसी पहले” या पड़ोस प्रेम/ सौहार्द का उदाहरण दिया जाता है, वहां इस प्रकार की घटना होना,  हमारे नैतिक पतन की पराकाष्ठा का पैमाना बन चुका है।

हम तो विगत छह दशकों से हमेशा अच्छे पड़ोसी से लाभान्वित होते आ रहे हैं। छोटे मोटे विवाद, विचारों में मतभेद एक आम बात हैं।

बचपन से आज तक सप्ताह में, कम से कम एक बार जब तक पड़ोसी से “बार्टर” पद्धति में प्राप्त व्यंजन का आनंद छूटा नहीं है। घर की सब्जी जब मन पसंद नहीं रहती थी, तब पड़ोस की चाची/ मासी के यहां से बिना मांगे स्वादिस्ट व्यंजन का खूब आनंद लेते आ रहें हैं। ये सब आप के साथ भी होता आ रहा है।

अब प्रश्न ये है, कि हमारी नैतिकता में इतनी गिरावट क्यों आ रही है? कहीं हम सब पारिवारिक मूल्यों से दूर पश्चिम की शरण में जाना तो नहीं है? धर्म से दूरी बढ़ती ही जा रही हैं। विषय विचार करने का है।

अब कलम को विश्राम देता हूं, द्वार पर लगी घंटी बजी है, अवश्य ही पड़ोसी की होगी, रविवार शाम के समय उनके यहां से इडली प्रति सप्ताह प्राप्त होती है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted