सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १।)

☆ मंजिरी साहित्य # १७ ☆

? – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – २ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

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आगे बढ़ते हैंl आज बताती हूँ कि कैसे कच्छ राज्य की स्थापना हुई?

कच्छ सिंध प्रान्त का प्रशासनिक हिस्सा हुआ करता थाl पर जब अरबों ने इसी सिंध प्रान्त के राजा दाहिर के राउर किले पर आक्रमण किया तब वहाँ जबरदस्त युद्ध हुआl उस समय राजा की सेना में ब्राम्हण, राजपूत और जाट भी शामिल थेl जिसमे राजा दाहिर वीरगति को प्राप्त हुएl उनकी रानी लाड़ी ने बचे हुए सैनिको को एकत्रित कर किले के दरवाजे को अंदर से बन्द कर शत्रु का सामना कियाl पर जब शत्रु किले की दीवार तोड़ने लगा तब असहाय रानी ने जोहर का फैसला लियाl तब उनके साथ वहाँ उपस्थित सभी महिलाओं ने जोहर कियाl परन्तु दुर्भाग्यवश राजा की दो बेटियों को अरबों ने बंदी बनाकर खलीफ़ा को तोहफ़े में भेज दियाl और हिन्दू आबादी पर जरिया कर लगा दियाl इन सभी के चलते सम्मा राजपूत, ब्राम्हण परिवार के साथ कुछ जाट परिवारों ने सिंध छोडकर कच्छ में अपना ठिकाना बनाने का निश्चय कियाl उस समय कच्छ में वाघेला और काठी जातियाँ राज्य करती थींl इन राजपूतों ने यहाँ के शासकों को पराजित कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना शुरू कियाl

एक बार फिर से सिंध ने कच्छ पर आक्रमण कियाl तब कच्छ के झारा पहाड़ियों पर घमासान युद्ध हुआ जिसमे सिंध को मुँह की खानी पड़ी परन्तु हजारों की मात्रा में हिन्दू जडेजाओं ने अपने प्राणो की आहुतियाँ भी दींl

कुछ दिनों में ये सभी राजपूत आपस में लड़ने झगड़ने लगेl जिसे देख इसी वंश के एक प्रतापी राजा राव खेंगरजी जी ने सभी को समझा बुझा कर एकत्रित किया और कच्छ राज्य की स्थापना कीl

इस तरह राव खेंगरजी प्रथम कच्छ पर शासन करने वाले जडेजा राजपूत वंश के प्रथम आधिकारिक संस्थापक भी कहलाएl राव साहब ने कच्छ के क्षेत्रफल, सुचारु अर्थव्यवस्था और भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रख अपने प्रान्त को बारह रियासतों में बाँट दियाl भुज को राजधानी घोषित कर दियाl ये रियासतें निम्न हैंl

1- अबडासा – ये कच्छ के महाबलशाली जागीरदारों का गढ़ थाl यहाँ के राजपूत भुज महाराजा के वंश घराने से थेl ये क्षेत्र इतना बडा था कि इसकी अपनी चार जागीरें थींl

2-अंजार – ये क्षेत्र सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध को जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक मार्ग पर बसा था और इसी वजह से ये कच्छ की समृद्ध रियासत थीl आज भी यह संतों की भूमि कहलाती हैl यह क्षेत्र अपने पारंपरिक धातु बर्तनों के साथ अजरख और ब्लॉक प्रिंट हेतु प्रसिद्द हैl

2- बाणी या बन्नी – यहाँ सिंधु नदी की सहायक नदियों के साथ आई उपजाऊ मिट्टी ने इस क्षेत्र को एशिया के सबसे बड़े घास के मैदान में परिवर्तित कर दियाl यहाँ मिट्टी के गोल घर बनाये जाते है जिसे भुंगा कहते हैंl ये घर भूकंप और तूफानो से रक्षा करते हैंl यहाँ की मुतवा और हलेपोत्रा कढ़ाई विश्व भर में प्रसिद्द हैl

4- भुवड चौवीसी – यह क्षेत्र भुवड गाँव के पास के चौबीस गावों के समूह से बना थाl यहाँ के कारीगर पत्थरों पर नक्काशी कर उनमें प्राण फूंक देते थेl

5- गराडो – यह क्षेत्र शांत और रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण थाl इसे आज नखत्राना और लखपत कहा जाता हैl यह क्षेत्र बाहरी घुसपैठ को रोकने हेतु चौकी का काम करता थाl यह पहाडियों से घिरा हुआ थाl इसी क्षेत्र में कच्छ की कुलदेवी माँ आशापुरा निवास करतीं हैंl सबसे ज्यादा ओस गिरने से इस क्षेत्र को माकपट भी कहा जाता है

6- हालार चौवीसी – इस क्षेत्र की चौबीस जागीरों में किसान वर्ग रहता था जिसने कडी मेहनत कर अपने क्षेत्र को सबसे उपजाऊ बनायाl अच्छी फ़सल ने इसे समृद्धि बनाया और अपने राजा को सबसे ज्यादा राजस्व दियाl

7- कंठ – यह क्षेत्र ऊंचाई पर होने से राजधानी भुज का ढाल कहलायाl कंठ की पहाड़ियों में जडेजा राजा अपनी सेना के साथ मिलकर गोरिल्ला नीति अपनाकर शत्रु पर हमला बोल देते थेl

8- काँठो – मांडवी और मुंद्रा तटीय शहरों ने इसे कच्छ को समृद्ध, आर्थिक दृष्टि मजबूत और व्यापारिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना दियाl यह राजा की आय का मुख्य स्रोत थाl इसी क्षेत्र के सागर खेडू अपनी वीरता हेतु मशहूर थेl आज भी यहाँ के कारीगर समुद्री जहाज बनाते हैंl यहाँ खजूर, चीकू और नारियल की पैदावार होती हैl

9- खड़ीर – कच्छ के सफ़ेद रन के दलदल के बीच का यह क्षेत्र द्वीप थाl मानसून में चारों तरफ पानी भरने पर इसका सम्पर्क टूट जाता थाl इस क्षेत्र को अभेद सुरक्षा चक्र भी कहा जाता थाl धोलावीरा इसी क्षेत्र में हैl और आज सरकार ने इसे रोड टू हेवन नमक सड़क से जोड़ दिया हैl

10- मोथाडा – भुज और अबडासा के बेच का यह क्षेत्र बाजरा और ज्वार की पैदावार करता थाl

11- प्रांथल – आज यह रापर और भाचाऊ का क्षेत्र हैl व्यापारिक मार्ग होने से यहाँ राजा ने विशेष चौकीयाँ बनवाई थींl

12- प्रवर – रण के पास का यह क्षेत्र जिसकी जमीन में नमक की मात्रा अत्यधिक होने से यहाँ की भूमि बंजर बन गईl यहाँ लखपथ का किला थाl इस किले पर राजपूत सेना प्रति प्रहर पहरा देती थीl पहले यहाँ बंदरगाह था जहाँ सिंध और गुजरात के व्यापारी व्यापार करने आया जाया करते थेl नारायण सरोवर आज भी यहाँ का मुख्य पर्यटल स्थल हैl

—- क्रमशः

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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