सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १८ ☆
कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ३ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
1 कोरी = 2 अधियो = 4 पयालो = 8 ढाबू = 16 ढिगलो = 24 दोकड़ो = 48 त्राम्बियो
जी हाँ ये सारी कच्छ रियासत की अपनी स्वयं की मुद्राएं थींl ये सोने, चांदी और ताँबे के सिक्कों से बनी होती थींl इन सभी सिक्कों के एक तरफ कच्छ के राजा का नाम देवनागरी लिपी में और राजघरानों के चिन्ह त्रिशूल, कटार और अर्धचंद्र उकेरे होते थेl
कच्छ का मांडवी तट जो अरब सागर का एक तट था यहाँ चौरासी देश की ध्वजाएं लहराती थींl इसी कारण से इसे चौरासी झंडो का बंदरगाह भी कहते थेl ये झंडे कच्छ के व्यापारिक साम्राज्य को दर्शाते थेl यहाँ हाथी दाँत, खजूर, लकड़ी, मसाले आदि आयात होते थेl और हस्तशिल्प, घी, चमड़ा, नमक आदि निर्यात होते थेl
उन दिनों वस्तु विनिमय होता था परन्तु कच्छ में व्यापारियों को प्रवेश करने से पहले इन मुद्राओं को खरीदना होता था, तभी वो मुद्राओं से व्यापार कर सकते थेl
सिर्फ समुद्री मार्ग से नहीं अपितु सडक मार्ग से भी व्यापार राजस्थान, सौराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, मध्यप्रदेश और मुंबई में भी होता थाl सड़क व्यापार अधिकतर ऊँट से होता थाl ये खराई ऊँट होते थेl ये पानी में भी तैर सकते थेl ये ऊँट समुद्र के आसपास के मैंग्रोज खाते थेl ये कई दिनों तक मीठे पानी के बिना भी जीवित रह सकते थेl
ऊन दिनों मांडवी बंदरगाह पर जहाजों को दिन और रात के समय रास्ता दिखाने की बड़ी ही अनोखी तकनीक होती थीl दिन में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ से दूरबीन की सहायता से समुद्री जहाजों को देखकर अधिकारी रंगीन झंडे लहराते थेl ज्वार का इंतजार करते ये किनारे से लग जाते थेl
वहीं रात्रि में किले के सबसे ऊपरी स्तम्भ पर बहुत बड़ी सी मशाल जलती थी जो लाइट हाउस का काम करती थीl जब दूर से आने वाले जहाज की लाइट दिखती तब मांडवी के नाविक अपनी नावों में मशालें जलाकर उनके पास पहुंचते और उन्हें अपने साथ सुरक्षित ले आते थेl जब ठंड के दिनों में कोहरा होता तब एक समयावधि पर तोप दागते थे और विशाल नगाड़े भी बजाते थेl जिससे जहाजों को बंदरगाह की दिशा मालूम हो जाती थीl
जब 1947 में हमें आजादी मिली तब कच्छ को भी भारत में मिला लिया गयाl उस समय के अंतिम शासक मदनसिंह जी ने अंतिम सिक्का बनवाया जिसपर देवनागरी लिपि में जयहिंद लिखवाया थाl
स्वतंत्रता के पश्चात कच्छ को मुंबई के एक जिले रूप में सम्मिलित कियाl तब कच्छ की सरकार मुंबई से चलती थीl पर भाषाओं को ध्यान में रखकर मुंबई का विभाजन हुआ तब कच्छ को मुंबई से अलग कर गुजरात में शामिल कर दिया गयाl
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





