श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८५ ☆ देश-परदेश – World Day for International Justice: 17th July ☆ श्री राकेश कुमार ☆
आज प्रातः ज्ञात हुआ कि आज विश्व न्याय दिवस है। मन को बड़ी शांति मिली कि पूरा विश्व न्याय व्यवस्था को मानता है।
न्यायालय में कार्यरत कर्मचारी, अधिकारी और न्यायधीश के बारे में हम मुंह ना ही खोलें तो अच्छा है। इस विषय पर मित्र मंडली में चर्चा होती रहती है, वैसे हमारे व्हाट्स ऐप ने इनकी व्यवस्था के चिथड़े उखाड़ने में कोई कमी नहीं रखी है।
एक मित्र बोले अब तो न्याय की देवी की आँखों से पट्टी उतार दी गई है, अब न्याय सब देख सकता है। कुछ जानकारों का कहना है, पट्टी हटाने के बाद से न्याय व्यवस्था में कार्य करवाने का नगद में होने वाला खर्च भी अब पहले से एक चौथाई बढ़ गया है।
अब कोई सम्राट विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठ कर न्याय तो नहीं कर रहा है, या बत्तीस पुतलियां हैं, जो न्याय पर सवाल उठाए जाएंगे। इतिहास में तो बादशाह जहांगीर की न्याय जंजीर की चर्चा भी है। हमारा इतिहास लिखने वाले कौन से राजा हरीश चंद्र के वंशज थे ? जो सब सच लिखा होगा।
देश के दक्षिण भाग में एक “संगोल राजदंड” प्रतीकात्मक रूप में संसद स्पीकर के पास रखा हुआ। उसके आने के बाद भी सांसद अपने घटिया व्यवहार में कोई बदलाव नहीं ला पाए हैं।
“Justice Delayed is Justice Denied” या कानून अंधा होता है, वाली कहावते अमर हो चुकी हैं। न्याय व्यवस्था की पैरवी करने वाले भी न्याय व्यवस्था को नीचा दिखाने में भरपूर सहयोग करते हैं।
© श्री राकेश कुमार
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