श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४७ अग्निधर्मा… ?

प्राय: हम सबके घर की ठाकुरबाड़ी में तड़के और सांझ, दीया प्रज्ज्वलित किया जाता है। सामान्यत:  दीये के मध्य भाग में घी में डूबी बाती रखकर उसका अग्रभाग ठाकुर जी की ओर करके उसे प्रदीप्त करते हैं।

आज देखता हूँ कि बाती का मुँह ठाकुर जी की ओर न होकर साधक की ओर हो चला है। इसके चलते ज्योति भी साधक की ओर आ रही है।

दृश्य से विचार उपजा, विचार का आलोक मस्तिष्क में प्रभासित हुआ। अपने देखे पर विचार किया, ज्योति की दिशा पर चिंतन किया तो फिर विचार पर,  चिंतन पर और स्वयं पर हँसी आने लगी।

लौ का अग्रभाग, उसका मुँह कौनसा है, यह कौन निर्धारित करेगा? अग्नि तो अग्नि है। उसका हर अंश दहकता है। हर दिशा में अग्रभाग है। पत्थरों की रगड़ से उद्भूत स्फुलिंग से लेकर अरण्य को चट कर जाने वाले दावानल तक और आकाश में लावा बिखेरती दामिनी से लेकर सागर के पेट में सुलगते बड़वानल तक, हर प्रकार की अग्नि का गुणधर्म है दाहकता।

भारतीय परंपरा का एक गुणधर्म, मानवीकरण भी है। अग्नि का मानवीकरण करते समय एक दूसरे की विपरीत दिशा में  दो चेहरे दिखाए जाते हैं। अग्नि के प्रवाह की कोडिंग हैं ये दो चेहरे। एक ओर ऊर्जा का, जीवन का प्रतीक है अग्नि। दूसरी ओर ऊर्जा के गमन के बाद देह का लपटों को समर्पण का प्रतीक है अग्नि।

वतायो फ़क़ीर सिंध के गहन दार्शनिक एवं विद्वान संत थे। उनके अनेक आख्यान प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि कंपकंपाने वाली शीत लहर की एक रात में वतायो और उनकी माँ, दोनों ठिठुर रहे थे। माँ ने बेटे से कहा, “वतायो, सुनते हैं, तू ईश्वर के निकट है। मैं भी यही महसूस करती हूँ। आज जाड़ा बहुत है। अपने ईश्वर से कह कि नर्क की थोड़ी-सी आग हम ग़रीबों के लिए दे दे।”

वतायो हँस पड़े। फिर बोले, “माँ, नर्क में कोई आग नहीं होती। सब अपनी-अपनी आग साथ लेकर आते हैं।”

अपनी अग्नि के साथ किस पथ पर और किस दिशा में यात्रा करनी है, इसका निर्णय निजी स्तर पर ही करना होता है। हाँ, अपनी अग्नि के आलोक में अग्निधर्मा हो सकने का स्वर्णिम अवसर प्रकृति हरेक को देती है। इति।

© संजय भारद्वाज 

संध्या 5:25 बजे, 01 अगस्त 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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